Sunday, 19 July 2020

लाचारी

     हल्की बरसात के साथ ही बरसाती पानी शहर की सड़कों पर दौड़ने लगा। यह नगर पालिका की मेहरबानी थी।

फ़ुटपाथ पर प्लास्टिक के कवर में सिमटी थी लाचारी कभी पैर तो कभी हाथ समेटने के प्रयास में लगी थी। हलचल साफ़ दिखाई दे रही थी।

 तेज़ रफ़्तार से दौड़ती हुई आई जल्दबाज़ी। वह अपनी ही धुन में थी। एक ही पल में सड़क पर पसरा गंदा पानी लाचारी के कवर पर पत्थर की चोट-सा लगा और वह सहम गई।तभी एक छोटी  बच्ची ने  मुँह उस कवर से बाहर निकला। अगले ही पल फिर वह कवर में छिप गई। 

देखते ही देखते मौसम के तेवर भी बिगड़ने लगे।तभी अचानक क्रोध वहाँ से गुज़रा उसे रेड लाइट का भी सब्र नहीं था। वह ऐसे आग उगलता निकला कि ट्रैफ़िक पुलिस उसके  पीछे लग गई। परंतु जाते-जाते फिर लाचारी पर गंदा पानी बरसा गया। फिर उसी बच्ची ने मुँह बाहर निकाला। अगले ही पल वह उसी कवर में सिमट गई।

 बूँदा-बाँदी अभी भी जारी थी। रेड लाइट के शोर-ओ-ग़ुल में हाथ में भुट्टा लिए सहसा प्रेम वहाँ ठहरा  एक पल उसने चारों तरफ़ निगाह दौड़ाई शायद वह लाचारी को आवाज़ दे रहा था कि वह अपनी जगह बदल ले। आने-जाने वाले गंदा पानी डालेंगे उस पर परंतु लाचारी ने अनसुना कर दिया। उस बच्ची ने भी मुँह बाहर नहीं निकाला। प्रेम ने अचानक उसकी वह प्लास्टिक हटाई।

सच्च ! उस वक़्त मैंने लाचारी को बहुत ही लाचार अवस्था में देखा। अपाहिज होती है लाचारी तब समझ में आया। पैर नहीं थे वह सिमटकर बैठी थी । काठ की छोटी-सी गाड़ी पर चप्पल  हाथों  में पहने ,बच्ची उसके पेट से चिपकी थी। पहली बार मैंने लाचारी को मोटी-मोटी आँखों से प्रेम को घूरते हुए देखा।

©अनीता सैनी 'दीप्ति'

Wednesday, 8 July 2020

अनुत्तरित प्रश्न

"बड़ी बहू हल्दी का थाल कहाँ है ?"


सुमित्रा चाची चिल्लाती हुई आई,

हल्दी के रंग में डूबी साड़ी के पल्लू को ठीक करते हुए एक नज़र अपने गहनों पर डालती हुई कहती है। 

"ओह ! मति मारी गई मेरी, यहीं तो रखा है आँखों के सामने।"


पैर की अँगुलियों में अटके बिछुए से साड़ी को खींचती हुई क़दम तेज़ी से बढ़ाती है। 


"सुमित्रा! बेटी का ब्याह है। बहू घर नहीं आ रही,यों  अपना आपा नहीं खोते।"

दादी ने मुँह बनाते हुए कहा 

बूढ़ी दादी पोती के ब्याह में ऐंठी हुई बैठी है कि कोई उससे कुछ क्यों नहीं पूछ रहा। दादी अपनी ऐंठन खोलते हुए मुँह बनाती है। परंतु सुमित्रा चाची अनसुना करते हुए वहाँ से निकल जाती है। हल्दी की रस्म शुरु होती है। हल्दी के रंग में रंगी औरतें खिलखिलाते हुए रस्म में चार चाँद लगातीं हैं। दादी अपने ही गुमान में बैठी देख रही थी यह सब। 

" दीदे फाड़-फाड़कर देखती ही रहोगी क्या ? वहाँ चौखट पर बैठ जाओ। सूबेदारनी अंदर ही घुसी आ रही है। विधवा की छाँव शुभ कार्य में शोभा देती है क्या ?"

 सुमित्रा चाची दादी पर एकदम झुँझलाती है।


"सुमित्रा !"

गोमती भाभी की ज़बान लड़खड़ा गई। 

न वह अंदर आ रही है और न ही अपने क़दम पीछे खींचती है। अपमान के ज़हर का घूँट वहीं खड़े-खड़े ही पी गई। क्षण भर अपने आपको संभालते हुए कहती है -


" बड़ी बहू वो शगुन तो लाना ही भूल गई मैं ...आती हूँ कुछ देर में दोबारा।"


गोमती भाभी दर्दभरी मुस्कान बड़ी बहू को थमा जाती है फिर आने का वादा करके एक अनुत्तरित प्रश्न के साथ ...


 ©अनीता सैनी 'दीप्ति'

Tuesday, 30 June 2020

पानी की किल्लत

 

 "प्रकृति का प्रकोप प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है,भूकंप के हल्के झटकों के साथ-साथ मुआ पानी भी पाताल की गोद में जा बैठा है।"

छत की मुँडेर पर रखे खाली बर्तन के पास बैठी एक चिड़िया ने मायूसीभरे स्वर में कहा। 

"हर किसी की जड़ें पीपल और बरगद-सी गहरी तो नहीं हो सकती ना...जो पाताल से पानी खींच सके।"

दूसरी चिड़िया की आवाज़ में व्याकुलता थी उसने आसमान को एक टक देखा उम्मीद और आग्रह दोनों आँखों की पलकों में छिपाते हुए कहा। 

  "धीरे-धीरे अब शेखावाटी में खेजड़ी का वृक्ष भी सूखने लगा है। धरती की तलहटी को छूते पानी से हम ही नहीं किसान भी व्याकुल हैं।"

पहली चिड़िया ने छज्जे की छाँव का आसरा लिया और दूसरी को आने का इशारा किया। 

"शहर और गाँव में बावड़ीयाँ तो पहले ही सूख चुकीं हैं  अब कुओं का पानी भी सूखने लगा है।"

छत के उपर से गुज़रते हुए कौवे ने खिसियाते हुए कहा। 

  "जीवन चुनौतियों से भरी गठरी को लादे रखता है वह कभी ज़मीन पर पैर ही नहीं रखता।"

दूसरी चिड़िया ने एक नज़र कौवे पर डालते हुए कहा। 

"वहीं तपती रेत पर अब ऊँट के पाँव भी जलने लगे हैं, छाले उभर आए हैं पैरों में उसके,उसकी कूबड़ सिकुड़-सा गया है।"

दोनों चिड़ियों ने पास रखे गमले में पानी के लिए चोंच मारी पानी तो नहीं था परंतु मिट्टी गीली होने से वहीं बैठ गई। 

"गड़रिये के पास छाँव के नाम पर कोरा आसमान है कुछ बादल के टुकड़े हैं जो कभी-कभार ही उसके साथ चलते हैं।"

पहली चिड़िया ने मन हल्का करते हुए कहा। 

"पेड़-पौधे भी सूख चुके हैं। मरुस्थल पैर पसार रहा है। भेड़-बकरियाँ अब मिट्टी को  सूँघती नज़र आतीं हैं। हर किसी का जीवन ठहरा-सा लगता है। नहीं ठहर रहा तो धरती की गोद में पानी और हुकुम का कभी आठ तो कभी शाम चार बजे बातें बनाना।"

एक तीसरी चिड़िया गमले में अपनी जगह बनाने का प्रयास करते हुए कहती है। 

©अनीता सैनी 'दीप्ति'



Friday, 26 June 2020

किशोरावस्था का आरंभिक चरण



       "भाई तुझे पता है! कुछ दिन पहले की ही ख़बर है। कोटा में नौवीं कक्षा  के एक छात्र ने पबजी के चक्कर में सुसाइड कर ली।"
भानु मूवी के बीच में माधव को टोकते हुए कहता है। 


"यार तुझे घर पर ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए। मेरी माँ हिटलर है।"
माधव हड़बड़ाते हुए भानु को चुप्पी साधने की हिदायत देता है। 

"भाई उसके पापा आर्मी में थे।"
भानु ने मायूसी से मुँह बनाते हुए कहा। 

"मुझे पता है यार, मैंने उसी दिन देख ली थी यह न्यूज़ ...तुझे प्रॉब्लम है तो भाई दिल्ली चला जा, सरकार इलाज भी कर रही है।"
माधव बार-बार भानु का मुँह बंद करने का प्रयास कर रहा था। 

"भाई लास्ट क्वेश्चन, क्या फोन को खिलौना बनाना ठीक है जिओ  को फ्री ही क्यों किया ?"
भानु माधव के ओर पास खिसकता है,ठुड्डी के हाथ लगाए एक टक माधव को घूरता है,अपने प्रतिउत्तर की प्रतीक्षा में। 

