Sunday, 28 February 2021

हाँ, डायन होतीं हैं !


         ”डायन होतीं हैं। हाँ, धरती पर ही होतीं हैं। अब बस उनके बदन से बदबू नहीं आती। बदसूरत चेहरा ख़ूबसूरत हो गया और न ही उनके होठों पर अब लहू लगा होता है। दाँत टूट चुके हैं। देखो! उनके नाख़ुँन घिस गए।  तुम्हें पता है, पता है न, बोलो! अरे बोलो न!! तुमने भी देखा है उसे ...?”

वह कमरे से बाहर दौड़ती हुई आई,घबराई हुई थी आँखों में एक तलाश लिए, पास खड़ी संगीता से पूछ बैठी।

न चेहरे पर झुर्रियाँ , न फटे कपड़े: पागल कहना बेमानी होगा। तेज था चेहरे पर, उम्र चालीस-पैंतालीस से ज़्यादा न दिखती थी। दिखने में बहुत ही सुंदर और शालीन थी वह।

”हाँ, होतीं  हैं जीजी! हमने कब मना किया, चलो अंदर अब आराम करो। लगन के बाद गुड्डू को हल्दी लगानी है। आपके बिन शगुन कैसे पूरा होगा? चलो-चलो अब आराम करो।”

दुल्हन की माँ उन्हें अंदर कमरे में ले जाती है।

इस वाकया के बाद माहौल में काना-फूसी होनी स्वभाविक थी। सभी की निगाहें उस बंद कमरे की तरफ़ थीं।

”कौन थी ये?”

संगीता ने पास बैठी एक महिला से दबे स्वर में पूछा।

”होने वाली दुल्हन की बूआ-सा हैं। सुना है इनके पति आर्मी में कोई बड़े पद से रिटायर्ड थे और बेटा भी आर्मी में कोई बड़ा ही अधिकारी था।”

महिला ने एक ही सांस में सब उगल दिया।

”नाम क्या था?”

संगीता ने बात काटते हुए कहा।

”नहीं पता! यही सुना बहु ने शादी के चार-पाँच महीनों में दोनों बाप-बेटे की कहानी ख़त्म कर, तलाक लेकर विदेश चली गई। बेटे ने रिवॉल्वर से ख़ुद को शूट कर लिया। पिता बेटे का ग़म सह न सका, कुछ दिनों बाद उसने भी आत्महत्या कर ली।”

महिला ने बड़े ही सहज लहज़े  में कहा, कहते हुए साड़ी और गहने ठीक करने में व्यस्त हो गई, अचानक कहा-

”वेटर कॉफ़ी।”

महिला ने कॉफी उठाई और चुस्कियों में डूब गई।

 वह बंद दरवाज़ा छोड़ गया मन में एक कसक कि क्या डायन होतीं हैं?


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Friday, 12 February 2021

पर उपदेश कुशल बहुतेरे

     


           सावन महीने के दूसरे सोमवार की घटना है, संजू और उसकी सास उस रोज़ सुबह-सुबह शिवालय में जल चढ़ाने जातीं हैं। एक दिन मंदिर में पार्वती माँ उनको मिलती हैं, कॉलोनी की औरतें उन्हें इसी नाम से पुकारतीं हैं।

     ”आ बैठ ममता! मंदिर में कुछ देर ठहरने से मन्नतें पूरी होतीं हैं, कुछ देर प्रभु की शरण में बैठना भी सुकून दे जाता है। देखो! तुम्हें  कहना ठीक तो नहीं लगता, अपनी है सो कह देती हूँ।”

मंदिर की सीढ़ियों पर पार्वती माँ के साथ संजू और उसकी सास बैठ जातीं हैं।

   ”उस रोज़ तुम्हारे घर की चाय पी थी।”

पार्वती माँ कुछ ठहर जातीं हैं।

   ”अरे वो! बहू ने बनाई थी, बड़ी अच्छी चाय बनाती है म्हारी संजू।”

संजू की सास चहकते हुए कहती है।

   ” वो तो ठीक है परंतु मैं यों कहूँ, उसमें जले दूध की गंध आ रही थी; यों दूध जलाना-उफानना ठीक नहीं।मान्यता है कि शुभ नहीं होता।”

पार्वती माँ दान में मिले सीदे की पोटली अलग-अलग करतीं हुईं  कहतीं हैं।दोनों सास-बहू के माथे पर अपमान की सलवटें उभर आईं।

