Tuesday, 18 June 2019

एक सवाल ख़ामोशी से

     मेरे हृदय में उमड़ता वात्सल्य-भाव अपनी चरम सीमा लाँघने लगता है जब आठ साल का एक मासूम बच्चा अपना बड़प्पन दिखाते हुए ज़िंदगी से जद्दोजहद कर उसे सँवारने की भरपूर कोशिश करता है और उम्मीद को अपने सीने से लगाये घूमता है। अपने कार्य  के प्रति समर्पण भाव दर्शाते हुए उसके पूर्ण होने का दावा करता है। ऐसा ही एक बच्चा था भानु। तीसरी कक्षा का वह छात्र मुझे रिझाने की भरपूर कोशिश करता था। उसके नन्हे ज्ञान-भंडार में भी नहीं थी इतनी शालीनता जितनी वह  मुझे दिखाने की कोशिश करता था। उसका शर्मीला शालीन स्वभाव सबको बड़ा प्रिय था। वैसे तो कक्षा के सभी बच्चे मुझे बहुत प्रिय थे परन्तु भानु कुछ अलग ही था। कभी-कभी वह मध्यान्ह-अवकाश का भोजन मेरे साथ समाप्तकर अपने आप को  गौरवान्वित महसूस करता था। धीरे-धीरे इसी तरह वक़्त अपनी सीढ़ियाँ चढ़ता गया और हम उसके साथ चलते रहे। एकाएक एक दिन पुस्तकालय से काफ़ी शोर-शराबे की आवाज़ आयी। अनायास ही मेरे क़दम उस ओर बढ़ते चले गये। मैं पुस्तकालय के दरवाज़े पर अपना क़दम रखने वाली ही थी की मिस शुक्ला की झिड़कीमिश्रित तल्ख़ आवाज़ आयी-

"मिस नीता! 

देखिये! आपके होनहार छात्र का कमाल! 

कभी भी गृहकार्य समय पर पूर्ण नहीं मिलता और आज तो कमाल ही हो गया। 

महाशय पुस्तक ही भूल गये। 

आज इसके माता-पिता को विद्यालय में उपस्थित होने के लिए कहा है।"


           मैं कुछ कहने कि स्थति में नहीं थी और पास ही बेंच पर बैठ गयी एक निगाह भानु की ओर दौड़ायी। 

 वह भी अपनी गर्दन झुकाये खड़ा था। उस बच्चे की आँखों से आँसू रोके नहीं रुक रहे थे। वह कोशिश कर रहा था कि उसके आँसू मुझे न दिखाई दें। मेरे सामने धूमिल हो रही उसकी छवि अब उसकी समझ से परे थी। वह बार-बार अपना चेहरा छिपा रहा था और मैं वहाँ से जाना चाहती थी परन्तु मिस शुक्ला की बातों में इस क़दर उलझ गयी कि मेरा वहाँ से जाना मिस शुक्ला को अपमानजनक लगता। 


             मिस शुक्ला की भानु को लेकर शिकायत वाज़िब थी परन्तु गणित आज एक ऐसा विषय बन गया है जिससे सामान्य बुद्धि के बच्चे बचना चाहते हैं। वे क्या समझे हैं और क्या नही। एक बालमन इस अंतरबोध से परे अपना दृष्टिकोण सजाता है और धीरे-धीरे उसका आँकलन अपनी समझ से करना चाहता है जहाँ उसे उलझन महसूस होती है वह इससे दूर भागना चाहता है। यह समझ का वह पड़ाव है जहाँ ऐसी  स्थित में उलझे बच्चे को एक सच्चे साथी की आवश्यकता महसूस होती है। यही वह परिस्थिति है जहाँ बच्चा आत्मसम्मान के बीज हृदय में अँकुरित करता है और अपने लिये एक रास्ता  चुनता है। 


तभी भानु के माता-पिता वहाँ पहुँचे |


भानु के मम्मी-पापा का ग़ुस्से में तमतमाया हुआ था चेहरा। वे इस बात को बहुत अपमानजनक मानते थे कि उनके बेटे की शिकायत उन्हें यहाँ तक खींच लायी  है और उन्हें इस  अपमान का सामना करना पड़ा। 


मिस शुक्ला - ( भानु के माता-पिता को बैठने का इशारा करती हुई ) "देखिये! आजकल भानु की शरारतें  बहुत बढ़ गयी हैं।  आपको भी इस ओर ध्यान देने की बड़ी आवश्यकता है।" 


भानु की मम्मी- "सुनता कहाँ है आज कल किसी की!" 

( भानु की तरफ़ ग़ुस्से  से देखती हुई )

भानु के पापा- आज शाम मैं इसकी ख़बर लेता हूँ, टी.वी., खेलना-कूदना सब बंद! 

