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Saturday, 24 December 2022

डर

           


                                    कुछ रोज़ पहले ही सुगणी गाँव से शहर आई थी। शहर की सखी-सहेलियों को उसका रहन-सहन रास नहीं आया था। वह इच्छा से भरी मासूम बदरी थी। जहाँ चाहे वहीं बरस जाती थी। चूड़ी, चप्पल, बिंदी और लाली सब की चाह लिए दहलीज पर खड़ी रहती। मनिहार को आते-जाते देखती और देखती ही रह जाती।उसे वह सब कुछ चाहिए होता, जो उसकी सखी सहेलियों के पास होता।

उसकी एक सहेली ने बताया इसे देखना नहीं आता फिर झुँझलाकर उसी ने कहा-”अरे! दिखता ही नहीं है इसे।”

जब सुगणी से साँची ने पूछा तब उसने कहा-

"सब कहते हैं मेरी आँखें नहीं हैं, मेरी आँखों को जो जँचता है वह मेरे आदमी को नहीं जँचता।” कहते हुए वह अपलक कोरे आसमान को घूरने लगती थी।बड़ी-सी बिंदी, उससे भी बड़ी नथनी और उससे भी बड़ी-बड़ी आँखें। उन आँखों में रमे काजल पर ठहरी लालासा की दो बूँदें, जिसे उसकी आँखें बड़ी चतुराई से घोलकर पी लिया करती थी।

"मुझे देखने ही कब दिया? पहले मेरी माँ! फिर इसकी माँ!!  अब यह खुद!!!" न चाहते हुए भी वह भोर-सी बिखर पड़ी। रात की उतरी चादर में गुम नजरिया ढूँढ़ती।

”कुछ समय पहले तक मेरे पास भी आँखें नहीं थीं, लोग दिखाते मैं भी वही सब देख लेती।" साँची ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।

" सच कह रही हैं आप! मेरा उपहास तो नहीं उड़ा रही न?.” वह हल्की-सी हँसी के साथ कुछ शरमाई और फिर खुद में सिमटकर रह गई थी।

"नहीं सच! कसम से!!” साँची ने विश्वास के साथ कहा।

"फिर!” वह धीरे से बोली।

" फिर क्या? फिर मेरे आत्मचेतना के अँखुए उग आए उन्हें महसूस किया। कुछ समय पश्चात धीरे-धीरे मुझे दिखने लगा।” साँची ने उसके विश्वास को और गहरे विश्वास के रंग में रंगते हुए कहा परन्तु न जाने क्यों फिर भी उसने पैर दहलीज के अंदर खींच लिए?


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


Thursday, 8 December 2022

मुखरित मौन

                   


                           "काल के क़दमों की आहट हूँ मैं! मेरा प्रभुत्व समय की परतों पर लिखा है।”  चट्टानों पर अपने नाम को अंकित करते हुए पुरुष ने स्त्री से कहा।

”ओह! बादल बरसे तब जानूँ मैं !” जेष्ठ महीने की तपती दुपहरी में स्त्री ने पुरुष  को परखते हुए कहा। कुछ समय पश्चात काली-पीली घटाएँ उमड़ी और बरसात की बूँदों से मिट्टी महक उठी जिसकी ख़ुशबू से  मुग्ध स्त्री झूम उठी।

” ठीक है! अब धूप के टुकड़े बिखेरकर बताओ तब लगे तुझ में कोई बात है!” साँझ के बढ़ते क़दम देख स्त्री ने पुरुष से फिर कहा।तभी माथे पर इंद्रधनुष सजाए कुछ पल के लिए आसमान धूप से चमक उठा।

"अच्छा! अब साँझ के आँगन में दीप जला कर दिखाओ ।" स्त्री ने पुरुष के सीने से लगते हुए कहा। पलक झपकते ही आसमान में तारे चमक उठे। चाँद उनकी टोह लेने देहरी पर खड़ा था। दोनों का प्रेम परवान चढ़ ही रहा था कि प्रेम में आकंठ डूबी स्त्री ने पुरुष से एक और इच्छा जताते हुए कहा- "चलो! अब मुझे पंख भी लगा दो।” सहसा स्त्री के शब्दों से पुरुष बिफर उठा।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Thursday, 1 December 2022

दर्द का कुआँ

                    


                           वह साँझ ढलते ही कान चौखट पर टांग देती और सीपी से समंदर का स्वर सुनने को व्याकुल धड़कनों को रोक लिया करती थी। बलुआ मिट्टी पर हाथ फेरती प्रेम के एहसास को धीरे-धीरे जीती थी।

हवा के झोंके से हिली साँकल के हल्के स्वर पर उसकी आँखें बोल पड़ती और वह झट से उठकर दूर तक ताकती सुनसान रास्तों को जिन पर सिर्फ़ चाँद-सूरज का ही आना-जाना हुआ करता था।

     उसका प्रेम दुनिया के लिए पागलपन और उसके लिए एहसास था जिससे सिर्फ़ और सिर्फ़ वही जीती थी। घर पर नई रज़ाई और एक गद्दा रखती थी।

 कहती थी- ”पता नहीं किस बखत उसका  आना हो जाए? आख़िर घर पर तो सुख से सोए।”

हवाएँ कहतीं हैं-  कारगिल-युद्ध का स्वर सुनाई देता था उसे,वही स्वर होले-होले लील गया। वह मुंडेर पर रोटी रख कौवे के स्वर से हर्षा उठती परंतु आसमान में उड़ते हवाई जहाज़ के स्वर से घबरा जाती थी। अकेली नहीं रहती थी खेत पर! पति ने  पानी का कुआँ खुदवाकर दिया था। उसी के साथ रहती थी।

कभी कभार भोलेपन से कहती - ”कोई मेरा कुआँ चुरा ले गया तो! ” गाँव उसके लिए शहर था और शहर एक स्वप्न नगरी।

उसकी सहजता ने ही गाँव भर में ढिंढ़ोरा पिटवा दिया था कि "ग़रीब घर की लड़की थी। कुछ देखा-भाला था नहीं, पानी का कुआँ देखा; इसी से दिल लगा बैठी।”

उसके घर से कुछ दूरी पर एक सत्य का वृक्ष खड़ा था , वह सत्य ही बोलता। कहता -” बच्चों को मायके लेकर गई थी, घरवालों ने पीछे से शहीद का दाह-संस्कार कर दिया। रहती भी तो गाँव के बाहर थी कौन आता कहने?  साल-छः महीने बाद पता चला तभी से बेताल बन घूमती रहती थी इसी चारदीवारी में, आने-जाने वालों से एक ही प्रश्न पूछती थी - " युद्ध कब ख़त्म होगा?”


