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Tuesday, 27 September 2022

मरीचिका

         


           

                   भोर की वेला, सूरज अपना तेज लिए आँगन में उतरा; कह रहा है- "देख!  मैं कितना चमक रहा हूँ। बरसाता कच्ची धूप काया की सारी थकान समेटने आया हूँ।"

 रेवती कहती है-  ” दूर हट मरजाणा! सर पै न मंडासो मार।”

  तभी एक आवाज़ दस्तक देती है।

”ताई देख! कौन आया है?” श्यामलाल ने दूर खड़ी एक औरत की ओर इशारा किय।

”क्यों, तेरे बाप ने दूसरा विवाह कर लिया क्या?”

रेवती बाड़ पर फैली तोरई और घीया की बेल ठीक करते हुए बिना देखे ही कहती है।

”ताई कभी तो सीधे मुँह बात कर लिया कर।” श्यामलाल झुँझलाता है।

”ठीक है, मुँह मोगरी-सा न बना; बता कौन है?”

रेवती पलटकर देखती है।

”दिखती तो औरत ही है, भीतर क्यों न आई बैरन।” रेवती माथे पर हाथ सटाकर देखती है।

”कानूड़ी! ओह!! म्हारी कानूड़ी।”

यह वही कानूड़ी है जो रूठकर गई थी। ”देख! तो कितनी काली पड़ गई है म्हारी छोरी, तेरे ख़सम के अनाज कम पड़ गया था के ?” बड़बड़ाते हुए अपनी बेटी की ओर दौड़ती है, ख़ुशी में बढ़ते कदम सहसा रुक जाते हैं। स्मृतियाँ आँखों के सामने बिखर जाती हैं।

” ठहर कांता! तू ऐसे ना जा सके।”

रेवती कांता के पीछे-पीछे तेज़ गति से चलते हुए आवाज़ लगाती है।

”सुन बावली! आठ वर्ष की छोरी न बाप कोण्या (नहीं )मिला करें (करते )।”

कहते हुए, रेवती आवाज़ पर आवाज़ दिए जा रही है।

"नहीं! नहीं!! और न सह सकूँ अब, मेरा है ही कौण (कौन )यहाँ?”

आठ साल की बच्ची की ऊँगली पकड़े  कांता तेज़ गति से चलती है। बेटी रीता माँ!माँ!! पुकारती पाँव पीछे खींचती है।

"ठहर! एक बार, मेरे त्याग ने यों न ठुकरा।"

रेवती बाँह फैला कांता को जाने से रोकती है।

वर्षों पहले गुज़रा समय आज फिर आँखों के सामने बिखर गया।

उसकी कानूड़ी कुछ ही दूरी पर खड़ी आँसू बहा रही थी।

”माँ छोरी न बाप न मिला, प्रेमी बहुत मिले।”

कहते हुए माँ से लिपट कांता रोने लगती है। गाँव की सबसे होनहार ज़िद्दी,पढ़ी-लिखी लड़की कांता उस समय की पाँचवी पास। दुनिया से टकराने का जुनून,विधवा हो दूसरा विवाह रचाकर निकली थी गाँव से।

”मैं न कहती मरो (मृत )मास न छोड़े ये भेड़िया,  तू तो जीवती निकली थी।” कहते हुए रेवती बेटी और नातिन की हालत पर फूट-फूट कर रोती है।

”कितनी उम्र में लेकर भाग गया छोरी ने तेरो ख़सम।” रेवती बेटी से सीधा प्रश्न करती है।

”पंद्रह-सोलह की ही हुई थी, हरामी की नज़र पहले से थी।” कांता अपनी ओढ़णी से नाक पोंछते हुए कहती है।

”हूँ! तब तो ठीक है।”  रेवती पास ही बरामदे में बैठ जाती है।

”माँ! मेरी छोरी ऐसी न थी, बहला-फुसला लिया उसने।” कांता मुँह बनाते हुए कहती है।

"छोरी तो म्हारी भी ऐसी न थी उसी हरामी ने फँसा लिया।” रेवती एक-एक कर तोरई और घीया टोकरी से बाहर निकाल कर रखती है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति' 

Wednesday, 21 September 2022

भावों की तपिश


          ”हवा के अभाव में दम घुट रहा है, हमारा नहीं; पहाड़ों का। द्वेषी है! पेड़ों को पनपने नहीं देता!! "

पहाड़ों पर भटके एक पंछी ने फोन पर अपनी पत्नी से कहा।

"कौन है द्वेषी?"

पत्नी ने सहज स्वर में पूछा।

”सूरज! कुछ दिनों से पृथ्वी से अनबन जो चल रही है उसकी !!”

पंछी सूरज, पृथ्वी और पहाड़ों से अपनी नज़दीकियाँ जताते हुए बड़ी चट्टान के सहारे  पीठ सटाकर बैठ जाता है।

”तुम सुनाओ! तुम्हारे यहाँ क्या चल रहा है?

पंछी से व्याकुलताभरे स्वर में पूछा।

”कुछ नया नहीं!  वही रोज़ का रुटीन!! दैनिक कार्यों में व्यस्त धूप धीरे-धीरे दिन सोख रही है। तीसरे पहर की छाँव तारीख़ से मिटने की पीड़ा में दहलीज़ पर बैठी है। समय चरखे पर लिपटने के लिए तेज़ी से दौड़ रहा है।”

पत्नी ने दिन का ब्यौरा देते हुए एक लंबी सांस भरी।

"और पौधे?” पंछी ने तत्परता से पूछा।

”पौधे नवाँकुर खिला रहे हैं तो कहीं फूलों में रंग भर रहे हैं।”

पत्नी ने बड़ी सहजता से कहा।

”हूँ " के साथ पंछी और पहाड़ों ने गहरी सुकून की सांस भरी जैसे हवा का झोंका नज़दीक से गुज़रा हो!


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Saturday, 10 September 2022

मरुस्थल की नदियाँ



”बाँकपन लिए,

मरुस्थल की नदियाँ खारी होती हैं!”

 विनय! रेत से भरी मुट्ठी हवा में उछालता व्यंगात्मक दृष्टि से अरुँधती की ओर मुस्कराता है।

अपेक्षाओं की बिखरती लहर देख वह शिकायतों का सेतु खड़ा करता है। तैरती विचारों की मछलियाँ समंदर और मरुस्थल का भेद भूल जाती हैं। रेत हवा में उड़ने लगती है। बची जल धराओं को सुविधा अनुसार मोड़ने का प्रयास पहाड़-सा लगता है।

”आख़िर समंदर की बेटियाँ हैं! लवणीयता लिए तो बहेंगी ही!”

इस बार विनय ने शब्दों की सूखी रेत नहीं उड़ाई ! भावों में भिगो मिट्टी का गोला बना अरुँधती की तरफ़ फेंका।

" नदी का बहना मात्र सार्थक नहीं है?”

अरुँधती ने शब्दों का घूँट-सा गटका इस वाक्य ने उसे पुनर्जीवित कर दिया।

”पहाड़ी नदी के स्वर में सुकून, पानी में मिठास होता है!”

विनय स्वच्छंद उड़ान की इच्छा में ठहरे पानी में कंकड़ फेंकता है।

" बादलों के नहीं बरसने से मरुस्थल रूठता है ? उसके नसीब में नहीं होता जंगल, मीठे पानी का झरना।”

जीवन से जूझती नागफनी थी अरुँधती , वहीं विनय शीतल झोंका ;  विनय शब्द बनने को तत्पर आवाज़ तलाशता रहा। अरुँधती उसे भाव बना मरुस्थल में छुपाती रही।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

 

Saturday, 20 August 2022

ख़ामोश सिसकियाँ

                              


                                      ”देख रघुवीर ! इन लकड़ियों के पाँच सौ से एक रुपया  ज़्यादा नहीं देने वाला। तुमने कहा- चार खेजड़ी की हैं, यह दो की नहीं लगती!”