(और उन्होंने एक लम्बी साँस ली )


मिस शुक्ला - ( अपना मुँह बनाती हुई ) "वह तो ठीक है परन्तु बच्चे का इस तरह लापरवाह होना ठीक नहीं।  उसे अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास होना चाहिए।"

 और उन्होंने भानु को अपनी ओर आने का इशारा किया।  


          भानु अपना गुनाह स्वीकारते हुए गर्दन झुकाये खड़ा था, मैं बड़े ही ध्यानपूर्वक मौन अवस्था में यह वाकया घटित होते देख रही थी। कुछ अपना भी पक्ष रखना चाहती थी परन्तु समय ठीक नहीं लगा और मेरे विचार इस वार्तालाप के विपरीत थे इसीलिये  मैंने अपने आपको ख़ामोशी में समेट लिया।  मुझे पता था वही ख़ामोशी बार-बार मुझसे कह रही थी कि मैं ख़ामोश क्यों हूँ? मेरी ख़ामोशी ने उस बच्चे को एक ऐसी राह दिखायी  जो शायद मेरी समझ से परे थी। 


भानु की मम्मी - ( उसका हाथ अपनी ओर खींचती हुई, उसे आँखें दिखाते हुए दोनों होंठ इस तरह बनाये जैसे इस बच्चे ने बहुत बड़ा गुनाह किया हो, मुसीबत का पिटारा तो अब खुलने वाला था। कक्षा परख (क्लास टेस्ट ) में इस बार उसे काफ़ी कम नंबर मिले।  

"यही दिन देखने के लिये हमने  इतने अच्छे विद्यालय में दाख़िला  करवाया तेरा .....!!!!

आँखों ही आँखों में  भानु  को सब कुछ समझा दिया |


तभी मिस शीला वहाँ पहुँची- "ओह! आप भानु  के पेरेंट्स! मैं भी आपसे मिलना चाहती थी।  

बहुत शरारती बच्चा है आपका, पढ़ाई में एक दम ज़ीरो। 

शरारत करने में अव्वल है। 

आप भी इस पर कुछ ध्यान दें। 

फिर पेरेंट्स की शिकायत आती है कि  नंबर कम मिले।" 

(अपनी बात समाप्त करती हुई उसने एक नज़र भानु पर डाली और वहाँ से निकल गयी )


       भानु बार-बार मेरी ओर देखता और गर्दन झुका लेता। 

उस बच्चे की मुझसे उम्मीद थी कि मैं कहूँ कि वह मेरे विषय में अच्छा है और गृहकार्य भी पूर्ण रहता है परन्तु न जाने क्यों मैं कह नहीं पायी  और वहाँ से बाहर निकल गयी।  इस घटना के कुछ दिन बाद तक  भानु विद्यालय नहीं आया और कुछ दिनों   तक मेरा  अवकाश रहा। उस  दिन के बाद हमारी दूरी इतनी बढ़ गयी कि वह बच्चा मेरे सामने आने से भी कतराने लगा। क्या वजह थी कि एक पल में वह इतना बदल गया। कभी-कभार आँखों ही आँखों में उससे बातें होती थी। कुछ सवाल थे उस बच्चे की आँखों में जो आज भी मुझसे कह रहे हैं  कि उस वक़्त मैं ख़ामोश क्यों थी ? क्यों नहीं कहा कि वह  बहुत अच्छा बच्चा है ?  

कभी-कभार ख़ामोशी ढ़ेर सारे सवाल छोड़ जाती है और यही प्रश्न करती है कि ख़ामोशी  ख़ामोश  क्यों थी ?


                              @ अनीता सैनी

   

Monday, 17 June 2019

कितना सहेगी और कब तक ?



धूप से  तपती  धरा, तार-तार  तन के वस्त्र, न शीश छुपाने की जगह, न एक बूँद पानी। पीड़ा से क्षत-विक्षत हृदय, आने वाले कल का कलुषित चेहरा अब आँखों के सामने मंडराने लगा। 

बार-बार  कराहने की आवाज़ से क्षुब्ध मन, पीड़ा के अथाह सागर में गोते लगाता हुआ। पलभर सहलाना फिर जर्जर अवस्था में छोड़कर चले आना। यही पीड़ा उसे और विचलित करती!

 कुछ पल स्नेह से सहला आँखों ही आँखों में दो चार बातें कर, स्नेह का प्रमाण-पत्र उस के तपते बदन के पास छोड़ महानता का ढोल पीटती हुई, रुख़ घर की ओर किया.....!!!