   ”ठीक है फिर चलते हैं, पार्वती माँ फिर कभी फ़ुरसत में बात करेंगे।”

संजू की सास उठने का प्रयास करती है।

   ”अरे नहीं! बैठ तो ज़रा।”

पार्वती माँ हाथ पकड़कर संजू की सास को वहीं बैठाती है।

   ”देख घर की बात है तब कहूँ, घर में चप्पलें ठीक तरह तरतीब से रखी रहनी चाहिए और चप्पल पर चप्पल बड़ा अपशकुन होता है, देख! पायदान को रोज़ झाड़ें और दहलीज़ पर हल्दी-कुमकुम के छींटे दिया कर। एक और बात

बहू को थोड़ा रोकती-टोकती रहा कर, रसोई में बर्तनों की ज़्यादा आवाज़ ठीक नहीं। बहू सुशील है परंतु कुछ संस्कार भी हों तो सोने पे सुहागा।”

अब पार्वती माँ के कलेज़े का भार कुछ कम हुआ और वे अपने आपको हल्का महसूस करने लगी, लंबी और चैन की सांस भरी।एक पल के लिए,

संजू और उसकी सास का मन भारी हो गया। दोनों के पैरों को जैसे जड़ों ने जकड़ लिया हो। संजू ने सोचा यह एक बार घर आई और पूरा निरीक्षण का पिटारा हमारे ही सामने खोल दिया। सास जिस बहू की तारीफ़ करते नहीं थकती, कॉलोनी में अब क्या कहेगी?

     ” पहले पहर ही मंदिर में आकर बैठ जाओ, कुछ देर बच्चों को भी सँभाल लिया करो।”

पार्वती माँ के बेटे की बहू हवा की तरह आती है और बच्चे को उसकी  गोद में थमा उसी गति से वापस चली जाती है। तीनों उसका मुँह ताकतीं रह जातीं हैं।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Monday, 8 February 2021

समझ का सेहरा

     


                     

                       ”आप क्या जानो जीजी, पीड़ा पहाड़-सी लगती है जब बात-बात पर  कोई रोका-टाकी करता है।”

पिछले काफ़ी दिनों से राधिका की जुबाँ पर यही बस यही शब्द कथक कर  रहे होते हैं। उसे देखकर लगता काटो तो ख़ून नहीं।

”अनसुना क्यों नहीं करती? क्यों दिल पर लेती है? तुम्हारे पति की आदत है।सास-सुसर बुज़ुर्ग  हैं।”

बदले में नीता का यही एक उत्तर राधिका को मिलता परंतु न जाने क्यों आज वह तमतमा गई।

”आप क्या जानो मेरे हृदय की पीड़ा, घूँघट में सभी बीनणीया बढ़िया दिखतीं हैं चेहरा तो घूँघट उठाने पर दिखता है।”

ग़ुस्से से तमतमाया राधिका का चेहरा लाल पड़ चुका था, इतने ग़ुस्से में वो कभी न होती थी।

”जीजी! आपको रोकने-टोकनेवाला कोई नहीं है कि क्या बना रही हो? और क्या नहीं बनाओ? पति और सास-ससुर आपके कहे अनुसार चलते हैं आप कभी नहीं समझोगी  मेरी पीड़ा।”

राधिका आपे से बाहर हो आग-बबूला हो गई। इस समय नीता ने राधिका से ज़्यादा  वाद-विवाद करना ठीक नहीं समझा।

”तुम्हें फ़ीवर होता है तब तुम्हारे पति ही चाय बनाते होंगे और सास खाना, डॉ. के पास भी ले जाते होंगे?”

नीता आराम से राधिका से पूछती है।

”दायित्त्व है उनका और कौन करेगा? मैं फ़ीवर में काम क्यों करूँ?”

राधिका बेपरवाही में सिमटी अभी भी होश में नहीं थी।

” और तुम्हारा दायित्त्व ?"