दोनों हाथ कमर पर धरे एक पैर आगे बढ़ाए खड़ा प्राइमरी स्कूल का अध्यापक व रघुवीर का छोटा भाई धर्मवीर।

”कैसे नहीं लगती दोनों जगह वाली दो-दो खेजड़ी की हैं, पूछो सुनीता, सुमन और सजना से, हम चारों ने मिलकर इकट्ठा की हैं।”

रघुवीर चोसँगी ज़मीन में गाड़ते हुए पसीना पोंछता है।

”देख भाई!  पाँच सौ से एक रुपया ज़्यादा नहीं देने वाला,तू जाने तेरा काम जाने; अब तू यह बता सुखराम दो दिन से स्कूल क्यों नहीं आ रहा?”

धर्मवीर रघुवीर की दुःखती रग पर हाथ रखते हुए ऊँट पर बैठे सात साल के सुखराम की ओर इशारा करता है, सुखराम अध्यापक कहे जाने वाले काका को देखता हुआ दाँत निपोरता है।

”काका! काका! यह हमारे साथ भट्टे पर मिट्टी खोदने जाता है।”

तीनों लड़कियाँ एक स्वर में एक साथ बोलती हैं।

” तू इन छोरियों के जीवन से कैसा खिलवाड़ कर रहा है? पास के गाँव के स्कूल में दाख़िला क्यों नहीं करवाता इनका!”

पास पड़ी लकड़ियों को धर्मवीर घूम-घूमकर देखता है। ”हाँ लकड़ियाँ हैं तो मोटी-मोटी, बढ़िया है। आड़ू को क्या पता मन और पंसेरी का ?”

रघुवीर की मासूमियत पर धर्मवीर अपनी राजनीति का लेप चढ़ाता है।

”तू अपने भट्टे पर पराली क्यों नहीं काम में लेता? खेत की लकड़ियाँ मेरे भट्टे पर डाल दिया कर, मैं छोरियों के स्कूल की व्यवस्था करता हूँ। तू  निरा ऊँट का ऊँट रहा, इन्हें तो इंसान बनने दे!”

कहते हुए धर्मवीर सूरज को ताकता है और वहाँ से स्कूल के लिए निकल जाता है।

”कलियुग में कौवों का बोलबाला है। कैसे बचेंगीं चिड़ियाँ ? कौन पिता होगा जो नहीं चाहता हो कि उसकी बेटियों को पंख और खुला आसमान न मिले?”

रघुवीर घर्मवीर की ओर देखता हुआ अंगोंछा सर पर कस के बाँधता है।

”बापू ! बापू ! स्कूल जाना है हमें।”

सुमन, सजना मन को पसीजते हुए कहती हैं।

”दिखता नहीं ! बापू की आँख में पसीना चला गया। चल दूर हट छाँव में बैठने दे!”

बड़ी लड़की सुनीता अपने पिता रघुवीर की ओर पानी से भरा जग बढ़ाती है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Monday, 15 August 2022

ठूँठपन


                        रिमझिम बरसात की झड़ी कजरी के मीठे स्वर-सी प्रतीत हो रही थी। मानो एक-एक बूँद प्रेम में झूम रही हो। जो प्रेम में था उसके लिए बारिश प्रेमल थी और जिसका हृदय पीड़ा में था उसके लिए समय की मार! अपनों के लिए अपनों को दुत्कारना फिर उन्हें अपनाने की चाह में भटकती धनकोर अनायास ही कह बैठती है -

”गृहस्थी में उलझी औरतें प्रेम में पड़ी औरतों-सी होती हैं।” स्वयं के अधीर मन को ढांढ़स बंधाती बारिश में भीगी ओढ़नी निचोड़कर उससे मुँह पोंछती है।

” किसी एक की परवाह में उलझी दूसरे के हृदय से कब ओझल हो जाती हैं, गृहस्थ औरतें जानते हो ना आप?”

स्पष्ट शब्द अशिष्टता की श्रेणी में कब खड़े कर दिए जाते हैं इसी विचार के साथ धनकोर के दृष्टिकोण को धारण करते हुए,सीढ़ियों पर बैठी गीता सूखा टॉवल उसकी ओर बढ़ाती है।

”तभी कहती हूँ लौट आ, तू वह नहीं रही जो पच्चीस वर्ष पहले थी।”

पश्चाताप की अग्नि में जलती धनकोर ममत्व भाव उड़ेलती, अचानक बिजली गिरे वृक्ष से लिपटकर सुबकने लगती है। उम्र के इस पड़ाव पर ज़रूरत का ताक़ाज़ा देती है इसी उम्मीद के साथ कि कोंपल फिर फूट जाएगी और वृक्ष हरा-भरा हो जाएगा।

"भूल क्यों नहीं जाते घटना और घटित लोगों को?”

कहते हुए- गीता के आँसू बहे न हृदय का भार बढ़ा और न ही पीड़ा के अनुभव से स्वर में आए कंपन ने अपना रुख़ बदला, सच यह ठूँठपन नहीं तो और क्या था उसका?


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Thursday, 28 July 2022

विसर्जन



                   ”गणगौर विसर्जन इसी बावड़ी में करती थीं गाँव की छोरियाँ।”

काई लगी मुंडेर पर हाथ फेरती शारदा बुआ मुंडेर से अपनी जान-पहचान बढ़ाने लगीं ।माँ के हाथों सिले घाघरे का ज़िक्र करती बावड़ी से कह बैठी -

”न जाने कितनी छोरियों के स्वप्न डूबे हैं इसमें! पानी नहीं होता तो भी इसी में पटककर जाती।”

आँखें झुका पैरों में पहने चाँदी के मोटे कड़ों को हाथ से धीरे-धीरे घुमाती साठ से सोलह के पड़ाव में पहुँची बुआ उस वक़्त, समय की चुप्पी में शब्द न भरने की पीड़ा को आज संस्कार नहीं कहे।

"जल्दी ही जीना भूल जाती हैं औरतें कब याद रहता है उन्हें कुछ ?”

बालों की लटों के रूप में बुआ के चेहरे पर आई मायूसी को सुदर्शना हाथ से कान के पीछे करते हुए कहती है।

” किसे डुबोती छोरियाँ ?”

"उस टेम सपने कहाँ देखने देते थे घरवाले, चूल्हा- चौकी खेत-खलिहान ज़मींदारों की बेटियों की दौड़ यहीं तक थीं?”

जीने की ललक, कोंपल-से फूटते स्वप्न; उम्र के अंतिम पड़ाव पर जीवन में रंग भरतीं सांसें ज्यों चेहरे की झूर्रियों से कह रही हों तुम इतनी जल्दी क्यों आईं ?

न चाहते हुए सुदर्शना से बुआ के पैर पर पैर रखा गया और कह बैठी-

"  छोरियाँ तो देखती थीं न स्वप्न।”

"न री! बावड़ी सूखी तो तालाब, नहीं तो कुएँ और हौज़ तो घर-घर में होते थे उनमें डुबो देती।”

”स्वप्न या गणगौर ?”