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Thursday, 17 November 2022

भूख


                    बारह महीनों वह काम पर जाता। रोज़ सुबह कुल्हाड़ी, दरांती कभी खुरपा-खुरपी तो कभी फावड़ा, कुदाल और कभी छोटी बाल्टी के साथ रस्सी लेकर घर से निकल जाता। शाम होते-होते जब वह वापस घर लौटता तब गुनहगार की भांति नीम के नीचे गर्दन झुकाए बैठा रहता। दो वक़्त की रोटी और दो कप चाय के लिए रसोई को घूरता रहता।

बाहर बरामदे में खाट पर बैठी उसकी बूढ़ी माँ, उसके द्वारा मज़दूरी पर ले जाए गए औज़ार देखकर तय करती कि आज उसकी मज़दूरी क्या और कितनी होगी? उसी के साथ यह भी तय करती कि शाम को घर लौटेगा कि न

”आज कुल्हाड़ी लेकर नहीं! फावड़ा, कुदाल और छोटी बाल्टी के साथ रस्सी लेकर निकला है, अब पाँच दिन तक घर की ओर मुँह नहीं करेगा।”  उसके जाते ही उसकी बूढ़ी माँ रसोई की खिड़की की ओर मुँह करते हुए ज़ोर से आवाज़ लगाती है। उसकी पत्नी  बुढ़िया का मंतव्य समझ जाती कि वह क्या कहना चाहती है।

” जगह है क्या उसे कहीं और?” इन्हीं शब्दों के साथ रसोई में दो-चार बर्तन गिरने की आवाज़ के साथ ही वह खाली पड़े पतिलों को ताकती है। 


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Wednesday, 2 November 2022

वीरानियों के सुर



           चित्तौड़ दुर्ग में विजय स्तंभ के पास घूमते हुए वह रानी पद्मिनी-सी लग रही थी।

शादी के चूड़े को निहारती बलाएँ ले रही थी अपने ख़ुशहाल जीवन की, सूरज की किरणों-से चमकते सुनहरे केश, खिलखिलाता चेहरा, ख़ुशियाँ माप-तौलकर नहीं, मन की बंदिशों को लाँघती दोनों हाथों से लुटाती जा रही थी।

प्यारी-सी स्माइल के साथ उसने रिद्धि की ओर फोन बढ़ाते हुए कहा-

”दीदी!  प्लीज एक पिक…।”

” हाँ!  क्यों नहीं… ज़रूर !” रिद्धि ने कहा।

उसने प्रसन्नता ज़ाहिर करते हुए कसकर अपने पार्टनर को जकड़ा और कैमरे के सामने प्यारी-सी मुस्कान के साथ मोहक पोज दिया।

” यार शालीनता से … ! फोटोग्राफ़ मम्मी-पापा और दादी को भी भेजने हैं।”

उसके पार्टनर ने कहा।

पार्टनर के शब्दों से वह सहम गई और शालीन लड़की के लिबास में ढलने का प्रयास करने लगी।

अगले ही पल वे दोनों रिद्धि की आँखों से ओझल हो गए।

वहीं मीराँ मंदिर के पास पद्मिनी जौहर-कुंड की वीरानियों ने रिद्धि को जैसे जकड़ लिया हो या कहूँ वह उन्हें भा गई और उन्होंने हाथ पकड़ वहीं पत्थर पर रिद्धि से बैठने का आग्रह किया। वे एक-दूसरे के प्रेम में डूब चुकी थीं। एक ओर मीराँ का विरह अश्रु बनकर बह रहा था तो दूसरी तरफ़ पद्मिनी का जौहर-कुंड उसे जला रहा था। उन वीरांगनाओं के सतीत्व के तप से रिद्धि मोम की तरह पिघलने लगी थी, अचानक उसके कानों में एक स्वर कोंधा।

”तुम्हारा ही पल्लू कैसे फिसलता है यार और ये फूहड़ हँसी ?”

सहसा उसके पार्टनर का स्वर रिद्धि के कानों से टकराया परंतु उसकी आँखों ने अनदेखा करना मुनासिब समझा। 

”बचकानी हरकत करते समय निगाहें इधर-उधर दौड़ा लिया करो यार।” उसका पार्टनर सहसा फिर झुँझलाया।

जो चिड़िया फुदक-फुदककर चहचहाती डालियों पर झूला झूल रही थी अब वह लोगों से नज़रें चुरा रही थी।

 रिद्धि ने बेचैन निगाहों से उनकी ओर देखा! और देखती ही रह गईं कि एक पद्मिनी मीराँ बनकर घर लौट रही थी।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Saturday, 1 October 2022

लकीरें


                           " कामवालियों के हाथों में लकीरें नहीं होतीं!” मेहँदी रचे हाथ दिखाते हुए वह उसकी हथेली देखते हुए कहती है।

उसने पीछे मुड़कर उसको जाते हुए देखा और फिर बर्तन धोने लगी।

”तुम्हें दुख नहीं होता ?”

धुली कटोरियाँ उठाते हुए दूसरी ने कहा।

"ज़िंदगी की आपा-धापी में बिछड़ गए सुख-दुख।” पथराई आँखों से कैलेंडर को ताकते हुए वह कहीं खो जाती है।सहसा फिर चुप्पी तोड़ते हुए कहती है -

 ”पत्ते सरीखे होते हैं दुःख, अभी ड्योढ़ी तक बुहारकर आई हूँ !”

उसाँस के साथ साड़ी से हाथ पोंछते हुए ढलते सूरज की  हल्की रोशनी में अपनी सपाट हथेली पर उसने फिर से लकीरें उगानी चाहीं।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Tuesday, 27 September 2022

भेड़िया

         




         

                   भोर की वेला में सूरज अपना तेज लिए आँगन में उतरते हुए कह रहा था- "देख!  मैं कितना चमक रहा हूँ। बरसाता कच्ची धूप काया की सारी थकान समेटने आया हूँ।"

 रेवती कह रही थी-  ” दूर हट मरजाणा! सर पै मंडासो न मार।”

  तभी उसके दरवाज़े पर दस्तक होती है।

”ताई देख! कौण आया है?” श्यामलाल ने दूर खड़ी एक औरत की ओर इशारा किया।

”क्यों, तेरे बाप ने दूसरा विवाह कर लिया क्या?”रेवती ने बाड़ पर फैली तोरई और घीया की बेल ठीक करते हुए बिना देखे ही कहा।

” कभी तो सीधे मुँह बात कर लिया कर ताई।”श्यामलाल ने झुँझलाते हुए कहा ।

”ठीक है, मुँह मोगरी-सा न बना; बता कौण है?” रेवती ने पलटकर देखते हुए कहा।

”दिखती तो औरत ही है, भीतर क्यों न आई बैरन।” रेवती ने माथे पर हाथ सटाकर कहा।

”कांता! ओह!! म्हारी कांता।यह वही कांता है जो वर्षों पहले रूठकर चली गई थी। देख तो! कितनी काली पड़ गई है म्हारी छोरी। तेरे ख़सम के अनाज कम पड़ गया था के ?” बड़बड़ाते हुए अपनी बेटी की ओर दौड़ी तो ख़ुशी में बढ़ते कदम सहसा रुक गए।

” ठहर कांता! तू ऐसे ना जा सके। सुन बावली! आठ वर्ष की छोरी न बाप कोण्या मिला करें।”

कहते हुए रेवती आवाज़ पर आवाज़ दिए जा रही थी।

"नहीं!नहीं!! और न सह सकूँ अब,मेरा है ही कौण यहाँ?”

आठ साल की बच्ची की ऊँगली पकड़े  कांता तेज़ गति से चलती जा रही थी। बेटी रीता माँ!माँ!! पुकारती पाँव पीछे खींच रही थी।

"ठहर! एक बार सुन बावली!!”