"यह प्रश्न मोदी जी और अम्बानी से कर ना यार, यहाँ मत कर मेरी माँ मुझे गेम छोड़ मूवी भी नहीं देखने देगीं।"
माधव सोफ़े से उठता हुआ भानु पर झुँझलाता है। 

"भाई सुन ना...।" 
भानु सभी प्रश्न एक ही सांस में गटक जाता है। 

राधिका रुम से सटी बालकनी में गमले की मिट्टी ठीक कर रही थी। 
अचानक उसके हाथ वहीं रुक जाते  हैं। 

-अनीता सैनी 'दीप्ति'

Saturday, 20 June 2020

प्रतीक्षा

    जैसे धूप से झुलसता आसमान धरती के लिए छाँव तलाशता दौड़ता हो वैसे ही सुमन दौड़कर आई और हाथ में टूटी चप्पल लिए सुरभि के सामने खड़ी हो गई। 

"मुझे पैसे नहीं दीदी काम चाहिए।"

सुमन अपनी टूटी चप्पल का फीता अँगूठे से दबाते हुए झट से ठीक करती है। लुगड़ी से हाथ पोंछती हुई  सफ़ाई का प्रमाण-पत्र देते हुए कहती है -

"कल ही ख़रीदी थी मैंने मेले से पूरे अस्सी रुपए की हैं। 

अच्छी हैं न...,चलताऊ नहीं हैं। फैंसी हैं न..., कम ही चलतीं हैं।"

सुमन ने अपनी टूटी चप्पल की ख़ामी फट से छिपा ली। 

सुमन  एक सांस में कितना कुछ कह गई सुरभि उसका चेहरा ताकती रही। 

"ऐसे वक़्त में मैं तुझे क्या काम दे सकती हूँ तुम भी कम ही बाहर निकला करो।"

कहते हुए सुरभि आगे क़दम बढ़ाती है। 

"आपकी पड़ोसन ने कहा था गेहूँ साफ़ करवाने हैं आपको।"

तेज़ आवाज़ में पुकारते हुए सुमन ने आत्मविश्वास के साथ लंबी उसाँस भरी। 

"वो तो है परंतु में पाँच सौ रुपये ही दूँगी।"

सुरभि विनम्रता से कहते हुए,पलटकर वहीं खड़ी हो गई। 

"नहीं दीदी मैं पूरे तीन सौ रुपये लूँगी दो दिन लगेंगे दो बोरी बीनने में। "

सुमन ने चेहरा ऐसे बनाया जैसे उससे समझदार इस धरती पर और कोई नहीं। 

"तुम्हें पता है तीन सौ रुपये कितने होते हैं?"

सुरभि ने उसकी मासूमियत को एक पल में छलना चाहा।

"क्यों नहीं जानती जब मेरा मर्द कार्तिक मास में ले गया था मुझे खेत पर काम करवाने तब दो महीने बाद मायके छोड़ गया था पूरे तीन सौ रुपये थमाये थे उसने मेरे हाथ में।"

उसके चेहरे पर सुकून था। भावविभोर हो गई थी वह  बीते समय को समेटते हुए। उसके पास सुनाने को बहुत कुछ था परंतु सुननेवाला कोई नहीं था। 

"तब तुम मज़दूरी क्यों करती हो पति है, घर है और ज़मीन भी है। अपने खेत पर काम करो यों क्यों घूमती हो?"

सुरभि ने उसे फटकारते हुए, कुछ समझाते हुए कहा। 

"वो छोटी बहू की चलती है न घर में।  गाय का गोबर डालती हूँ तब तसला छीन लेती है। रोटी बनाती हूँ तब बेलन छीन लेती है। सास-ससुर के चहेते बेटे-बहू है वो मान-सम्मान भी उन्हीं के हिस्से में हैं। कहते हैं तेरा ख़सम कमाता नहीं है।"

कहते-कहते उसका दर्द आँखों से छलक पड़ा। 

सतरह-अठारह साल की बच्ची पीड़ा ने जैसे उसका गला ही दबा दिया हो। आज उसके हृदय पर सुकून था। किसी ने उससे इतने स्नेह से बात की ही नहीं ,

ज़िंदगी से फटकार अपनों से अकाल के जैसी मार मिली थी उसे। 

"अब कभी नहीं जाओगी ससुराल?"

चलते-चलते सुरभि ने एक प्रश्न और उसके हाथ में थमा दिया।

"क्यों न जाऊँ ससुराल साल में दो बार जाती हूँ और वह मुझे लेने भी आता है जब खेत पर खलिहान का काम ज़्याद होता है तब। मेरे सिवा उसका हाथ बँटानेवाला और है ही कौन है? मेरा मर्द बहुत भोला है। ससुराल वालों ने कितनी बार कहा सुमन को छोड़ दे,चप्पल तक  ठीक से नहीं पहननी आती उसे परंतु उसने मेरा साथ नहीं छोड़ा। जैसे-तैसे करके समय निकल जाए फिर आएगा वह मुझे लेने, मैं प्रतीक्षा में हूँ उसकी।"

सुमन कल आने के वादे के साथ उम्मीद समेटे आँचल में वहाँ से चली गई और छोड़ गई एक गहरी कसक। 

-अनीता सैनी 'दीप्ति'

Monday, 8 June 2020

कुछ प्रश्न

   पहली बार किसी सैनिक को ससम्मान उसके घर छोड़ने गया था।  घुटन अभी भी धड़कनों से रिस रही थी। सांसें स्वयं से द्वंद्व करतीं  नज़र आईं। सफ़र में कुछ पल ठहरे थे एक जवान के घर। 

वहीं से कुछ प्रश्न ज़ेहन में खटक गए। 

 अंतरद्वंद्व  के चलते आख़िर बैठे-बैठे मैं  पूछ ही बैठा-

"तुम्हारी पत्नी के हाथ में चूड़ियाँ नहीं थीं। 

मैंने हृदय की व्याकुलता अपने साथी सैनिक के सामने परोसी।

उसने कहा -

"हालात ने छीन लीं।"

और वह मुस्कुराया।

"उसका चेहरा भावशून्य था।"

मैंने अपनी ही सांस गटकते हुए कहा। 

उसने कहा -

"समय की धूप ने सोख लिए ।"

वह एकटक उसकी फोटो निहार रहा था। 

"उसकी चाल में लचक, पैरों में पायल की खनक नहीं थी।"

मैंने उसका हृदय टटोलते हुए कहा। 

उसने कहा -

"उसने किसी अपने को अर्पणकर दी।"

और उसकी आँखें नम हो गईं। 

"उसकी मुस्कान दिखावा लगी शब्द लड़खड़ा रहे थे।"

मैंने शब्दों से गहरा वार किया।

उसने कहा -

"वह दिखावा मेरे लिए था, बिखरे शब्द ही बीनता हूँ मैं।"

उसने गर्दन पीछे  सीट पर टिकाई और सीने की घुटन वहीं पी गया। 

"तुम इतने ख़ुश कैसे रह सकते हो उसके साथ?"

मैंने उसके सब्र पर व्यंग्यपूर्ण तीक्ष्ण प्रहार किया। 

उसने कहा -

" इसलिए कि वो आज भी मेरे इंतज़ार में जी रही है।"

उसने अपनी सांसों में एक राज़ दबा लिया देखते ही देखते उसने एक मासूम को अपनी वर्दी में छिपा लिया।

-अनीता सैनी 'दीप्ति'


Sunday, 7 June 2020

शब्दजाल में उलझे भाव

  "चाय पूछे न पानी ऊपर से चिलचिलाती धूप तू ही बता महतो यह  कैसी मीटिंग?" 

रघुवीर अपने पास बैठे व्यक्ति से पसीना पोंछते हुए कहता है। 

"अरे! काका ठहरो, कुछ बड़े नेता आने वाले हैं आज।   

 शहर में आवारा पशुओं पर हो रहे अत्याचार को देखते हुए जागरुकता अभियान पर मीटिंग है।" 

महतो अपने सफ़ेद कुर्ते की सलवटें निकालता हुआ कुछ अकड़कर कहता है। 

"बात तो ठीक ही कहते हैं नेता लोग, हम जैसे अनपढ़ों की बुद्धि में  बैठती कहाँ है उनके जैसी राजनीति।"

रघुवीर मुँह पर हाथ फेरता इधर-उधर देखते हुए कहता है।  

"काका तुम कुछ समझो न समझो बस गर्दन को इस तरह घुमाना कि तुमसे समझदार कोई दूसरा व्यक्ति नहीं।"

महतो अपने साथ लाए पाँच-दस सदस्यों को धूप में और अधिक देर तक टिके रहने के लिए हिम्मत बँधाता है। 

"बात तो सौ  टका खरी कही तूने महतो,भला गर्दन घुमाने में हमारा क्या जाता है।"

पास बैठे एक व्यक्ति ने ठहाके के साथ महतो का समर्थन करते हुए कहा। 

"भाई ये नेता और मीडिया वाले पता नहीं क्या खाते हैं?