नीता जल्द ही अपने शब्दों को बदलने का प्रयास करती है और कहती है -

” तुमने ठीक कहा, मैं नहीं समझूँगी क्योंकि मुझे कोई नहीं है यह कहने वाला कि आज तुम आराम करो तुम्हें फ़ीवर है,मैं चाय बनाता हूँ, आज बच्चों के स्कूल में, मैं ही चला जाता हूँ। कोई नहीं है ये कहने वाला कि माँ-बाबा की दवाई आज मैं ले आता हूँ। आज की ज़रूरतों को कल पर डालना कुछ भारी तो लगता ही होगा? परंतु तुम ठीक कहती हो मैं नहीं समझूँगी क्योंकि मैं तुम्हारी जगह नहीं हूँ।”


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


Thursday, 4 February 2021

परिवर्तित परिवेश

                    


                ”बड़ी बहू कहे ज़िंदगीभर कमाया, किया क्या है? एक साइकिल तक नई नहीं ख़रीदी।”

बग़लवाली चारपाई पर ठुड्डी से हाथ लगाए बैठी परमेश्वरी अपने पति से कहती है।

”जब हाथ-पैर सही-सलामत तब गाड़ी-घोड़ा कौ के करणों।”

निवाला मुँह में लेते समय हाथ कुछ ठनक-सा गया, हज़ारी भाँप गए कि बहू दरवाज़े के पीछे खड़ी है और समझ गए अगले महीने होने वाले रिटायरमेन्ट पर उठनेवाले बवाल की लहरें हैं।

”मुझे तो समझ न थी, आप तो कुछ करके दिखाता बेटे-बहूआँ णा; जिणो हराम कर राखौ है। कहती है- के करौ  जीवनभर की कमाई को; आँधा पीसो कुत्ता खायो।”

परमेश्वरी पति की थाली में एक और रोटी रखती है, छाछ का गिलास  हाथ में थमाते हुए कहती है।

”घर आने से पहले इतनी हाय-तौबा, सोचता हूँ बाक़ी जीवन बसर कैसे होगा? पंद्रह जनों का पालन-पोषण कर रहा हूँ और क्या चाहिए?”

खाना अधूरा छोड़ हजारी थाली छोड़ उठ जातें हैं। हाथ धोकर तौलिए से हाथ पोंछते हुए अपनी चप्पलें चारपाई के नीचे से पैरों से खिसकाते हुए कहते हैं।

”अपने घर के पेड़ न सींचता! भाई-बहन को करो, कौन याद रखे।  परिवार के लिए बैंक में तो फूटी कौड़ी नहीं है, मैं नहीं बहू कहे।”

परमेश्वरी थाली स्टूल से उठाती हुई कहती है।

हज़ारी एक टक अपनी पत्नी की ओर देखते हैं, देखते हैं उसकी घबराई आँखों को; भोलेपन में डूबी बुढ़ापे की परवाह और बेटे-बहू की समझदारी के तैरते अनेक बैंक-बैलेंस के प्रश्नों को।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Thursday, 28 January 2021

बुज़ुर्ग

            


            "अंक प्लीज़ साइड में ही रहें आप आपके कपडों से स्मैल आ रही।”

बीस-बाईस साल की युवती ने मुँह बनाते हुए नाक को सिकोड़ते हुए।

अभी-अभी मेट्रो में सवार हुए सत्तर-पचहत्तर साल के बुज़ुर्ग लुहार से कहती है।

उसके कपड़े मैले-कुचैले,चेहरे और हाथों पर धूप-मिट्टी ने मिलकर एक परत बनाई हुई थी परंतु बड़ी-बड़ी मूछों में ताव अभी भी था। उसके दोनों कंधों पर लोहे के कुछ बर्तन टंगे थे एक हाथ से मेट्रो में सपोर्ट को पकड़े हुए और दूसरे हाथ में भारी सामान थाम रखा था।जिसे न जाने क्यों वह नीचे नहीं टिकाना चाहता था। लड़की ने जैसे ही उससे कहा वह स्वयं को असहज महसूस करने लगा। चेहरे पर बेचैनी के भाव उभर आए। सहारे की तलाश में वह बुज़ुर्ग इधर-उधर आँखें घुमाने लगा। हर कोई उससे दूरी बनाना चाहता था।

”मैम प्लीज़ आप मेरी सीट पर...।”

पास ही की सीट पर बैठे एक हेंडस्म नौजवान ने हाथ का इशारा किया और लड़की को अपनी सीट दी,हल्की मुस्कान के साथ दोनों ने एक-दूसरे का स्वागत किया। लड़की अब सहज अवस्था में थी। सीट मिलते ही वह अपने आपको औरों की तुलना में बेहतर समझने लगी।

अभी भी बुज़ुर्ग असहज था। उसकी आँखों में बेचैनी, क़दम कुछ लड़खड़ाए हुए से...।

”प्लीज़ टेक सीट।”

