Saturday, 12 September 2020

तुम्हें भुला नहीं पाई

    


    आज से लगभग दस वर्ष पूर्व मेरे पति की पोस्टिंग जयपुर कमांड हाउस में थी। हम सरकारी क्वाटर में रहते थे। उस वक़्त मेरी गुड़िया की उम्र यही कुछ दो वर्ष थी। शर्मीले स्वभाव की वजह से यह अक्सर मेरे साथ ही रहती या बालकनी में ही खेलती रहती और मेरा भी तक़रीबन समय इसके साथ बालकनी में ही बीतता।

हमारे सामने वाले क्वाटर में उतर प्रदेश के चौहान सर का परिवार रहता था।
वे भी आर्मी में  थे। शायद वक़्त का ही खेल रहा कि वे  भी हमारे जैसे ही थे। उनका भी किसी के यहाँ आना- जाना बहुत ही कम था या कहें न के बराबर ही था। अक्सर उनकी पत्नी मुझे देखर मुस्कराती और मैं उसे देखकर। इससे आगे कभी बात नहीं बढ़ी न कभी उसने नाम पूछा और न ही मैंने। जब कभी भी आमना-सामना होता बस एक हल्की मुस्कुराहट के साथ स्वागत होता। 
उनके बहुत ही प्यारे-प्यारे दो जुड़वा बच्चे थे। उनकी उम्र यही कुछ सात-आठ महीने ही रही होगी। अक्सर वे बालकनी में ही खेलते रहते थे। वे हमें देखते रहते और हम उन्हें,  यह सिलसिला काफ़ी दिनों तक ऐसे ही चलता रहा।
एक दिन शाम ढले अचानक उनके क्वाटर से चीख़ने-चिल्लाने की आवाज़ें आईं। एक-दो मिनट तक अपने आप को बड़ी मुश्किल से रोक पाई। फिर नहीं रहा गया तो क़दम ख़ुद व ख़ुद उनके क्वाटर की ओर बढ़ते गए। उस वक़्त मेरे हाथ में सिर्फ़ फोन था और मैं दौड़कर उनके दरवाज़े पर पहुँची। एक-दो बार खटखटाने पर उन्होंने दरवाज़ा खोला। 
मैंने देखा उनमें से एक बच्चा रो रहा है और एक की वह छाती दबा रही है उसने इतना ही कहा- "नहलाने के लिए टब में बिठाया था फिसलकर पानी के टब में डूब गया। मेरे हस्बेंड का फोन नहीं लग रहा है, क्या करूँ ?" 
मुझे कुछ नहीं समझ आ रहा था कि मैं क्या करूँ? जल्द ही डेक्स रुम में फोन किया और गाड़ी मँगवाई। उस बच्चे को गोद में उठाया और जल्द ही आर्मी हॉस्पिटल पहुँची।
ड्राइवर बार-बार कहता मैडम सांस चैक करो। नहीं समझ आया कैसे करूँ ?और क्या करूँ ? बच्चा रो भी नहीं रहा था, लगा जैसे गहरी नींद में सो रहा है।हिम्मत दिखा रही थी परंतु हाथ काँप रहे थे फिर सोचा इसे दूध पिलाकर देखती हूँ। उस दस-पंद्रह मिनट के सफ़र में उसने एक दो बार दूध पीने की कोशिश की मन को बहुत सुकून मिला
परंतु आर्मी अस्पताल पहुँचने पर वहाँ उन्होंने पूछा-
"बच्चा किसका है?"
समझ नहीं आया क्या कहूँ?
झूठ भी बड़ी हिम्मत से बोली और माँ के हस्ताक्षर कर दिए। कुछ समय पश्चात आर्मी अस्पताल से जेके लॉन में ट्रांसफर कर दिया गया। हिम्मत  यहाँ जवाब दे गई। तीस-चालीस मिनट का सफ़र तय करना उस दिन बड़ा भारी लगा। मैंने अपनी तसल्ली के लिए उसे सीने से लगाए रखा।
अंत में हम जेके लॉन अस्पताल पहुँचे। वहाँ पहुँचने के बाद पता चला मेरे पास पैसे नहीं है। घर से ख़ाली हाथ निकली थी। लेकिन आर्मी से होने की वजह से हमें काफ़ी महत्व दिया गया। कई जाँचें  करवानी थीं, नहीं सूझा क्या करूँ तब एक दवाइयों की दुकान पर फोन रखा और पैसे माँगे; उसने मदद भी की। पैसे  बाद में लौटाने को कहा। तब लगा अच्छे लोग भी हैं धरती पर।
कुछ समय पश्चात आर्मी से भी बहुत मदद मिली।क़िस्मत अच्छी थी, उसी दौरान विदेश से अच्छे डॉक्टर भी आए हुए थे।  
कुछ दिनों बाद हम फिर मिले।अब ख़ामोशी ने शब्द तलाश लिए थे जब कभी भी उसे देखती, गोद में उठाती तो ममता छलक पड़ती। देखते ही देखते  बालकनी ने चुप्पी तोड़ी। वहाँ उन बच्चों की चीख़ें मुझे अक्सर  पुकारतीं और मैं दौड़कर बालकनी में पहुँच जाती।
दस साल के अंतराल पर भी उनके प्रति मेरा ममत्त्व वैसे ही यादों के हिंडोले  में झूलता रहा है। मैं उन बच्चों को कभी भूल नहीं पाई। मन के एक कोने में मीठी-सी याद बन बैठे हैं वे बच्चे।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Tuesday, 8 September 2020

