Tuesday, 30 June 2020

पानी की किल्लत

 

 "प्रकृति का प्रकोप प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है,भूकंप के हल्के झटकों के साथ-साथ मुआ पानी भी पाताल की गोद में जा बैठा है।"

छत की मुँडेर पर रखे खाली बर्तन के पास बैठी एक चिड़िया ने मायूसीभरे स्वर में कहा। 

"हर किसी की जड़ें पीपल और बरगद-सी गहरी तो नहीं हो सकती ना...जो पाताल से पानी खींच सके।"

दूसरी चिड़िया की आवाज़ में व्याकुलता थी उसने आसमान को एक टक देखा उम्मीद और आग्रह दोनों आँखों की पलकों में छिपाते हुए कहा। 

  "धीरे-धीरे अब शेखावाटी में खेजड़ी का वृक्ष भी सूखने लगा है। धरती की तलहटी को छूते पानी से हम ही नहीं किसान भी व्याकुल हैं।"

पहली चिड़िया ने छज्जे की छाँव का आसरा लिया और दूसरी को आने का इशारा किया। 

"शहर और गाँव में बावड़ीयाँ तो पहले ही सूख चुकीं हैं  अब कुओं का पानी भी सूखने लगा है।"

छत के उपर से गुज़रते हुए कौवे ने खिसियाते हुए कहा। 

  "जीवन चुनौतियों से भरी गठरी को लादे रखता है वह कभी ज़मीन पर पैर ही नहीं रखता।"

दूसरी चिड़िया ने एक नज़र कौवे पर डालते हुए कहा। 

"वहीं तपती रेत पर अब ऊँट के पाँव भी जलने लगे हैं, छाले उभर आए हैं पैरों में उसके,उसकी कूबड़ सिकुड़-सा गया है।"

दोनों चिड़ियों ने पास रखे गमले में पानी के लिए चोंच मारी पानी तो नहीं था परंतु मिट्टी गीली होने से वहीं बैठ गई। 

"गड़रिये के पास छाँव के नाम पर कोरा आसमान है कुछ बादल के टुकड़े हैं जो कभी-कभार ही उसके साथ चलते हैं।"

पहली चिड़िया ने मन हल्का करते हुए कहा। 

"पेड़-पौधे भी सूख चुके हैं। मरुस्थल पैर पसार रहा है। भेड़-बकरियाँ अब मिट्टी को  सूँघती नज़र आतीं हैं। हर किसी का जीवन ठहरा-सा लगता है। नहीं ठहर रहा तो धरती की गोद में पानी और हुकुम का कभी आठ तो कभी शाम चार बजे बातें बनाना।"

एक तीसरी चिड़िया गमले में अपनी जगह बनाने का प्रयास करते हुए कहती है। 

©अनीता सैनी 'दीप्ति'



Friday, 26 June 2020

किशोरावस्था का आरंभिक चरण



       "भाई तुझे पता है! कुछ दिन पहले की ही ख़बर है। कोटा में नौवीं कक्षा  के एक छात्र ने पबजी के चक्कर में सुसाइड कर ली।"
भानु मूवी के बीच में माधव को टोकते हुए कहता है। 


"यार तुझे घर पर ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए। मेरी माँ हिटलर है।"
माधव हड़बड़ाते हुए भानु को चुप्पी साधने की हिदायत देता है। 

"भाई उसके पापा आर्मी में थे।"
भानु ने मायूसी से मुँह बनाते हुए कहा। 

"मुझे पता है यार, मैंने उसी दिन देख ली थी यह न्यूज़ ...तुझे प्रॉब्लम है तो भाई दिल्ली चला जा, सरकार इलाज भी कर रही है।"
माधव बार-बार भानु का मुँह बंद करने का प्रयास कर रहा था। 

"भाई लास्ट क्वेश्चन, क्या फोन को खिलौना बनाना ठीक है जिओ  को फ्री ही क्यों किया ?"
भानु माधव के ओर पास खिसकता है,ठुड्डी के हाथ लगाए एक टक माधव को घूरता है,अपने प्रतिउत्तर की प्रतीक्षा में। 