रेवती बाँह फैला कांता को जाने से रोक रही थी।

वर्षों पहले गुज़रा समय आज फिर आँखों के सामने कांत को देख बिखर गया।

उसकी कानूड़ी कुछ ही दूरी पर उसी बाड़ के पास खड़ी आँसू बहा रही थी।

”माँ तू ठीक कहती थी! छोरी न बाप कोन्या मिला!” कहते हुए माँ से लिपट कांता फूट-फुटकर रोने लगी।

गाँव की सबसे होनहार ज़िद्दी,पढ़ी-लिखी लड़की कांता उस समय की पाँचवी पास। दुनिया से टकराने का जुनून,विधवा हो प्रेम विवाह रचाकर निकली थी गाँव से।

”मैं न कहती मरो मास न छोड़े ये भेड़िया,  तू तो जीवती निकली।” कहते हुए रेवती बेटी और नातिन की हालत पर फूट-फूट कर रोने लगी थी।

”कितनी उम्र में लेकर भाग गया छोरी ने तेरो ख़सम।” रेवती ने बेटी से सीधा प्रश्न किया।

”पंद्रह-सोलह की ही हुई थी कि हरामी की नज़र पहले से थी।” कांता ने अपनी ओढ़णी से नाक पोंछते हुए कहा।

”हूँ! तब तो ठीक है छोरी स्याणी होगी ही।”  रेवती ने बरामदे में बैठते हुए कहा।

”माँ! मेरी छोरी ऐसी न थी, बहला-फुसला लिया उस हरामी ने।” कांता ने मुँह बनाते हुए कहा।

"छोरी तो म्हारी भी ऐसी न थी उसी हरामी ने फाँस लिया ।” रेवती ने एक-एककर तोरई और घीया को टोकरी से बाहर बरामदे में रखते हुए कहा।  


@अनीता सैनी 'दीप्ति' 

Wednesday, 21 September 2022

भावों की तपिश


          ”हवा के अभाव में दम घुटता है, हमारा नहीं; पहाड़ों का। द्वेषी है! पेड़ों को पनपने नहीं देता!! "

पहाड़ों पर भटकते एक पंछी ने फोन पर अपनी पत्नी से कहा।

"कौन है द्वेषी?"

पत्नी ने सहज स्वर में पूछा।

”सूरज! कुछ दिनों से पृथ्वी से अनबन जो चल रही है उसकी !!”

पंछी सूरज, पृथ्वी और पहाड़ों से अपनी नज़दीकियाँ जताते हुए बड़ी चट्टान के सहारे  पीठ सटाकर बैठते हुए कहता है।

”तुम सुनाओ! तुम्हारे यहाँ क्या चल रहा है?

पंछी ने व्याकुल स्वर में पूछा।

”कुछ नया नहीं!  वही रोज़ का रुटीन!! दैनिक कार्यों में व्यस्त धूप धीरे-धीरे दिन सोख रही है। तीसरे पहर की छाँव तारीख़ से मिटने की पीड़ा में दहलीज़ पर बैठी है। समय चरखे पर लिपटने के लिए तेज़ी से दौड़ रहा है।”

पत्नी ने दिन का ब्यौरा देते हुए एक लंबी सांस भरी।

"और पौधे?” पंछी ने तत्परता से पूछा।

”पौधे नवाँकुर खिला रहे हैं तो कहीं फूलों में रंग भर रहे हैं।”

पत्नी ने बड़ी सहजता से कहा।

”हूँ " के साथ पंछी और पहाड़ों ने गहरी सुकून की सांस भरी जैसे हवा का झोंका नज़दीक से गुज़रा हो!


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Saturday, 20 August 2022

ख़ामोश सिसकियाँ

                              


                                      ”देख रघुवीर ! इन लकड़ियों के पाँच सौ से एक रुपया ज़्यादा नहीं देने वाला। तुमने कहा यह चार खेजड़ी की लकड़ियाँ हैं, यह दो की भी नहीं लगती!”

दोनों हाथ कमर पर धरे एक पैर आगे बढ़ाए खड़ा प्राइमरी स्कूल का अध्यापक व रघुवीर का छोटा भाई धर्मवीर।

”कैसे नहीं लगती दोनों जगह वाली दो-दो खेजड़ी की लकड़ियाँ हैं, पूछो सुनीता, सुमन और सजना से, हम चारों ने मिलकर इकट्ठा की हैं।”

रघुवीर चोसँगी ज़मीन में गाड़ते हुए पसीना पोंछता है।

”देख भाई!  पाँच सौ से एक रुपया ज़्यादा नहीं देने वाला,तू जाने तेरा काम जाने; अब तू यह बता सुखराम दो दिन से स्कूल क्यों नहीं आ रहा?”

धर्मवीर रघुवीर की दुःखती रग पर हाथ रखते हुए ऊँट पर बैठे सात साल के सुखराम की ओर इशारा करता है, सुखराम अध्यापक कहे जाने वाले काका को देखता हुआ दाँत निपोरता है।

”काका! काका! यह हमारे साथ भट्टे पर मिट्टी खोदने जाता है।”

तीनों लड़कियाँ एक स्वर में एक साथ बोलती हैं।

” तू इन छोरियों के जीवन से कैसा खिलवाड़ कर रहा है? पास ही के गाँव के स्कूल में दाख़िला क्यों नहीं करवाता इनका!”

पास पड़ी लकड़ियों को धर्मवीर घूम-घूमकर देखता है। ”हाँ लकड़ियाँ हैं तो मोटी-मोटी, बढ़िया है। आड़ू को क्या पता मन और पंसेरी का ?”

रघुवीर की मासूमियत पर धर्मवीर अपनी राजनीति का लेप चढ़ाता है।

”तू अपने भट्टे पर पराली क्यों नहीं काम में लेता? खेत की लकड़ियाँ मेरे भट्टे पर डाल दिया कर, मैं छोरियों के स्कूल की व्यवस्था करता हूँ। तू  निरा ऊँट का ऊँट रहा, इन्हें तो इंसान बनने दे!”

कहते हुए धर्मवीर सूरज को ताकता हुआ वहाँ से स्कूल के लिए निकल जाता है।

बापू ! बापू ! स्कूल जाना है हमें।”

सुमन, सजना मन को पसीजते हुए कहती हैं।

”दिखता नहीं ! बापू की आँख में पसीना चला गया। चल दूर हट छाँव में बैठने दे!”

बड़ी लड़की सुनीता अपने पिता रघुवीर की ओर पानी से भरा जग बढ़ाती है।

”कलियुग में कौवों का बोलबाला है। कैसे बचेंगीं चिड़ियाँ ? कौन पिता होगा जो नहीं चाहता हो कि उसकी बेटियों को पंख और खुला आसमान न मिले?”

रघुवीर घर्मवीर की ओर देखता हुआ अंगोंछा सर पर कस के बाँधता है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Monday, 15 August 2022

ठूँठ


                        रिमझिम बरसात कजरी के मीठे स्वर-सी प्रतीत हो रही थी। मानो एक-एक बूँद प्रेम में झूम रही थी। जो प्रेम में, उसके लिए बारिश प्रेमल और जिसका हृदय पीड़ा में, उसके लिए समय की मार! अपनों के लिए अपनों को दुत्कारना फिर उन्हें अपनाने की चाह में भटकना, ऐसी थी धन कौर।

”हवा के साथ बरसात भी अपना रुख़ बदल लेती है! इंसान की तो बिसात ही क्या?”