बैठक

    फोन पर तय हुआ बैठक का स्थान व समय। स्थान सड़क किनारे रखी बेंच, समय रात आठ बजे नगरपालिका के लैंप पोस्ट के लट्टू की रोशनी में, निगरानी रखने के लिए रखे दो पेड़। 

मनोरंजन का साधन होगी पोस्टर पर बनी कामकाजी महिला।

सुनसान सड़क शालीनमुद्रा में, साथ ही होंगे शीतल हवा के झोंके,हाँ इक्के-दुक्के तारे भी आसमान में रहेंगे।

साथ ही मौसम भी सुहावना हो, प्रकृति को भी नियमावली समझाई गई। 

नौकरशाही ने समय की पाबंदी दर्शाते हुए पाँच मिनट पहले ही पहुँचना बेहतर समझा। हाथ में सफ़ेद पेपर का बंडल कपड़े एकदम ब्रांडेड टाई-बैल्ट। हाँ बैल्ट कुछ ढीला था नौकरशाही बार-बार उसे सँभालते हुए। 

अनायास ही कुछ मच्छर भी सभा के सहभागी बनने को उतारु न चाहते हुए भी इर्द-गिर्द ही भिनभिनाते रहे। नौकरशाही मनमौजी रबैये  में तल्लीन।

तभी एक शानदार गाड़ी के साथ लालफीताशाही का प्रवेश। काले रंग का सूट हाथ में एक शाही फ़ाइल रात के अँधरे में भी शाही चश्मा जैसे बतासे से मकोड़ा बाहर निकल रहा हो।

 "समय की तल्खियाँ मेहरबान हैं जनाब हम पर आप कुछ देरी से पधारे "


नौकरशाही ने दाहिना हाथ आगे बढ़ाया। कुछ मच्छरों ने संगीत बजाया दोनों पेड़ हवा के साथ लहराए। पोस्टरवाली महिला कुछ सहमी-सी अपनी प्राकृतिक मुद्रा में आने का प्रयास करती हुई।


" समय का अंतराल ही भेद तय करता है जनाब।"


स्वागत में सजी महफ़िल का जाएज़ा लेते हुए लालफीताशाही।


"यहाँ मच्छरों के संगीत में अपनापन ज़्यादा ही बरसता दिखा।"