"यह प्रश्न मोदी जी और अम्बानी से कर ना यार, यहाँ मत कर मेरी माँ मुझे गेम छोड़ मूवी भी नहीं देखने देगीं।"
माधव सोफ़े से उठता हुआ भानु पर झुँझलाता है। 

"भाई सुन ना...।" 
भानु सभी प्रश्न एक ही सांस में गटक जाता है। 

राधिका रुम से सटी बालकनी में गमले की मिट्टी ठीक कर रही थी। 
अचानक उसके हाथ वहीं रुक जाते  हैं। 

-अनीता सैनी 'दीप्ति'

Saturday, 20 June 2020

प्रतीक्षा

    जैसे धूप से झुलसता आसमान धरती के लिए छाँव तलाशता दौड़ता हो वैसे ही सुमन दौड़कर आई और हाथ में टूटी चप्पल लिए सुरभि के सामने खड़ी हो गई। 

"मुझे पैसे नहीं दीदी काम चाहिए।"

सुमन अपनी टूटी चप्पल का फीता अँगूठे से दबाते हुए झट से ठीक करती है। लुगड़ी से हाथ पोंछती हुई  सफ़ाई का प्रमाण-पत्र देते हुए कहती है -

"कल ही ख़रीदी थी मैंने मेले से पूरे अस्सी रुपए की हैं। 

अच्छी हैं न...,चलताऊ नहीं हैं। फैंसी हैं न..., कम ही चलतीं हैं।"

सुमन ने अपनी टूटी चप्पल की ख़ामी फट से छिपा ली। 

सुमन  एक सांस में कितना कुछ कह गई सुरभि उसका चेहरा ताकती रही। 

"ऐसे वक़्त में मैं तुझे क्या काम दे सकती हूँ तुम भी कम ही बाहर निकला करो।"

कहते हुए सुरभि आगे क़दम बढ़ाती है। 

"आपकी पड़ोसन ने कहा था गेहूँ साफ़ करवाने हैं आपको।"

तेज़ आवाज़ में पुकारते हुए सुमन ने आत्मविश्वास के साथ लंबी उसाँस भरी। 

"वो तो है परंतु में पाँच सौ रुपये ही दूँगी।"

सुरभि विनम्रता से कहते हुए,पलटकर वहीं खड़ी हो गई। 

"नहीं दीदी मैं पूरे तीन सौ रुपये लूँगी दो दिन लगेंगे दो बोरी बीनने में। "

सुमन ने चेहरा ऐसे बनाया जैसे उससे समझदार इस धरती पर और कोई नहीं। 

"तुम्हें पता है तीन सौ रुपये कितने होते हैं?"

सुरभि ने उसकी मासूमियत को एक पल में छलना चाहा।

"क्यों नहीं जानती जब मेरा मर्द कार्तिक मास में ले गया था मुझे खेत पर काम करवाने तब दो महीने बाद मायके छोड़ गया था पूरे तीन सौ रुपये थमाये थे उसने मेरे हाथ में।"

उसके चेहरे पर सुकून था। भावविभोर हो गई थी वह  बीते समय को समेटते हुए। उसके पास सुनाने को बहुत कुछ था परंतु सुननेवाला कोई नहीं था। 

"तब तुम मज़दूरी क्यों करती हो पति है, घर है और ज़मीन भी है। अपने खेत पर काम करो यों क्यों घूमती हो?"

सुरभि ने उसे फटकारते हुए, कुछ समझाते हुए कहा। 

"वो छोटी बहू की चलती है न घर में।  गाय का गोबर डालती हूँ तब तसला छीन लेती है। रोटी बनाती हूँ तब बेलन छीन लेती है। सास-ससुर के चहेते बेटे-बहू है वो मान-सम्मान भी उन्हीं के हिस्से में हैं। कहते हैं तेरा ख़सम कमाता नहीं है।"

कहते-कहते उसका दर्द आँखों से छलक पड़ा। 

सतरह-अठारह साल की बच्ची पीड़ा ने जैसे उसका गला ही दबा दिया हो। आज उसके हृदय पर सुकून था। किसी ने उससे इतने स्नेह से बात की ही नहीं ,

ज़िंदगी से फटकार अपनों से अकाल के जैसी मार मिली थी उसे। 

"अब कभी नहीं जाओगी ससुराल?"