बड़बड़ाते हुए धनकोर घर की ओर बढ़ती जा रही थी।

 अधीर मन को ढाँढ़स बँधाती बारिश में भीगी ओढ़नी निचोड़ती गीता को देख अनायास ही कह बैठती है।

”गृहस्थी में उलझी औरतें प्रेम में पड़ी औरतों से भी गहरी होती हैं।”

"स्पष्ट शब्द अशिष्टता की श्रेणी में कब खड़े कर दिए जाएँ और कब गिरा दिए जाएं।" इसी विचार के साथ धनकोर के दृष्टिकोण को समझते हुए,सीढ़ियों पर बैठी गीता सूखा टॉवल उसकी ओर बढ़ाती है।

”दिमाग़ के खूंटे से विचारों की रस्सी न लपेटाकर अब कहती हूँ लौट आ, तू वह नहीं रही जो पच्चीस वर्ष पहले थी।” पश्चाताप की अग्नि में जलती धनकोर ममत्व भाव उड़ेलती, अचानक बिजली गिरे वृक्ष-सी बेटी से लिपटकर सुबकने लगती है। उम्र के इस पड़ाव पर ज़रूरत का ताक़ाज़ा देती है इसी उम्मीद के साथ कि कोंपल फिर फूट जाएगी और वृक्ष हरा-भरा हो जाएगा।

"भूल क्यों नहीं जाती घटना और घटित लोगों को?किसी एक की परवाह में उलझी दूसरे के हृदय से कब ओझल हो जाती हैं गृहस्थ औरतें, जानती हैं ना आप?”

कहते हुए- गीता के आँसू बहे, न हृदय का भार बढ़ा और न ही पीड़ा के अनुभव से स्वर में आए कंपन ने रुख़ बदला।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Thursday, 28 July 2022

विसर्जन



                   ”गणगौर विसर्जन इसी बावड़ी में करती थीं गाँव की छोरियाँ।”

कहते हुए काई लगी मुंडेर पर हाथ फेरती शारदा बुआ मुंडेर से अपनी जान-पहचान बढ़ाने लगी। माँ के हाथों सिले घाघरे का ज़िक्र करती बावड़ी से कह बैठी -

”न जाने कितनी छोरियों के स्वप्न लील गई तु! पानी नहीं होता तो भी तुझमें ही पटककर जाती।”

आँखें झुका पैरों में पहने चाँदी के मोटे कड़ों को हाथ से धीरे-धीरे घुमाती साठ से सोलह की उम्र में पहुँची बुआ उस वक़्त, समय की चुप्पी में शब्द न भरने की पीड़ा को आज संस्कार नहीं कहे।

"जल्दी ही जीना भूल जाती हैं औरतें कब याद रहता है उन्हें कुछ ?”

बालों की लटों के रूप में बुआ के चेहरे पर आई मायूसी को सुदर्शना हाथ से कान के पीछे करते हुए कहती है।

” किसे डुबोती छोरियाँ ?”

"उस टेम सपने कहाँ देखने देते थे घरवाले, चूल्हा- चौकी खेत-खलिहान ज़मींदारों की बेटियों की दौड़ यहीं तक तो थीं?”

जीने की ललक, कोंपल-से फूटते स्वप्न; उम्र के अंतिम पड़ाव पर जीवन में रंग भरतीं सांसें ज्यों चेहरे की झूर्रियों से कह रही हों तुम इतनी जल्दी क्यों आईं ?

न चाहते हुए सुदर्शना बुआ से फिर पूछती है।

"  छोरियाँ तो देखती थीं न स्वप्न।”

"न री! बावड़ी सूखी तो तालाब, नहीं तो कुएँ और हौज़ तो घर-घर में होते थे उनमें डुबो देती थी।”

”स्वप्न या गणगौर ?”

सुदर्शना ने फिर यही प्रश्न दोहराया।

बड़प्पन का मुकुट ज़मीन पर पटक, मुँह फेरती सावित्री बुआ धीरे से कहती है।

"दोनों।”


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Sunday, 10 July 2022

विश्वास के चार फूल


                 ”पिता का हाथ छूटने पर भाई ने कलाई छोड़ दी और पति का साथ छूटने पर बेटे ने…।” कहते हुए बालों को सहलाती सावित्री बुआ की उँगलियाँ सर पर कथा लिखती रही। अर्द्ध-विराम तो कहीं पूर्ण-विराम और कहीं प्प्रश्न-चिह्न पर ठहर जातीं। बुआ के विश्वास का सेतु टूटने पर शब्द सांसों के भँवर में डूबते परंतु उनमें संवेदना हिलकोरे मारती रही।

बाल और न उलझें इस पर राधिका ने एक नज़र सावित्री बुआ पर डालते हुए कहा-

”बाल उलझते हैं बुआ!”

" क्या करती हो दिनभर,बाल सूखे हाथ-पैर सूखे; कब सीखेगी अपना ख़याल रखना?" कहते हुए झुँझलाहट ने शब्दों के सारे प्रवाह तोड़ दिए, अब सावित्री बुआ के भाव शब्दों में उतर पहेलियाँ गढ़ने में व्यस्त हो गए थे।

” समर्पण दोष नहीं, आपका स्वभाव ही ममतामयी है।”

राधिका ने पलटकर बुआ के घुटनों पर ठुड्डी टिकाते हुए कहा।

"और उनका क्या ?  उनका हृदय करुणामय  नहीं…?”

माथे से टपकती पसीने की बूंदो में समाहित कई प्रश्न उत्तर की तलाश में भटक रहे,यह कथा नहीं उपन्यास के बिछड़े किरदारों की पीड़ा थी जो  उँगलियों के सहारे सर में डग भर रही थी।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Wednesday, 1 June 2022

दंड



                                            बर्तनों की हल्की आवाज़ के साथ एक स्वर निश्छलता के कानों में कौंधता है।

” निर्भाग्य है तू!  यह देख, तेरा श्राद्ध निकाल दिया।” कहते हुए आक्रोशित स्वर में क्रोध ने थाली से एक निवाला निकाला और ग़ुस्साए तेवर लिए थाली से उठ जाता है।

”मर गई तू हमारे लिए …ये ले…।" मुँह पर कफ़न दे मारा ईर्ष्या ने भी।

 "हुआ क्या?" निश्छलता समझ न पाई दोनों के मनोभावों को और वह सकपका गई। 

 समाज की पीड़ित हवा के साथ पीड़ा से लहूलुहान कफ़न में लिपटी निश्छलता जब दहलीज़ के बाहर कदम रखती है तब उसका सामना उल्लाहना से होता है।

” निश्छल रहने का दंड है यह ! " कहते हुए उल्लाहना खिलखिलाता हुए उसके सामने से गुज़र जाता है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Wednesday, 18 May 2022

पत्थरों की पीड़ा



"तोगड़े!  रिश्तों से उबकाई क्यों आने लगती है? ” कहते हुए वितान पलकों पर पड़े बोझ को तोगड़े से बाँटना चाह रहा था।

"श्रीमान! सभी अपनी-अपनी इच्छाओं की फिरकी फेंकते हैं जब वे पूरी नहीं होतीं तब आती है उबकाई।"

तोगड़े ने हाज़िर-जवाबी से उत्तर देते हुए कहा।

"पिछले पंद्रह महिनों से पहाड़ियों के बीचोंबीच यों सुनसान टीसीपी पर बैठना ज़िम्मेदारी भरा कार्य नहीं है ?"

वितान कुर्सी पर एक लोथड़े के समान पड़ा था। जिसकी आँखें तोगड़े को घूर रही थी। घूरते हुए कह रहीं थीं- ”बता तोगड़े, हम क्यों हैं?धरती पर,आख़िर हमारा अस्तित्व ही क्या है? क्यों नहीं समझती दुनिया कि छ: महीने में एक बार समाज में पैर रखने पर हमें कैसा लगता है?”