मच्छर आत्मग्लानि से कुछ दूर भिनभिनाने लगते हैं। पेड़ सलामी  में झुकते हुए पोस्टरवाली महिला कुछ सँभलती हुई बेंच हल्की मुस्कान बिखेरती है। सड़क अभी भी ख़ामोश है।


"सहभागिता के लिए पारदर्शिता ज़रुरी है जनाब,लोकतंत्र की यही विशिष्टता है।"


नौकरशाही ने अपनी सजगता दर्शाते हुए कहा। मच्छरों ने संगीत और तेज़ किया, पेड़ मुस्कराए और पोस्टरवाली महिला सहज मुद्रा में।


"अनुचित हस्तक्षेप पॉलिसी के अंतर्गत नहीं।"


लालफीताशाही का रुख़ लाल हुआ तब कुछ लाल फीते कसे और बाँधे गए।सड़क का सर पैरों से कुचला उसे धन के देवता कुबेर  को सौंपा गया।बेंच को नकारा गया, पोस्टरवाली महिला से कामकाज छीना गया। हवा को कुछ हद तक लताड़ा गया और उसे निन्न्यानवे साल के लिए लीज़  पर रखा गया।

 पेड़ों की सलामी पर कुछ हद तक प्रसन्नता  दर्शाई गई। मच्छरों पर हायर एंड फायर का शख़्त नियम नियमावली में मार्क किया गया। बैठक का मंतव्य अब तक सभी की समझ से परे था।


©अनीता सैनी 'दीप्ति'

Thursday, 27 August 2020

क़ीमत किसकी


    क़ीमत उसकी ज़िंदगी की उसके हाथ में थमाई गई थी जिसे वह सहेज न सकी या उसके बच्चों की जो 'पापा' शब्द गँवाने पर मिली थी उन्हें। जब भी मिलती हूँ उससे समझ नहीं पाती हूँ क़ीमत किसकी थी और किसने चुकाई। यह जो हर रोज़ चुकाती है या वह जो सरकार ने हाथ में थमाई थी उसके पति की।

काफ़ी बार मिल चुकी थी उससे, आज कलेक्ट्री के बाहर खड़ी थी वह बरसात में अपने आप को समेटे हुए। सूखा चेहरा,पुकारती आँखें हर सांस में घुटन थी उसके। हाथ में प्लास्टिक का छोटो-सा बैग था।ऑटो-ऑटो कह पुकार रही थी। गाड़ी के हल्के ब्रेक लगाने से उसमें हिम्मत आई अकेली होने के वास्ते के साथ ही अपने गंतव्य पर छोड़ने का आग्रह किया। एकाधिकार के साथ बग़लवाली सीट पर बैठ गई।

"आप स्कूटी क्यों नहीं खरीदती हैं? घर के छोटे-मोटे काम रोज़  निकलते रहते हैं।"
रश्मि ने स्नेह के साथ संगीता से कहा।

संगीता ख़ामोश थी, विनम्रभाव से रश्मि को देखती रही; न जाने क्यों शब्दों का अभाव था उसके पास।

 "ख़ुद का आत्मविश्वास भी बना रहता है,हम कम थोड़ी हैं  किसी से; लाचारी क्यों जताएँ आँखों से ?"
रश्मि ने संगीता को सीट बैल्ट थमाया और मुस्कुराते हुए कहा।

संगीता ने कुछ नहीं कहा, हल्की मुस्कान के साथ दुपट्टे से चेहरा पोंछने लगी। किसी उलझन में थी जो आँखें बता रहीं थीं।

"आप यहाँ काम करने लगीं  हैं?"
रश्मि ने फिर एक प्रश्न संगीता से किया।

"नहीं घर के काग़ज़ बनवाने थे परंतु आज भी बिल्डर नहीं आया।"
संगीता ने बनावटी मुस्कुराहट बिखेरने का प्रयास किया।

"अरे वाह! फिर तो बधाई हो स्वयं के घर की बात ही निराली है।"
रश्मि संगीता की ख़ुशी का हिस्सा बनते हुए कहती है।