तीन-चार सीट दूर बैठे एक विदेशी टूरिस्ट की आवाज़ थी।

 उसने उस बुज़ुर्ग का सामान थामते हुए उसे अपनी सीट पर बैठने का आग्रह  किया।

जिन यात्रियों की आँखें इस घटनाक्रम पर टिकी हुईं थीं एक पल के लिए उनकी पलकें लजा गईं।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Tuesday, 26 January 2021

अंतर

        

                            ”बिटिया लकड़ियों से छेड़खानी नहीं करते काँटा चुभ जाएगा।”

विजया की दादी माँ ने अलाव में कुछ और कंडे डालते हुए कहा।

”अब भगीरथ की दोनों बहुओं को ही देख लो, छोटीवाली तो पूरे गाँव पर भारी है। शदी-विवाह में सबसे आगे रहती है। मजाल जो उसकी ज़बान से एक भी गीत छूट जाए।”

विजया की दादी अलाव से कुछ दूर खिसकती हुई उसके दादाजी से  कहती है।

”अरे! क्यों उनके पीछे लगी रहती है, सीख जाएँगीं धीरे-धीरे।”

और पास खड़ी विजया को वो अपनी गोद में बिठाते है।

”अब और कब सीखेंगीं, कल की ही बात कहूँ; बड़ीवाली से कहा कोठरी से जेवड़ी लाने को, वहाँ बूत बनी खड़ी रही जाने क्या मँगवा लिया हो? इतनी भी समझ नहीं है थारी बीनणियाँ में।”

बहुओं की खीझ लकड़ियों पर उतारते हुए,अंदर-ही अंदर टूट रही होती है।

”आप क्या जानो मेरे मन की पीड़ा दुनिया की बहुएँ इतनी टंच होवें कि सास-ससुर सुख से मर सकें और म्हारे माथे पर ये दोनों एक गूँगी, एक बहरी।”

”ठीक से समझाया करो इन्हें , आधी-अधूरी बात बोलती हो तुम।"

दादाजी  विजया से पानी का गिलास मँगवाते हुए कहते और वह दौड़ती हुई अंदर गई।

”अब पूजा-पाठ भी मैं ही सिखाऊँ? उनके माँ-बाप ने कुछ न सिखाया । म्हारा भी कर्म फूटेड़ा था जो ये दोनों मिली।”

विजया की दादी की चिंताएँ अब आग की लपटों-सी दहकती दिखीं।

”अम्मा मैं अच्छे से सभी गीत सीखूँगी,पूजा भी अच्छे से किया करुँगी और गाय को चारा भी डालूँगी।”

विजया ने दादाजी को पानी का गिलास थमाते हुए कहा।

”न री लाडो! बेटियाँ तो घर में चहकतीं ही अच्छी लगती, मैं तो बहुओं की बात कहूँ तू तो बड़ी हो कलेक्टर बनना।”

दादीजी ने विजया को सीने से लगा लिया।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


Friday, 11 December 2020

बैल बुद्धि ने कहा- "उन्नति है!"


[चित्र साभार : गूगल ]
एक तरफ़ जहाँ उन्नति सम्पनता पीठ पर लादे दौड़ती है। 

वहीं सड़क किनारे लाचारी पेड़ की छाँव में बैठी उन्नति से हाथ मिलाने की चाह में टूटती जा रही है। 

गाँव और हाइवे का फ़ासला ज़्यादा नहीं है परंतु अंतर बहुत है। 

  हाइवे पर जहाँ आलीशान गाड़ियाँ दौड़ती हैं वहीं गाँव में ऊँट- गाडियों की मद्धिम चाल दिखती है। 

हाइवे से इतर, उन्नति गाँव में फैलना चाहती है जैसे ही ऊँट-गाड़ी गाँव की तरफ़ रुख़ करतीं है उन्नति उन पर सवार होती है।
कभी ऊँट की थकान बन गिरती है, कभी ऊँट को हाँकने की ख़ुशी बन दौड़ती है तो कभी दोनों का आक्रोश बन आग बबूला होती है। अगर जगह न भी मिले तब वह चिपकती है ऊँट गाड़ी के टायर से मिट्टी की गठान बन।
   कभी-कभी थक-हारकर वहीं पेड़ की छाँव में बैठती है। हाइवे को देखती है,देखती है जड़ता में लीन ज़िंदगियों की रफ़्तार।