"क्यों नहीं? है श्रीमान! है, ज़िम्मेदारी से लबालब भरा है। दिन भर एक भी गाड़ी यहाँ से नहीं गुज़रती फिर भी देखो! हम राइफल लिए खड़े रहते हैं।" कहते हुए- तोगड़े राइफल के लेंस में पहाड़ियों को घूरता हुआ। वहाँ घूमती परछाई खोज रहा था।

"तोगड़े!" कहते हुए वितान ने चुप्पी साध ली ।

" हुकुम श्रीमान।” कहते हुए तोगड़े राइफल के लेंस में देखता ही जा रहा था।

"तुम्हारी पत्नी,दोस्त और घरवाले शिकायत नहीं करते तुम से तुम्हारी ज़िम्मेदारियों को लेकर।" कहते हुए वितान ने अपनी उलझनों को एक-एक कर सुलझाने के प्रयास के साथ अपनी ज़िंदगी से पूछना चाह रहा था। "कि आख़िर उसने किया क्या है?”

"नहीं साहेब! पत्नी को टेम कहाँ ? खेत-खलिहान बच्चे, चार-चार गाय बँधी हैं घर पर। छुट्टी के वक़्त उसे याद दिलाना पड़ता है कि मैं भी घर पर आया हुआ हूँ, पगली भूल जाती है।"

तोगड़े का अट्टहास वितान को गाँव की गलियों में दौड़ा रहा था। वह यादों के हल्के झोंकों की फटकार को थामकर बैठना चाहता था।

"साहेब! समाज में सभी का पेटा भरना पड़ता है। नहीं तो कौन याद रखता है हम जैसे मुसाफ़िरों को, दोस्तों को एक-एक रम की बॉटल चाहिए। घरवालों को पैसे और पत्नी को कोसने के लिए नित नए शब्द, बच्चों के हिस्से कुछ बचता ही कहाँ है? शिकायतों के अंकुर फूट-फूटकर स्वतः ही झड़ जाते हैं।"

वितान की मायूस आँखों को हँसाने के प्रयास के साथ तोगड़े दाँत निपोरता हुए टीसीपी के गोखे में रखी पानी की बॉटल को कोसने लगा।

 तपते पहाड़ो से गुज़रते शीतल झोंको के साथ वितान अपनों की स्मृतियों को और गहरे से उकेरने में मग्न हो गया।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Wednesday, 27 April 2022

मोजड़ी


                   " माँ! बहुत चुभती हैं मोजड़ी।”

 रुआँसा चेहरा लिए, पारुल ने अपने दिल की बात माँ से कही। इसी उम्मीद में कि माँ उसे सहलाकर सँभाल लेगी।

" नई मोजड़ी,  सभी को अखरती हैं! धीरे-धीरे इनकी ऐसी आदत लगती है कि कोई और जँचती ही नहीं पैरों में।"

पारुल की माँ झूठ-मूठ की हँसी होठों पर टाँकते हुए मेहंदी के घोल को बेवजह और घोंटती जा रही थी। 

"इनसे पैरों में पत्थर भी धँसते हैं।"

पारुल अपने ही पैरों की ओर एक टक देखती जा रही थी। मासूम मन छाले देख सहमता जा रहा था।

 शून्य भाव में डूबी माँ दर्द, पीड़ा; प्रेम इन शब्दों के अहसास से ऊपर उठ चुकी थी।बस एक शब्द था गृहस्थी जिसे वह खींचती जा रही थी। पारुल के पैरों में पड़े छालों पर मेहंदी का लेप लगाते हुए स्वयं के जीवन को दोहराती कि कैसे जोड़े रखते हैं रिश्तों की डोर? माँ परिवार शब्द से बाहर नहीं निकली, इसी शब्द में डूब चुकी थी। कभी-कभार तो माँ के हाथों से छूट चेहरे से चिपक जाती थी थकान, परंतु माँ थी कि कभी बोलती नहीं थी। बस एक ही शब्द हाँकती रहती थी कुटुंब । यह शब्द पारुल के लिए नया था, तभी चुभती थी  उससे मोजड़ी।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Saturday, 23 April 2022

धरा की अंबर से प्रीत


               "ल रही थी देह मेरी तब अंबर ने छिटकी थी प्रेम की बूँदें!" घुटनों पर ठुड्डी टिकाए बैठी धरा ने निशा को निहारते हुए कहा।

” तुम्हारी मिट्टी की ख़ुशबु से महकती है सृष्टि   ।” तारों जड़ा-आँचल ओढ़े चाँदनी बरसाती निशा ने धारा का माथा चूमते हुए कहा। 

 "बाहों में ले कहता था अंबर कि ख़्याल रखना अपना। एक  आह पर दौड़ा चला आता था!" निशा से कहते हुए धरा अंबर के अटूट प्रेम-विश्वास की गाँठ पल्लू से बाँधते हुए फिर बड़बड़ाने लगी और कहती है-

”देखते ही देखते निहाल हो गई थी मैं! बादलों का बरसना साधना ही तो थी मेरी। गृहस्थी फल-फूल रही थी। निकम्मे बच्चों को पालना रेगिस्तान में दूब सींचने से कम कहाँ था? " कहते हुए शून्य में लीन धरा अपने अति लाड-प्यार से बिगड़ैल बच्चों को पल्लू से ढकती, धीरे-धीरे उनका माथा सहलाने लगती है।

” अमर प्रेम है आपका!” पवन, पेड़ पर टंगी होले से फुसफुसाती है। पवन के शब्दों को धरा अनसुना करते हुए कहती है-

”एक ही परिवार तो था!  देखते ही देखते दूरियों में दूरियाँ बढ़ गईं। चाँद का चाँदनी बरसाना, सूरज का भोर को लाना उसमें इतना आक्रोश भी न था। बादलों का यों भर-भरकर बरसना सब दाता ही तो थे ! बेटी बिजली का रौद्र रूप कभी-कभी पीड़ा देता, बेटी है ना;  लाडली जो ठहरी।” समर्पित भाव में खोई धरा, आह! के साथ तड़प उठी।

”पुत्र समय! प्रेम की प्रति छवि, गृहस्थी चलाने को दौड़ता, घर का बड़ा बेटा जो है! मैं भी दौड़ती हूँ उसके पीछे, ये न कहे माँ निढाल हो गई।” कहते हुए धरा होले से पालथी मार बैठ जाती है कि कहीं हिली तो नादान बच्चे भूकंप भूकंप कह कोहराम न मचा दे! कहेंगे, ग़ुस्सा बहुत करती है माँ।

" बच्चों की मनमानी पर यों पर्दा न डाला करो !” निशा धरा के कंधे पर हाथ रखती है।

" ना री क्या कहूँ उन्हें ? दूध के दाँत टूटते नहीं कि कर्म जले अक्ल फोड़ने बैठ जाते हैं ! पानी है!हवा है!! फिर भी और गढ़ने बैठ जाते हैं। नहीं तो यों अंबर को न उजाड़ते और मेरा आँचल तार-तार न करते।” कहते हुए धरा मौन हो जाती है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति' 

Wednesday, 13 April 2022

स्वाभिमान का टूटता दरख़्त

                 


                 ”मौत पृष्ठभूमि बनाकर नहीं आती कभी,दबे पाँव कहीं भी चली आती है।”

कहते हुए सुखवीर उठकर बैठ जाता है।

”खाली रिवॉल्वर से जूझती मेरी अँगुलियाँ! उसका रिवॉल्वर मेरे सीने पर था। नज़रें टकराईं! कमबख़्त ने गोली क्यों नहीं चलाई?”