"अब ख़ुशी और ग़म में फ़र्क़ नज़र नहीं आता,ज़रुरत-सी लगती है।"
अचानक संगीता की आँखें भर आईं।

"हिम्मत रखो, मैं समझ सकती हूँ।
रश्मि एक नज़र संगीता पर डालती है। बहुत कुछ है उसके मन में जो वह किसी से कहना चाहती है परंतु कहे किससे, सुनने वाला कोई नहीं। अचानक वह फूट पड़ती है ।

"किस अपराध की सज़ा भुगत रही हूँ मैं? उससे शादी की उसकी या उसके पैसे नहीं मिलने पर घर से निकाल दी गई उसकी? पिछले दो दिन से चक्कर लगा रही हूँ, एक घंटे में आने की कहते हैं और अब देखो सुबह से शाम हो गई।जूतियाँ पहननेवाला ही जानता है कि वे पांव में कहाँ काटतीं हैं।"
जाके पांव न फटी बिंवाई सो का जाने पीर पराई कहते हुए शब्दों ने उसका साथ छोड़ दिया। अभी भी गला रुँधा हुआ था उसका। ख़ुद से परेशान साथ ही एक साथी का अभाव कहीं न कहीं उसे खटक रहा था। खिड़की की तरफ़ मुँहकर बच्चों को फोन करने लगी। न चाहते हुए भी आज वह बिखर गई, अगले ही पल ख़ुद को समेटने में व्यस्त एक आवरण गढ़ने लगी।
 काफ़ी देर तक इसी ख़ामोशी के साथ सफ़र अपने सफ़र की ओर बढ़ने लगा।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'  

Saturday, 22 August 2020

पापा बदल गए

                                                                     
     "पर्वत जल रहे थे तभी पत्थर पिघलने लगे। नदी का बहता पानी भी ठहर-सा गया था,न जाने क्यों  अचानक पेड़-पौधे दौड़ने लगे और पक्षियों के पंख भी  नहीं थे ममा,वे तड़प रहे थे। जंगली-जानवरों के पैर नहीं थे वे दौड़ नहीं पा रहे थे, पुकार रहे थे वे मुझे परंतु आवाज़ नहीं आ रही थी। आप मेरे स्वप्न में कहीं नहीं थे, पापा को पुकारा वो नहीं आए।पापा बदल गए ममा,वे क्यों नहीं आए।उनकी शिक्षा बुख़ार में जल रही थी, पुकार रही थी। उन्हें आना चाहिए था न ममा।"
    दो दिन से बुख़ार से जूझ रही शिक्षा अचानक रात को बड़बड़ाते हुए उठती है और कहते हुए रोने लगती है।
    अपने कलेजे के टुकड़े की ऐसी हालत देख मीता की आँखें भर आईं।
माथे पर गीली पट्टी रखकर शिक्षा को सुलाने का प्रयास भी विफल रहा।
बुख़ार ने शिक्षा के मन की सभी तहें खोल दीं जो वह कभी खेल-खेल में न कह पाई।
शिक्षा के व्याकुल मन की सीलन में मीता रातभर करवट बदलती रही।

©अनीता सैनी 'दीप्ति'

Sunday, 19 July 2020

लाचारी

     हल्की बरसात के साथ ही बरसाती पानी शहर की सड़कों पर दौड़ने लगा। यह नगर पालिका की मेहरबानी थी।

फ़ुटपाथ पर प्लास्टिक के कवर में सिमटी थी लाचारी कभी पैर तो कभी हाथ समेटने के प्रयास में लगी थी। हलचल साफ़ दिखाई दे रही थी।

 तेज़ रफ़्तार से दौड़ती हुई आई जल्दबाज़ी। वह अपनी ही धुन में थी। एक ही पल में सड़क पर पसरा गंदा पानी लाचारी के कवर पर पत्थर की चोट-सा लगा और वह सहम गई।तभी एक छोटी  बच्ची ने  मुँह उस कवर से बाहर निकला। अगले ही पल फिर वह कवर में छिप गई। 