 आँखों के सामने हो रहे कुकृत्य पर मन द्रवित नहीं होता, इनके कहे शब्दों से दस दिन तक दिमाग़ ठनता है,

 मुझ जैसा अनपढ़ भी विचार करने  बैठ जाता है इनके कहे शब्दजाल पर।"

रघुवीर चारों तरफ़ निगाह दौड़ाते हुए वहाँ से निकलने की कोई जुगत लगाता है हुक्के चिलम के बिना वह ज़्यादा देर ठहर नहीं सकता।

"अरे! भाई मैं तो चला तेरे नेता लोग पता नहीं आएँगे कि नहीं परंतु तेरी काकी जरुर आ जाएगी खरी-खोटी सुनाती हुई।"

रघुवीर वहाँ से खिसक लेता है। 

"डेढ़ सौ रुपए की सब्ज़ी ख़रीदी...धनियाँ, मिर्ची डालते हुए भी नाटक!

घोर कलयुग...! इंसान ही इंसान को खाएगा!"

दोनों हाथों में सब्ज़ी से भरे पॉलीथिन के बैग थामें  बड़बड़ाते हुए रघुवीर घर पर आता है। 

"यही जगह मिली थी बैठने के लिए पूरे जहान में तुझे,

दिनभर डोलती है पॉलीथिन चबाती हुए बैठेगी आख़िर मेरी दहलीज़  पर,

गायों की हालत दिन व दिन बद से बदतर होती जा रही है।"

रघुवीर गाय को डंडा मारते हुए दहलीज़ से हटाता है। 

"बालों के साथ-साथ बुद्धि भी झड़ गई क्या आपकी, गौमाता पर कोई ऐसे झुंझलाता है ?"

सब्ज़ी से भरा पॉलीथिन का बैग हाथ में लेते हुए रघुवीर की पत्नी कहती है। 

"अरे! बहू से कहो रोटी हिसाब से बनाए, इस तरह आवारा पशुओं के सामने फेंकने से क्या फ़ाएदा।"

रघुवीर पत्थर पर पड़ी रोटियों को देखते हुए कहता है। 

"आप ही कहो, आपने क्या मुँह सिल रखा है?"

पति-पत्नी दोनों बातों में उलझते हुए  घर के अंदर जाते हैं। 

"अरे! बेटा एक कप कड़क अदरक की चाय पिला दे।"

कहते हुए रघुवीर कुर्सी पर बैठता है और टीवी चलाता है। 

"अरे! क्या हो गया है देश दुनिया को पशुओ पर निर्मम अत्याचार!"

पीड़ा का भाव चेहरे पर लिए रघुवीर एक टक टीवी स्क्रीन पर नज़र गढ़ाए हुए  कहता है। 

-अनीता सैनी 'दीप्ति'

Sunday, 17 May 2020

तुम्हारी फुलिया

  "सांसों के चलने मात्र से झुलसता है क्या पीड़ा से हृदय?"

फुलिया अपनी गाय गौरी का माथा सहलाते हुए पूछती है। 

 "तुम्हें भी मालिक  की याद तो आती होगी? क्यों न आए? मुझसे पहले वह तुझसे जो मिलने आता है। बरामदे में पैर रखते ही पूछता है गौरी कैसी है?"

फुलिया गाय को चारा डालते हुए उसी के पास बैठ जाती है। 

 बातों-बातों में पता ही नहीं चला कब वह अतीत की गहराई में खो जाती है। 

"इस बार उसके सकुशल घर पहुँचते ही तुझे पाँच सेर गुड़ खिलाऊँगी बस एक बार उसे घर तो आने दे।"

फुलिया बच्चे की तरह गौरी की पीठ सहलाती है शायद उससे मिन्नतें भी कर रही है पति के सकुशल लौटने की। 

जब भी अंतस में कोई विचार उमड़ता, बतियाने पहुँच जाती है गौरी के पास। 

"अरे फुलिया! बृजमोहन के साथ क्यों न चली जाती?"

 पड़ोसन ने जले पर नमक छिड़कते हुए कहा। 

"हाँ ठीक कहा काकी सा, म्हारी ज़मीन-ज़ायदाद  पर ताकि थे हाथ फेर लो।" 

फुलिया ने झुँझलाते हुए कहा। 

"अरे कभी तो सीधे मुँह बात किया कर।"

 काकी सा मुँह बनाते हुए वहाँ से निकल गयी। 

"सब जानू मैं एक से एक डेढ़ सयानी बैठी है गाँव में। फुलिया अनपढ़ वह क्या जाने हिसाब-किताब के बारे में ज़मीन-ज़ायदाद  पर हाथ फेर सब अपने हिस्से में समेट लेंगे।" 

फुलिया मन ही मन बड़बड़ाते हुए चौखट पर बैठ जाती है। 

 अविश्वास के चलते फुलिया गाँव में किसी से सीधे मुँह बात भी नहीं करती है। अकेलेपन में उलझी-सी अकेली ही बड़बड़ाती रहती है। आज दर्द और भी गहरा हो गया,मदद भी माँगे तो किससे? 

गाँव में उठ रही तरह-तरह की बातों से फुलिया का मन बहुत बेचैन रहने लगा है। 

आये दिन मज़दूरों के साथ हो रहे तरह-तरह के हादसे, कौन घर पहुँचेगा; कौन नहीं?

 वह दिन-रात इसी दर्द को पी रही है। 

सास-ससुर के देहांत के बाद गौरी ही उसका एकमात्र सहारा है। बृजमोहन अपने माँ-बाप की इकलौती संतान होने से फुलिया को कोई सहारा नहीं है। कहने को गाँव है परंतु वह भी ज़रुरत के वक़्त ही दरवाज़ा खटखटाता है। 

देर रात तक चौखट पर बैठे-बैठे कोरे आसमान को घूरती रहती है।  पिछली बार जब आया था तब एक फोन हाथ में थमाकर गया था। 

चार तक नम्बर याद रखने की हिदायत दी थी उसने। एक गौरी के डॉक्टर का, दूसरा अपना; तीसरा मायके में भाभी का जो कभी फोन ही नहीं  उठाती;चौथा शहर वाली दीदी का।अब काफ़ी दिनों से वह फोन भी पानी की हॉज़ में गिरा पड़ा है।

 गाँव में कभी किसी से कभी किसी से मिन्नतें  करती है पानी की हॉज़  से फोन निकलवाने का न वह हॉज़ ख़ाली हुआ, न फोन निकाल पायी। इधर-उधर से उड़ती बातें सुन-सुनकर घर के बर्तन फोड़ती रहती है। कभी दूध न देने पर गौरी पर झुंझला पड़ती है। ऐसी ज़िंदगी से जूझ रही है। तुम्हारी फुलिया। 

©अनीता सैनी 

Tuesday, 12 May 2020

कहो न सब ठीक हो जाएगा !


      मौसम अक्सर साँझ ढले ख़राब हो ही जाता है।

आँधी के साथ कुछ बूँदा-बाँदी होना स्वभाविक ही है। सामने पार्क में देखने से लग रहा था जैसे पेड़ टूटकर अभी गिरने ही वाले हैं। 

  तेज़ तूफ़ान के साथ बीच-बीच में किसी के चीख़ने-चिल्लाने की आवाज़ कानों में गूँज रही थी। 

धड़कनें बढ़ने लगीं कि आख़िर हुआ क्या? क़दम ख़ुद-ब-ख़ुद उस दिशा की ओर बढ़ने लगे। 

"मैंने थाली भी बजायी थी और दीपक भी जलाये थे।"

सुमित्रा आंटी मातम में डूबी यही रट लगाए जा रहीं थीं। 

पड़ोस की कुछ औरतें उन्हें ढाढ़स बँधा रही थीं। 

 "सुमित्रा हिम्मत रख दुधमुँहे बच्चे हैं बहू के उनका तो विचार कर।"

पास ही बैठी एक औरत ने सुमित्रा काकी को कँधे का सहारा देते हुए कहा। 

"कैसे सब्र करुँ? ये पिछले दो साल से घर बैठे हैं वह दो महीने घर नहीं बैठ पाया। घबरा क्यों गया माँ-बाप बोझ लगे उसे?"

सुमित्रा काकी के पति के दोनों पैर किसी हादसे में कट गए थे अब वह एक ही जगह बैठे रहतें हैं। 

परंतु कौन नहीं टिक पाया, किसे बोझ लगे; यह नहीं समझ पायी। 

"भाभी उन्होंने आत्महत्या कर ली! मैं क्या करु? कैसे लाऊँ उन्हें?"

पायल ने एकदम से पूजा को जकड़ लिया

 वह उसके सीने से लग सुबक-सुबक कर रोने लगी। 

"एक बार कहो न भाभी सब ठीक हो जाएगा। 

 तुम्हारे शब्दों से हिम्मत मिलती है; बोलो न भाभी।"

पायल पूजा से बार-बार यही आग्रह कर रही थी। 

गला रुँध गया,शब्द लड़खड़ा गए बस आँखें बरस रहीं  थीं

 कैसे कहूँ? 

सब ठीक हो जाएगा!


