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Wednesday, 21 September 2022

भावों की तपिश


          ”हवा के अभाव में दम घुट रहा है, हमारा नहीं; पहाड़ों का। द्वेषी है! पेड़ों को पनपने नहीं देता!! "

पहाड़ों पर भटके एक पंछी ने फोन पर अपनी पत्नी से कहा।

"कौन है द्वेषी?"

पत्नी ने सहज स्वर में पूछा।

”सूरज! कुछ दिनों से पृथ्वी से अनबन जो चल रही है उसकी !!”

पंछी सूरज, पृथ्वी और पहाड़ों से अपनी नज़दीकियाँ जताते हुए बड़ी चट्टान के सहारे  पीठ सटाकर बैठ जाता है।

”तुम सुनाओ! तुम्हारे यहाँ क्या चल रहा है?

पंछी से व्याकुलताभरे स्वर में पूछा।

”कुछ नया नहीं!  वही रोज़ का रुटीन!! दैनिक कार्यों में व्यस्त धूप धीरे-धीरे दिन सोख रही है। तीसरे पहर की छाँव तारीख़ से मिटने की पीड़ा में दहलीज़ पर बैठी है। समय चरखे पर लिपटने के लिए तेज़ी से दौड़ रहा है।”

पत्नी ने दिन का ब्यौरा देते हुए एक लंबी सांस भरी।

"और पौधे?” पंछी ने तत्परता से पूछा।

”पौधे नवाँकुर खिला रहे हैं तो कहीं फूलों में रंग भर रहे हैं।”

पत्नी ने बड़ी सहजता से कहा।

”हूँ " के साथ पंछी और पहाड़ों ने गहरी सुकून की सांस भरी जैसे हवा का झोंका नज़दीक से गुज़रा हो!


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Saturday, 10 September 2022

मरुस्थल की नदियाँ



”बाँकपन लिए,

मरुस्थल की नदियाँ खारी होती हैं!”

 विनय! रेत से भरी मुट्ठी हवा में उछालता व्यंगात्मक दृष्टि से अरुँधती की ओर मुस्कराता है।

अपेक्षाओं की बिखरती लहर देख वह शिकायतों का सेतु खड़ा करता है। तैरती विचारों की मछलियाँ समंदर और मरुस्थल का भेद भूल जाती हैं। रेत हवा में उड़ने लगती है। बची जल धराओं को सुविधा अनुसार मोड़ने का प्रयास पहाड़-सा लगता है।

”आख़िर समंदर की बेटियाँ हैं! लवणीयता लिए तो बहेंगी ही!”

इस बार विनय ने शब्दों की सूखी रेत नहीं उड़ाई ! भावों में भिगो मिट्टी का गोला बना अरुँधती की तरफ़ फेंका।

" नदी का बहना मात्र सार्थक नहीं है?”

अरुँधती ने शब्दों का घूँट-सा गटका इस वाक्य ने उसे पुनर्जीवित कर दिया।

”पहाड़ी नदी के स्वर में सुकून, पानी में मिठास होता है!”

विनय स्वच्छंद उड़ान की इच्छा में ठहरे पानी में कंकड़ फेंकता है।

" बादलों के नहीं बरसने से मरुस्थल रूठता है ? उसके नसीब में नहीं होता जंगल, मीठे पानी का झरना।”

जीवन से जूझती नागफनी थी अरुँधती , वहीं विनय शीतल झोंका ;  विनय शब्द बनने को तत्पर आवाज़ तलाशता रहा। अरुँधती उसे भाव बना मरुस्थल में छुपाती रही।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

 

Saturday, 20 August 2022

ख़ामोश सिसकियाँ

                              


                                      ”देख रघुवीर ! इन लकड़ियों के पाँच सौ से एक रुपया  ज़्यादा नहीं देने वाला। तुमने कहा- चार खेजड़ी की हैं, यह दो की नहीं लगती!”

दोनों हाथ कमर पर धरे एक पैर आगे बढ़ाए खड़ा प्राइमरी स्कूल का अध्यापक व रघुवीर का छोटा भाई धर्मवीर।

”कैसे नहीं लगती दोनों जगह वाली दो-दो खेजड़ी की हैं, पूछो सुनीता, सुमन और सजना से, हम चारों ने मिलकर इकट्ठा की हैं।”

रघुवीर चोसँगी ज़मीन में गाड़ते हुए पसीना पोंछता है।

”देख भाई!  पाँच सौ से एक रुपया ज़्यादा नहीं देने वाला,तू जाने तेरा काम जाने; अब तू यह बता सुखराम दो दिन से स्कूल क्यों नहीं आ रहा?”