सुदर्शना ने फिर यही प्रश्न दोहराया।

बड़प्पन का मुकुट ज़मीन पर पटक, मुँह फेरते हुए धीरे से कहती है।

"दोनों।”


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Sunday, 10 July 2022

विश्वास के चार फूल



                 ”पिता का हाथ छूटते ही भाई ने कलाई छोड़ दी और पति का साथ छूटने पर बेटे ने…।”

 बालों को सहलाते हुए सावित्री बुआ की उँगलियाँ सर पर कथा लिखने लगीं। अर्द्ध-विराम तो कहीं पूर्ण-विराम और कहीं प्प्रश्न-चिह्न पर ठहर जातीं। विश्वास सेतु  टूटने पर शब्द सांसों के भँवर में डूबते परंतु उनमें संवेदना हिलकोरे मारती दिखी।

बाल और न उलझें इस पर राधिका ने एक नज़र सावित्री बुआ पर डालते हुए कहा-

”बाल उलझते हैं बुआ!”

"करती क्या हो?दिनभर बाल सूखे, हाथ-पैर सूखे; कब सीखोगी स्वयं का ख़याल रखना?"

झुँझलाहट ने शब्दों के सारे प्रवाह तोड़ दिए, अब भाव और शब्द पहेलियाँ गढ़ने लगे।

” समर्पण दोष नहीं, आपका स्वभाव ही ममतामयी है।”

राधिका ने पलटकर बुआ के घुटनों पर ठुड्डी टिकाते हुए कहा।

"और उनका क्या था ?  उनका हृदय करुणामय  नहीं…?”

माथे से टपकती पसीने की बूंदो में समाहित कई प्रश्न उत्तर की तलाश में भटकने लगे,यह कथा नहीं उपन्यास के बिछड़े किरदारों की पीड़ा थी जो  उँगलियों के सहारे सर में डग भर रही थी।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Sunday, 3 July 2022

वॉलेट


         " मुझे लगता है! तुम अपरिचित हो? परिवर्तन का चक्का चाक नहीं है कि चाहे जब घुमा दो!” कहते हुए- रुग्ण मनोवृत्ति अंगारों पर लेट जाती है।

  मॉल हो या छोटी-बड़ी दुकानें दरवाज़े के बाहर भेद-भाव भरी चप्पलें व्यवस्थित करने का ज़िम्मा इसी मनोवृति का होता है। एक-एक चप्पल का गहराई से अवलोकन करती फिर दिन व दिनांक का टोकन नाम सहित फला-फला व्यक्ति विशेष के हाथों में थमा देती है।

"ठीक ! तुम कुछ दिनों बाद आना।” कहते हुए, रुग्ण मनोवृति वहाँ से चली जाती है।

 विभा को मिले टोकन पर दिन व दिनांक निर्धारित नहीं है उसने अक्ल के घोड़े दौड़ाए परंतु वह समय से पिछड़ चुकी है।

विभा के साथ उम्मीद में हाथ बाँधे खड़ी चार आँखें, बार-बार एक ही वाक्य दोहरातीं है।

”एक बार और बात करके देखो, बस आख़िरी बार; फिर घर चलते हैं।”

वे आँखें हृदय से फिसलते सपनों को सँभालती हैं फिर अगले ही पल तितर-बितर बिखरी लालसाओं को समेटने में व्यस्तता दिखाने लगती हैं।

अंततः घूरने लगती हैं विभा के हाथों में जकड़े सिफ़ारिश के छोटे से वॉलेट को जिसका उपयोग उनके लिए निषेध है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Wednesday, 1 June 2022

दंड



                                            बर्तनों की हल्की आवाज़ और एक स्वर कौंधता है।

” निर्भाग है तू !  यह देख,  तेरा श्राद्ध निकाल दिया आज।”

आक्रोशित स्वर में क्रोध थाली से एक निवाला निकालता है और ग़ुस्साए तेवर लिए थाली से उठ जाता है।

”मर गई तू हमारे लिए आज से …ये ले…। "

और मुँह पर कफ़न दे मारा ईर्ष्या ने।

स्त्री समझ न पाई मनोभावों को, वह सकपका जाती है। "हुआ क्या ? "

 समाज की पीड़ित हवा के साथ, पीड़ा से लहूँ लहूलुहान कफ़न में लिपटी स्त्री जब दहलीज़ के बाहर पैर रखती है तभी उलाहना से सामना होता है।

” पुरुषों के समाज में नारी हो, तूने नारीत्व छोड़ पुरुषत्व धारण किया ? उसी का दंड है यह ! "

उल्लाहना खिलखिलाते हुए सामने से गुज़र जाता है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Wednesday, 18 May 2022

पत्थरों की पीड़ा



"तोगड़े ! रिश्तों से उबकाई क्यों आती है? ”

पलकों पर पड़े बोझ को वितान तोगड़े से बाँटना चाहता है।

"श्रीमान! सभी अपनी-अपनी इच्छाओं की फिरकी फेंकते हैं जब वे पूरी नहीं होतीं तब आती है उबकाई।"

तोगड़े हाज़िर-जवाबी से उत्तर देता है।

"पिछले पंद्रह महिनों से पहाड़ियों के बीचोंबीच यों सुनसान टीसीपी पर बैठना ज़िम्मेदारी भरा कार्य नहीं है क्या ?"

वितान कुर्सी पर एक लोथड़े के समान पड़ा है। जिसकी आँखें तोगड़े को घूर रही हैं,घूरते हुए कह रहीं हैं- ”बता तोगड़े, हम क्यों हैं?धरती पर,आख़िर हमारा अस्तित्व क्या है? क्यों नहीं समझते  दुनिया वाले कि छ महीने में एक बार समाज में पैर रखने पर हमें कैसा लगता है?”

"क्यों नहीं? है श्रीमान! है, ज़िम्मेदारी से लबालब भरा है दिन भर एक भी गाड़ी यहाँ से नहीं गुज़रती फिर भी देखो! हम राइफल लिए खड़े हैं।"

कहते हुए- तोगड़े राइफल के लेंस से पहाड़ियों को निहारते हुए उनमें खो जाता है।

"तोगड़े!"

कहते हुए वितान चुप्पी साध लेता है।

" हुकुम श्रीमान।”

वह  राइफल के लेंस में देखता ही जाता है।

"तुम्हारी पत्नी,दोस्त और घरवाले शिकायत नहीं करते तुम से तुम्हारी ज़िम्मेदारियों को लेकर।"

वितान उलझनों को एक-एक कर सुलझना चाहता है। ज़िंदगी से पूछना चाहता है कि आख़िर किया क्या है मैंने?

"नहीं साहेब! पत्नी को टेम ही कहाँ मिलता है? खेत-खलिहान बच्चे, चार-चार गाय बँधी हैं घर पर,  छुट्टी के वक़्त उसे याद दिलाना पड़ता है कि मैं भी घर पर आया हुआ हूँ। पगली भूल जाती है।"

तोगड़े का अट्टहास उसे गाँव ले जाता है यादों के हल्के झोंकों की फटकार से वह उठकर खड़ा हो जाता है और इधर-उधर निगाह दौड़ाने लगता है।

"साहेब! समाज में सभी का पेटा भरना पड़ता है। नहीं तो कौन याद रखता है हम जैसे मुसाफ़िरों को, दोस्तों को एक-एक रम की बॉटल चाहिए। घरवालों को पैसे और पत्नी को कोसने के लिए नित नए शब्द, बच्चों के हिस्से कुछ बचता ही कहाँ है? शिकायतों के अंकुर फूट-फूटकर स्वतः ही झड़ जाते हैं।"

वितान की मायूस आँखों को हँसाने के प्रयास के साथ तोगड़े दाँत निपोरते हुए टीसीपी के गोखे से झाँकता हुआ पानी की बॉटल उठाता है।तपते पहाड़ो से गुज़रते शीतल झोंके अपनों की स्मृतियों को और गहरे से उकेरने में मग्न हो जाते हैं।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Monday, 2 May 2022

मौन गौरैया



              कॉरिडोर में कबूतर का धरने पर बैठना। जाने पहचाने स्वर में गुटर-गूँ गुटर-गूँ करते हुए कहना । 

"हाँ, वही हूँ मैं।" 

राधिका जैसे कह रही हो।

 ” हाँ,गमले के पीछे की एक गज़ ज़मीन तुम्हारे ही नाम तो लिख रखी है। "

  हिलकोरे मारती स्मृतियाँ; राधिका समय से साथ बहती ही चली गई।

 "हाँ, वही तो है यह कबूतर…नहीं! नहीं!वह नहीं है, वह तो कुछ मोटा था।” अब कबूतर की पहचान करने को आकुल हो गया मन ?