ढलते सूरज का आसरा लिए कुछ क़दम चलती है उन्नति गाँव की औरतों के संग जो अभी-अभी उतरीं  हैं तेज़ रफ़्तार से चलने
वाली ज़िंदगियों के साथ, उन्नति सवार होती है उनकी हँसी की खनक पर, सुर्ख़ रंग के चूड़े के सुर्ख़ रंग पर, क़दमों की गति पर,
कभी ओढ़नी के झीनेपन से झाँकती है जिसे उन औरतों ने  छिपाया है थेले में सबकी निगाह से सबसे नीचे,कभी-कभी समा जाती है वह उन औरतों के मन में विद्रोही बन परंतु जैसे ही गाँव में प्रवेश करती हैं वे औरतें उसे छिटक देतीं  हैं। स्वयं से परे मिट्टी के उस टीले पर,पेड़ों के झुरमुट में।
कई सदियाँ बीत गईं, उन्नति वहीं बैठी है निर्मोही और निरीह।

आज उस मिट्टी के टीले पर बैठे हैं कुछ नौजवान वे उन्नति को गाँव की शोभा बनाने की बातों में उलझे हैं। विषय बहुत गंभीर है,आवाज़ में जोश उत्साह उफनता नज़र आया।
वे नौजवान भविष्य बेचने को उतारु, भूख ठुकराने को तत्पर,उन्नति की चाह में होश गवाँ बैठे।

कहते हैं -

"भूख भटकाएँगे, फिर भी न मिली तब हम कुछ स्वप्न  गिरवी रखेंगे।"

जोशीले नौजवान ने उन्नति हेतु स्वयं को दाँव पर लगाया।कुछ और नौजवानों में उत्साह जगाया।

जोखिम उठा कंधों पर, उन्नति को पाने की लहर-सी दौड़ी।
बुद्धि की चतुराई किसी के समझ न आई।

"चलना कहाँ है ?"
मन का डर एक पल बुदबुदाया।

 हिम्मत कहती है -
" बुद्धि कहते हैं उसे हमें भी सर-माथे बिठानी होगी।"

उन्नति की चाह में गाँव के नौजवानों ने बुद्धि से हाथ मिलाया।

सर-माथे बिठा, आदेश को आँखों पर सजाया।

उन्नति दुल्हन-सी शरमाई।

"हाँ! अब मैं प्रवेश करुँगी गाँव में सदियों बाद एक उम्मीद-सी इठलाई,नौजवानों की सांसों  में सुकून बन इतराई।"

धीरे-धीरे उन्नति निखरती आई। गाँव की गलियों में अशोक के वृक्ष-सी लहराई ।

बदले में नौजवानों ने गाँव का अन्न लुटाया, अपनों को भूखा सुलाया जो न माना उसे पानी पिलाकर सुलाया।

उन्नति की चाह ने सभी को नंगे पाँव दौड़ाया,उस दिन से लाचारी चौखट पर बैठी, भूख ने एक-एक निवाले को तरसाया।

बुद्धि ने अब बैल-बुद्धि का रुख़ अपनाया।

गाँव में हौज़ बनवाया पानी अभी तक न आया

सड़क के पत्थर रेत में समाए।  

बुद्धि ने नौजवानों को और झाँसे में ले उन्नति के नाम की बैसाखी थमाई उस पर इच्छाओं की घंटी लगवाई।

गाँववालों को भूख से कुपोषित करवाया। किसी की ज़मीन, किसी के बैल गिरवी रखवाए।गृह-क्लेश उनके हाथों में ज़िंदगी जहन्नुम बना ख़ामोशी पहन रियायत बाँटने निकली।

सड़क बनवाई उस पर पानी को दौड़ाया, लैंम्प पोस्ट के लट्टू की रोशनी निखर-निखरकर आई।जहाँ पानी का अभाव वहाँ पानी निकालने की नालियाँ नज़र आईं।

और तो और पुराना ऐतिहासिक पंचायत भवन को गिरा नए का शिलान्यास करवाया। नौजवानों के हाथों में लोहे के निवाले थमाए,वृद्धों के लिए मनोरंजन की व्यवस्था करवाई।

बुद्धि ने कहा-

"उन्नति है!"