देखते ही देखते मौसम के तेवर भी बिगड़ने लगे।तभी अचानक क्रोध वहाँ से गुज़रा उसे रेड लाइट का भी सब्र नहीं था। वह ऐसे आग उगलता निकला कि ट्रैफ़िक पुलिस उसके  पीछे लग गई। परंतु जाते-जाते फिर लाचारी पर गंदा पानी बरसा गया। फिर उसी बच्ची ने मुँह बाहर निकाला। अगले ही पल वह उसी कवर में सिमट गई।

 बूँदा-बाँदी अभी भी जारी थी। रेड लाइट के शोर-ओ-ग़ुल में हाथ में भुट्टा लिए सहसा प्रेम वहाँ ठहरा  एक पल उसने चारों तरफ़ निगाह दौड़ाई शायद वह लाचारी को आवाज़ दे रहा था कि वह अपनी जगह बदल ले। आने-जाने वाले गंदा पानी डालेंगे उस पर परंतु लाचारी ने अनसुना कर दिया। उस बच्ची ने भी मुँह बाहर नहीं निकाला। प्रेम ने अचानक उसकी वह प्लास्टिक हटाई।

सच्च ! उस वक़्त मैंने लाचारी को बहुत ही लाचार अवस्था में देखा। अपाहिज होती है लाचारी तब समझ में आया। पैर नहीं थे वह सिमटकर बैठी थी । काठ की छोटी-सी गाड़ी पर चप्पल  हाथों  में पहने ,बच्ची उसके पेट से चिपकी थी। पहली बार मैंने लाचारी को मोटी-मोटी आँखों से प्रेम को घूरते हुए देखा।

©अनीता सैनी 'दीप्ति'

Wednesday, 8 July 2020

अनुत्तरित प्रश्न

"बड़ी बहू हल्दी का थाल कहाँ है ?"


सुमित्रा चाची चिल्लाती हुई आई,

हल्दी के रंग में डूबी साड़ी के पल्लू को ठीक करते हुए एक नज़र अपने गहनों पर डालती हुई कहती है। 

"ओह ! मति मारी गई मेरी, यहीं तो रखा है आँखों के सामने।"


पैर की अँगुलियों में अटके बिछुए से साड़ी को खींचती हुई क़दम तेज़ी से बढ़ाती है। 


"सुमित्रा! बेटी का ब्याह है। बहू घर नहीं आ रही,यों  अपना आपा नहीं खोते।"

दादी ने मुँह बनाते हुए कहा 

बूढ़ी दादी पोती के ब्याह में ऐंठी हुई बैठी है कि कोई उससे कुछ क्यों नहीं पूछ रहा। दादी अपनी ऐंठन खोलते हुए मुँह बनाती है। परंतु सुमित्रा चाची अनसुना करते हुए वहाँ से निकल जाती है। हल्दी की रस्म शुरु होती है। हल्दी के रंग में रंगी औरतें खिलखिलाते हुए रस्म में चार चाँद लगातीं हैं। दादी अपने ही गुमान में बैठी देख रही थी यह सब। 

" दीदे फाड़-फाड़कर देखती ही रहोगी क्या ? वहाँ चौखट पर बैठ जाओ। सूबेदारनी अंदर ही घुसी आ रही है। विधवा की छाँव शुभ कार्य में शोभा देती है क्या ?"

 सुमित्रा चाची दादी पर एकदम झुँझलाती है।


"सुमित्रा !"

गोमती भाभी की ज़बान लड़खड़ा गई। 

न वह अंदर आ रही है और न ही अपने क़दम पीछे खींचती है। अपमान के ज़हर का घूँट वहीं खड़े-खड़े ही पी गई। क्षण भर अपने आपको संभालते हुए कहती है -


" बड़ी बहू वो शगुन तो लाना ही भूल गई मैं ...आती हूँ कुछ देर में दोबारा।"


गोमती भाभी दर्दभरी मुस्कान बड़ी बहू को थमा जाती है फिर आने का वादा करके एक अनुत्तरित प्रश्न के साथ ...