 कबूतर अपने साथ ले आया यादों की पोटली।  राधिका उस गठरी में ढूँढ़ने लगी थी कोकिला को, उसकी माँ उसे कोकि कह पुकारती।

 राधिका जैसे ही कॉरिडोर में रखी कुर्सी खिसकाती उसके एक-दो मिनट बाद ही कोकि छत के कॉर्नर पर आकर खड़ी हो जाती । कोकि वहाँ रहने नहीं आई थी तब उस दीवार पर यही कबूतर बैठा करता था।

 भावों ने उठ कर समर्थन किया। 

" हाँ, शायद यही था।" 

 फ़ुरसत के लम्हों में अक्सर राधिका उसे निहारती रहती । अब वह स्थान कोकि का हुआ। उसकी माँ उसे आवाज़ लगाती-

 "अरे! कोकि इधर आ, बाहर बहुत धूप  है।" 

 तब वह हाथ हिलते हुए कहती- " मैं अभी नहीं आऊँगी।” उसके हिलते हाथ राधिका को यों ही कुछ कहते से नज़र आते।

 दिन-रात अपनी गति से डग भरते गए। राधिका और कोकि एक दूसरे को देखकर समय व्यतीत करने लगे। एक बंधन जो उन्होंने नहीं बाँधा स्वतः ही जुड़ता चला गया, जो भी पाँच-सात मिनट पहले आता वह दूसरे का इंतज़ार करता। आँखें मिलती एक मिठी मुस्कान के साथ,कोकि मुट्ठी भर स्नेह भेजती और राधिका ममता के फूल। 

कबूतर पता नहीं कब राधिका के कॉरिडोर में आकर रहने लगा और इस कहनी का निमित्त बन गया। वह अकेला नहीं आया, पहले अपने दो अंडे छोड़कर  गया फिर वहीं अपना घर बना लिया। राधिका उसे दाना-पानी  देने लगी, जल्द ही उससे भी दोस्ती हो गई । अब देखकर उड़ता नहीं, वहीं पंख फैलाए बैठा रहता। 

"हाँ,यह वही कबूतर है शायद दोबारा आया है।" अवचेतन से चेतन में लौटी राधिका उसे देखकर फिर यह शब्द दोहराती है।

समय अपनी चाल चलता गया। कोकि कभी उदास तो कभी हँसती जैसे भी रहती पाँच बजे उसी कॉर्नर पर खड़ी मिलती। उसका मौन शब्द बिखेरता, राधिका पलकों पर सहेज लेती। कोकि की घनी काली पलकें बहुत कुछ कह जातीं। मम्मी से कितना लाड- प्यार,कितनी डाँट मिली।इन सब का हिसाब  देने लगी थी,उसकी मुस्कान हृदय में बदरी-सी बरसती। निगाह भर देखना दोनों के लिए तृप्ति का एहसास था।  

उन दिनों अचानक राधिका की बेटी बीमार पड़ गई। कोरिडोर में बैठने का सिलसिला टूट गया। बेटी की तपती काया देख राधिका बिखर-सी गई। झुँझलाहट  कंधों पर टंगी  रहती और दुपट्टा खूँटी पर। या तो कुछ बोलती नहीं, बोलती तो काटने को दौड़ती। एक दिन दो दिन न जाने उस समय बेटी को क्या हुआ था? तब उसे एहसास हुआ जिस मोह  मुक्ति की वह दुहाई देती फिरती है  वह तो अभी भी उसके पल्लू से बँधा पड़ा है ।फिर वह  मुक्त किससे हुई? क्या था जिससे वह स्वयं को मुक्त-सी पाती। एक हल्कापन जो उसे अंबर में उड़ा ले जाता। बादलों के उस पार  धरती की सुंदरता निहारने।

किरायदार शब्द कितना पीड़ादायी होता है, यह एहसास भी उसे उन्हीं दिनों हुआ जब सांसें देह का साथ छोड़ती-सी लगी।

 तभी उस दिन अचानक डोरबेल बजती है।

”आंटी आजकल आप कोरिडोर में क्यों नहीं बैठतीं ? "

छोटा-सा बच्चा बार-बार उचक-उचककर डोरबेल बजाता जाता और कहता जाता, बंदर की भांति एक जगह ठहरने का नाम ही नहीं ले रहा था।

"शरारत नहीं करते, दीदी आराम कर रही है ना। "

राधिका ने बड़े ग़ुस्से से कहा । अब भला बच्चे को क्या पता, कौन आराम कर रहा है?और कौन जाग रहा है? राधिका के शब्दों की गर्माहट से बच्चा चुपचाप वहीं खड़ा हो गया और पैर के पंजे से चप्पलें हिलाने लगा।

"ये क्या प्रश्न है और कौन हो तुम?”

राधिका ने शब्दों पर पड़ने वाले सभी स्वराघात, बलाघात ताक़ पर रखते हुए,भरे बादलों से निकली बिजली-सी मासूम बच्चे पर टूट पड़ी।

” कोकि ने भेजा है।”

 बच्चा अपमान की लहरों पर सवार हो नथुने फूलाने लगा  कि मुझ पर किस बात का इतना ग़ुस्सा! चॉकलेट की जगह शब्दों का चाबुक जड़ दिया!

"क्यों कोकि स्वयं नहीं आ सकती थी?"

राधिका ने स्वर को सँभालते हुए कोकि पर अपना हक जताते हुए कहा।

”बोलती नहीं है वह, बाहर जाने पर मम्मी फटकारती है उसे। "

हाथ में पकड़ी छोटी-सी छड़ी वहीं छोड़ बच्चा दौड़ता हुआ सीढ़ियाँ जल्दी-जल्दी पार कर गया, पीछे मुड़कर भी नहीं देखा कि उसके एक शब्द से  हृदय टूटकर बिखर गया है।जैसे ही राधिका ने कोरिडोर का दरवाज़ा खोला। साँझ की बरसती धूप में कोकि राधिका का इंतज़ार करती मिली। एक हाथ में गेंद,  दूसरे हाथ से गर्दन का पसीना पोंछती। उसकी आँखें शिकायतों के पर्वत गढ़ रही थीं और पलकें नाराज़गी से भीगी हुई थीं।

उस वक़्त राधिका पाषाण से कम न थी। न भावों ने शब्द गढ़े न हाथों ने हिलकर हाय कहा। हृदय ने जिस तूफ़ान को जकड रखा था, कोकि को देख  झरने-सा बह निकला।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Wednesday, 27 April 2022

मोजड़ी


                   " माँ! बहुत चुभती हैं मोजड़ी।”

 रुआँसा चेहरा लिए, पारुल ने अपना दिल माँ की गोद में रखा। इसी उम्मीद में कि माँ उसे सहलाकर सँभाल लेगी।

" नई मोजड़ी,  सभी को अखरती हैं! धीरे-धीरे इनकी ऐसी आदत लगती है कि कोई और जँचती ही नहीं ।"

माँ झूठ-मूठ की हँसी होठों पर टाँकते हुए बेवजह मेहंदी के घोल को और घोंटती जाती है।

"इनसे से पैरों में पत्थर भी धँसते हैं।"

पारुल अपने ही पैरों की ओर एक टक देखती है। मासूम मन छाले देख सहम जाता है।

 शून्य भाव में डूबी माँ दर्द, पीड़ा; प्रेम इन शब्दों के अहसास से ऊपर उठ चुकी है।बस एक शब्द है गृहस्थी जिसे वह खींचती रहती है। पारुल के पैरों में पड़े छालों पर मेहंदी का लेप लगाते हुए स्वयं के जीवन को दोहराती कि कैसे जोड़े रखते हैं रिश्तों की डोर? माँ परिवार शब्द से बाहर नहीं निकली, इसी शब्द में डूब चुकी है। कभी-कभी तो माँ के हाथों से छूट चेहरे से चिपक जाती है थकान, परंतु माँ है कि बोलती नहीं है। बस एक ही शब्द हाँकती है कुटुंब । यह शब्द पारुल के लिए नया है, तभी चुभती हैं उससे मोजड़ी।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Saturday, 23 April 2022

धरा की अंबर से प्रीत



               "जलती थी देह! अंबर ने छिटकी थी प्रेम की बूँदें!"