©अनीता सैनी 'दीप्ति'


Tuesday, 5 May 2020

वृंदा

 

          रात के अंतिम पहर में धुँधले पड़ते तारों में तलाशती है अपनों के चेहरे ऐसा लगा जैसे एक-एक कर साथ छोड़ रहे हैं उसका और वह ख़ामोशी से खड़ी सब देख रही है। एक आवाज़ उसे विचलित कर रही है। 

"हक नहीं तुम्हें कुछ भी बोलने का। ज्ञान के भंडारणकर्ता हैं न,समझ उड़ेलने को। तुम क्यों आपे से बाहर हो रही हो। तुम्हें बोलने की आवश्यकता नहीं है।"

बुद्धि ने वृंदा को समझाया और बड़े स्नेह से दुलारा। 

"क्यों न बोलें हम,तानाशाही क्यों सहें?"

मन ने हड़बड़ाते हुए कहा। 

"क्योंकि वे समझ पर लीपा-पोतीकर रहे हैं जिससे काफ़ी लोगों को सुकून की अनुभूति हो रही है।"

बुद्धि ने अपनी गहराई से कुछ बीनते हुए कहा। 

"बाक़ी लोगों का क्या वे क्या गणना का हिस्सा नहीं है।"

"क्या यह सही समय था? तीनों सेनाओं को उलझाना ठीक था।"

गला रुँध गया और मन की आँखें नम हो गई। 

"वे सकारात्मकता दर्शाना चाहते हैं।"

बुद्धि ने मन को हिम्मत बँधाई। 

"फिर डॉक्टर और पुलिस की सुरक्षा के लिए ज़रुरी सामान उपलब्ध क्यों नहीं कराया गया। वे मर रहे हैं। बेवजह फूल बरसाकर क्या दिखा रहे हैं? "

मन एक कोने में बैठकर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा जैसे उसने किसी अपने को खोया है। 

"किससे अनुमति हासिल की कि इस तरह सभा बुलाकर मातम मना रहे हो?"

अंदर से आवाज़ ने आवाज़ दी मन और बुद्धि दोनों सहम गए। 

"ये वाकचातुर्य नासमझी को समझदारी का लिबास पहना रहे हैं।"

मन ने धीमे स्वर में अपना मंतव्य रखा। 

"क्या करोगे तुम? "

"ज़्यादा ज्ञान मत बघारो।"

आवाज़ ने आक्रोशित स्वर में उसांस के साथ कहा। 

"माफ़ी-माईबाप! अब कभी मन अपने शब्द ज़ूबाँ पर नहीं लाएगा। इसने पाँच सपूत खोए हैं। मनः स्थति समझो इसकी।"

बुद्धि ने मन की तरफ़ से आवाज़ से माफ़ी माँगी कभी आवाज़ न निकालने के वादे के साथ। 

वृंदा की आँखें नम हो गई,  उसने देखा!

 और पाँच तारे आसमान में लुप्त हो गए। 

@अनीता सैनी 'दीप्ति'


Monday, 4 May 2020

अनपढ़ औरतें

    ज सुबह से ही मौसम बिगड़ रहा था। गीता गांव के हाल-चाल फोन पर ले रही कि मौसम  की मार से पहले खलिहान में पड़ा अनाज घर तक सुरक्षित पहुँचा या नहीं।

पुनीत अख़बार पढ़ रहा था, सासु माँ अंदर रुम में आराम कर रही थी। 

"वह अपने बच्चों की भूख मिटाने के लिए पत्थर उबाल रही थी।"

पुनीत ने विस्फारित नेत्रों से मम्मी से कहा और फिर दूसरा समाचार पढ़ने लगा। 

"अनपढ़ होगी!"

गीता की सास ने कमरे के अंदर से आवाज़ दी। 

"मॉम कहती है माँ कभी अनपढ़ नहीं होती।"

पुनीत ने माँ शब्द को फ़ील करते हुए  गीता का समर्थन किया।

" कीनिया की एक महिला जिसके आठ बच्चे थे वह विधवा थी। लोगों के कपड़े धोकर अपने बच्चों का पेट भरती थी। हाल ही में कोरोना की वजह से काम पर नहीं जा सकती थी। खाने को घर पर कुछ नहीं था,  बच्चों को बहलाने के लिए वह पत्थर उबालने लगी। बच्चों को कुछ संतोष होगा जिसके इंतज़ार में वे सो जाएँगे।"

पुनीत ने अपनी बाल-बुद्धि से यह विचार विचलित मन से अपनी दादी माँ को सुनाया। 

"और पता है, उसकी पड़ोसन ने उसका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर अपलोड कर दिया जिससे कि काफ़ी लोगों ने उनकी मदद भी की।"

पुनीत अपनी दादी माँ को बार-बार समझा रहा था। 

"मॉम आप क्या कहते हो?"

पुनीत ने फिर प्रश्न किया। 

"उसकी पीड़ा को पिरो सकूँ वे  शब्द कहाँ से लाऊँ? "

गीता ने पुनीत को दूध का गिलास थमाते हुए कहा। 

"ये अनपढ़ औरतें भी न कभी पत्थर तो कभी नमक से पेट भर देती हैं अपने बच्चों का।"

गीता की सास पास ही सोफ़े पर बैठते हुए, ऐसी ही एक घटना से इस घटना को जोड़कर समझाती हुई कहती है। 

"पता है मुझे कोई अनपढ़ ही होगी।"

©अनीता सैनी


Thursday, 30 April 2020

बेटी की माँ


डॉक्टर साहिबा ने फोन रखते हुए ज्योति को शीघ्र अस्पताल पहुँचने की सलाह दी। 

 संयोगवश उस समय घर पर कोई नहीं था जब अचानक ज्योति को लेबर पेन होने लगा। 

उसने पति को सूचित किया जो किसी कार्य से पास के शहर में गया था। 

"मुझे पहुँचने में एक-डेढ़ घंटा लगेगा। 

माँ के साथ चली जाओ।"

ज्योति के पति ने कहा। 

"माँ- पिताजी मंदिर गये हैं, फोन घर पर ही छोड़ गए हैं।" 

ज्योति ने उत्तर दिया। 

अच्छा ठीक है निधि के साथ जाती हूँ अस्पताल। 

कुछ समय अंतराल पर ज्योति के मम्मी-पापा और सास-ससुर भी पहुँच जाते हैं। 

उन्हें देखकर ज्योति  के मन में बहुत संतोष हुआ। 

अपनों का साथ क्या होता है उस दिन ज्योति ने जाना। 

तभी ज्योति को लेबर रुम में ले जाया जाता है। 

वहीं बाहर सभी इंतज़ार कर रहे थे नन्हें मेहमान का परंतु यह क्या ज्योति की सास बार-बार भगवान का सुमिरण कर रही थी। 

यह देखकर निधि को बहुत अच्छा लगा। 

इतना प्रेम वह भी बहू से कभी-कभी ही देखने को मिलता है। 

बारिश की हल्की बूँदा-बाँदी से शाम का मौसम कुछ ठंडा हो गया। शायद इसी से उनके हाथ-पैर काँप रहे थे। 

"आप ठीक हैं आंटीजी?"

निधि ने ज्योति की सास के कँधे पर हाथ रखते हुए पूछा। 

"हाँ बेटा!"

उन्होंने बड़ी ही आत्मीयता से मुस्कुराते हुए कहा। 

"भगवान बीनणी ने सुख-शांति से दो कुढ़ा कर दे और के चाहे।"

उसांस के साथ उन्होंने फिर शब्दों को दोहराया और कुछ बड़बड़ाते हुए टहलने लगीं।

तभी लेबर रूम से बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर गोद में नवजात बच्चे को लेकर निकली। 

"बधाई हो! नन्ही परी पधारी है आप के आँगन में।"

मुस्कुराते हुए उन्होंने सभी को बधाई दी। 

"फोटो क्लिक बिल्कुल भी न करें।"

डॉक्टर ने ज्योति के पापा की ओर इशारा किया। 

हल्की-फुल्की फ़ॉर्मल्टी के बाद बच्ची को अंदर ले जाया गया।"

"मैंने कहा था आपको, मेरी कौन सुने घर माही,अब देखो छोरी ने मुँह काढ़ लियो न,म्हारे तो छोरे का भाग ही फूटगा।"

ज्योति की सास एकदम अपने पति पर झुँझला उठी। 

" देखो समधन नातिन न माथे मत मारो, राम के घरा जाणों है,थारे भी तीन-तीन छोरियाँ हैं ।"

ज्योति की माँ का सब्र टूट गया, उन्होंने भी तपाक से प्रति उत्तर दिया। 

वे दोनों समधन वहीं आपस में वाद-विवाद में उलझ गयीं।

किसी ने एक बार भी नहीं पूछा ज्योति कैसी है?

निधि ज्योति से मिलने वार्ड की तरफ़ क़दम बढ़ाती है परंतु न जाने क्यों उसके क़दम नहीं बढ़ रहे थे वह एक कश्मकश में उलझी थी वह और पता ही नहीं चला कब ज्योति के बेड के पास पहुँच गयी। 

"माँ जी ख़ुश हैं न?"