धर्मवीर रघुवीर की दुःखती रग पर हाथ रखते हुए ऊँट पर बैठे सात साल के सुखराम की ओर इशारा करता है, सुखराम अध्यापक कहे जाने वाले काका को देखता हुआ दाँत निपोरता है।

”काका! काका! यह हमारे साथ भट्टे पर मिट्टी खोदने जाता है।”

तीनों लड़कियाँ एक स्वर में एक साथ बोलती हैं।

” तू इन छोरियों के जीवन से कैसा खिलवाड़ कर रहा है? पास के गाँव के स्कूल में दाख़िला क्यों नहीं करवाता इनका!”

पास पड़ी लकड़ियों को धर्मवीर घूम-घूमकर देखता है। ”हाँ लकड़ियाँ हैं तो मोटी-मोटी, बढ़िया है। आड़ू को क्या पता मन और पंसेरी का ?”

रघुवीर की मासूमियत पर धर्मवीर अपनी राजनीति का लेप चढ़ाता है।

”तू अपने भट्टे पर पराली क्यों नहीं काम में लेता? खेत की लकड़ियाँ मेरे भट्टे पर डाल दिया कर, मैं छोरियों के स्कूल की व्यवस्था करता हूँ। तू  निरा ऊँट का ऊँट रहा, इन्हें तो इंसान बनने दे!”

कहते हुए धर्मवीर सूरज को ताकता है और वहाँ से स्कूल के लिए निकल जाता है।

”कलियुग में कौवों का बोलबाला है। कैसे बचेंगीं चिड़ियाँ ? कौन पिता होगा जो नहीं चाहता हो कि उसकी बेटियों को पंख और खुला आसमान न मिले?”

रघुवीर घर्मवीर की ओर देखता हुआ अंगोंछा सर पर कस के बाँधता है।

”बापू ! बापू ! स्कूल जाना है हमें।”

सुमन, सजना मन को पसीजते हुए कहती हैं।

”दिखता नहीं ! बापू की आँख में पसीना चला गया। चल दूर हट छाँव में बैठने दे!”

बड़ी लड़की सुनीता अपने पिता रघुवीर की ओर पानी से भरा जग बढ़ाती है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Monday, 15 August 2022

ठूँठपन


                        रिमझिम बरसात की झड़ी कजरी के मीठे स्वर-सी प्रतीत हो रही थी। मानो एक-एक बूँद प्रेम में झूम रही हो। जो प्रेम में था उसके लिए बारिश प्रेमल थी और जिसका हृदय पीड़ा में था उसके लिए समय की मार! अपनों के लिए अपनों को दुत्कारना फिर उन्हें अपनाने की चाह में भटकती धनकोर अनायास ही कह बैठती है -

”गृहस्थी में उलझी औरतें प्रेम में पड़ी औरतों-सी होती हैं।” स्वयं के अधीर मन को ढांढ़स बंधाती बारिश में भीगी ओढ़नी निचोड़कर उससे मुँह पोंछती है।

” किसी एक की परवाह में उलझी दूसरे के हृदय से कब ओझल हो जाती हैं, गृहस्थ औरतें जानते हो ना आप?”

स्पष्ट शब्द अशिष्टता की श्रेणी में कब खड़े कर दिए जाते हैं इसी विचार के साथ धनकोर के दृष्टिकोण को धारण करते हुए,सीढ़ियों पर बैठी गीता सूखा टॉवल उसकी ओर बढ़ाती है।

”तभी कहती हूँ लौट आ, तू वह नहीं रही जो पच्चीस वर्ष पहले थी।”

पश्चाताप की अग्नि में जलती धनकोर ममत्व भाव उड़ेलती, अचानक बिजली गिरे वृक्ष से लिपटकर सुबकने लगती है। उम्र के इस पड़ाव पर ज़रूरत का ताक़ाज़ा देती है इसी उम्मीद के साथ कि कोंपल फिर फूट जाएगी और वृक्ष हरा-भरा हो जाएगा।

"भूल क्यों नहीं जाते घटना और घटित लोगों को?”

कहते हुए- गीता के आँसू बहे न हृदय का भार बढ़ा और न ही पीड़ा के अनुभव से स्वर में आए कंपन ने अपना रुख़ बदला, सच यह ठूँठपन नहीं तो और क्या था उसका?