 ©अनीता सैनी 'दीप्ति'

Tuesday, 30 June 2020

पानी की किल्लत

 

 "प्रकृति का प्रकोप प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है,भूकंप के हल्के झटकों के साथ-साथ मुआ पानी भी पाताल की गोद में जा बैठा है।"

छत की मुँडेर पर रखे खाली बर्तन के पास बैठी एक चिड़िया ने मायूसीभरे स्वर में कहा। 

"हर किसी की जड़ें पीपल और बरगद-सी गहरी तो नहीं हो सकती ना...जो पाताल से पानी खींच सके।"

दूसरी चिड़िया की आवाज़ में व्याकुलता थी उसने आसमान को एक टक देखा उम्मीद और आग्रह दोनों आँखों की पलकों में छिपाते हुए कहा। 

  "धीरे-धीरे अब शेखावाटी में खेजड़ी का वृक्ष भी सूखने लगा है। धरती की तलहटी को छूते पानी से हम ही नहीं किसान भी व्याकुल हैं।"

पहली चिड़िया ने छज्जे की छाँव का आसरा लिया और दूसरी को आने का इशारा किया। 

"शहर और गाँव में बावड़ीयाँ तो पहले ही सूख चुकीं हैं  अब कुओं का पानी भी सूखने लगा है।"

छत के उपर से गुज़रते हुए कौवे ने खिसियाते हुए कहा। 

  "जीवन चुनौतियों से भरी गठरी को लादे रखता है वह कभी ज़मीन पर पैर ही नहीं रखता।"

दूसरी चिड़िया ने एक नज़र कौवे पर डालते हुए कहा। 

"वहीं तपती रेत पर अब ऊँट के पाँव भी जलने लगे हैं, छाले उभर आए हैं पैरों में उसके,उसकी कूबड़ सिकुड़-सा गया है।"

दोनों चिड़ियों ने पास रखे गमले में पानी के लिए चोंच मारी पानी तो नहीं था परंतु मिट्टी गीली होने से वहीं बैठ गई। 

"गड़रिये के पास छाँव के नाम पर कोरा आसमान है कुछ बादल के टुकड़े हैं जो कभी-कभार ही उसके साथ चलते हैं।"

पहली चिड़िया ने मन हल्का करते हुए कहा। 

"पेड़-पौधे भी सूख चुके हैं। मरुस्थल पैर पसार रहा है। भेड़-बकरियाँ अब मिट्टी को  सूँघती नज़र आतीं हैं। हर किसी का जीवन ठहरा-सा लगता है। नहीं ठहर रहा तो धरती की गोद में पानी और हुकुम का कभी आठ तो कभी शाम चार बजे बातें बनाना।"

एक तीसरी चिड़िया गमले में अपनी जगह बनाने का प्रयास करते हुए कहती है। 

©अनीता सैनी 'दीप्ति'



Friday, 26 June 2020

किशोरावस्था का आरंभिक चरण



       "भाई तुझे पता है! कुछ दिन पहले की ही ख़बर है। कोटा में नौवीं कक्षा  के एक छात्र ने पबजी के चक्कर में सुसाइड कर ली।"
भानु मूवी के बीच में माधव को टोकते हुए कहता है। 


"यार तुझे घर पर ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए। मेरी माँ हिटलर है।"
माधव हड़बड़ाते हुए भानु को चुप्पी साधने की हिदायत देता है। 

"भाई उसके पापा आर्मी में थे।"
भानु ने मायूसी से मुँह बनाते हुए कहा। 

"मुझे पता है यार, मैंने उसी दिन देख ली थी यह न्यूज़ ...तुझे प्रॉब्लम है तो भाई दिल्ली चला जा, सरकार इलाज भी कर रही है।"
माधव बार-बार भानु का मुँह बंद करने का प्रयास कर रहा था। 