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Tuesday, 8 December 2020

माँ



               "माँ को बेटियों के पारिवारिक मामलों में ज़्यादा दख़ल  नहीं देनी चाहिए।

बेटियाँ जितनी जल्दी मायके का मोह छोड़ती हैं उनकी गृहस्थी उतनी जल्दी फलती-फूलती है।"

माँ आज भी इन्हीं विचारों की गाँठ पल्लू से लगाए बैठी है। बहुत कुछ है जो उससे कहना है, पूछना है परंतु वह कभी नहीं पूछती, न ही कुछ कहती है। 

समझदारी का लिबास ओढ़े टूटे-फूटे शब्दों को जोड़ती हुई फोन पर कहती है-

"सालभर से ज़्यादा का समय हो गया गाँव आए हुए, देख लेना, गाँव का घर भी सँभाल जाना और एक-दो दिन मेरे पास भी रुक जाना, मन बहल जाएगा।"

मन होता है पूछूँ मेरा या तुम्हारा।

जब भी मन भारी होता है माँ का तब बेपरवाही दर्शाती हुई कहती है-

"गला भारी हो गया, ज़ुकाम है; नींबू  की चाय बनाऊँगी।"

 और फोन काट देती है।

सप्ताह में एक-दो बार उसे ज़ुकाम होता है। कभी-कभी मुझे भी होता है। पूछती नहीं है माँ, बताती है।

" नींबू की चाय बनाकर पी ले।"

मैं उससे भी ज़्यादा समझदारी दिखाती हूँ।

"नेटवर्क नहीं है"...कहकर फोन काटती हूँ...।”

@अनीता सैनी  'दीप्ति'

Tuesday, 1 December 2020

मन की वीथियों से

   


         मन की  वीथियों से झाँकती स्मृतियाँ कहतीं हैं कि वे क़ैद क्यों है? कुछ प्रश्न हमेशा के लिए प्रश्न ही रहते हैं,वे तलाशते हैं उत्तर और कहते हैं उत्तर कहाँ हैं?

ऐसी ही कुछ स्मृतियाँ आपसे बाँटना चाहती हूँ।

शायद मन का कुछ भार कम हो।

राजस्थान में शेखावाटी के टीले, उन टीलों में दफ़्न है वे पदचाप।

पदचाप जिन्होंने  कई ऊँटों को जीवनदान  दिया। पशुओं की सेवा को अपना धर्म बनाया।जीवन के अंतिम पड़ाव पर भी काफ़ी दूर तक निकल पड़ते वे पदचाप पशुओं के इलाज हेतु। थकान जैसा शब्द उनके लिए बना ही नहीं था।एक आलोक था चेहरे पर आवाज़ में उछाह। 

माँ एक आवाज़ के साथ उनका आदेश पूरा करती। चाहे वह चाय-पानी हो या खाना बनाना या पशुओं को चारा डालना हो।

पशुओं के लिए पानी का स्रोत उस स्रोत के बग़ल में ही बैठते थे।उस रास्ते से गुज़रने वाला कोई भी व्यक्ति या पशु कभी भी भूखे पेट नहीं लौटता। ऐसे नेक दिल इंसान थे मेरे दादा जी।

मैं स्वयं से पूछती हूँ कि क्या शब्दों से किसी की हत्या हो सकती है? उत्तर कुछ उलझा-सा मिलता है और उसी उत्तर में उलझ जाती हूँ मैं।

परंतु कैसे ?

 हमें एहसास नहीं होता की हमारे शब्दों की वजह से सामनेवाला व्यक्ति  ज़िंदगी से हार चुका है। किसी के लिए कुछ शब्द सिर्फ़  शब्द होते तो किसी के लिए  वही शब्द बहुत गहरा ज़ख़्म बन जाते हैं। पिलानेवाला बेफ़िक्री से पिला जाता है शब्दों में  ज़हर का घूँट और पीनेवाले का जीवन ठहर जाता है।

मेरे दादा जी पेशे से पशु चिकित्सक थे। प्रकृति और पशु-पक्षियों से अथाह प्रेम उन्हें भीड़ से अलग पहचान दिलाता है। वे बिन फीस लिए पशुओं का इलाज करते थे।आस-पास के पचास गाँव से लोग उनके पास अपने पशुओं के इलाज हेतु आया करते थे। बहुत ही नाज़ुक मन के नेक दिल इंसान थे। परंतु थे बड़े स्पष्टवादी।

झूठ फ़रेब राजनीति से कोसों दूर। छोटे बच्चे की तरह मासूमियत शब्दों से ज़्यादा व्यवहार में झलकती थी। कई क़िस्से ऐसे है जो भुलाए नहीं भूलते-