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Thursday, 28 July 2022

विसर्जन



                   ”गणगौर विसर्जन इसी बावड़ी में करती थीं गाँव की छोरियाँ।”

काई लगी मुंडेर पर हाथ फेरती शारदा बुआ मुंडेर से अपनी जान-पहचान बढ़ाने लगीं ।माँ के हाथों सिले घाघरे का ज़िक्र करती बावड़ी से कह बैठी -

”न जाने कितनी छोरियों के स्वप्न डूबे हैं इसमें! पानी नहीं होता तो भी इसी में पटककर जाती।”

आँखें झुका पैरों में पहने चाँदी के मोटे कड़ों को हाथ से धीरे-धीरे घुमाती साठ से सोलह के पड़ाव में पहुँची बुआ उस वक़्त, समय की चुप्पी में शब्द न भरने की पीड़ा को आज संस्कार नहीं कहे।

"जल्दी ही जीना भूल जाती हैं औरतें कब याद रहता है उन्हें कुछ ?”

बालों की लटों के रूप में बुआ के चेहरे पर आई मायूसी को सुदर्शना हाथ से कान के पीछे करते हुए कहती है।

” किसे डुबोती छोरियाँ ?”

"उस टेम सपने कहाँ देखने देते थे घरवाले, चूल्हा- चौकी खेत-खलिहान ज़मींदारों की बेटियों की दौड़ यहीं तक थीं?”

जीने की ललक, कोंपल-से फूटते स्वप्न; उम्र के अंतिम पड़ाव पर जीवन में रंग भरतीं सांसें ज्यों चेहरे की झूर्रियों से कह रही हों तुम इतनी जल्दी क्यों आईं ?

न चाहते हुए सुदर्शना से बुआ के पैर पर पैर रखा गया और कह बैठी-

"  छोरियाँ तो देखती थीं न स्वप्न।”

"न री! बावड़ी सूखी तो तालाब, नहीं तो कुएँ और हौज़ तो घर-घर में होते थे उनमें डुबो देती।”

”स्वप्न या गणगौर ?”

सुदर्शना ने फिर यही प्रश्न दोहराया।

बड़प्पन का मुकुट ज़मीन पर पटक, मुँह फेरते हुए धीरे से कहती है।

"दोनों।”


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Sunday, 10 July 2022

विश्वास के चार फूल



                 ”पिता का हाथ छूटते ही भाई ने कलाई छोड़ दी और पति का साथ छूटने पर बेटे ने…।”

 बालों को सहलाते हुए सावित्री बुआ की उँगलियाँ सर पर कथा लिखने लगीं। अर्द्ध-विराम तो कहीं पूर्ण-विराम और कहीं प्प्रश्न-चिह्न पर ठहर जातीं। विश्वास सेतु  टूटने पर शब्द सांसों के भँवर में डूबते परंतु उनमें संवेदना हिलकोरे मारती दिखी।

बाल और न उलझें इस पर राधिका ने एक नज़र सावित्री बुआ पर डालते हुए कहा-

”बाल उलझते हैं बुआ!”

"करती क्या हो?दिनभर बाल सूखे, हाथ-पैर सूखे; कब सीखोगी स्वयं का ख़याल रखना?"

झुँझलाहट ने शब्दों के सारे प्रवाह तोड़ दिए, अब भाव और शब्द पहेलियाँ गढ़ने लगे।

” समर्पण दोष नहीं, आपका स्वभाव ही ममतामयी है।”

राधिका ने पलटकर बुआ के घुटनों पर ठुड्डी टिकाते हुए कहा।

"और उनका क्या था ?  उनका हृदय करुणामय  नहीं…?”

माथे से टपकती पसीने की बूंदो में समाहित कई प्रश्न उत्तर की तलाश में भटकने लगे,यह कथा नहीं उपन्यास के बिछड़े किरदारों की पीड़ा थी जो  उँगलियों के सहारे सर में डग भर रही थी।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Sunday, 3 July 2022

वॉलेट


         " मुझे लगता है! तुम अपरिचित हो? परिवर्तन का चक्का चाक नहीं है कि चाहे जब घुमा दो!” कहते हुए- रुग्ण मनोवृत्ति अंगारों पर लेट जाती है।