चलते-चलते सुरभि ने एक प्रश्न और उसके हाथ में थमा दिया।

"क्यों न जाऊँ ससुराल साल में दो बार जाती हूँ और वह मुझे लेने भी आता है जब खेत पर खलिहान का काम ज़्याद होता है तब। मेरे सिवा उसका हाथ बँटानेवाला और है ही कौन है? मेरा मर्द बहुत भोला है। ससुराल वालों ने कितनी बार कहा सुमन को छोड़ दे,चप्पल तक  ठीक से नहीं पहननी आती उसे परंतु उसने मेरा साथ नहीं छोड़ा। जैसे-तैसे करके समय निकल जाए फिर आएगा वह मुझे लेने, मैं प्रतीक्षा में हूँ उसकी।"

सुमन कल आने के वादे के साथ उम्मीद समेटे आँचल में वहाँ से चली गई और छोड़ गई एक गहरी कसक। 

-अनीता सैनी 'दीप्ति'

Monday, 8 June 2020

कुछ प्रश्न

   पहली बार किसी सैनिक को ससम्मान उसके घर छोड़ने गया था।  घुटन अभी भी धड़कनों से रिस रही थी। सांसें स्वयं से द्वंद्व करतीं  नज़र आईं। सफ़र में कुछ पल ठहरे थे एक जवान के घर। 

वहीं से कुछ प्रश्न ज़ेहन में खटक गए। 

 अंतरद्वंद्व  के चलते आख़िर बैठे-बैठे मैं  पूछ ही बैठा-

"तुम्हारी पत्नी के हाथ में चूड़ियाँ नहीं थीं। 

मैंने हृदय की व्याकुलता अपने साथी सैनिक के सामने परोसी।

उसने कहा -

"हालात ने छीन लीं।"

और वह मुस्कुराया।

"उसका चेहरा भावशून्य था।"

मैंने अपनी ही सांस गटकते हुए कहा। 

उसने कहा -

"समय की धूप ने सोख लिए ।"

वह एकटक उसकी फोटो निहार रहा था। 

"उसकी चाल में लचक, पैरों में पायल की खनक नहीं थी।"

मैंने उसका हृदय टटोलते हुए कहा। 

उसने कहा -

"उसने किसी अपने को अर्पणकर दी।"

और उसकी आँखें नम हो गईं। 

"उसकी मुस्कान दिखावा लगी शब्द लड़खड़ा रहे थे।"

मैंने शब्दों से गहरा वार किया।

उसने कहा -

"वह दिखावा मेरे लिए था, बिखरे शब्द ही बीनता हूँ मैं।"

उसने गर्दन पीछे  सीट पर टिकाई और सीने की घुटन वहीं पी गया। 

"तुम इतने ख़ुश कैसे रह सकते हो उसके साथ?"

मैंने उसके सब्र पर व्यंग्यपूर्ण तीक्ष्ण प्रहार किया। 

उसने कहा -

" इसलिए कि वो आज भी मेरे इंतज़ार में जी रही है।"

उसने अपनी सांसों में एक राज़ दबा लिया देखते ही देखते उसने एक मासूम को अपनी वर्दी में छिपा लिया।

-अनीता सैनी 'दीप्ति'


Sunday, 7 June 2020

शब्दजाल में उलझे भाव

  "चाय पूछे न पानी ऊपर से चिलचिलाती धूप तू ही बता महतो यह  कैसी मीटिंग?" 