कहते हुए सुखवीर माँझे में लिपटे पंछी की तरह छटपटाता हुआ अर्पिता की गोद में अपना सर रखता है।मौत का यों गले मिलकर चले जाना उसके के लिए अबूझ पहेली से कम नहीं वह अर्पिता के हाथ को सहलाते हुए उसकी हस्त-रेखाएँ पढ़ने का प्रयास करता है।

”वह सतरह-अठारह वर्ष का बच्चा ही था ! हल्की मूँछे, साँवला रंग, लगा ज्यों अभी-अभी नया रंगरूट भर्ती हुआ हो ?”

दिल पर लगी गहरी चोट को कुरेदते हुए,सुखवीर बीते लम्हों को मूर्ति की तरह गढ़ता है।आधी रात को झोंपड़ी के बाहर गूँजते झींगुरों का स्वर उस मूर्ति को ज्यों ताक रहे हों।

”भुला क्यों नहीं देते उस वाक़िया को?”

सुखवीर के दर्द का एक घूँट चखते हुए, अर्पिता उसका सर सहलाने लगती है।

 फड़फड़ाते मोर के पंखों का स्वर, तेज़ क्रन्दन के साथ पेड़ की टहनियों से निकलते हुए,मध्यम स्वर में बोलते  ही जाना। स्वर सुनकर दोनों की नज़रें खिड़की से निकल खेतों की ओर टहने निकल पड़ती हैं।

ख़ामोशी को तोड़ते हुए सुखवीर कहता है-

” फौजी पर बंदा एहसान कर गया, सांसें उधार दे कर !”

हृदय की परतों को टटोलते हुए सुखवीर अर्पिता को एक नज़र देखते हुए उसी घटना में डूब जाता है। मन पर रखे भार को कहीं छोड़ना चाहता है।अर्पिता को लगा कि वह टोकते हुए कहे- ”वह पल सौभाग्य था मेरा।” परंतु न जाने क्यों ख़ामोशी शब्द निगल जाती है। महीनों से नींद को तरसती आँखें विचारों में प्रेम ढूँढती हैं। मुट्ठी में दबा ज़िंदगी का टुकड़ा सुखवीर को कहीं चुभता है एक आह के साथ बोल फूट ही पड़ते हैं।

”बंदे को ऐसा नहीं करना चाहिए था !”

नींद ने ज्यों पानी से भीगी पलकों पर दस्तक दी हो!सुखवीर आँखें बंद कर लेता है, देखते ही देखते हल्के झोंके के साथ स्वाभिमान का भारी दरख़्त टूट कर धरती पर गिर पड़ता है, गिरने के तेज़ स्वर से सहमी अर्पिता सुखवीर को सीने से लगा लेती है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Sunday, 3 April 2022

पेैबंद लगा पुरुष-हृदय


                   अहं में लिप्त पुरुष-हृदय करवट बदलता, स्त्री-हृदय को अपने प्रभुत्त्व का पाठ पढ़ाते हुए कहता है-

" काल के पैरों की आहट हूँ मैं! जब-जब काल ने करवट बदली,मेरा अस्तित्त्व उभर कर सामने आया है।"

  स्त्री-हृदय पुरुष-हृदय की सत्ता स्वीकारता है और खिलखिलाकर कहता है।

”चलो फिर बादलों में रंग भरो! बरसात की झड़ी लगा दो।”

कुछ समय पश्चात बादल घने काले नज़र आते हैं और बारिश होने लगती है।

”अब धूप से आँगन सुखा दो।”

कुछ समय पश्चात धूप से आसमान चमक उठता है।

" अच्छा अब अँधरे को रोशनी में डुबो दो। "

और तभी आसमान में चाँद चमक उठता है।

 समय के साथ पुरुष-हृदय का सौभाग्य चाँद की तरह चमकने लगता है।

अगले ही पल प्रेम में मुग्ध स्त्री-हृदय पुरुष-हृदय से आग्रह करते हुए कहता है-

"अब मुझे खग की तरह पंख लगा दो, पेड़ की सबसे ऊँची शाख़ पर बिठा दो।"

पुरुष-हृदय विचलित हो उठा, स्त्री-हृदय की स्वतंत्रता की भावनाएँ उसे अखरने लगती है। ”मुक्त होने का स्वप्न कैसे देखने लगी?” उसी दिन से पुरुष-सत्ता क्षीण होने लगती है।

 पेड़ की शाख़ पर बैठा पुरुष-हृदय छोटी-छोटी टहनियों से स्त्री-हृदय को स्पर्श करते हुए, स्वार्थ में पगी उपमाएँ गढ़ता है वह कोमल से अति कोमल स्त्री-हृदय गढ़ने का प्रयास करता है प्रेम और त्याग का पाठ पढ़ाते हुए कहता है -

”तुम शीतल झोंका, फूलों-सी कोमल, महकता इत्र हो तुम ममता की मुरत, प्रेमदात्री तुम।"

 स्त्री-हृदय एक नज़र पुरुष-हृदय पर डालता है शब्दों के पीछे छिपी चतुराई को भाँपता है और चुप चाप निकल जाता है।

” बला ने गज़ब ढाया है! रात के सन्नाटे को चीरते हुए निकल गई ! पायल भी उतार फेकी! चुड़ैल कैसे कहूँ? गहने भी नहीं लादे! लालचन लोभन कैसे कह पुकारूँ?"

वृक्ष की शाख़ पर बैठा पुरुष-हृदय, पेड़ के नीचे टहलते स्त्री-हृदय को देखता है।

देखता है! मान-सम्मान और स्वाभिमान का स्वाद चख चुका स्त्री-हृदय तेज़ धूप, बरसते पानी और ठिठुराती सर्दी से लड़ना जान चुका है। वर्जनाओं की बेड़ियों को तोड़ता सूर्योदय के समान चमकता, धरती पर आभा बिखेरता प्रकृति बन चुका है। 


@अनीता सैनी 'दीप्ति ' 

Monday, 28 March 2022

परिवर्तन



                  ” न री ! पाप के पैरों घुँघरु न बाँध; तेरे कलेजे पर ज़िंदा नाचेगा ज़िंदगी भर।”

बुलिया काकी का अंतरमन उसे कचोटता है। हाथों में लहू से लथपथ बच्ची को माँ के पेट पर डालती है और बाँस का टुकड़ा टटोलने लगती है।

"अरे आँखें खोल शारदा! वे ले जाएँगे करमजली को।"

बुलिया काकी नाल काटते हुए शारदा को होश में लाने का प्रयास करती है। शारदा की यह चौथी बिटिया थी, दो को  ज़िंदा दफ़ना दिया, एक दरवाज़े के बाहर बाप के पैरों से लिपटी खड़ी है। कि इस बार वह अपने भाई के साथ खेलेगी।

”काकी-सा इबके लला ही आया है ना...।”

दर्द से कराहते, लड़खड़ाते शब्दों के साथ प्रसन्नचित्त स्वर में शारदा पूछती है।

" ना री तेरा द्वार पहचानने लगी हैं निर्मोही, मेरे ही हाथों जनती हैं मरने को।"

बुलिया काकी माथा पीटते हुए वहीं चारपाई पर बैठ जाती है। शारदा लटकते पल्लू से बच्ची को ढक लेती है।

"काकी-सा दरवाज़ा खोल दो, उन्हें अंदर आने दो….।"

शारदा दबे स्वर में दरवाज़े की ओर इशारा करती है।

स्वर भारी था-” काकी बिटवा है ना?"

