Sunday, 19 July 2020

लाचारी

     हल्की बरसात के साथ ही बरसाती पानी शहर की सड़कों पर दौड़ने लगा। यह नगर पालिका की मेहरबानी थी।

फ़ुटपाथ पर प्लास्टिक के कवर में सिमटी थी लाचारी कभी पैर तो कभी हाथ समेटने के प्रयास में लगी थी। हलचल साफ़ दिखाई दे रही थी।

 तेज़ रफ़्तार से दौड़ती हुई आई जल्दबाज़ी। वह अपनी ही धुन में थी। एक ही पल में सड़क पर पसरा गंदा पानी लाचारी के कवर पर पत्थर की चोट-सा लगा और वह सहम गई।तभी एक छोटी  बच्ची ने  मुँह उस कवर से बाहर निकला। अगले ही पल फिर वह कवर में छिप गई। 

देखते ही देखते मौसम के तेवर भी बिगड़ने लगे।तभी अचानक क्रोध वहाँ से गुज़रा उसे रेड लाइट का भी सब्र नहीं था। वह ऐसे आग उगलता निकला कि ट्रैफ़िक पुलिस उसके  पीछे लग गई। परंतु जाते-जाते फिर लाचारी पर गंदा पानी बरसा गया। फिर उसी बच्ची ने मुँह बाहर निकाला। अगले ही पल वह उसी कवर में सिमट गई।

 बूँदा-बाँदी अभी भी जारी थी। रेड लाइट के शोर-ओ-ग़ुल में हाथ में भुट्टा लिए सहसा प्रेम वहाँ ठहरा  एक पल उसने चारों तरफ़ निगाह दौड़ाई शायद वह लाचारी को आवाज़ दे रहा था कि वह अपनी जगह बदल ले। आने-जाने वाले गंदा पानी डालेंगे उस पर परंतु लाचारी ने अनसुना कर दिया। उस बच्ची ने भी मुँह बाहर नहीं निकाला। प्रेम ने अचानक उसकी वह प्लास्टिक हटाई।

सच्च ! उस वक़्त मैंने लाचारी को बहुत ही लाचार अवस्था में देखा। अपाहिज होती है लाचारी तब समझ में आया। पैर नहीं थे वह सिमटकर बैठी थी । काठ की छोटी-सी गाड़ी पर चप्पल  हाथों  में पहने ,बच्ची उसके पेट से चिपकी थी। पहली बार मैंने लाचारी को मोटी-मोटी आँखों से प्रेम को घूरते हुए देखा।

©अनीता सैनी 'दीप्ति'

Wednesday, 8 July 2020

अनुत्तरित प्रश्न

"बड़ी बहू हल्दी का थाल कहाँ है ?"


सुमित्रा चाची चिल्लाती हुई आई,

हल्दी के रंग में डूबी साड़ी के पल्लू को ठीक करते हुए एक नज़र अपने गहनों पर डालती हुई कहती है। 

"ओह ! मति मारी गई मेरी, यहीं तो रखा है आँखों के सामने।"


पैर की अँगुलियों में अटके बिछुए से साड़ी को खींचती हुई क़दम तेज़ी से बढ़ाती है। 


"सुमित्रा! बेटी का ब्याह है। बहू घर नहीं आ रही,यों  अपना आपा नहीं खोते।"

दादी ने मुँह बनाते हुए कहा 

बूढ़ी दादी पोती के ब्याह में ऐंठी हुई बैठी है कि कोई उससे कुछ क्यों नहीं पूछ रहा। दादी अपनी ऐंठन खोलते हुए मुँह बनाती है। परंतु सुमित्रा चाची अनसुना करते हुए वहाँ से निकल जाती है। हल्दी की रस्म शुरु होती है। हल्दी के रंग में रंगी औरतें खिलखिलाते हुए रस्म में चार चाँद लगातीं हैं। दादी अपने ही गुमान में बैठी देख रही थी यह सब। 

" दीदे फाड़-फाड़कर देखती ही रहोगी क्या ? वहाँ चौखट पर बैठ जाओ। सूबेदारनी अंदर ही घुसी आ रही है। विधवा की छाँव शुभ कार्य में शोभा देती है क्या ?"

 सुमित्रा चाची दादी पर एकदम झुँझलाती है।


"सुमित्रा !"

गोमती भाभी की ज़बान लड़खड़ा गई। 

न वह अंदर आ रही है और न ही अपने क़दम पीछे खींचती है। अपमान के ज़हर का घूँट वहीं खड़े-खड़े ही पी गई। क्षण भर अपने आपको संभालते हुए कहती है -


" बड़ी बहू वो शगुन तो लाना ही भूल गई मैं ...आती हूँ कुछ देर में दोबारा।"


गोमती भाभी दर्दभरी मुस्कान बड़ी बहू को थमा जाती है फिर आने का वादा करके एक अनुत्तरित प्रश्न के साथ ...


 ©अनीता सैनी 'दीप्ति'

तुम्हें भुला नहीं पाई

          आज से लगभग दस वर्ष पूर्व मेरे पति की पोस्टिंग जयपुर कमांड हाउस में थी। हम सरकारी क्वाटर में रहते थे। उस वक़्त मेरी गुड़िया की उम्र ...