इस बार तापमान सातवें आसमान पर था। पानी का स्तर पाताल को छूता, समेटा गंगा ने अपना जीवन। सूर्य  धरा को अपने तेज़ से झुलसाता हुआ, अपने गंतव्य की ओर बढ़ ही रहा था कि  मानव भी उसका सहभागी बन उसका उत्साहवर्धन करने में मग़रूर हुआ जा रहा था। 

हृदय में सुलगता करुण भाव, आँखों में चंद आँसू और मैं अपने दायित्व से मुक्त हो बग़ीचे की बेंच पर बैठ मुस्कुराती हुई आने-जाने वालों को एक टक निहारती। कुछ पल अपने आपसे बातें करती हुई।  इसी दिनचर्या में मैंने अपने आपको समेट लिया। 

           आज शाम कुछ अलग-सी थी।  बादल के एक-दो टुकड़े भी मुझेसे  मिलने आये, हवा भी आस-पास ही टहल रही थी। तभी आसमां  में धूसर रंग उमड़ने लगा और  मैं अपने आपको उसमें रंगती, भीनी-भीनी  मिट्टी की ख़ुशबू से अपने आपको सराबोर करने लग। नज़ारा कुछ ऐसा बना कि आसमान में काले बादलों संग आँधी भी अरमानों पर थी। 

(तभी ज़ोर से चिल्लाने की आवाज़ ) मैं  बैंच पर अपने आपको  तलाशने लगी..  


रीता -- 

(कुछ बौखलाई हुई ) चलो घर, पूरे कपड़े ख़राब हो गये, मिट्टी का मेक-अप उफ़ ! मेरा चेहरा....


संगीता -- 

(ढाढ़स बँधवाती हुई ) अरे! कुछ देर बैठ, हवा के साथ बादल भी छंट जाएँगे, वैसे भी काफ़ी अच्छी हवा चल रही है, आँधी से इतना क्यों परेशान हो रही हो?  देख सूरज ने कितना जलाया है मुझे?  वह अपना हाथ उसे दिखने लगी। 

              ( सूर्य की किरणों से होने वाला त्वचा कैंसर आज समाज में आम-सी दिखने वाली बीमारी बन गयी है )

सुनीता -

 ( अपना मुँह बनाती हुई ) क़सम से यार कितनी धूप है यहाँ! चलो मेरे घर, कुछ देर  एसी  की  हवा  में ठहाके लगाते हैं। 


रीता -

 ( सुनीता का समर्थन करती हुई ) चलो कुछेक कोल्ड ड्रिंक भी ऑर्डर कर देते हैं (उसने मेरी तरफ़ ताकते  हुए कहा )


   ( मैं वहाँ ऐसे पेड़ की छाँव में बैठी जो आभास मात्र अपना एहसास करा रहा था | मुझे भी दिखावा मात्र ऐसे सहारे की आवश्यकता थी जो लगे मैं छाँव में बैठी हूँ।  वो उजड़ा हुआ बग़ीचा अक्सर मुझसे बातें करता।  मैं भी उससे काफ़ी बातें करती। घुलने-मिलने के बाद उसे सँवारने की  काफ़ी कोशिश की  पर नाकाम रही।)

अब वहाँ से सभी जा चुके थे पर मैं उसी बेंच से चिपक गयी।  हल्की-हल्की बूँदा-बाँदी होने लगी। एक-एक बूँद धरा के  तपते बदन को छूती और अपना अस्तित्व गँवा देती।  दस मिनट यूँ ही बारिश होती रही, एक बूँद भी धरा पर नज़र नहीं आयी। धरा की यह तपती काया अपनी अतृप्तता  का  बोध करती और व्याकुल नज़र आने लगी। ठूँठ बने उस छोटे से पेड़ से एक-एक बूँद टपकती और धरा से अपना स्नेह जताती इस स्नेह की साक्षी मैं शून्य का भ्रमण करती उन्हें देखती रही। एक बूँद भी उसने अपने तन पर नहीं रखी। एक-एक कर सभी बूँदें  धरा को समर्पित कर अपने निस्वार्थ प्रेम  का बोध करता सदृश्य।  ज़ब भी उस सूखे वृक्ष को देखती हूँ उसका धरा के प्रति समर्पण शब्दों से परे. ...!!!!


संगीता -

 (आश्चर्य से मुझे देखती हुई ) अरे दी आप यहीं बैठी हैं!  


मैं -

 जी आप भी  बैठिए ( मैंने बड़प्पन दिखाया )


रीता -

 नहीं वो मौसम अच्छा हो गया सो टहलने आ गये, वैसे हम....

          (और उसने बेफर्स मुँह में डाल लिये )

संगीता - 

आप अक्सर यहाँ आती हैं? ( बात बढ़ाते हुए कहा )


मैं -

 जी (जब भी वक़्त मिलता है )


सुनीता -

  ( रेपर और कोल्ड्र-ड्रिंक की ख़ाली बोतल बेंच के नीचे डालती हुई ) चलो पार्क का राउंड लगाते हैं...

(और वो लोग वहाँ से चले गये )

आज तन धरा का जला, कल हमारा। बेख़ौफ़ दौड़ रहे किस राह पर.. !!

भविष्य का भयानक चेहरा, असंवेदनशील होती सोच, क्यों नहीं समझ रहे धरा का दर्द, कितना सहेगी और कब तक ?

                                                    - अनीता सैनी


तुम्हें भुला नहीं पाई

          आज से लगभग दस वर्ष पूर्व मेरे पति की पोस्टिंग जयपुर कमांड हाउस में थी। हम सरकारी क्वाटर में रहते थे। उस वक़्त मेरी गुड़िया की उम्र ...