"भाई लास्ट क्वेश्चन, क्या फोन को खिलौना बनाना ठीक है जिओ  को फ्री ही क्यों किया ?"
भानु माधव के ओर पास खिसकता है,ठुड्डी के हाथ लगाए एक टक माधव को घूरता है,अपने प्रतिउत्तर की प्रतीक्षा में। 

"यह प्रश्न मोदी जी और अम्बानी से कर ना यार, यहाँ मत कर मेरी माँ मुझे गेम छोड़ मूवी भी नहीं देखने देगीं।"
माधव सोफ़े से उठता हुआ भानु पर झुँझलाता है। 

"भाई सुन ना...।" 
भानु सभी प्रश्न एक ही सांस में गटक जाता है। 

राधिका रुम से सटी बालकनी में गमले की मिट्टी ठीक कर रही थी। 
अचानक उसके हाथ वहीं रुक जाते  हैं। 

-अनीता सैनी 'दीप्ति'

Saturday, 20 June 2020

प्रतीक्षा

    जैसे धूप से झुलसता आसमान धरती के लिए छाँव तलाशता दौड़ता हो वैसे ही सुमन दौड़कर आई और हाथ में टूटी चप्पल लिए सुरभि के सामने खड़ी हो गई। 

"मुझे पैसे नहीं दीदी काम चाहिए।"

सुमन अपनी टूटी चप्पल का फीता अँगूठे से दबाते हुए झट से ठीक करती है। लुगड़ी से हाथ पोंछती हुई  सफ़ाई का प्रमाण-पत्र देते हुए कहती है -

"कल ही ख़रीदी थी मैंने मेले से पूरे अस्सी रुपए की हैं। 

अच्छी हैं न...,चलताऊ नहीं हैं। फैंसी हैं न..., कम ही चलतीं हैं।"

सुमन ने अपनी टूटी चप्पल की ख़ामी फट से छिपा ली। 

सुमन  एक सांस में कितना कुछ कह गई सुरभि उसका चेहरा ताकती रही। 

"ऐसे वक़्त में मैं तुझे क्या काम दे सकती हूँ तुम भी कम ही बाहर निकला करो।"

कहते हुए सुरभि आगे क़दम बढ़ाती है। 

"आपकी पड़ोसन ने कहा था गेहूँ साफ़ करवाने हैं आपको।"

तेज़ आवाज़ में पुकारते हुए सुमन ने आत्मविश्वास के साथ लंबी उसाँस भरी। 

"वो तो है परंतु में पाँच सौ रुपये ही दूँगी।"

सुरभि विनम्रता से कहते हुए,पलटकर वहीं खड़ी हो गई। 

"नहीं दीदी मैं पूरे तीन सौ रुपये लूँगी दो दिन लगेंगे दो बोरी बीनने में। "

सुमन ने चेहरा ऐसे बनाया जैसे उससे समझदार इस धरती पर और कोई नहीं। 

"तुम्हें पता है तीन सौ रुपये कितने होते हैं?"

सुरभि ने उसकी मासूमियत को एक पल में छलना चाहा।

"क्यों नहीं जानती जब मेरा मर्द कार्तिक मास में ले गया था मुझे खेत पर काम करवाने तब दो महीने बाद मायके छोड़ गया था पूरे तीन सौ रुपये थमाये थे उसने मेरे हाथ में।"

उसके चेहरे पर सुकून था। भावविभोर हो गई थी वह  बीते समय को समेटते हुए। उसके पास सुनाने को बहुत कुछ था परंतु सुननेवाला कोई नहीं था। 

"तब तुम मज़दूरी क्यों करती हो पति है, घर है और ज़मीन भी है। अपने खेत पर काम करो यों क्यों घूमती हो?"