भावशून्य निगाहों से धरा, निशा को एक टक निहारती है।निशा सन्नाटे में सिमटी तारों जड़ा आँचल ओढ़े चाँदनी छान रही है।

 बाहों में ले कहता- " ख़्याल रखना अपना, एक आह! दौड़ा चला आता है!"

अंबर के अटूट प्रेम,विश्वास की एक गाँठ और पल्लू से बाँधती है धरा, कहती है -”हाँ मेरी खबर लेते रहना।"

”देखते ही देखते निहाल हो गई! बादलों का बरसना साधना थी। गृहस्थी फल-फूल रही है। निकम्मे बच्चों को पालना रेगिस्तान में दुब सींचने से कम कहाँ? "

अपने अति लाड-प्यार से बिगड़ैल बच्चों को पल्लू से ढकती है धरा, धीरे-धीरे उनका माथा सहलाती है।

बच्चों पर अपार स्नेह न्योछावर करती बहुत कुछ सहती एक लंबी सांस लेती है।

” अमर प्रेम है आपका!”

पवन पेड़ पर टंगी होले से फुसफुसाती है।धरा पवन के शब्दों को अनसुना करते हुए कहती है-

”एक ही परिवार तो था!  देखते ही देखते दूरियों में दूरिया बढ़ गई। चाँद का चाँदनी बरसाना, सूरज का भोर को लाना उसमें इतना आक्रोश भी न था। बादलों का यों भर-भरकर बरसना सब दाता ही तो थे ! बेटी बिजली का रौद्र रूप कभी-कभी पीड़ा देता है, बेटी है ना ; लाडली जो ठहरी।”

समर्पित भाव में खोई धरा, आह! के साथ तड़प उठती है।

”पुत्र समय! प्रेम की प्रति छवी है, गृहस्थी चलाने को दौड़ता है, घर का बड़ा बेटा है ना! मैं भी दौड़ती हूँ उसके पीछे, ये न कहे माँ निढाल हो गई।”

धरा होले से पालथी मार बैठती है, कहीं हिली तो नादान बच्चे भूकंप भूकंप कह कोहराम न मचा दे! "कहेंगे, ग़ुस्सा बहुत करती है माँ।"

" बच्चों की मनमानी पर यों पर्दा न डाला करो !”

निशा धरा के कंधे पर हाथ रखती है।

" ना री क्या कहूँ उन्हें ? दूध के दाँत टूटते नहीं कि कर्म जले अक्ल फोड़ने बैठ जाते हैं ! पानी है!हवा है!!  गढ़ने बैठ जाते है। नहीं तो यों अंबर में छेद कर मेरे आँचल को तार-तार न करते।”

धरा निशा को स्नेह से भीगी हल्की फटकार लगाती है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Wednesday, 13 April 2022

स्वाभिमान का टूटता दरख़्त

                 


                 ”मौत कभी पृष्ठभूमि बनाकर नहीं आती,दबे पाँव कहीं भी चली आती है।”

कहते हुए सुखवीर उठकर बैठ जाता है।

”खाली रिवॉल्वर से जूझती मेरी अँगुलियाँ! उसका रिवॉल्वर मेरे सीने पर था। नज़रें टकराईं! कमबख़्त ने गोली क्यों नहीं चलाई?”

सुखवीर माँझे में लिपटे पंछी की तरह छटपटाता हुआ अर्पिता की गोद में अपना सर रखता है।मौत का यों गले मिलकर चले जाना सुखवीर के लिए अबूझ पहेली बन गई।अर्पिता के हाथ को सहलाते हुए उसकी हस्त-रेखाएँ पढ़ने का प्रयास करता है।

”वह सतरह-अठारह वर्ष का बच्चा ही था ! हल्की मूँछे, साँवला रंग, लगा ज्यों अभी-अभी नया रंगरूट भर्ती हुआ हो ?”

दिल पर लगी गहरी चोट को कुरेदते हुए,सुखवीर बीते लम्हों को मूर्ति की तरह गढ़ता है।आधी रात को झोंपड़ी के बाहर गूँजते झींगुरों का स्वर उस मूर्ति को ज्यों ताक रहे हों।

”भुला क्यों नहीं देते उस वाक़िया को?”

सुखवीर के दर्द का एक घूँट चखते हुए, अर्पिता उसका सर सहलाने लगती है।

 फड़फड़ाते मोर के पंखों का स्वर, तेज़ क्रन्दन के साथ पेड़ की टहनियों से निकलते हुए,मध्यम स्वर में बोलते  ही जाना। स्वर सुनकर दोनों की नज़रें खिड़की से निकल खेतों की ओर टहने निकल पड़ती हैं।

ख़ामोशी को तोड़ते हुए सुखवीर कहता है-

” फौजी पर बंदा एहसान कर गया, सांसें उधार दे कर !”

हृदय की परतों को टटोलते हुए सुखवीर अर्पिता को एक नज़र देखते हुए उसी घटना में डूब जाता है। मन पर रखे भार को कहीं छोड़ना चाहता है।अर्पिता को लगा कि वह टोकते हुए कहे- ”वह पल सौभाग्य था मेरा।” परंतु न जाने क्यों ख़ामोशी शब्द निगल जाती है। महीनों से नींद को तरसती आँखें विचारों में प्रेम ढूँढती हैं। मुट्ठी में दबा ज़िंदगी का टुकड़ा सुखवीर को कहीं चुभता है एक आह के साथ बोल फूट ही पड़ते हैं।

”बंदे को ऐसा नहीं करना चाहिए था !”