रघुवीर अपने पास बैठे व्यक्ति से पसीना पोंछते हुए कहता है। 

"अरे! काका ठहरो, कुछ बड़े नेता आने वाले हैं आज।   

 शहर में आवारा पशुओं पर हो रहे अत्याचार को देखते हुए जागरुकता अभियान पर मीटिंग है।" 

महतो अपने सफ़ेद कुर्ते की सलवटें निकालता हुआ कुछ अकड़कर कहता है। 

"बात तो ठीक ही कहते हैं नेता लोग, हम जैसे अनपढ़ों की बुद्धि में  बैठती कहाँ है उनके जैसी राजनीति।"

रघुवीर मुँह पर हाथ फेरता इधर-उधर देखते हुए कहता है।  

"काका तुम कुछ समझो न समझो बस गर्दन को इस तरह घुमाना कि तुमसे समझदार कोई दूसरा व्यक्ति नहीं।"

महतो अपने साथ लाए पाँच-दस सदस्यों को धूप में और अधिक देर तक टिके रहने के लिए हिम्मत बँधाता है। 

"बात तो सौ  टका खरी कही तूने महतो,भला गर्दन घुमाने में हमारा क्या जाता है।"

पास बैठे एक व्यक्ति ने ठहाके के साथ महतो का समर्थन करते हुए कहा। 

"भाई ये नेता और मीडिया वाले पता नहीं क्या खाते हैं?

 आँखों के सामने हो रहे कुकृत्य पर मन द्रवित नहीं होता, इनके कहे शब्दों से दस दिन तक दिमाग़ ठनता है,

 मुझ जैसा अनपढ़ भी विचार करने  बैठ जाता है इनके कहे शब्दजाल पर।"

रघुवीर चारों तरफ़ निगाह दौड़ाते हुए वहाँ से निकलने की कोई जुगत लगाता है हुक्के चिलम के बिना वह ज़्यादा देर ठहर नहीं सकता।

"अरे! भाई मैं तो चला तेरे नेता लोग पता नहीं आएँगे कि नहीं परंतु तेरी काकी जरुर आ जाएगी खरी-खोटी सुनाती हुई।"

रघुवीर वहाँ से खिसक लेता है। 

"डेढ़ सौ रुपए की सब्ज़ी ख़रीदी...धनियाँ, मिर्ची डालते हुए भी नाटक!

घोर कलयुग...! इंसान ही इंसान को खाएगा!"

दोनों हाथों में सब्ज़ी से भरे पॉलीथिन के बैग थामें  बड़बड़ाते हुए रघुवीर घर पर आता है। 

"यही जगह मिली थी बैठने के लिए पूरे जहान में तुझे,

दिनभर डोलती है पॉलीथिन चबाती हुए बैठेगी आख़िर मेरी दहलीज़  पर,

गायों की हालत दिन व दिन बद से बदतर होती जा रही है।"

रघुवीर गाय को डंडा मारते हुए दहलीज़ से हटाता है। 

"बालों के साथ-साथ बुद्धि भी झड़ गई क्या आपकी, गौमाता पर कोई ऐसे झुंझलाता है ?"

सब्ज़ी से भरा पॉलीथिन का बैग हाथ में लेते हुए रघुवीर की पत्नी कहती है। 

"अरे! बहू से कहो रोटी हिसाब से बनाए, इस तरह आवारा पशुओं के सामने फेंकने से क्या फ़ाएदा।"

रघुवीर पत्थर पर पड़ी रोटियों को देखते हुए कहता है। 

"आप ही कहो, आपने क्या मुँह सिल रखा है?"

पति-पत्नी दोनों बातों में उलझते हुए  घर के अंदर जाते हैं। 

"अरे! बेटा एक कप कड़क अदरक की चाय पिला दे।"

कहते हुए रघुवीर कुर्सी पर बैठता है और टीवी चलाता है। 

"अरे! क्या हो गया है देश दुनिया को पशुओ पर निर्मम अत्याचार!"

पीड़ा का भाव चेहरे पर लिए रघुवीर एक टक टीवी स्क्रीन पर नज़र गढ़ाए हुए  कहता है। 

-अनीता सैनी 'दीप्ति'

Sunday, 17 May 2020

तुम्हारी फुलिया

  "सांसों के चलने मात्र से झुलसता है क्या पीड़ा से हृदय?"