  मॉल हो या छोटी-बड़ी दुकानें दरवाज़े के बाहर भेद-भाव भरी चप्पलें व्यवस्थित करने का ज़िम्मा इसी मनोवृति का होता है। एक-एक चप्पल का गहराई से अवलोकन करती फिर दिन व दिनांक का टोकन नाम सहित फला-फला व्यक्ति विशेष के हाथों में थमा देती है।

"ठीक ! तुम कुछ दिनों बाद आना।” कहते हुए, रुग्ण मनोवृति वहाँ से चली जाती है।

 विभा को मिले टोकन पर दिन व दिनांक निर्धारित नहीं है उसने अक्ल के घोड़े दौड़ाए परंतु वह समय से पिछड़ चुकी है।

विभा के साथ उम्मीद में हाथ बाँधे खड़ी चार आँखें, बार-बार एक ही वाक्य दोहरातीं है।

”एक बार और बात करके देखो, बस आख़िरी बार; फिर घर चलते हैं।”

वे आँखें हृदय से फिसलते सपनों को सँभालती हैं फिर अगले ही पल तितर-बितर बिखरी लालसाओं को समेटने में व्यस्तता दिखाने लगती हैं।

अंततः घूरने लगती हैं विभा के हाथों में जकड़े सिफ़ारिश के छोटे से वॉलेट को जिसका उपयोग उनके लिए निषेध है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Wednesday, 1 June 2022

दंड



                                            बर्तनों की हल्की आवाज़ और एक स्वर कौंधता है।

” निर्भाग है तू !  यह देख,  तेरा श्राद्ध निकाल दिया आज।”

आक्रोशित स्वर में क्रोध थाली से एक निवाला निकालता है और ग़ुस्साए तेवर लिए थाली से उठ जाता है।

”मर गई तू हमारे लिए आज से …ये ले…। "

और मुँह पर कफ़न दे मारा ईर्ष्या ने।

स्त्री समझ न पाई मनोभावों को, वह सकपका जाती है। "हुआ क्या ? "

 समाज की पीड़ित हवा के साथ, पीड़ा से लहूँ लहूलुहान कफ़न में लिपटी स्त्री जब दहलीज़ के बाहर पैर रखती है तभी उलाहना से सामना होता है।

” पुरुषों के समाज में नारी हो, तूने नारीत्व छोड़ पुरुषत्व धारण किया ? उसी का दंड है यह ! "

उल्लाहना खिलखिलाते हुए सामने से गुज़र जाता है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Wednesday, 18 May 2022

पत्थरों की पीड़ा



"तोगड़े ! रिश्तों से उबकाई क्यों आती है? ”

पलकों पर पड़े बोझ को वितान तोगड़े से बाँटना चाहता है।

"श्रीमान! सभी अपनी-अपनी इच्छाओं की फिरकी फेंकते हैं जब वे पूरी नहीं होतीं तब आती है उबकाई।"

तोगड़े हाज़िर-जवाबी से उत्तर देता है।

"पिछले पंद्रह महिनों से पहाड़ियों के बीचोंबीच यों सुनसान टीसीपी पर बैठना ज़िम्मेदारी भरा कार्य नहीं है क्या ?"

वितान कुर्सी पर एक लोथड़े के समान पड़ा है। जिसकी आँखें तोगड़े को घूर रही हैं,घूरते हुए कह रहीं हैं- ”बता तोगड़े, हम क्यों हैं?धरती पर,आख़िर हमारा अस्तित्व क्या है? क्यों नहीं समझते  दुनिया वाले कि छ महीने में एक बार समाज में पैर रखने पर हमें कैसा लगता है?”

"क्यों नहीं? है श्रीमान! है, ज़िम्मेदारी से लबालब भरा है दिन भर एक भी गाड़ी यहाँ से नहीं गुज़रती फिर भी देखो! हम राइफल लिए खड़े हैं।"

कहते हुए- तोगड़े राइफल के लेंस से पहाड़ियों को निहारते हुए उनमें खो जाता है।

"तोगड़े!"

कहते हुए वितान चुप्पी साध लेता है।

" हुकुम श्रीमान।”

वह  राइफल के लेंस में देखता ही जाता है।

"तुम्हारी पत्नी,दोस्त और घरवाले शिकायत नहीं करते तुम से तुम्हारी ज़िम्मेदारियों को लेकर।"

वितान उलझनों को एक-एक कर सुलझना चाहता है। ज़िंदगी से पूछना चाहता है कि आख़िर किया क्या है मैंने?