नींद ने ज्यों पानी से भीगी पलकों पर दस्तक दी हो!सुखवीर आँखें बंद कर लेता है, देखते ही देखते हल्के झोंके के साथ स्वाभिमान का भारी दरख़्त टूट कर धरती पर गिर पड़ता है, गिरने के तेज़ स्वर से सहमी अर्पिता सुखवीर को सीने से लगा लेती है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Sunday, 3 April 2022

पेैबंद लगा पुरुष-हृदय


                   अहं में लिप्त पुरुष-हृदय करवट बदलता, स्त्री-हृदय को अपने प्रभुत्त्व का पाठ पढ़ाते हुए कहता है-

" काल के पैरों की आहट हूँ मैं! जब-जब काल ने करवट बदली,मेरा अस्तित्त्व उभर कर सामने आया है।"

  स्त्री-हृदय पुरुष-हृदय की सत्ता स्वीकारता है और खिलखिलाकर कहता है।

”चलो फिर बादलों में रंग भरो! बरसात की झड़ी लगा दो।”

कुछ समय पश्चात बादल घने काले नज़र आते हैं और बारिश होने लगती है।

”अब धूप से आँगन सुखा दो।”

कुछ समय पश्चात धूप से आसमान चमक उठता है।

" अच्छा अब अँधरे को रोशनी में डुबो दो। "

और तभी आसमान में चाँद चमक उठता है।

 समय के साथ पुरुष-हृदय का सौभाग्य चाँद की तरह चमकने लगता है।

अगले ही पल प्रेम में मुग्ध स्त्री-हृदय पुरुष-हृदय से आग्रह करते हुए कहता है-

"अब मुझे खग की तरह पंख लगा दो, पेड़ की सबसे ऊँची शाख़ पर बिठा दो।"

पुरुष-हृदय विचलित हो उठा, स्त्री-हृदय की स्वतंत्रता की भावनाएँ उसे अखरने लगती है। ”मुक्त होने का स्वप्न कैसे देखने लगी?” उसी दिन से पुरुष-सत्ता क्षीण होने लगती है।

 पेड़ की शाख़ पर बैठा पुरुष-हृदय छोटी-छोटी टहनियों से स्त्री-हृदय को स्पर्श करते हुए, स्वार्थ में पगी उपमाएँ गढ़ता है वह कोमल से अति कोमल स्त्री-हृदय गढ़ने का प्रयास करता है प्रेम और त्याग का पाठ पढ़ाते हुए कहता है -

”तुम शीतल झोंका, फूलों-सी कोमल, महकता इत्र हो तुम ममता की मुरत, प्रेमदात्री तुम।"

 स्त्री-हृदय एक नज़र पुरुष-हृदय पर डालता है शब्दों के पीछे छिपी चतुराई को भाँपता है और चुप चाप निकल जाता है।

” बला ने गज़ब ढाया है! रात के सन्नाटे को चीरते हुए निकल गई ! पायल भी उतार फेकी! चुड़ैल कैसे कहूँ? गहने भी नहीं लादे! लालचन लोभन कैसे कह पुकारूँ?"

वृक्ष की शाख़ पर बैठा पुरुष-हृदय, पेड़ के नीचे टहलते स्त्री-हृदय को देखता है।

देखता है! मान-सम्मान और स्वाभिमान का स्वाद चख चुका स्त्री-हृदय तेज़ धूप, बरसते पानी और ठिठुराती सर्दी से लड़ना जान चुका है। वर्जनाओं की बेड़ियों को तोड़ता सूर्योदय के समान चमकता, धरती पर आभा बिखेरता प्रकृति बन चुका है। 


@अनीता सैनी 'दीप्ति ' 

Monday, 28 March 2022

परिवर्तन



                  ” न री ! पाप के पैरों घुँघरु न बाँध; तेरे कलेजे पर ज़िंदा नाचेगा ज़िंदगी भर।”

बुलिया काकी का अंतरमन उसे कचोटता है। हाथों में लहू से लथपथ बच्ची को माँ के पेट पर डालती है और बाँस का टुकड़ा टटोलने लगती है।

"अरे आँखें खोल शारदा! वे ले जाएँगे करमजली को।"

बुलिया काकी नाल काटते हुए शारदा को होश में लाने का प्रयास करती है। शारदा की यह चौथी बिटिया थी, दो को  ज़िंदा दफ़ना दिया, एक दरवाज़े के बाहर बाप के पैरों से लिपटी खड़ी है। कि इस बार वह अपने भाई के साथ खेलेगी।

”काकी-सा इबके लला ही आया है ना...।”

दर्द से कराहते, लड़खड़ाते शब्दों के साथ प्रसन्नचित्त स्वर में शारदा पूछती है।

" ना री तेरा द्वार पहचानने लगी हैं निर्मोही, मेरे ही हाथों जनती हैं मरने को।"

बुलिया काकी माथा पीटते हुए वहीं चारपाई पर बैठ जाती है। शारदा लटकते पल्लू से बच्ची को ढक लेती है।

"काकी-सा दरवाज़ा खोल दो, उन्हें अंदर आने दो….।"

शारदा दबे स्वर में दरवाज़े की ओर इशारा करती है।

स्वर भारी था-” काकी बिटवा है ना?"

मदन चारपाई के पास झुकता हुआ पूछता है। दोनों औरतें एक टक मदन को ख़ामोशी से घूरतीं हैं मदन लड़की को बिना देखे ही समझ लेता है कि लड़की हुई है,पैर पकड़ वहीं काकी के पास बैठ जाता है।

"वे आप के माँ-बाप थे? आप थी वह लड़की  या कोई और ?" स्मृतियों में खोई पार्वती दादी को नीता टोकते हुए कहती है।

पार्वती दादी स्मृति में डूब चुकी थी समय लगता था उन्हें  वापस आने में।

"मदन न मारता, अपनी बेटियों को! दहेज का दानव आता, उठा ले जाता गाँव की बेटियों को, माँ- बाप तो कलेजा पीटते, कोई छुड़ाता न था।"

पार्वती दादी के चेहरे की झुर्रियों से झाँकती पीड़ा कई प्रश्न लिए खड़ी,दो घुँट पानी पिया और पथरई आँखों से घूरते हुए कहती।

"आज भी खुले आम घूमता है दानव, जो बेटियाँ बहादुर होती हैं जीत लेती हैं, जो लड़ना नहीं जानती उसे उठा ले जाता है आता तो आज भी है, गला नहीं घोंटता, धीरे-धीरे ख़ून चूसता है, हाँ आता तो आज भी है।”

पार्वती दादी पूर्ण विश्वास के साथ अपने ही शब्दों का दोहराव करती हैं।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Monday, 21 March 2022

बुधिया



                     ”हाथ बढ़ाओ…अपना अपना हाथ बढ़ाओ …हाथ…!”

सत्तासीन दोनों हाथ झुकाए, नीचे खड़े व्यक्तियों के हाथ थामता और उन्हें खींचकर शिखर पर मौजूद कुर्सी पर बैठा देता।शिखर पर अच्छी व्यवस्था है।रहने, खाने-पीने घूमने-फिरने की मानो सभी के लिए शिखर को पाना ही जीवन का सार हो। प्रत्येक व्यक्ति के लिए वही सुख का द्वार हो चूका है परंतु यह क्या? सत्तासीन ने अपनी दोनों आँखें सर पर रखीं हैं! जैसे बालों पर  फ़ैशन के लिए एनक रखा जाता है। बुधिया यह दृश्य देख विचलित हो जाता है। बदन से बहते पसीने को अंगोछे से बार-बार पोंछता है।

”हे प्रभु! बहुत दूर से आया हूँ। बाप ने ज़मीन माँ ने जेवर गिरवी रखें हैं।मुझे यहाँ तक पहुँचाने के लिए।”

बुधिया तीसरे पड़ाव पर खड़ा स्वयं ही बड़बड़ाता है। मुट्ठी में दबाई मुद्रा को चूमता फिर सीने से लगा लेता फिर एक टक कोरे आसमान को निहार लंबी  साँस भरता।

"दूर हटाओ इन्हें, दूर हटाओ…दूर…दूर…।"

यह क्या? सत्तासीन हाथ के स्पर्श मात्र से चुनाव कर रहा है! बुधिया चौंक गया। वह एक नज़र देखता है उन व्यक्तियों को जो हाथ छूटने से नीचे गिर गए और उन्हें भी जो गिरकर वापस उसी कतार में अपनी जगह बना रहें हैं।

"अक़्ल के अंधे हाथ पत्थर पर रगड़,देख! कैसे दरारें पड़ी हैं? हाथ हैं कि ऊँट के तापड़!"