मदन चारपाई के पास झुकता हुआ पूछता है। दोनों औरतें एक टक मदन को ख़ामोशी से घूरतीं हैं मदन लड़की को बिना देखे ही समझ लेता है कि लड़की हुई है,पैर पकड़ वहीं काकी के पास बैठ जाता है।

"वे आप के माँ-बाप थे? आप थी वह लड़की  या कोई और ?" स्मृतियों में खोई पार्वती दादी को नीता टोकते हुए कहती है।

पार्वती दादी स्मृति में डूब चुकी थी समय लगता था उन्हें  वापस आने में।

"मदन न मारता, अपनी बेटियों को! दहेज का दानव आता, उठा ले जाता गाँव की बेटियों को, माँ- बाप तो कलेजा पीटते, कोई छुड़ाता न था।"

पार्वती दादी के चेहरे की झुर्रियों से झाँकती पीड़ा कई प्रश्न लिए खड़ी,दो घुँट पानी पिया और पथरई आँखों से घूरते हुए कहती।

"आज भी खुले आम घूमता है दानव, जो बेटियाँ बहादुर होती हैं जीत लेती हैं, जो लड़ना नहीं जानती उसे उठा ले जाता है आता तो आज भी है, गला नहीं घोंटता, धीरे-धीरे ख़ून चूसता है, हाँ आता तो आज भी है।”

पार्वती दादी पूर्ण विश्वास के साथ अपने ही शब्दों का दोहराव करती हैं।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Tuesday, 15 March 2022

मैं हूँ


                       “मेरा ईमेल चैक करते रहना, ख़ैर ख़बर मिलती रहगी कि मैं हूँ।”  उस दिन फोन पर प्रदीप के शब्दों में जोश नहीं, प्रेम था। प्रेम जो सांसों से बहता हुआ शब्दों में ढलता कह रहा हो बस आख़िरी मिशन... फिर रिज़ाइन लिख दूँगा, अब बस और नहीं होती यह नौकरी।

"मैं हूँ से मतलब …?” कहते हुए भावातिरेक में तान्या के शब्द  लड़खड़ा रहे थे। वाक्यों की गठान ठीक न जोड़ पाई। उसने प्रदीप को इतना पढ़ा कि उसके इन शब्दों का प्रत्युत्तर ठीक से नहीं दे सकी। फिर चाहे किताब हो या इंसान; अक़्सर ऐसा होता है, ज़्यादा पढ़ने से तारतम्यता टूट जाता है।

 “मैं हूँ से मतलब मैं हूँ…।" हल्के स्वर में प्रदीप ने ये शब्द फिर दोहराये थे। इस बार गला रुँधा हुआ नहीं था, अपितु जोश था। नहीं रुँधा हुआ था। इन्हीं ख़्यालों में गुम तान्या कॉरिडोर में रखी ख़ाली कुर्सी को एक टक ताक रही थी। एक पखवाड़ा बीत गया प्रदीप की व्यस्तता के चलते न कोई ईमेल न ही फोन बस का एहसास था।

 “मैं हूँ”


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Wednesday, 9 March 2022

वज्राहत मन

          


                 ”अम्मा जी आपके साथ और कौन-कौन है?” कहते हुए नर्स ड्रिप बदलने लगती है।

”हाँ…हाँ… वे!” कहते हुए अम्मा जी टुकुर-टुकुर नर्स को घूरने लगती हैं ।अम्मा जी की स्मृति विस्तार पर प्रश्न वाचक का लोगो लगा हुआ था।नर्स डॉ. को जो जो सुनाना चाहती, वही उन्हें सुन जाता। दिखाई भी वही देता, नर्स डॉ. को जो जो दिखाना चाहती।

”अम्मा जी कुछ स्मरण हुआ ?” नर्स जाते-जाते यही शब्द फिर दोहराती है। अम्मा जी को कुछ याद आता है परंतु याद की तरह नहीं बल्कि छींक की तरह, उमड़ता है फिर चला जाता है । नर्स को फिर टुकुर-टुकुर देखने लगती है।

”बड़ी शांत और सुशील हैं अम्मा जी।”कहते हुए पाँच नंबर बैड का पेशेंट अम्मा जी के पास से गुजरता है।

"ओह! शांत और सुशील! " व्यंग्यात्मक स्वर में नर्स यही शब्द फिर दोहराती है। अम्मा जी को भी यही  सुनाई देता हैं।

”हाँ…हाँ…हाँ…शांत…सुशील… !” स्मृतियाँ अब अम्मा जी के बुखार की तरह धीरे-धीरे उमड़ती हैं। बहुत देर तक स्थाई रहती हैं। माथे पर ठंडे पानी से भीगी  पट्टी रखी जाती है। गहरी साँस के साथ चारों तरफ़ देखती हैं परंतु दिखता नहीं है।स्वयं के साथ संघर्ष कर आजीवन अर्जित किया ख़िताब अम्मा जी के होंठो पर फिर टहलने लगता हैं।

”शांत… सुशील…।”


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Tuesday, 1 March 2022

ज्ञान सरोवर



   ” मालिक! मैं यह न समझ पाया, आप कब हो आए? ज्ञान सरोवर!” नाथू जमीन पर सोने के लिए प्लास्टिक का त्रिपाल बिछाता है।

” सात पीढ़ियों पहले हमारे पूर्वज होकर आए, हमारे तो ख़ून में बहता है ज्ञान।”

हुक्के की गुड़-गुड़ के साथ जमींदार का सीना छह इंच और चौड़ा हो जाता है। इस वार्तालाप के साक्षी बने चाँद- तारे घुटनों पर ठुड्डी टिकाए आज भी वैसे ही ताक रहे हैं जैसे वर्षों पहले ताक रहे थे।

” अब मालिक पीछला हिसाब कर ही दो, सोचता हूँ मैं भी ज्ञान सरोवर हो ही आता हूँ।”नाथू विचलित मन से जल्दी-जल्दी हाथों से त्रिपाल की सलवटें निकालने लगता है।

”अरे! ऐसे कैसे हो आते हो? वो तो बहुत दूर है!”

हुक्के की गुड़-गुड़ और तेज हो जाती है।

”कितना दूर मालिक, चाँद पर तो न ही ना?”

नाथू हाथ में लिया अंगोंछा सर के नीचे लगा लेता है।

"मानसरोवर के भी उस पार, नाम सुना है कि नहीं? उससे भी कई पहाड़ी ऊपर, तुम रहने दो मर मरा जाओगे कहीं!” कहते हुए -

काली रात में नील गायों के आने की सरसराहट सुनते हुए जमींदार ने निगाह दौड़ाई।

”अब सोचता हूँ मालिक, कब तक आपही की खींची लकीरें देखता रहूँगा। कुछ कहूँ तब आप उपले की तरह  बात पलट देते हो।”

नाथू हाथ में अंगोंछा लिए, फिर घुटनों के बल बैठ जाता है।

”फिर?”