आज जहाँ सभी माता-पिता अपनी लड़कियों की शादी करते वक़्त ज़मीन-जाएदाद  और पैसा देखते हैं वहीं मेरे दादा जी मेरी सगाई के वक़्त मुझसे कहते हैं- 

"थारे ख़ातिर म्हारे से ज़्यादा ज़मीनवाला घर कोन्या देखा ताकि थान कम काम करना पड़ेगा ससुराल में।"

कहते-कहते गला रुँध जाता और कहते-

"सीता छोटो-सो आँगन है तने ज़्यादा झाड़ू-पौंछा भी कोनी करना पड़ेगा।"

 इतना मासूम मन था उनका।

मेरी शादी से पहले ही मेरी सास से झगड़कर आ गए।

कहते -

" म्हारी छोरी घर को काम कोनी करेगी बहुत दुबली और कमज़ोर है।" 

शायद वे  मेरे लिए तमाम ख़ुशियाँ बटोरना चाहते थे।

कभी-कभी  सोचती हूँ कोई किसी की इतनी फ़िक़्र भी कर सकता है क्या ?

और मैं नासमझी की टोकरी कंधों पर लिए समझदारी को थामे नासमझी ही बाँटती फिरती।

जब बिट्टू तीन-चार महीने का था तब वे मुझसे कहते-

" सीता!  बिट्टू को मेरे पास सुला दे।"

 और मैं ग़ुस्सा करती हुई कहती-

 " नहीं दादा जी आप इसे दबा देंगे, कहीं गिरा देंगे यह रोने लगेगा।"

जिसने इतने बच्चों का पालन-पोषण किया। उससे ही अगले एक मिनट में बच्चों का पालन-पोषण करना सिखा देती। पता नहीं बिट्टू से उनका स्नेह ज़्यादा था या मेरी ममता। 

उसी समय कुछ ऐसा घटित हुआ कि  हमारा अगले एक वर्ष तक मिलना नहीं हुआ।

उसी दौरान दादा जी को ब्रेन हेमरेज हो गया।एक अस्सी साल के व्यक्ति को क्या समस्या सताएगी कि उसे ज़िंदगी से ऐसे और इतना जूझना पड़े।

सुनने में आया कि बहुत ही नज़दीक के किसी रिश्तेदार  ने शब्दों का बहुत गहरा आघात दिया जिससे वे टूट गए।जीवन के उस पड़ाव पर वे  किसी से कुछ कह न सके। मन की घुटन जब शब्द में नहीं ढल पाती तब  फटतीं  हैं  दिमाग़ की नसें,उनके साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।

बड़ी माँ कहतीं  हैं -

"उस रात तुम्हारे दादा जी  पूरी रात सीता-सीता पुकार रहे थे।"

 वह रात उनकी आख़िरी रात थी।

 काश आख़िरी बार मैं अपना नाम अपने दादा जी के मुँह से सुन पाती। 

 सुन पाती कि वे क्या कहना चाहते हैं मुझे?

उनके देहांत की ख़बर मुझे काफ़ी दिनों बाद पता चली।

  मन होता है मैं उस व्यक्ति से पूछूँ कि ऐसा क्या कहा कि चंद शब्दों से एक व्यक्ति जीवन छोड़ गया।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Saturday, 12 September 2020

तुम्हें भुला नहीं पाई

    


    आज से लगभग दस वर्ष पूर्व मेरे पति की पोस्टिंग जयपुर कमांड हाउस में थी। हम सरकारी क्वाटर में रहते थे। उस वक़्त मेरी गुड़िया की उम्र यही कुछ दो वर्ष थी। शर्मीले स्वभाव की वजह से यह अक्सर मेरे साथ ही रहती या बालकनी में ही खेलती रहती और मेरा भी तक़रीबन समय इसके साथ बालकनी में ही बीतता।