भीड़ में खड़े सुधी महानुभाव ने बुधिया को पत्थर की ओर इशारा करते हुए कहा। बुधिया जल्दी-जल्दी हाथ पत्थर पर रगड़ने लगता है। बग़ल से बहती नदी में हाथ भिगोता और फिर पत्थर पर रगड़ने लगता। हाथों से बहता लहू देख,अचानक बुधिया को ख़याल आता है, अगला पड़ाव नदी पार करना ही तो है!  सो हाथ वैसे ही साफ़ हो जाएँगे। वह चुपचाप फिर वहीं खड़ा हो जाता है।

"बैल बुद्धि…।”

कहते हुए सुधी महानुभाव दाँत निपोरने लगता है।

” बाप रे बाप ! अब यह नई बला क्या?”

बुधिया ने देखा कि, सत्तासीन हाथ पकड़ने वाले के स्वर पर भी ध्यान दे रहा है। जिसका स्वर मीठा है उसे स्नेह, …और जिसका स्वर कर्कश है, उसका हाथ छोड़ रहा है।

”दस वर्ष की अथक मेहनत से यहाँ पहुँचा हूँ प्रभु! बड़ा लम्बा रास्ता तय किया है यहाँ तक पहुँचने के लिए ।”

बुधिया बार-बार कोरे आसमान को ताकता है तो कभी देखता है उन सुधी महानुभावों को जो शिखर के आस-पास ही टहल रहे हैं। उन्हें कोई फ़िक्र नहीं है बारी आने की, घर से दो क़दम की दूरी फिर आ जाएगे, उनके लिए यह सब टहलने मात्र भर से ज़्यादा कुछ नहीं था। 

"अगले पाँच वर्ष तक हाथ बढ़ाने का कोई आवेदन नहीं, सभी सीट भरी जा चुकी है।"

सत्तासीन आँखें आँखों पर रखते हुए ऐलान करता है।थकान में लिपटी एक लम्बी साँस के साथ।

इस समाचार से बुधिया की देह ठंडी पड़ जाती है। हाथ से वह सिक्का छूट जाता है। सुस्ताने के लिए बैठना चाहता है कि उसे कोई धक्का देता है।वह दस-बीस सीढ़ी और नीचे खिसक जाता है। अचानक उसे स्मरण होता है,अगले पाँच वर्ष बाद हाथ बढ़ाने वाले आवेदन में उसका आवेदन अस्वीकार्य ही होगा क्योंकि उसकी उम्र निकल चुकी है।बुधिया नदी किनारे हथेलियाँ रगड़ते हुए, पथराई आँखों से बेचैन आत्मा की तरह आज भी शिखर को ताक रहा है।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Tuesday, 15 March 2022

मैं हूँ


                       ”ईमेल चैक रते रहना,एहसास करवाता रहूँगा; मैं हूँ।”

इस बार प्रदीप के शब्दों में जोश नहीं, प्रेम था। प्रेम जो सांसों में बहता हुआ, कह रहा हो "बस आख़िरी मिशन... फिर रिज़ाइन लिख दूँगा, अब बस और नहीं होता।"

"मैं हूँ से मतलब …?”

भावातिरेक में तान्या के शब्द  लड़खड़ा गए। उसने उसे इतना पढ़ा कि शब्द बिठाना भूल गई, फिर चाहे किताब हो या इंसान; अक़्सर ऐसा होता है तारतम्यता भुला बैठते हैं। अचानक उसे महसूस हुआ शब्दों की लय टूट गई है। मैंने क्या कहा? ठीक कहा ना ? उसने क्या कहा? क्या यही जो मैंने सुना।

”मैं हूँ से मतलब मैं हूँ…।"

हल्के स्वर में प्रदीप ने ये शब्द फिर दोहराये। इस बार स्वर रुँधे हुए थे, नहीं जोश था, नहीं गला रुँधा हुआ था।स्मृतियों की उठती हिलोरों पर सवार तान्या कॉरिडोर में रखी ख़ाली कुर्सी को एक टक ताक रही थी। एक पखवाड़ा बीत गया कोई ईमेल नहीं, बस एक एहसास।

" मैं हूँ।"


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Wednesday, 9 March 2022

वज्राहत मन

          


                 ”अम्मा जी आपके साथ और कौन-कौन है?” कहते हुए नर्स ड्रिप बदलने लगती है।

”हाँ…हाँ… वे!” कहते हुए अम्मा जी टुकुर-टुकुर नर्स को घूरने लगती हैं ।अम्मा जी की स्मृति विस्तार पर प्रश्न वाचक का लोगो लगा हुआ था।नर्स डॉ. को जो जो सुनाना चाहती, वही उन्हें सुन जाता। दिखाई भी वही देता, नर्स डॉ. को जो जो दिखाना चाहती।

”अम्मा जी कुछ स्मरण हुआ ?” नर्स जाते-जाते यही शब्द फिर दोहराती है। अम्मा जी को कुछ याद आता है परंतु याद की तरह नहीं बल्कि छींक की तरह, उमड़ता है फिर चला जाता है । नर्स को फिर टुकुर-टुकुर देखने लगती है।

”बड़ी शांत और सुशील हैं अम्मा जी।”कहते हुए पाँच नंबर बैड का पेशेंट अम्मा जी के पास से गुजरता है।

"ओह! शांत और सुशील! " व्यंग्यात्मक स्वर में नर्स यही शब्द फिर दोहराती है। अम्मा जी को भी यही  सुनाई देता हैं।

”हाँ…हाँ…हाँ…शांत…सुशील… !” स्मृतियाँ अब अम्मा जी के बुखार की तरह धीरे-धीरे उमड़ती हैं। बहुत देर तक स्थाई रहती हैं। माथे पर ठंडे पानी से भीगी  पट्टी रखी जाती है। गहरी साँस के साथ चारों तरफ़ देखती हैं परंतु दिखता नहीं है।स्वयं के साथ संघर्ष कर आजीवन अर्जित किया ख़िताब अम्मा जी के होंठो पर फिर टहलने लगता हैं।

”शांत… सुशील…।”


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Tuesday, 1 March 2022

ज्ञान सरोवर



   ” मालिक! मैं यह न समझ पाया, आप कब हो आए? ज्ञान सरोवर!” नाथू जमीन पर सोने के लिए प्लास्टिक का त्रिपाल बिछाता है।

” सात पीढ़ियों पहले हमारे पूर्वज होकर आए, हमारे तो ख़ून में बहता है ज्ञान।”

हुक्के की गुड़-गुड़ के साथ जमींदार का सीना छह इंच और चौड़ा हो जाता है। इस वार्तालाप के साक्षी बने चाँद- तारे घुटनों पर ठुड्डी टिकाए आज भी वैसे ही ताक रहे हैं जैसे वर्षों पहले ताक रहे थे।

” अब मालिक पीछला हिसाब कर ही दो, सोचता हूँ मैं भी ज्ञान सरोवर हो ही आता हूँ।”नाथू विचलित मन से जल्दी-जल्दी हाथों से त्रिपाल की सलवटें निकालने लगता है।

”अरे! ऐसे कैसे हो आते हो? वो तो बहुत दूर है!”

हुक्के की गुड़-गुड़ और तेज हो जाती है।

”कितना दूर मालिक, चाँद पर तो न ही ना?”

नाथू हाथ में लिया अंगोंछा सर के नीचे लगा लेता है।

"मानसरोवर के भी उस पार, नाम सुना है कि नहीं? उससे भी कई पहाड़ी ऊपर, तुम रहने दो मर मरा जाओगे कहीं!” कहते हुए -

काली रात में नील गायों के आने की सरसराहट सुनते हुए जमींदार ने निगाह दौड़ाई।

”अब सोचता हूँ मालिक, कब तक आपही की खींची लकीरें देखता रहूँगा। कुछ कहूँ तब आप उपले की तरह  बात पलट देते हो।”

नाथू हाथ में अंगोंछा लिए, फिर घुटनों के बल बैठ जाता है।

”फिर?”

