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Wednesday, 21 September 2022

भावों की तपिश


          ”हवा के अभाव में दम घुट रहा है, हमारा नहीं; पहाड़ों का। द्वेषी है! पेड़ों को पनपने नहीं देता!! "

पहाड़ों पर भटके एक पंछी ने फोन पर अपनी पत्नी से कहा।

"कौन है द्वेषी?"

पत्नी ने सहज स्वर में पूछा।

”सूरज! कुछ दिनों से पृथ्वी से अनबन जो चल रही है उसकी !!”

पंछी सूरज, पृथ्वी और पहाड़ों से अपनी नज़दीकियाँ जताते हुए बड़ी चट्टान के सहारे  पीठ सटाकर बैठ जाता है।

”तुम सुनाओ! तुम्हारे यहाँ क्या चल रहा है?

पंछी से व्याकुलताभरे स्वर में पूछा।

”कुछ नया नहीं!  वही रोज़ का रुटीन!! दैनिक कार्यों में व्यस्त धूप धीरे-धीरे दिन सोख रही है। तीसरे पहर की छाँव तारीख़ से मिटने की पीड़ा में दहलीज़ पर बैठी है। समय चरखे पर लिपटने के लिए तेज़ी से दौड़ रहा है।”

पत्नी ने दिन का ब्यौरा देते हुए एक लंबी सांस भरी।

"और पौधे?” पंछी ने तत्परता से पूछा।

”पौधे नवाँकुर खिला रहे हैं तो कहीं फूलों में रंग भर रहे हैं।”

पत्नी ने बड़ी सहजता से कहा।

”हूँ " के साथ पंछी और पहाड़ों ने गहरी सुकून की सांस भरी जैसे हवा का झोंका नज़दीक से गुज़रा हो!


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Saturday, 10 September 2022

मरुस्थल की नदियाँ



”बाँकपन लिए,

मरुस्थल की नदियाँ खारी होती हैं!”

 विनय! रेत से भरी मुट्ठी हवा में उछालता व्यंगात्मक दृष्टि से अरुँधती की ओर मुस्कराता है।

अपेक्षाओं की बिखरती लहर देख वह शिकायतों का सेतु खड़ा करता है। तैरती विचारों की मछलियाँ समंदर और मरुस्थल का भेद भूल जाती हैं। रेत हवा में उड़ने लगती है। बची जल धराओं को सुविधा अनुसार मोड़ने का प्रयास पहाड़-सा लगता है।

”आख़िर समंदर की बेटियाँ हैं! लवणीयता लिए तो बहेंगी ही!”

इस बार विनय ने शब्दों की सूखी रेत नहीं उड़ाई ! भावों में भिगो मिट्टी का गोला बना अरुँधती की तरफ़ फेंका।

" नदी का बहना मात्र सार्थक नहीं है?”

अरुँधती ने शब्दों का घूँट-सा गटका इस वाक्य ने उसे पुनर्जीवित कर दिया।

”पहाड़ी नदी के स्वर में सुकून, पानी में मिठास होता है!”

विनय स्वच्छंद उड़ान की इच्छा में ठहरे पानी में कंकड़ फेंकता है।

" बादलों के नहीं बरसने से मरुस्थल रूठता है ? उसके नसीब में नहीं होता जंगल, मीठे पानी का झरना।”

जीवन से जूझती नागफनी थी अरुँधती , वहीं विनय शीतल झोंका ;  विनय शब्द बनने को तत्पर आवाज़ तलाशता रहा। अरुँधती उसे भाव बना मरुस्थल में छुपाती रही।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

 

भावों की तपिश

          ”हवा के अभाव में दम घुट रहा है, हमारा नहीं; पहाड़ों का। द्वेषी है! पेड़ों को पनपने नहीं देता!! " पहाड़ों पर भटके एक पंछी ने फो...