 जमींदार प्रश्न करता है।

” फिर क्या? यों हांडी में सर दिए नहीं बैठूँगा।अपनी लकीर खींचूँगा।”

नाथू मुँह पर अंगोंछा डालकर सो जाता है। रात भर हुक्के की गुड़-गुड़ उसके कानों में गुड़कती रहती है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Thursday, 24 February 2022

बुलावा पत्र

   


        ”आँगन में बहू के पैर ही शुभ नहीं पड़े ! नहीं तो मेरा राजू क्या कम था पढ़ाई में?" हाथ में लिफ़ाफ़ा लिए नीना बेटे की नाकामयाबी को बहू की परछाई से ढकने का प्रयास करती है।

”मैं तो पहले दिन ही समझ गई थी, थालियों को क्या झट-पट उठा रही थी। अरे! थोड़ी शर्म लिहाज तो करती।” रोहिणी नीना के टूटे दिल की छेकड़ से झाँकते हुए उसे टटोलती है।

”ना री रोहिणी! ऐसे तो विश्वास न करूँ? यह  तो गुरुजी जी ने कहा है; बहू पर ग्रहों का दोष है अब देखो कब छटेंगे…? "

 बेचैनियों के साथ भावों के हिलोरों में बहती नीना। सारा दोषारोपण बहू के सर-माथे मढ़ देती है।

”क्या बहू ने कोई कांड किया? यों माथा पकड़ क्यों बैठी हो?”

चाय की चुस्कियों के साथ उत्सुकता का बिस्किट डूबोते हुए; रोहिणी नीना के ओर समीप खिसक जाती है।

”कल जा रही है  बाड़मेर, बुलावा पत्र आया है उसका।”

बहू के जाने से बेचैन नीना नासमझी की लपटों में झुलसती हुई रसोई की ओर जाती है।

”अच्छा, बताओ बहू कहा है? बड़े बुजुर्गो के आगे ढोक देना भी भूल गई क्या?”

रोहिणी चारपाई से उठती है, निगाहें कमरा तो कभी किचन की तरफ़ दौड़ाती है।

"बुआ जी आप तो मिठाई खाइए,  स्टेट बैंक में मेरा सिलेक्शन हुआ है, दो दिन बाद जॉइनिंग है।”

दीक्षा प्लेट में मिठाई लिए आती है।

”मैं कहूँ न, लाखों में एक है हमारी दीक्षा; तुम तो बौराय गई हो भाभी।”

झोंके-सी बदलती रोहिणी दीक्षा की बलाएँ लेते हुए अपने सीने से लगा लेती है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Thursday, 3 February 2022

लेखा




               "चले आए मुँह उठाये।”

प्रगति ख़ाली  बर्तनों को सिंक में पटकते हुए कहती है।

" इतनी निर्मोही न बनो; पसंद नहीं हूँ यही कह दो, व्यवहार तो ऐसे कर रही हो ज्यों ट्रैफ़िक-पुलिस का काटा चालान हूँ।”

लेखा बड़े स्नेह से प्रगति के कंधे पर ठुड्डी रखते हुए कान में कहता है।

"पूछा कब था? पिछले एक वर्ष से देख रही हूँ तुम्हें ; क्या चल रहा है ये,और ये अट्ठाईस दिन पहले आने वाला क्या झंझट है!"

प्रगति अपनी मोटी-मोटी आँखों से लेखा को घूरती है।

"क्या करता मैं! ऊपर से ऑडर था; और फिर खानापूर्ति करके सब को बहलाना ही तो था।”

शब्दों पर लगी धूल झाड़ सफ़ाई की चाबी छल्ले में टाँगते हुए लेखा कहता है।

"नून न राई, तेल सातवें आसमान पर, गैस सलेंडर  एक हज़ार पार होने को आया ; हांडी में क्या मोबाइल पकाऊँ ?"

कहते हुए प्रगति ज़मीन पर पसर जाती है।

 "अगले वर्ष फिर आऊँगा, इस बार मोंगरे का गजरा लाऊँगा।”

भोली सूरत के पीछे शातिर दिमाग़ को छिपाते हुए। दाँत निपोरता है लेखा।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Wednesday, 19 January 2022

दत्तचित्त


              "लव इज़ लाइफ़ बट माय लाइफ इज़ माय वर्क।”

अनूप का स्टेटस पढ़ते हुए अदिति एक नज़र अनूप पर डालती है। काम का बोझ ज्यों झाँक रहा हो आँखों से और स्टेटस...।

”लाइफ इज़ ब्यूटीफुल बट स्ट्रेस इज़ थॉर्न।”

हल्की बरसात में कॉरिडोर से अपना हाथ बढ़ाते हुए, अदिति कहती है।

"तुम्हारी मुस्कुराहट ही मेरी ज़िंदगी है।”

अनूप एक नजर आदिति पर डालता है फिर फ़ाइल में रो खींचने में व्यस्त हो जाता है वह समझ चुका है कि अदिति ने उसका स्टेटस पढ़ लिया है। कहीं न कहीं उसके शब्दों का दर्द झेल रही।

”घुटनों के बल सीढ़ियाँ चढ़ता अबोध बालक है जीवन।”

आदिति पहेली के सहारे शब्दों के पुल को बाँधने के प्रयास के साथ पति के कंधे पर सर रखते हुए कहती है।

" नज़रिया है अपना-अपना। मुझे लगता है ज़िंदगी उस चिड़िया की तरह है जो मेरी तरह भरी बरसात में  अपने पँख झाड़ रही है।"

अनूप फ़ाइल साइड में रखते हुए कंधे पर रखा आदिति का सर सहलाने लगता है।

”मुझे लगता है फ़ाइल में बंद प्रत्यक कारतूस का हिसाब है जिंदगी...।”

अदिति की ज़बान लड़खड़ा जाती है।अनजाने में शब्दों की चोट से एक नासूर रिसने लगता है। वादियों में प्रेम ढूँढ़ने निकला मन झोंके के थपेड़े से सहम जाता है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Thursday, 13 January 2022

निक्की

       


               ”माइंड को लोड क्यों देने का साहेब?”

नर्स डॉ. के साथ केबिन से बाहर निकलते हुए कहती है।

"बच्ची ने कुछ खाया?”

डॉ. निक्की की ओर संकेत करता हुए कहता है।

”नहीं साहेब! आजकल के बच्चे कहाँ कुछ सुनते हैं?

बार-बार एक ही नम्बर डायल कर रही है।"

नर्स दोनों हाथ जैकेट में डालते हुए शब्दों की चतुराई दिखाने में व्यस्त हो जाती है।

"साहेब लागता है ये केस मराठी छै; बार-बार बच्ची आई-बाबा बोलती।”

नर्स छ-सात साल की निकी के आँसू पौछते हुए उसका मास्क ठीक करने लगती है।

”जब तक बच्ची के रिलेटिव नहीं पहुँचते; आप बच्ची का खयाल रखें।”

डॉ. फ़ाइल नर्स के हाथ में थमाते हुए। पास ही बैठी अपनी बहन शिखा को हाथ से चलने का इशारा करता है।

”साहेब! आर्मी वालों का कोई ठिकाना नहीं होता। कब तक लौटेगा…? मेरे को इतना टाइम कहाँ…! मैं क्या करेगी; कहाँ रखेगी बच्ची को ?"

नर्स पीछे  से आवाज़ लगाती है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

स्वप्न नहीं! भविष्य था

                       स्वप्न नहीं! भविष्य वर्तमान की आँखों में तैर रहा था और चाँद  दौड़ रहा था।  ”हाँ! चाँद इधर-उधर दौड़ ही रहा था!! तारे ठह...