 जमींदार प्रश्न करता है।

” फिर क्या? यों हांडी में सर दिए नहीं बैठूँगा।अपनी लकीर खींचूँगा।”

नाथू मुँह पर अंगोंछा डालकर सो जाता है। रात भर हुक्के की गुड़-गुड़ उसके कानों में गुड़कती रहती है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Thursday, 24 February 2022

बुलावा पत्र

   


        ”आँगन में बहू के पैर ही शुभ नहीं पड़े ! नहीं तो मेरा राजू क्या कम था पढ़ाई में?" हाथ में लिफ़ाफ़ा लिए नीना बेटे की नाकामयाबी को बहू की परछाई से ढकने का प्रयास करती है।

”मैं तो पहले दिन ही समझ गई थी, थालियों को क्या झट-पट उठा रही थी। अरे! थोड़ी शर्म लिहाज तो करती।” रोहिणी नीना के टूटे दिल की छेकड़ से झाँकते हुए उसे टटोलती है।

”ना री रोहिणी! ऐसे तो विश्वास न करूँ? यह  तो गुरुजी जी ने कहा है; बहू पर ग्रहों का दोष है अब देखो कब छटेंगे…? "

 बेचैनियों के साथ भावों के हिलोरों में बहती नीना। सारा दोषारोपण बहू के सर-माथे मढ़ देती है।

”क्या बहू ने कोई कांड किया? यों माथा पकड़ क्यों बैठी हो?”

चाय की चुस्कियों के साथ उत्सुकता का बिस्किट डूबोते हुए; रोहिणी नीना के ओर समीप खिसक जाती है।

”कल जा रही है  बाड़मेर, बुलावा पत्र आया है उसका।”

बहू के जाने से बेचैन नीना नासमझी की लपटों में झुलसती हुई रसोई की ओर जाती है।

”अच्छा, बताओ बहू कहा है? बड़े बुजुर्गो के आगे ढोक देना भी भूल गई क्या?”

रोहिणी चारपाई से उठती है, निगाहें कमरा तो कभी किचन की तरफ़ दौड़ाती है।

"बुआ जी आप तो मिठाई खाइए,  स्टेट बैंक में मेरा सिलेक्शन हुआ है, दो दिन बाद जॉइनिंग है।”

दीक्षा प्लेट में मिठाई लिए आती है।

”मैं कहूँ न, लाखों में एक है हमारी दीक्षा; तुम तो बौराय गई हो भाभी।”

झोंके-सी बदलती रोहिणी दीक्षा की बलाएँ लेते हुए अपने सीने से लगा लेती है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Thursday, 3 February 2022

लेखा




               "चले आए मुँह उठाये।”

प्रगति ख़ाली  बर्तनों को सिंक में पटकते हुए कहती है।

" इतनी निर्मोही न बनो; पसंद नहीं हूँ यही कह दो, व्यवहार तो ऐसे कर रही हो ज्यों ट्रैफ़िक-पुलिस का काटा चालान हूँ।”

लेखा बड़े स्नेह से प्रगति के कंधे पर ठुड्डी रखते हुए कान में कहता है।

"पूछा कब था? पिछले एक वर्ष से देख रही हूँ तुम्हें ; क्या चल रहा है ये,और ये अट्ठाईस दिन पहले आने वाला क्या झंझट है!"

प्रगति अपनी मोटी-मोटी आँखों से लेखा को घूरती है।

"क्या करता मैं! ऊपर से ऑडर था; और फिर खानापूर्ति करके सब को बहलाना ही तो था।”

शब्दों पर लगी धूल झाड़ सफ़ाई की चाबी छल्ले में टाँगते हुए लेखा कहता है।

"नून न राई, तेल सातवें आसमान पर, गैस सलेंडर  एक हज़ार पार होने को आया ; हांडी में क्या मोबाइल पकाऊँ ?"

कहते हुए प्रगति ज़मीन पर पसर जाती है।

 "अगले वर्ष फिर आऊँगा, इस बार मोंगरे का गजरा लाऊँगा।”

भोली सूरत के पीछे शातिर दिमाग़ को छिपाते हुए। दाँत निपोरता है लेखा।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Wednesday, 19 January 2022

दत्तचित्त


              "लव इज़ लाइफ़ बट माय लाइफ इज़ माय वर्क।”

अनूप का स्टेटस पढ़ते हुए अदिति एक नज़र अनूप पर डालती है। काम का बोझ ज्यों झाँक रहा हो आँखों से और स्टेटस...।

”लाइफ इज़ ब्यूटीफुल बट स्ट्रेस इज़ थॉर्न।”

हल्की बरसात में कॉरिडोर से अपना हाथ बढ़ाते हुए, अदिति कहती है।

"तुम्हारी मुस्कुराहट ही मेरी ज़िंदगी है।”

अनूप एक नजर आदिति पर डालता है फिर फ़ाइल में रो खींचने में व्यस्त हो जाता है वह समझ चुका है कि अदिति ने उसका स्टेटस पढ़ लिया है। कहीं न कहीं उसके शब्दों का दर्द झेल रही।

”घुटनों के बल सीढ़ियाँ चढ़ता अबोध बालक है जीवन।”

आदिति पहेली के सहारे शब्दों के पुल को बाँधने के प्रयास के साथ पति के कंधे पर सर रखते हुए कहती है।

" नज़रिया है अपना-अपना। मुझे लगता है ज़िंदगी उस चिड़िया की तरह है जो मेरी तरह भरी बरसात में  अपने पँख झाड़ रही है।"

अनूप फ़ाइल साइड में रखते हुए कंधे पर रखा आदिति का सर सहलाने लगता है।

”मुझे लगता है फ़ाइल में बंद प्रत्यक कारतूस का हिसाब है जिंदगी...।”

अदिति की ज़बान लड़खड़ा जाती है।अनजाने में शब्दों की चोट से एक नासूर रिसने लगता है। वादियों में प्रेम ढूँढ़ने निकला मन झोंके के थपेड़े से सहम जाता है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Thursday, 13 January 2022

निक्की

       


               ”माइंड को लोड क्यों देने का साहेब?”

नर्स डॉ. के साथ केबिन से बाहर निकलते हुए कहती है।

"बच्ची ने कुछ खाया?”

डॉ. निक्की की ओर संकेत करता हुए कहता है।

”नहीं साहेब! आजकल के बच्चे कहाँ कुछ सुनते हैं?

बार-बार एक ही नम्बर डायल कर रही है।"

नर्स दोनों हाथ जैकेट में डालते हुए शब्दों की चतुराई दिखाने में व्यस्त हो जाती है।

"साहेब लागता है ये केस मराठी छै; बार-बार बच्ची आई-बाबा बोलती।”

नर्स छ-सात साल की निकी के आँसू पौछते हुए उसका मास्क ठीक करने लगती है।

”जब तक बच्ची के रिलेटिव नहीं पहुँचते; आप बच्ची का खयाल रखें।”

डॉ. फ़ाइल नर्स के हाथ में थमाते हुए। पास ही बैठी अपनी बहन शिखा को हाथ से चलने का इशारा करता है।

”साहेब! आर्मी वालों का कोई ठिकाना नहीं होता। कब तक लौटेगा…? मेरे को इतना टाइम कहाँ…! मैं क्या करेगी; कहाँ रखेगी बच्ची को ?"

नर्स पीछे  से आवाज़ लगाती है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

मरीचिका

                                          भोर की वेला, सूरज अपना तेज लिए आँगन में उतरा; कह रहा है- "देख!  मैं कितना चमक रहा हूँ। बरसात...