फुलिया अपनी गाय गौरी का माथा सहलाते हुए पूछती है। 

 "तुम्हें भी मालिक  की याद तो आती होगी? क्यों न आए? मुझसे पहले वह तुझसे जो मिलने आता है। बरामदे में पैर रखते ही पूछता है गौरी कैसी है?"

फुलिया गाय को चारा डालते हुए उसी के पास बैठ जाती है। 

 बातों-बातों में पता ही नहीं चला कब वह अतीत की गहराई में खो जाती है। 

"इस बार उसके सकुशल घर पहुँचते ही तुझे पाँच सेर गुड़ खिलाऊँगी बस एक बार उसे घर तो आने दे।"

फुलिया बच्चे की तरह गौरी की पीठ सहलाती है शायद उससे मिन्नतें भी कर रही है पति के सकुशल लौटने की। 

जब भी अंतस में कोई विचार उमड़ता, बतियाने पहुँच जाती है गौरी के पास। 

"अरे फुलिया! बृजमोहन के साथ क्यों न चली जाती?"

 पड़ोसन ने जले पर नमक छिड़कते हुए कहा। 

"हाँ ठीक कहा काकी सा, म्हारी ज़मीन-ज़ायदाद  पर ताकि थे हाथ फेर लो।" 

फुलिया ने झुँझलाते हुए कहा। 

"अरे कभी तो सीधे मुँह बात किया कर।"

 काकी सा मुँह बनाते हुए वहाँ से निकल गयी। 

"सब जानू मैं एक से एक डेढ़ सयानी बैठी है गाँव में। फुलिया अनपढ़ वह क्या जाने हिसाब-किताब के बारे में ज़मीन-ज़ायदाद  पर हाथ फेर सब अपने हिस्से में समेट लेंगे।" 

फुलिया मन ही मन बड़बड़ाते हुए चौखट पर बैठ जाती है। 

 अविश्वास के चलते फुलिया गाँव में किसी से सीधे मुँह बात भी नहीं करती है। अकेलेपन में उलझी-सी अकेली ही बड़बड़ाती रहती है। आज दर्द और भी गहरा हो गया,मदद भी माँगे तो किससे? 

गाँव में उठ रही तरह-तरह की बातों से फुलिया का मन बहुत बेचैन रहने लगा है। 

आये दिन मज़दूरों के साथ हो रहे तरह-तरह के हादसे, कौन घर पहुँचेगा; कौन नहीं?

 वह दिन-रात इसी दर्द को पी रही है। 

सास-ससुर के देहांत के बाद गौरी ही उसका एकमात्र सहारा है। बृजमोहन अपने माँ-बाप की इकलौती संतान होने से फुलिया को कोई सहारा नहीं है। कहने को गाँव है परंतु वह भी ज़रुरत के वक़्त ही दरवाज़ा खटखटाता है। 

देर रात तक चौखट पर बैठे-बैठे कोरे आसमान को घूरती रहती है।  पिछली बार जब आया था तब एक फोन हाथ में थमाकर गया था। 

चार तक नम्बर याद रखने की हिदायत दी थी उसने। एक गौरी के डॉक्टर का, दूसरा अपना; तीसरा मायके में भाभी का जो कभी फोन ही नहीं  उठाती;चौथा शहर वाली दीदी का।अब काफ़ी दिनों से वह फोन भी पानी की हॉज़ में गिरा पड़ा है।

 गाँव में कभी किसी से कभी किसी से मिन्नतें  करती है पानी की हॉज़  से फोन निकलवाने का न वह हॉज़ ख़ाली हुआ, न फोन निकाल पायी। इधर-उधर से उड़ती बातें सुन-सुनकर घर के बर्तन फोड़ती रहती है। कभी दूध न देने पर गौरी पर झुंझला पड़ती है। ऐसी ज़िंदगी से जूझ रही है। तुम्हारी फुलिया। 

©अनीता सैनी 

Tuesday, 12 May 2020

कहो न सब ठीक हो जाएगा !