"नहीं साहेब! पत्नी को टेम ही कहाँ मिलता है? खेत-खलिहान बच्चे, चार-चार गाय बँधी हैं घर पर,  छुट्टी के वक़्त उसे याद दिलाना पड़ता है कि मैं भी घर पर आया हुआ हूँ। पगली भूल जाती है।"

तोगड़े का अट्टहास उसे गाँव ले जाता है यादों के हल्के झोंकों की फटकार से वह उठकर खड़ा हो जाता है और इधर-उधर निगाह दौड़ाने लगता है।

"साहेब! समाज में सभी का पेटा भरना पड़ता है। नहीं तो कौन याद रखता है हम जैसे मुसाफ़िरों को, दोस्तों को एक-एक रम की बॉटल चाहिए। घरवालों को पैसे और पत्नी को कोसने के लिए नित नए शब्द, बच्चों के हिस्से कुछ बचता ही कहाँ है? शिकायतों के अंकुर फूट-फूटकर स्वतः ही झड़ जाते हैं।"

वितान की मायूस आँखों को हँसाने के प्रयास के साथ तोगड़े दाँत निपोरते हुए टीसीपी के गोखे से झाँकता हुआ पानी की बॉटल उठाता है।तपते पहाड़ो से गुज़रते शीतल झोंके अपनों की स्मृतियों को और गहरे से उकेरने में मग्न हो जाते हैं।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Monday, 2 May 2022

मौन गौरैया



              कॉरिडोर में कबूतर का धरने पर बैठना। जाने पहचाने स्वर में गुटर-गूँ गुटर-गूँ करते हुए कहना । 

"हाँ, वही हूँ मैं।" 

राधिका जैसे कह रही हो।

 ” हाँ,गमले के पीछे की एक गज़ ज़मीन तुम्हारे ही नाम तो लिख रखी है। "

  हिलकोरे मारती स्मृतियाँ; राधिका समय से साथ बहती ही चली गई।

 "हाँ, वही तो है यह कबूतर…नहीं! नहीं!वह नहीं है, वह तो कुछ मोटा था।” अब कबूतर की पहचान करने को आकुल हो गया मन ?

 कबूतर अपने साथ ले आया यादों की पोटली।  राधिका उस गठरी में ढूँढ़ने लगी थी कोकिला को, उसकी माँ उसे कोकि कह पुकारती।

 राधिका जैसे ही कॉरिडोर में रखी कुर्सी खिसकाती उसके एक-दो मिनट बाद ही कोकि छत के कॉर्नर पर आकर खड़ी हो जाती । कोकि वहाँ रहने नहीं आई थी तब उस दीवार पर यही कबूतर बैठा करता था।

 भावों ने उठ कर समर्थन किया। 

" हाँ, शायद यही था।" 

 फ़ुरसत के लम्हों में अक्सर राधिका उसे निहारती रहती । अब वह स्थान कोकि का हुआ। उसकी माँ उसे आवाज़ लगाती-

 "अरे! कोकि इधर आ, बाहर बहुत धूप  है।" 

 तब वह हाथ हिलते हुए कहती- " मैं अभी नहीं आऊँगी।” उसके हिलते हाथ राधिका को यों ही कुछ कहते से नज़र आते।

 दिन-रात अपनी गति से डग भरते गए। राधिका और कोकि एक दूसरे को देखकर समय व्यतीत करने लगे। एक बंधन जो उन्होंने नहीं बाँधा स्वतः ही जुड़ता चला गया, जो भी पाँच-सात मिनट पहले आता वह दूसरे का इंतज़ार करता। आँखें मिलती एक मिठी मुस्कान के साथ,कोकि मुट्ठी भर स्नेह भेजती और राधिका ममता के फूल। 

कबूतर पता नहीं कब राधिका के कॉरिडोर में आकर रहने लगा और इस कहनी का निमित्त बन गया। वह अकेला नहीं आया, पहले अपने दो अंडे छोड़कर  गया फिर वहीं अपना घर बना लिया। राधिका उसे दाना-पानी  देने लगी, जल्द ही उससे भी दोस्ती हो गई । अब देखकर उड़ता नहीं, वहीं पंख फैलाए बैठा रहता। 

"हाँ,यह वही कबूतर है शायद दोबारा आया है।" अवचेतन से चेतन में लौटी राधिका उसे देखकर फिर यह शब्द दोहराती है।