ज्योति ने बेचैनी से पूछा। 

"हाँ बहुत ख़ुश हैं।"

"क्यों "

निधि ने बेपरवाही से कहा। 

"उन्होंने पूजा रखी थी,मन्नतों में मांगा करती थीं घर का वारिस।"

अंतस में कुछ बिखरने की आवाज़ से ज्योति सहम-सी गयी। 

बेटी के लिए अब आँचल छोटा लगने लगा...  

©अनीता सैनी  'दीप्ति'

Wednesday, 22 April 2020

वह लड़का

      रितेश लॉन में आराम-कुर्सी पर बैठे अख़बार के मुखपृष्ठ की सुर्ख़ियों पर नज़र गड़ाए थे।जैकी हरी मुलायम घास पर कुलाँचें भरता हुआ कभी रितेश का ध्यान बँटाने की कोशिश में पाँवों के पास आकर

कूँ-कूँ करने लगता। गुलमोहर की डालियों पर गौरैया-वृन्द का सामूहिक गान, मुंडेर पर कौए की कांव-कांव, घास पर पड़तीं उदय हो चुके भानु की रश्मियाँ, सुदूर अमराइयों से आती मोर, टिटहरी, कोयल की मधुर कर्णप्रिय ध्वनियाँ आदि-आदि  मिलकर मनोहारी दृश्य उपस्थित कर रहे थे तभी सर पर पोटली रखे, एक हाथ में गन्ने का गट्ठर व दूसरे हाथ में स्टील की बर्नी लिए गोपाल मुख्य द्वार से ही आवाज़ लगाता हुआ रितेश को प्रणाम करता है। 

"मैम साहब कुछ हरी सब्ज़ियाँ भी लाया हूँ। "

गोपाल एक छोटा थैला और अन्य सामान राधिका के हाथ में थमाकर लॉन की सफ़ाई में जुट गया। 

"गोपाल भाई बाल-बच्चे सब ठीक हैं?

भाभी जी को मेरी भेजी साड़ी पसंद तो आयी न!"

राधिका ने उत्सुकता से गोपाल को पुकारते हुए उसकी उदारता को भाँपते हुए अपने  उत्तरदायित्व को पूर्ण रुप से निर्वहन करने का प्रयास किया। आयेदिन गोपाल भी कभी हरी सब्ज़ियाँ, दूध, घी, दालें, गुड़ आदि गाँव में उपलब्धता और अपनी क्षमता के मुताबिक़ सभी साहब के घर लाने का प्रयास  किया करता था ताकि उनकी कृपा उसे मिलती रहे। 

"सब ठीक ही है मैम साहब,  हमरा बिटवा भी अब अपनी पढ़ाई पूरी कर चुका है अगर आप साहब से कहकर साहब जी के दफ़्तर में  उसे भी काम पर लगवा दो तो मेहरबानी आपकी। "

गोपाल ने गमछे से अपना मुँह पोंछते हुए उम्मीदभरी निगाहों से राधिका से विनम्र अनुरोध  किया और अपने काम में जुट गया। राधिका भी बिन कुछ कहे अंदर चली गयी। 

सप्ताहभर बाद सही मौक़ा पाकर राधिका ने गोपाल के बेटे को सरकारी नौकरी में लेने का रितेश से आग्रह किया।  कुछ दिनों बाद गोपाल के लड़के को रितेश ने अपने सरकारी कार्यालय में डी-वर्ग में अस्थाई नियुक्ति दे दी। 

लड़का ठीक-ठाक पढ़ा लिखा था।  हल्की-फुलकी अँग्रेज़ी भी जानता था, गणित में अच्छा था। लेन-देन के मामलों में एक दम हाज़िर-जवाबी। 

अब धीरे-धीरे रितेश ऑफ़िस  के साथ-साथ सुबह-शाम उस लड़के से अपने घर का काम-काज भी करवाने लगा और गोपाल की छुट्टी कर दी गयी। काफ़ी दिनों तक ऐसे ही चलता रहा। 

एक दिन बहुत तेज़ बारिश हो रही थी।  वह लड़का अपनी साइकिल बँगले के बाहर ही खड़ी करके आता है। कपड़े बारिश में भीगे हुए थे। कुछ चिंतित-सा जल्दी में था शायद वह। 

"अरे इतनी बारिश में ऑफ़िस  से इतनी जल्दी आ गये,  कुछ देर वहीं ठहर जाते तब तक बारिश रुक जाती। "

रितेश ने दरवाज़ा खोलते हुए कहा। 

"साहब! बाबा की तबीयत ख़राब है,

आज घर जल्दी जाना चाहता हूँ। "

लड़के ने दीनता से दाँत दिखाते हुए विनम्रतापूर्वक कहा। 

"ठीक है तो फिर ऑफ़िस में ही बड़े बाबू को बोलकर निकल जाते, यहाँ आने की मशक्कत क्यों की?"

रितेश ने उसे फटकारते हुए कहा। 

"साहब अब मेरी नौकरी भी स्थाई कर दो, मेरे बाद आए दो लड़कों को आपने स्थाई कर दिया है।पिछले दो वर्ष से आप और मैम साहब को लगातार बोल रहा हूँ।"

लड़के ने आज बारिश के पानी में अपनी लाचारी धोने का  पूरा प्रयास किया। आख़िरकार अपनी नौकरी स्थाई करवाने का पूरा भरकस यत्न किया। 

"ठीक है...ठीक है...मैं देखता हूँ, अभी तुम घर जाओ।"

वह लड़का गर्दन झुकाए वहाँ से निकल जाता है परंतु आज उसका दर्द बारिश की बूँदों को भी पी रहा था शायद कोई टीस फूट रही थी हृदय में। 

"लड़का बहुत मेहनती है और फिर गोपाल भाई भी हमारे वफ़ादार थे, आप इसे स्थाई क्यों नहीं कर देते?

आपकी समझ मुझे नहीं समझ आती।"

राधिका कॉफ़ी का कप रितेश की ओर बढ़ाते हुए कहती है। 

"तुम नहीं जानती इन लोगों को,  ज़्यादा सर पर बिठाओ तब नाचने लगते है।  मैं यह जो इससे दोनों जगह काम में ले रहा हूँ न...मिनटों में बदल जाएगा यही लड़का। आज गिड़गिड़ाकर गया है, यही आँखें दिखाने लगेगा, आज स्थाई होने की माँग कल प्रमोशन की माँग करने लगेगा। आज सर झुकाकर जा रहा है कल यही सर उठाने लगेगा और तो और हमारे घर की बेगार करना भी झटके में छोड़ देगा। 

रितेश ने कॉफ़ी ख़त्म की और मोबइल फोन पर निगाह गड़ाते हुए कहा। 

राधिका की पलकें एक पल के लिए ठहर गईं रितेश के भावशून्य चेहरे पर। आज  रितेश का एक नया रुप जो देख रही थी काष्ठवत होकर। 

©अनीता सैनी 

Thursday, 16 April 2020

मरुस्थल का मौन संवाद

      दूर-दूर तक अपना ही विस्तार देख मरु मानव को भेजता है एक संदेश। वह भी चाहता है तपते बदन पर छाँव। निहारना चाहता है जीव-जंतुओं को। सुबह-सुबह उठना चाहता है सुनकर बैलों-ऊँटों की घंटियों की मधुर ध्वनि।थक गया है धूल से उठते बवंडर देख-देखकर। नम आँखों से फिर वह भी हँसने लगता है, देखता है मानव के कृत्य; तभी दूर से आती आँधी को देखता है और कहता है -

"मरुस्थल का विस्तार तीव्र गति से बढ़ रहा। जिस  मानव का मन हरियाली में मुग्ध है उस तक ससम्मान मेरा संदेश पहुँचा दो।"

सर्वाधिक गतिशील अर्द्धचंद्राकार बालू के स्तूप बरखान ने अपनी जगह बदलते हुए कहा-

"बढ़ रहे हैं हम, बढ़ावा इंसान दे रहा है। सब सहूलियत से जो मिल रहा है उसे गँवाने को आतुर लग रहा है। एक पल के जीवन की ख़ातिर बच्चों का भविष्य दाँव पर लगा रहा है, ना-समझ हृदय पर भी विस्तार मरुस्थल का कर रहा है।"

बरखान ने हवा को उसी दिशा में धकेला जिधर से वह आयी थी, ग़ुस्से में हवा ने अपना रुख़ बदला। बालू को आग़ोश में लिया, स्वरुप बवंडर का दिया;अब गर्त को अपना स्वरुप प्राप्त हुआ वह भी सभा में सहभागिता जताता है। 

"समझ के वारे-न्यारे पट खुले हैं मानव के। क्या दिखता नहीं  कैसे हवा हमें खिसकाती है और जगह बनाती है। रण (टाट ) के लिए और खडींन की मटियारी मिट्टी जिजीविषा के साथ पनपती है वहाँ।"

गर्त अपना रुप प्राप्त करता है, बालू उठने से कुछ तपन महसूस करता है। जलते बदन को सहलाता हुआ अपने विचार रख ही देता है। 

"परंतु राह में इंदिरा गाँधी नहर रोड़ा बनेगी,कैसे पार करेंगे  उसे? सुना है पेड़-पौधे लगाए जा रहे हैं। बाड़ से बाँधा जा रहा है हमें।"

 पवन के समानांतर  चलते हुए, बनने वाले अनुदैधर्य स्तूप ने हवा के चले जाने पर अपना मंतव्य रखा। 

"हम नहीं करेंगे उस ओर से निमंत्रण स्वयं हमारे पास आएगा। वे आतुर हैं स्वयं को मरुस्थल बनाने के लिए। क्या सुना है कभी बाड़ ने बाड़े को निगला, नहीं न... तो अब देखो।"

अनुप्रस्थ ने समकोण में अपनी आकृति बनाई,  चारों तरफ़ निग़ाह दौड़ाई और कहा-

"वह देखो,  ऊँटों की टोळी कैसे दौड़ रही है? मरीचिका-सी!