      मौसम अक्सर साँझ ढले ख़राब हो ही जाता है।

आँधी के साथ कुछ बूँदा-बाँदी होना स्वभाविक ही है। सामने पार्क में देखने से लग रहा था जैसे पेड़ टूटकर अभी गिरने ही वाले हैं। 

  तेज़ तूफ़ान के साथ बीच-बीच में किसी के चीख़ने-चिल्लाने की आवाज़ कानों में गूँज रही थी। 

धड़कनें बढ़ने लगीं कि आख़िर हुआ क्या? क़दम ख़ुद-ब-ख़ुद उस दिशा की ओर बढ़ने लगे। 

"मैंने थाली भी बजायी थी और दीपक भी जलाये थे।"

सुमित्रा आंटी मातम में डूबी यही रट लगाए जा रहीं थीं। 

पड़ोस की कुछ औरतें उन्हें ढाढ़स बँधा रही थीं। 

 "सुमित्रा हिम्मत रख दुधमुँहे बच्चे हैं बहू के उनका तो विचार कर।"

पास ही बैठी एक औरत ने सुमित्रा काकी को कँधे का सहारा देते हुए कहा। 

"कैसे सब्र करुँ? ये पिछले दो साल से घर बैठे हैं वह दो महीने घर नहीं बैठ पाया। घबरा क्यों गया माँ-बाप बोझ लगे उसे?"

सुमित्रा काकी के पति के दोनों पैर किसी हादसे में कट गए थे अब वह एक ही जगह बैठे रहतें हैं। 

परंतु कौन नहीं टिक पाया, किसे बोझ लगे; यह नहीं समझ पायी। 

"भाभी उन्होंने आत्महत्या कर ली! मैं क्या करु? कैसे लाऊँ उन्हें?"

पायल ने एकदम से पूजा को जकड़ लिया

 वह उसके सीने से लग सुबक-सुबक कर रोने लगी। 

"एक बार कहो न भाभी सब ठीक हो जाएगा। 

 तुम्हारे शब्दों से हिम्मत मिलती है; बोलो न भाभी।"

पायल पूजा से बार-बार यही आग्रह कर रही थी। 

गला रुँध गया,शब्द लड़खड़ा गए बस आँखें बरस रहीं  थीं

 कैसे कहूँ? 

सब ठीक हो जाएगा!


©अनीता सैनी 'दीप्ति'


Tuesday, 5 May 2020

वृंदा

 

          रात के अंतिम पहर में धुँधले पड़ते तारों में तलाशती है अपनों के चेहरे ऐसा लगा जैसे एक-एक कर साथ छोड़ रहे हैं उसका और वह ख़ामोशी से खड़ी सब देख रही है। एक आवाज़ उसे विचलित कर रही है। 

"हक नहीं तुम्हें कुछ भी बोलने का। ज्ञान के भंडारणकर्ता हैं न,समझ उड़ेलने को। तुम क्यों आपे से बाहर हो रही हो। तुम्हें बोलने की आवश्यकता नहीं है।"

बुद्धि ने वृंदा को समझाया और बड़े स्नेह से दुलारा। 

"क्यों न बोलें हम,तानाशाही क्यों सहें?"

मन ने हड़बड़ाते हुए कहा। 

"क्योंकि वे समझ पर लीपा-पोतीकर रहे हैं जिससे काफ़ी लोगों को सुकून की अनुभूति हो रही है।"

बुद्धि ने अपनी गहराई से कुछ बीनते हुए कहा। 

"बाक़ी लोगों का क्या वे क्या गणना का हिस्सा नहीं है।"

"क्या यह सही समय था? तीनों सेनाओं को उलझाना ठीक था।"

गला रुँध गया और मन की आँखें नम हो गई। 

"वे सकारात्मकता दर्शाना चाहते हैं।"

बुद्धि ने मन को हिम्मत बँधाई। 

"फिर डॉक्टर और पुलिस की सुरक्षा के लिए ज़रुरी सामान उपलब्ध क्यों नहीं कराया गया। वे मर रहे हैं। बेवजह फूल बरसाकर क्या दिखा रहे हैं? "

मन एक कोने में बैठकर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा जैसे उसने किसी अपने को खोया है। 

"किससे अनुमति हासिल की कि इस तरह सभा बुलाकर मातम मना रहे हो?"