सुरभि ने उसे फटकारते हुए, कुछ समझाते हुए कहा। 

"वो छोटी बहू की चलती है न घर में।  गाय का गोबर डालती हूँ तब तसला छीन लेती है। रोटी बनाती हूँ तब बेलन छीन लेती है। सास-ससुर के चहेते बेटे-बहू है वो मान-सम्मान भी उन्हीं के हिस्से में हैं। कहते हैं तेरा ख़सम कमाता नहीं है।"

कहते-कहते उसका दर्द आँखों से छलक पड़ा। 

सतरह-अठारह साल की बच्ची पीड़ा ने जैसे उसका गला ही दबा दिया हो। आज उसके हृदय पर सुकून था। किसी ने उससे इतने स्नेह से बात की ही नहीं ,

ज़िंदगी से फटकार अपनों से अकाल के जैसी मार मिली थी उसे। 

"अब कभी नहीं जाओगी ससुराल?"

चलते-चलते सुरभि ने एक प्रश्न और उसके हाथ में थमा दिया।

"क्यों न जाऊँ ससुराल साल में दो बार जाती हूँ और वह मुझे लेने भी आता है जब खेत पर खलिहान का काम ज़्याद होता है तब। मेरे सिवा उसका हाथ बँटानेवाला और है ही कौन है? मेरा मर्द बहुत भोला है। ससुराल वालों ने कितनी बार कहा सुमन को छोड़ दे,चप्पल तक  ठीक से नहीं पहननी आती उसे परंतु उसने मेरा साथ नहीं छोड़ा। जैसे-तैसे करके समय निकल जाए फिर आएगा वह मुझे लेने, मैं प्रतीक्षा में हूँ उसकी।"

सुमन कल आने के वादे के साथ उम्मीद समेटे आँचल में वहाँ से चली गई और छोड़ गई एक गहरी कसक। 

-अनीता सैनी 'दीप्ति'

Monday, 8 June 2020

कुछ प्रश्न

   पहली बार किसी सैनिक को ससम्मान उसके घर छोड़ने गया था।  घुटन अभी भी धड़कनों से रिस रही थी। सांसें स्वयं से द्वंद्व करतीं  नज़र आईं। सफ़र में कुछ पल ठहरे थे एक जवान के घर। 

वहीं से कुछ प्रश्न ज़ेहन में खटक गए। 

 अंतरद्वंद्व  के चलते आख़िर बैठे-बैठे मैं  पूछ ही बैठा-

"तुम्हारी पत्नी के हाथ में चूड़ियाँ नहीं थीं। 

मैंने हृदय की व्याकुलता अपने साथी सैनिक के सामने परोसी।

उसने कहा -

"हालात ने छीन लीं।"

और वह मुस्कुराया।

"उसका चेहरा भावशून्य था।"

मैंने अपनी ही सांस गटकते हुए कहा। 

उसने कहा -

"समय की धूप ने सोख लिए ।"

वह एकटक उसकी फोटो निहार रहा था। 

"उसकी चाल में लचक, पैरों में पायल की खनक नहीं थी।"

मैंने उसका हृदय टटोलते हुए कहा। 

उसने कहा -

"उसने किसी अपने को अर्पणकर दी।"

और उसकी आँखें नम हो गईं। 

"उसकी मुस्कान दिखावा लगी शब्द लड़खड़ा रहे थे।"

मैंने शब्दों से गहरा वार किया।

उसने कहा -

"वह दिखावा मेरे लिए था, बिखरे शब्द ही बीनता हूँ मैं।"

उसने गर्दन पीछे  सीट पर टिकाई और सीने की घुटन वहीं पी गया। 

"तुम इतने ख़ुश कैसे रह सकते हो उसके साथ?"

मैंने उसके सब्र पर व्यंग्यपूर्ण तीक्ष्ण प्रहार किया। 

उसने कहा -

" इसलिए कि वो आज भी मेरे इंतज़ार में जी रही है।"

उसने अपनी सांसों में एक राज़ दबा लिया देखते ही देखते उसने एक मासूम को अपनी वर्दी में छिपा लिया।

-अनीता सैनी 'दीप्ति'


तुम्हें भुला नहीं पाई

          आज से लगभग दस वर्ष पूर्व मेरे पति की पोस्टिंग जयपुर कमांड हाउस में थी। हम सरकारी क्वाटर में रहते थे। उस वक़्त मेरी गुड़िया की उम्र ...