कहीं ठाह मिली इन्हें? नहीं न... इसी के जैसे चरवाहे आसान करेंगे थाह हमारी। 

तीनों आपस में खिसियाते हैं,तेज़ धूप को पीते हुए। अब वे तीनों हवा के साथ उठे बवंडर के साथ अपना स्थान बदलते हैं।  एकरुपता इतनी की मानव को भी मात दे गए हैं। नम आँखों से आभार व्यक्त करते हैं मानव का जिसने उसे के स्वरुप को ओर विस्तार दिया है।

©अनीता सैनी 

Saturday, 11 April 2020

गश्त पर सैनिक

    

 शाम का सन्नाटा जंगल को और भी डरावना बना देता है।छत्तीसगढ़ के सघन वन पार करना किसी मिशन से कम नहीं था उस पर हल्की बूँदा-बाँदी छिपे जीव-जंतुओं को खुला आमंत्रण थी।पेड़ों से लताएँ गुंथीं हुईं थी, रास्ता बनाना बहुत मुश्किल था।तीनों दोस्त बारी-बारी से लताओं पर चाकू चलाते और रास्ता बनाते हुए आगे बढ़ रहे थे।मंजीत यही कुछ उन्नीस-बीस वर्ष का प्रकृतिप्रेमी स्मार्ट नौजवान था। हरा-भरा जंगल मोह रहा था उसे, प्रकृति का ख़ूबसूरत  नज़ारा आँखों में क़ैद करते हुए आगे बढ़ रहा था। 

प्रवीण ने समय की नज़ाकत को समझा और तेज़ी से अपने क़दमों को आगे बढ़ाते हुए समय रहते दूरी तय करने का फ़ैसला करता है।उसे लगा अब आदेश देने का वक़्त निकल चुका है।वह अपने दोनों सहयोगियों को अपने पीछे चलने का आदेश देता है। गुमसुम ख्यालों लीन दोनों दोस्तों की चुप्पी पर वार करता हुआ कहता। 

"अपनों की याद मन की चारदीवारी में क़ैद हो उनकी रक्षा का दायित्त्व और सुरक्षा का ख़याल धर्म है हमारा।"

प्रवीण ने दोनों कमांडो के विचलित मन में उत्साह का संचार करते हुए कहा। 

"कमांडो प्रकाश! तुम्हारे चेहरे पर कुछ बेरुख़ी झलक रही है,घर पर सब कुशल मंगल?"

"जी कमांडो!"

प्रकाश अपने सीनियर का मान रखते हुए चाकू ज़ोर से लताओं-बल्लरियों पर चलाता है और एक लंबी साँस लेता है। 

"एक सीनियर नहीं दोस्त पूछ रहा है, सब ठीक है परिवार में? "

प्रवीण की सद्भावना में भी रोष झलक ही जाता है।  क़दमों की आहट और तेज़ हो जाती है। शाम के सन्नाटे के साथ पैरों से कुचलतीं सूखी पत्तियों की आवाज़ साफ़ सुनी जा सकती थी। 

"पत्नी, बच्चे, परिवार और समाज के क़िस्से बेचैनी बढ़ाते हैं सर! "

प्रकाश ने अपना पक्ष रखा। दर्द भी रुतबे से बाँटना चाहा।  नम आँखों का पानी आँखों को ही पिला दिया। 

"पत्नी,बच्चे, परिवार और समाज हमारी ज़िंदगी नहीं,  हम देश के सिपाही हैं; वो आप से जुड़े हैं और आप देश से। समझना-समझाना कुछ नहीं,  विचार यही रखो कि हम चौबीस घंटे के सिपाही हैं और परिवार हमारा एक मिनट!"

प्रवीण ने सीना चौड़ा करते हुए आँखों में आत्मविश्वास को पनाह देते हुए कहा। 

एक निगाह जंगल में दौड़ाई और ठंडी साँस खींचते हुए कहा-

"जवानों के प्रेम के क़िस्से नहीं बनते, वे शहादत पाषाण पर लिखवाते हैं; हमें सैनिक होने पर फ़ख़्र है।  इसी एहसास को सीने में पाले रखो कमांडो!"

बादलों की गड़गड़ाहट के साथ बूँदा-बाँदी और बढ़ जाती है। तीनों दोस्तों ने एक पेड़ के नीचे ठहरने का निश्चय किया और पैरों पर बँधे ऐंक्लिट में अपने-अपने चाकू रखे। प्रवीण सबसे सीनियर है, उसी को कमांड संभालनी है सो उसे हक नहीं था कुछ कहने का या अपने मन के द्वंद्व को शब्द देने का। वह उस वक़्त संरक्षक की भूमिका में था।  वे पीठ पर लदे सामान से कुछ खाने-पीने का सामान निकलते हैं। 

प्रकाश एक टहनी से बैठने की जगह साफ़ करता है। सीनियर को सम्मान, जूनियर को स्नेह बस। बैठने का हाथ से इशारा करता है। 

"सर मेरे माँ-बाबा मुझपर बहुत गर्व करते हैं। मेरी प्रेमिका जान निसार करती है मुझपर!"

मंजीत प्रकृति के सौंदर्य में डूबा ख़ुशी-ख़ुशी अपना मंतव्य व्यक्त रखता है। 

"अभी प्रेमिका है,  पत्नी बनने पर देखना कमियों का ख़ज़ाना ढूँढ़ लेगी मोहतरमा!"

प्रकाश मंजीत को छेड़ता हुआ कहता हैं। 

"हम दूध का क़र्ज़ चुकाने निकले है। पत्नी और बच्चों के गुनाहगार तो रहते ही हैं उनके सितम को भी सीने से लगाया करो यारो!"

प्रवीण वहीं पेड़ के नीचे लेट जाता है। एक हाथ सर के नीचे और एक हाथ अपने सीने पर रखता है। कहीं अपनी ही दुनिया में गुम हो जाता है। आँखें एकटक पानी की गिरती बूँदों को अपनों के एहसास से जोड़तीं है। यादों के गहरे समंदर में डूब रहा था प्रवीण।  

"सर कभी आपको नहीं लगता अगर आप सेना में सम्मिलित नहीं होते तो ज़रुर किसी ऐसी संस्था में होते कि सुबह-शाम अपने परिवार के साथ होते। आप भी समाज का हिस्सा होते। आपने महसूस किया है आम इंसान की सोच को? "

आख़िरकार  प्रकाश अपनी व्यथा स्पष्ट कर ही देता है और पीछे खिसकते हुए पेड़ का सहारा लेता है।  

"नहीं और देखना भी नहीं चाहता क्योंकि मैं देश का सिपाही हूँ और वे मेरे लोग। वे कितना ही ग़ुरूर पालें परंतु तुम्हारे जितने बहादुर नहीं हैं वे, नहीं कर सकते परिवार का त्याग।"

प्रवीण उठकर बैठ जाता है।  अब बारिश भी कुछ कम हो गयी थी।  तीनों दोस्त अपनी पीठ पर लादते हैं पिट्ठू और निकलते हैं  पाने अपनी मंज़िल उन्हीं लताओं को हटाते हुए।

©अनीता सैनी 

Friday, 10 April 2020

वरिष्ठ लेखक डॉ. रूपचंद्र शास्त्री 'मयंक' जी द्वारा लिया गया मेरा साक्षात्कार ब्लॉग 'मयंक की डायरी' पर प्रकाशित


वरिष्ठ लेखक आदरणीय रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' जी जो अनेक पुस्तकों के लेखक हैं, कई ब्लॉग के संचालनकर्ता हैं, साहित्यिक संस्थाओं के संस्थापक हैं, उन्होंने मेरा साक्षात्कार ब्लॉग 'मयंक की डायरी' के लिये लिया है जो आपके समक्ष प्रस्तुत है-


चर्चाकार (शनिवार-रविवार)

रविवार, मार्च 29, 2020

"जानी-मानी ब्लॉग लेखिका अनीता सैनी का साक्षात्कार"

मित्रों!