अंदर से आवाज़ ने आवाज़ दी मन और बुद्धि दोनों सहम गए। 

"ये वाकचातुर्य नासमझी को समझदारी का लिबास पहना रहे हैं।"

मन ने धीमे स्वर में अपना मंतव्य रखा। 

"क्या करोगे तुम? "

"ज़्यादा ज्ञान मत बघारो।"

आवाज़ ने आक्रोशित स्वर में उसांस के साथ कहा। 

"माफ़ी-माईबाप! अब कभी मन अपने शब्द ज़ूबाँ पर नहीं लाएगा। इसने पाँच सपूत खोए हैं। मनः स्थति समझो इसकी।"

बुद्धि ने मन की तरफ़ से आवाज़ से माफ़ी माँगी कभी आवाज़ न निकालने के वादे के साथ। 

वृंदा की आँखें नम हो गई,  उसने देखा!

 और पाँच तारे आसमान में लुप्त हो गए। 

@अनीता सैनी 'दीप्ति'


Monday, 4 May 2020

अनपढ़ औरतें

    ज सुबह से ही मौसम बिगड़ रहा था। गीता गांव के हाल-चाल फोन पर ले रही कि मौसम  की मार से पहले खलिहान में पड़ा अनाज घर तक सुरक्षित पहुँचा या नहीं।

पुनीत अख़बार पढ़ रहा था, सासु माँ अंदर रुम में आराम कर रही थी। 

"वह अपने बच्चों की भूख मिटाने के लिए पत्थर उबाल रही थी।"

पुनीत ने विस्फारित नेत्रों से मम्मी से कहा और फिर दूसरा समाचार पढ़ने लगा। 

"अनपढ़ होगी!"

गीता की सास ने कमरे के अंदर से आवाज़ दी। 

"मॉम कहती है माँ कभी अनपढ़ नहीं होती।"

पुनीत ने माँ शब्द को फ़ील करते हुए  गीता का समर्थन किया।

" कीनिया की एक महिला जिसके आठ बच्चे थे वह विधवा थी। लोगों के कपड़े धोकर अपने बच्चों का पेट भरती थी। हाल ही में कोरोना की वजह से काम पर नहीं जा सकती थी। खाने को घर पर कुछ नहीं था,  बच्चों को बहलाने के लिए वह पत्थर उबालने लगी। बच्चों को कुछ संतोष होगा जिसके इंतज़ार में वे सो जाएँगे।"

पुनीत ने अपनी बाल-बुद्धि से यह विचार विचलित मन से अपनी दादी माँ को सुनाया। 

"और पता है, उसकी पड़ोसन ने उसका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर अपलोड कर दिया जिससे कि काफ़ी लोगों ने उनकी मदद भी की।"

पुनीत अपनी दादी माँ को बार-बार समझा रहा था। 

"मॉम आप क्या कहते हो?"

पुनीत ने फिर प्रश्न किया। 

"उसकी पीड़ा को पिरो सकूँ वे  शब्द कहाँ से लाऊँ? "

गीता ने पुनीत को दूध का गिलास थमाते हुए कहा। 

"ये अनपढ़ औरतें भी न कभी पत्थर तो कभी नमक से पेट भर देती हैं अपने बच्चों का।"

गीता की सास पास ही सोफ़े पर बैठते हुए, ऐसी ही एक घटना से इस घटना को जोड़कर समझाती हुई कहती है। 

"पता है मुझे कोई अनपढ़ ही होगी।"

©अनीता सैनी


Thursday, 30 April 2020

बेटी की माँ


डॉक्टर साहिबा ने फोन रखते हुए ज्योति को शीघ्र अस्पताल पहुँचने की सलाह दी। 

 संयोगवश उस समय घर पर कोई नहीं था जब अचानक ज्योति को लेबर पेन होने लगा। 

उसने पति को सूचित किया जो किसी कार्य से पास के शहर में गया था। 

"मुझे पहुँचने में एक-डेढ़ घंटा लगेगा। 

माँ के साथ चली जाओ।"