हमारे सामने वाले क्वाटर में उतर प्रदेश के चौहान सर का परिवार रहता था।
वे भी आर्मी में  थे। शायद वक़्त का ही खेल रहा कि वे  भी हमारे जैसे ही थे। उनका भी किसी के यहाँ आना- जाना बहुत ही कम था या कहें न के बराबर ही था। अक्सर उनकी पत्नी मुझे देखर मुस्कराती और मैं उसे देखकर। इससे आगे कभी बात नहीं बढ़ी न कभी उसने नाम पूछा और न ही मैंने। जब कभी भी आमना-सामना होता बस एक हल्की मुस्कुराहट के साथ स्वागत होता। 
उनके बहुत ही प्यारे-प्यारे दो जुड़वा बच्चे थे। उनकी उम्र यही कुछ सात-आठ महीने ही रही होगी। अक्सर वे बालकनी में ही खेलते रहते थे। वे हमें देखते रहते और हम उन्हें,  यह सिलसिला काफ़ी दिनों तक ऐसे ही चलता रहा।
एक दिन शाम ढले अचानक उनके क्वाटर से चीख़ने-चिल्लाने की आवाज़ें आईं। एक-दो मिनट तक अपने आप को बड़ी मुश्किल से रोक पाई। फिर नहीं रहा गया तो क़दम ख़ुद व ख़ुद उनके क्वाटर की ओर बढ़ते गए। उस वक़्त मेरे हाथ में सिर्फ़ फोन था और मैं दौड़कर उनके दरवाज़े पर पहुँची। एक-दो बार खटखटाने पर उन्होंने दरवाज़ा खोला। 
मैंने देखा उनमें से एक बच्चा रो रहा है और एक की वह छाती दबा रही है उसने इतना ही कहा- "नहलाने के लिए टब में बिठाया था फिसलकर पानी के टब में डूब गया। मेरे हस्बेंड का फोन नहीं लग रहा है, क्या करूँ ?" 
मुझे कुछ नहीं समझ आ रहा था कि मैं क्या करूँ? जल्द ही डेक्स रुम में फोन किया और गाड़ी मँगवाई। उस बच्चे को गोद में उठाया और जल्द ही आर्मी हॉस्पिटल पहुँची।
ड्राइवर बार-बार कहता मैडम सांस चैक करो। नहीं समझ आया कैसे करूँ ?और क्या करूँ ? बच्चा रो भी नहीं रहा था, लगा जैसे गहरी नींद में सो रहा है।हिम्मत दिखा रही थी परंतु हाथ काँप रहे थे फिर सोचा इसे दूध पिलाकर देखती हूँ। उस दस-पंद्रह मिनट के सफ़र में उसने एक दो बार दूध पीने की कोशिश की मन को बहुत सुकून मिला
परंतु आर्मी अस्पताल पहुँचने पर वहाँ उन्होंने पूछा-
"बच्चा किसका है?"
समझ नहीं आया क्या कहूँ?
झूठ भी बड़ी हिम्मत से बोली और माँ के हस्ताक्षर कर दिए। कुछ समय पश्चात आर्मी अस्पताल से जेके लॉन में ट्रांसफर कर दिया गया। हिम्मत  यहाँ जवाब दे गई। तीस-चालीस मिनट का सफ़र तय करना उस दिन बड़ा भारी लगा। मैंने अपनी तसल्ली के लिए उसे सीने से लगाए रखा।
अंत में हम जेके लॉन अस्पताल पहुँचे। वहाँ पहुँचने के बाद पता चला मेरे पास पैसे नहीं है। घर से ख़ाली हाथ निकली थी। लेकिन आर्मी से होने की वजह से हमें काफ़ी महत्व दिया गया। कई जाँचें  करवानी थीं, नहीं सूझा क्या करूँ तब एक दवाइयों की दुकान पर फोन रखा और पैसे माँगे; उसने मदद भी की। पैसे  बाद में लौटाने को कहा। तब लगा अच्छे लोग भी हैं धरती पर।
कुछ समय पश्चात आर्मी से भी बहुत मदद मिली।क़िस्मत अच्छी थी, उसी दौरान विदेश से अच्छे डॉक्टर भी आए हुए थे।  
कुछ दिनों बाद हम फिर मिले।अब ख़ामोशी ने शब्द तलाश लिए थे जब कभी भी उसे देखती, गोद में उठाती तो ममता छलक पड़ती। देखते ही देखते  बालकनी ने चुप्पी तोड़ी। वहाँ उन बच्चों की चीख़ें मुझे अक्सर  पुकारतीं और मैं दौड़कर बालकनी में पहुँच जाती।
दस साल के अंतराल पर भी उनके प्रति मेरा ममत्त्व वैसे ही यादों के हिंडोले  में झूलता रहा है। मैं उन बच्चों को कभी भूल नहीं पाई। मन के एक कोने में मीठी-सी याद बन बैठे हैं वे बच्चे।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

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          ”डायन होतीं हैं। हाँ, धरती पर ही होतीं हैं। अब बस उनके बदन से बदबू नहीं आती। बदसूरत चेहरा ख़ूबसूरत हो गया और न ही उनके होठों पर अ...