झुँझनू राजस्थान में जन्मी, जयपुर (राजस्थान) की निवासी हिन्दी ब्लॉगिंग की सशक्त लेखिका और चर्चा मंच पर ब्लॉगों की चर्चाकार अनीता सैनी का साक्षात्कार पर देखिए -




श्रीमती अनीता सैनी एक अध्यापिका हैं। हिंदी और कम्प्यूटर साइंस पढ़ाती हैं। इनका एक संयुक्त परिवार है जिसमें शासकीय अधिकारी से लेकर खेती-किसानी से जुड़े पारिवारिक सदस्य हैं।



अनीता जी साहित्य में आपका रुझान कैसे हुआ? आपको कब महसूस हुआ कि आपके भीतर कोई रचनाकार है?

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अनीता सैनी: साहित्य के प्रति मेरा रुझान बचपन से ही रहा है। आरंभ डायरी-लेखन से हुआ आगे चलकर छोटी-छोटी देशप्रेम की कविताएँ लिखीं जब वे सराहीं गयीं तब एकांकी / प्रहसन लिखना शुरू किया। जब गुण ग्राहक प्रबुद्ध जनों ने मनोबल बढ़ाया तब एहसास हुआ कि मेरे भीतर भी कोई रचनाकार है।

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अब जरा यह भी बता दीजिए कि आप का आदर्श कौन रहा है? और क्यों रहा है? क्या अब भी आप उसे अपना आदर्श मानते हैं या समय के बहाव के साथ आदर्श प्रतीकों में बदलाव आया है?

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अनीता सैनी: मेरे स्वर्गीय दादा जी श्री गीगराज साँखला ( जो जाने-माने पशु चिकित्सक थे ) वो आज भी मेरे मेरे आदर्श हैं क्योंकि उन्होंने ही मुझे ऐसे संस्कार दिये जो जीवन जीने की कला सिखाते हैं।उनके द्वारा रोपे गये सामाजिक मूल्य मेरे जीवन की धरोहर हैं। प्रकृति और पशु-पक्षियों से उन्हें विशेष लगाव था जिसका प्रभाव मेरे जीवन पर भी है।

इसलिए  मेरे दादा जी का कृतित्त्व और व्यक्तित्त्व आज भी मेरे लिये आदर्श बने हुए हैं। वक़्त के साथ मूल्य बदलते रहते हैं जिन्हें नये सिरे से पुनर्स्थापित किया जाना एक सतत प्रक्रिया है। समय के साथ आये बदलावों में भी दादा जी द्वारा रोपे गये संस्कार मुझे आज भी ऊर्जावान बनाये रखते हैं।

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अनीता जी वर्तमान रचनाकारों की पीढ़ी में आप के आदर्श कौन हैं?

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अनीता सैनी: सच कहूँ तो वर्तमान पीढ़ी के रचनाकारों में मेरा कोई आदर्श नहीं है चूँकि मैं अभी साहित्य अध्ययन प्रक्रिया से गुज़र रही हूँ जहाँ कविवर प्रोफ़ेसर अशोक चक्रधर जी एवं कविवर अशोक बाजपेयी जी का सृजन मुझे बहुत प्रभावित करता है।

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आप अपना लेखन स्वांतःसुखाय करती हैं या किसी विशेष प्रयोजन से करती हैं?

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अनीता सैनी: स्वान्तः सुखाय तो हरेक लेखक / रचनाकार के साथ स्वतः अप्रत्यक्ष रूप से चिपक जाता है। हाँ,  विशेष प्रयोजन के विषय में कहना चाहूँगी कि सृजन के लिये क़लम यदि थाम ही ली है तो उसे क्यों न वक़्त का सच लिखकर सारगर्भित बनाया जाय। जब कभी आज को भविष्य में आँकने की ज़रूरत हो तो विभिन्न मुद्दों पर मेरा नज़रिया भी शामिल किया जाय, ऐसा मेरा मानना है।

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अनीता जी! आप साहित्य की किस विधा को ज्यादा सशक्त मानती हैं?

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अनीता सैनी: मेरी नज़र में साहित्य की सभी विधाएँ सशक्त हैं लेकिन मुझे कभी-कभी कविता जनमानस पर अपना प्रभाव संप्रेषित करने में असरदार नज़र आती है क्योंकि उसमें भाव, विचार एवं संवेदना का मिश्रण व्यक्ति के अंतरमन को झकझोरते हैं।

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आज एक हिन्दी ब्लॉगर के रूप में आपकी जो पहचान बन रही है उसमें आप किस रचनाकार के रूप में उभर रही हैं। गीत, मुक्तक, ग़ज़ल या छन्दमुक्त लिखने में किस को सहज महसूस मानती हैं?

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अनीता सैनी: दरअसल मेरी पहचान छंदमुक्त लेखन से हुई है क्योंकि इसमें मैं अपने विचार सँजोने में स्वयं को सहज पाती हूँ। हालाँकि मैं छंदबद्ध रचनाओं दोहा एवं नवगीत में भी दख़ल रखती हूँ।

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क्या आप भी यह मानती हैं कि गीत विदा हो रहा है और छन्दमुक्त  या ग़ज़ल तेज़ी से आगे आ रही है? कारण बताइए।

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अनीता सैनी: हाँ, ऐसा मैंने भी आजकल का लेखन पढ़कर महसूस किया है। छंदमुक्त लेखन का रुझान बढ़ने की वजह है कि आजकल रचनाकार अपना समय और मेहनत दोनों बचाना चाहते हैं अतः ऐसे लेखन में अपनी समस्त ऊर्जा लगा देते हैं। छंदमुक्त लेखन अँग्रेज़ी कविता लेखन से प्रभावित है।

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अनीता जी! क्या आप हिंदी और उर्दू को अलग-अलग देखने में सहमत हैं? अगर हाँ तो क्यों?

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अनीता सैनी: नहीं। मैंने अपने लेखन में इन दोनों भाषाओं के शब्दों का भरपूर इस्तेमाल किया है। भाव संप्रेषित करने के लिये भाषा को लचकदार होना ज़रूरी है। भारत में हिंदी-उर्दू एवं अँग्रेज़ी भाषाओं के शब्दों को लेखन में प्रचुर स्थान मिला है।

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अनीता जी क्या आप यह मानती हैं कि लोग लेखन से इस लिए जुड़ रहे हैं क्योंकि ये एक प्रभावी विजिटिंग कार्ड की तरह काम आ जाता है और यश, पुरस्कार विदेश यात्राओं के तमाम अवसर उसे इसके जरिए सहज उपलब्ध होने लगते हैं।

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अनीता सैनी: हाँ, हो सकता है ऐसा कुछ रचनाकारों के लिये संभव है। इस विषय पर मेरे पास अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है।

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आज के संदर्भ में कविसम्मेलनों को आप कितना प्रासंगिक मानते हैं और क्यों?

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अनीता सैनी: आजकल कवि-सम्मलेन राजनीतिक आयोजन हो गये हैं क्योंकि इनके आयोजकों का किसी विशेष विचारधारा के प्रचार-प्रसार का छिपा हुआ मक़सद होता है। हालाँकि कवि-सम्मलेन आज भी आकर्षण का केन्द्र बने हुए हैं क्यों

(माँ और बिटिया)

कि वहाँ श्रोताओं को प्रभावित करने के लिये हास्य-व्यंग प्रधान रचनाओं के प्राधान्य के साथ नया कुछ नहीं होता है।

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अनीता जी! अपने जीवन की किसी महत्वपूर्ण घटना या संस्मरण का उल्लेख भी तो कीजिए।

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अनीता सैनी: मेरे विवाहोपरांत एक घटना ने मुझे गंभीर चिंतन के लिये विवश किया। मेरे दूर के रिश्ते की बहन का पति सेना में था जिसकी शादी हुए पंद्रह दिन ही हुए थे कि ड्यूटी ज्वाइन करने का आदेश आ गया। लेकिन वक़्त ने सितम ऐसा ढाया कि तीन दिन बाद ही उस सैनिक की अर्थी गाँव आ गयी। बाद में मैंने उस बहन के कठिन संघर्ष की मर्मांतक पीड़ा से सराबोर कहानी सुनी जिसे पग-पग पर समाज के ताने और अपनों की उपेक्षा सहनी पड़ी। मैंने तब महसूस किया कि स्त्रियों के समक्ष ऐसी चुनौतियों का सामना करने की पर्याप्त क्षमता होनी चाहिए। अतः मैंने शिक्षा को महत्त्व देते हुए ख़ुद के पैरों पर खड़ा होना अपना स्वाभिमान समझा साथ ही अन्य स्त्रियों को शिक्षा की ओर प्रेरित किया।

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अनीता जी आपकी सोच से पाठकों को जरूर प्रेरणा मिलेगी।

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कृपया पाठकों को यह भी बताइए कि आपकी रचनाएँ अब तक कहाँ-कहाँ प्रकाशित हो चुकी हैं?

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अनीता सैनी: मेरे ब्लॉग 'गूँगी गुड़िया' एवं 'अवदत अनीता'   के अतिरिक्त 'अमर उजाला काव्य' पर मेरी रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं।

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आपकी दृष्टि में लेखन के लिए पुरस्कार की क्या उपयोगिता है? आजकल लोग गुमनाम लोगों को पुरस्कार देते रहते हैं इससे किसका भला होता है?  रचनाकार का या पुरस्कार देनेवाले का?