ज्योति के पति ने कहा। 

"माँ- पिताजी मंदिर गये हैं, फोन घर पर ही छोड़ गए हैं।" 

ज्योति ने उत्तर दिया। 

अच्छा ठीक है निधि के साथ जाती हूँ अस्पताल। 

कुछ समय अंतराल पर ज्योति के मम्मी-पापा और सास-ससुर भी पहुँच जाते हैं। 

उन्हें देखकर ज्योति  के मन में बहुत संतोष हुआ। 

अपनों का साथ क्या होता है उस दिन ज्योति ने जाना। 

तभी ज्योति को लेबर रुम में ले जाया जाता है। 

वहीं बाहर सभी इंतज़ार कर रहे थे नन्हें मेहमान का परंतु यह क्या ज्योति की सास बार-बार भगवान का सुमिरण कर रही थी। 

यह देखकर निधि को बहुत अच्छा लगा। 

इतना प्रेम वह भी बहू से कभी-कभी ही देखने को मिलता है। 

बारिश की हल्की बूँदा-बाँदी से शाम का मौसम कुछ ठंडा हो गया। शायद इसी से उनके हाथ-पैर काँप रहे थे। 

"आप ठीक हैं आंटीजी?"

निधि ने ज्योति की सास के कँधे पर हाथ रखते हुए पूछा। 

"हाँ बेटा!"

उन्होंने बड़ी ही आत्मीयता से मुस्कुराते हुए कहा। 

"भगवान बीनणी ने सुख-शांति से दो कुढ़ा कर दे और के चाहे।"

उसांस के साथ उन्होंने फिर शब्दों को दोहराया और कुछ बड़बड़ाते हुए टहलने लगीं।

तभी लेबर रूम से बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर गोद में नवजात बच्चे को लेकर निकली। 

"बधाई हो! नन्ही परी पधारी है आप के आँगन में।"

मुस्कुराते हुए उन्होंने सभी को बधाई दी। 

"फोटो क्लिक बिल्कुल भी न करें।"

डॉक्टर ने ज्योति के पापा की ओर इशारा किया। 

हल्की-फुल्की फ़ॉर्मल्टी के बाद बच्ची को अंदर ले जाया गया।"

"मैंने कहा था आपको, मेरी कौन सुने घर माही,अब देखो छोरी ने मुँह काढ़ लियो न,म्हारे तो छोरे का भाग ही फूटगा।"

ज्योति की सास एकदम अपने पति पर झुँझला उठी। 

" देखो समधन नातिन न माथे मत मारो, राम के घरा जाणों है,थारे भी तीन-तीन छोरियाँ हैं ।"

ज्योति की माँ का सब्र टूट गया, उन्होंने भी तपाक से प्रति उत्तर दिया। 

वे दोनों समधन वहीं आपस में वाद-विवाद में उलझ गयीं।

किसी ने एक बार भी नहीं पूछा ज्योति कैसी है?

निधि ज्योति से मिलने वार्ड की तरफ़ क़दम बढ़ाती है परंतु न जाने क्यों उसके क़दम नहीं बढ़ रहे थे वह एक कश्मकश में उलझी थी वह और पता ही नहीं चला कब ज्योति के बेड के पास पहुँच गयी। 

"माँ जी ख़ुश हैं न?"

ज्योति ने बेचैनी से पूछा। 

"हाँ बहुत ख़ुश हैं।"

"क्यों "

निधि ने बेपरवाही से कहा। 

"उन्होंने पूजा रखी थी,मन्नतों में मांगा करती थीं घर का वारिस।"

अंतस में कुछ बिखरने की आवाज़ से ज्योति सहम-सी गयी। 

बेटी के लिए अब आँचल छोटा लगने लगा...  

©अनीता सैनी  'दीप्ति'

पानी की किल्लत

   "प्रकृति का प्रकोप प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है,भूकंप के हल्के झटकों के साथ-साथ मुआ पानी भी पाताल की गोद में जा बैठा है।"...