समय अपनी चाल चलता गया। कोकि कभी उदास तो कभी हँसती जैसे भी रहती पाँच बजे उसी कॉर्नर पर खड़ी मिलती। उसका मौन शब्द बिखेरता, राधिका पलकों पर सहेज लेती। कोकि की घनी काली पलकें बहुत कुछ कह जातीं। मम्मी से कितना लाड- प्यार,कितनी डाँट मिली।इन सब का हिसाब  देने लगी थी,उसकी मुस्कान हृदय में बदरी-सी बरसती। निगाह भर देखना दोनों के लिए तृप्ति का एहसास था।  

उन दिनों अचानक राधिका की बेटी बीमार पड़ गई। कोरिडोर में बैठने का सिलसिला टूट गया। बेटी की तपती काया देख राधिका बिखर-सी गई। झुँझलाहट  कंधों पर टंगी  रहती और दुपट्टा खूँटी पर। या तो कुछ बोलती नहीं, बोलती तो काटने को दौड़ती। एक दिन दो दिन न जाने उस समय बेटी को क्या हुआ था? तब उसे एहसास हुआ जिस मोह  मुक्ति की वह दुहाई देती फिरती है  वह तो अभी भी उसके पल्लू से बँधा पड़ा है ।फिर वह  मुक्त किससे हुई? क्या था जिससे वह स्वयं को मुक्त-सी पाती। एक हल्कापन जो उसे अंबर में उड़ा ले जाता। बादलों के उस पार  धरती की सुंदरता निहारने।

किरायदार शब्द कितना पीड़ादायी होता है, यह एहसास भी उसे उन्हीं दिनों हुआ जब सांसें देह का साथ छोड़ती-सी लगी।

 तभी उस दिन अचानक डोरबेल बजती है।

”आंटी आजकल आप कोरिडोर में क्यों नहीं बैठतीं ? "

छोटा-सा बच्चा बार-बार उचक-उचककर डोरबेल बजाता जाता और कहता जाता, बंदर की भांति एक जगह ठहरने का नाम ही नहीं ले रहा था।

"शरारत नहीं करते, दीदी आराम कर रही है ना। "

राधिका ने बड़े ग़ुस्से से कहा । अब भला बच्चे को क्या पता, कौन आराम कर रहा है?और कौन जाग रहा है? राधिका के शब्दों की गर्माहट से बच्चा चुपचाप वहीं खड़ा हो गया और पैर के पंजे से चप्पलें हिलाने लगा।

"ये क्या प्रश्न है और कौन हो तुम?”

राधिका ने शब्दों पर पड़ने वाले सभी स्वराघात, बलाघात ताक़ पर रखते हुए,भरे बादलों से निकली बिजली-सी मासूम बच्चे पर टूट पड़ी।

” कोकि ने भेजा है।”

 बच्चा अपमान की लहरों पर सवार हो नथुने फूलाने लगा  कि मुझ पर किस बात का इतना ग़ुस्सा! चॉकलेट की जगह शब्दों का चाबुक जड़ दिया!

"क्यों कोकि स्वयं नहीं आ सकती थी?"

राधिका ने स्वर को सँभालते हुए कोकि पर अपना हक जताते हुए कहा।

”बोलती नहीं है वह, बाहर जाने पर मम्मी फटकारती है उसे। "

हाथ में पकड़ी छोटी-सी छड़ी वहीं छोड़ बच्चा दौड़ता हुआ सीढ़ियाँ जल्दी-जल्दी पार कर गया, पीछे मुड़कर भी नहीं देखा कि उसके एक शब्द से  हृदय टूटकर बिखर गया है।जैसे ही राधिका ने कोरिडोर का दरवाज़ा खोला। साँझ की बरसती धूप में कोकि राधिका का इंतज़ार करती मिली। एक हाथ में गेंद,  दूसरे हाथ से गर्दन का पसीना पोंछती। उसकी आँखें शिकायतों के पर्वत गढ़ रही थीं और पलकें नाराज़गी से भीगी हुई थीं।

उस वक़्त राधिका पाषाण से कम न थी। न भावों ने शब्द गढ़े न हाथों ने हिलकर हाय कहा। हृदय ने जिस तूफ़ान को जकड रखा था, कोकि को देख  झरने-सा बह निकला।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

भावों की तपिश

          ”हवा के अभाव में दम घुट रहा है, हमारा नहीं; पहाड़ों का। द्वेषी है! पेड़ों को पनपने नहीं देता!! " पहाड़ों पर भटके एक पंछी ने फो...