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अनीता सैनी: महोदय, मैं इस पेचीदा प्रश्न का जवाब देने में अपने आप को सक्षम नहीं पाती। मैं एक नवोदित रचनाकार हूँ।

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आपकी अभी तक कितनी कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं? और किन-किन विधाओं में,  आप अपने को मूलतः क्या मानते हैं-गीतकार ग़ज़लकार या मुक्त साहित्यकार?

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अनीता सैनी: मेरा काव्य-संग्रह 'एहसास के गुंचे' अति शीघ्र प्रकाशित होने जा रहा है जिसमें मुख्यतः मुक्त छंद की रचनाएँ हैं। फिलहाल तो मैं स्वयं को मुक्त-साहित्यकार ही मानती हूँ हालाँकि छंदबद्ध रचनाओं में दोहा एवं नवगीत लेखन भी करती हूँ।

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अब जरा यह भी बता दीजिए कि लेखन संबंधी आपकी भविष्य की क्या-क्या योजनाएं हैं?

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अनीता सैनी: यह तो भविष्य पर ही निर्भर है।

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साहित्य लेखन के अतिरिक्त आपकी अन्य रुचियाँ क्या हैं?

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अनीता सैनी: अध्ययन एवं अध्यापन।

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अनीता जी! आपको पसन्द क्या है और नापसन्द क्या है?

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अनीता सैनी: सीधी-सादी, सहज प्राकृतिक जीवन शैली पसंद है और दोहरे मापदंड वाला कृत्रिम जीवन नापसंद है।

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आप संयुक्त परिवार में रहती हैं या अपने एकल परिवार में?

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अनीता सैनी: मैं संयुक्त परिवार में अपने सास-ससुर और बेटा-बेटी के साथ रहती हूँ और पति राजकीय सेवा में हैं।

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आप ब्लॉगिंग में कब से हैं और ब्लॉग पर आना कैसे हुआ?

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अनीता सैनी: मैं ब्लॉगिंग में मई 2018 से हूँ। 'राजस्थान पत्रिका' के साप्ताहिक अंक में एक स्तम्भ के ज़रिये ब्लॉग संबंधी विस्तृत जानकारी मिली जिसके आधार पर मैंने अपना ब्लॉग तैयार किया और तकनीकी जानकारी उपलब्ध कराने में बेटे मोहित ने भरपूर सहयोग किया।

क्या आप राजनीति में भी रुचि रखती हैं क्या?

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अनीता सैनी: नहीं।

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अन्त में पाठकों को यह भी बताइए कि आप अपने लेखन के माध्यम से समाज को क्या संदेश देना चाहती हैं?

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अनीता सैनी: लेखन हमेशा अस्तित्त्व में बना रहता है अतः परिवार,समाज, देश एवं दुनिया को मूल्याधारित विचार से जोड़ना और सकारात्मक परिवर्तन के साथ प्रकृति से प्रेम को बढ़ावा देना ही मेरा संदेश जिससे मानवीय संवेदना का सरोवर सूखने न पाये।

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तो ये थे अनीता सैनी से पूछे गये उनसे जुड़े कुछ सवाल।

आशा है कि पाठक आपके इस साक्षात्कार को पसन्द करेंगे और उनके स्पष्ट जवाबों से प्रेरणा भी मिलेगी। मैं आपके उज्जवल भविष्य की कामना करता हूँ।

धन्यवाद अनीता जी!

हार्दिक शुभकामनाओं के साथ-

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

साहित्यकार एवं समीक्षक

टनकपुर-रोड, खटीमा

जिला-ऊधमसिंहनगर (उत्तराखण्ड) 262308

मोबाइल-7906360576

Website. http://uchcharan.blogspot.com/

E-Mail . roopchandrashastri@gmail.com

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आदरणीय शास्त्री जी का तह-दिल से सादर आभार जो उन्होंने मुझ जैसी नवोदित रचनाकार को अहमियत देते हुए मेरे लेखन को विस्तृत मंच प्रदान किया और साहित्य जगत में मेरा परिचय बढ़ाया.सादर आभार सर 

Sunday, 5 April 2020

...और वह निकल गयी !

      गस्त माह की उमसभरी गर्मी में घर से बाहर निकलना अरुचिकर कार्य लगता है। शरीर में पसीना उत्पन्न करती उमस से दो-चार होना ही पड़ता है नित्य ड्यूटी पर निकलनेवालों को। पक्षी भी मानो साँस साधकर पेड़ों पर बैठे हों उमस के गुज़रने के इंतज़ार में। दोपहर तक भी सूरज बादलों में छिपा हुआ था, कभी-कभार हल्की बूँदा-बाँदी से सड़क गीली हो जाया करती थी। उस दिन प्रीति अपने बेटे को कोचिंग सेंटर से लेने पहुँची थी। कोचिंग क्लास ख़त्म हुई तो बच्चे अपने-अपने साधनों से घरों को जाने लगे। बेटे रवि ने प्रीति से जूस पीने का आग्रह किया। दोनों पास ही एक रेस्टोरेंट में जाते हैं और प्रीति दो गिलास ऑरेंज जूस ऑर्डर करती है। यही कुछ तीन-चार मिनट हुए थे कि कुछ टकराने की तेज़ आवाज़ आती है। प्रीति सहम जाती है,उसका फोन हाथ से छूट जाता है। 

"क्या हुआ?"

"मॉम आपका फोन!"

रवि ने बेंच पर ख़ाली जूस का गिलास रखते हुए कहा। 

"वो देखो! वह बाइक फिसल गयी।"

हादसे को देखकर प्रीति के होश उड़ गये। 

"बाई सा! ऐसे हादसे यहाँ दिन में दस होते हैं,आप क्यों अपना मन माड़ा कर रहा हो।"

वेटर ने गिलास उठाते हुए कहा।

"आजकल के छोरा-छोरी ऐसे ही निकलते हैं घर से। नये ज़माने की नयी सोच।"

पास खड़े एक व्यक्ति ने कहा। 

"भैया! आप आइडी देखकर घरवालो को फोन कर दीजिये। 

प्रीति ने पास खड़े एक व्यक्ति से कहा। 

"बाइक पर उस लड़के के साथ एक लड़की भी थी वह  एक दम उठी और पास गुज़रते ऑटो में बैठकर निकल गयी उसने परवाह नहीं की कि वह लड़का कैसा है?"

प्रीति ने विचलित मन से यह सवाल पास खड़े लोगों से किया।

"मॉम ! आप क्यों अपना बीपी बढ़ा रही हो। वो नहीं उलझना चाहती थी पुलिस और लोगों से,अच्छा हुआ निकल गयी।"

 रवि अपनी से प्रीति का प्रतिउत्तर देते हुए, वहाँ से चलने का आग्रह करता है

"बाई सा! आप अपनी गाड़ी साइड में कीजिए या यहाँ से निकलिए,पुलिस आ चुकी है,वे संभाल लेंगे।"

रेस्टोरेंट में काम करते एक व्यक्ति ने कहा। 

प्रीति अपने बेटे के साथ घटनास्थल से निकल चुकी थी परंतु एक कसक थी मन में, काश! वह उस बीस-बाईस साल के लड़के की मदद कर पाती। वह क्यों घबरायी भीड़ से और उसके साथ जो लड़की थी एक दम उठ कर कैसे चली गयी,इतनी आसानी से,कैसे निर्णय कर लेते हैं चुटकियों में ? वह विचारों के अंतर द्वंद्व उलझती हुई अपने बेटे से कहती है। 

"रवि! तुहें पता है, जब तुम आठ-नौ महीने के थे; मुझे ठीक से तुम्हें गोद में उठाना भी नहीं आता था तब हम भोपाल में थे। हम रात को किसी पार्टी से आ रहे थे, यही कुछ दस-ग्यारह बजे थे। तुम्हारे पापा ड्राइविंग कर रहे थे सामने अचानक नील गाय आ गयी और ब्रेक लगाने से गाड़ी का बैलेंस बिगड़ गया। उस वक़्त उन लोगों ने जिस अपनत्व से हमारी मदद की थी, मैं भुला नहीं पा रही हूँ; हमें भी ऐसे ही लोगों की मदद करनी चाहिए।"

प्रीति अपने बेटे से कहती हुई भावुक हो जाती है। 

"मॉम! मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि आप ग़लत हो परंतु आप आज भी

पंद्रह साल पहले वहीं खड़े हो और समय आगे निकल चुका है शायद आपको भी समय के साथ चलना चाहिए।"

रवि ने बड़ी गंभीरता से अपनी मॉम के सामने अपना विचार रखा।

©अनीता सैनी 



लाचारी

      हल्की बरसात के साथ ही बरसाती पानी शहर की सड़कों पर दौड़ने लगा।  यह नगर पालिका की मेहरबानी थी। फ़ुटपाथ पर प्लास्टिक के कवर में ...