Saturday, 12 September 2020

तुम्हें भुला नहीं पाई

    


    आज से लगभग दस वर्ष पूर्व मेरे पति की पोस्टिंग जयपुर कमांड हाउस में थी। हम सरकारी क्वाटर में रहते थे। उस वक़्त मेरी गुड़िया की उम्र यही कुछ दो वर्ष थी। शर्मीले स्वभाव की वजह से यह अक्सर मेरे साथ ही रहती या बालकनी में ही खेलती रहती और मेरा भी तक़रीबन समय इसके साथ बालकनी में ही बीतता।

हमारे सामने वाले क्वाटर में उतर प्रदेश के चौहान सर का परिवार रहता था।
वे भी आर्मी में  थे। शायद वक़्त का ही खेल रहा कि वे  भी हमारे जैसे ही थे। उनका भी किसी के यहाँ आना- जाना बहुत ही कम था या कहें न के बराबर ही था। अक्सर उनकी पत्नी मुझे देखर मुस्कराती और मैं उसे देखकर। इससे आगे कभी बात नहीं बढ़ी न कभी उसने नाम पूछा और न ही मैंने। जब कभी भी आमना-सामना होता बस एक हल्की मुस्कुराहट के साथ स्वागत होता। 
उनके बहुत ही प्यारे-प्यारे दो जुड़वा बच्चे थे। उनकी उम्र यही कुछ सात-आठ महीने ही रही होगी। अक्सर वे बालकनी में ही खेलते रहते थे। वे हमें देखते रहते और हम उन्हें,  यह सिलसिला काफ़ी दिनों तक ऐसे ही चलता रहा।
एक दिन शाम ढले अचानक उनके क्वाटर से चीख़ने-चिल्लाने की आवाज़ें आईं। एक-दो मिनट तक अपने आप को बड़ी मुश्किल से रोक पाई। फिर नहीं रहा गया तो क़दम ख़ुद व ख़ुद उनके क्वाटर की ओर बढ़ते गए। उस वक़्त मेरे हाथ में सिर्फ़ फोन था और मैं दौड़कर उनके दरवाज़े पर पहुँची। एक-दो बार खटखटाने पर उन्होंने दरवाज़ा खोला। 
मैंने देखा उनमें से एक बच्चा रो रहा है और एक की वह छाती दबा रही है उसने इतना ही कहा- "नहलाने के लिए टब में बिठाया था फिसलकर पानी के टब में डूब गया। मेरे हस्बेंड का फोन नहीं लग रहा है, क्या करूँ ?" 
मुझे कुछ नहीं समझ आ रहा था कि मैं क्या करूँ? जल्द ही डेक्स रुम में फोन किया और गाड़ी मँगवाई। उस बच्चे को गोद में उठाया और जल्द ही आर्मी हॉस्पिटल पहुँची।
ड्राइवर बार-बार कहता मैडम सांस चैक करो। नहीं समझ आया कैसे करूँ ?और क्या करूँ ? बच्चा रो भी नहीं रहा था, लगा जैसे गहरी नींद में सो रहा है।हिम्मत दिखा रही थी परंतु हाथ काँप रहे थे फिर सोचा इसे दूध पिलाकर देखती हूँ। उस दस-पंद्रह मिनट के सफ़र में उसने एक दो बार दूध पीने की कोशिश की मन को बहुत सुकून मिला
परंतु आर्मी अस्पताल पहुँचने पर वहाँ उन्होंने पूछा-
"बच्चा किसका है?"
समझ नहीं आया क्या कहूँ?
झूठ भी बड़ी हिम्मत से बोली और माँ के हस्ताक्षर कर दिए। कुछ समय पश्चात आर्मी अस्पताल से जेके लॉन में ट्रांसफर कर दिया गया। हिम्मत  यहाँ जवाब दे गई। तीस-चालीस मिनट का सफ़र तय करना उस दिन बड़ा भारी लगा। मैंने अपनी तसल्ली के लिए उसे सीने से लगाए रखा।
अंत में हम जेके लॉन अस्पताल पहुँचे। वहाँ पहुँचने के बाद पता चला मेरे पास पैसे नहीं है। घर से ख़ाली हाथ निकली थी। लेकिन आर्मी से होने की वजह से हमें काफ़ी महत्व दिया गया। कई जाँचें  करवानी थीं, नहीं सूझा क्या करूँ तब एक दवाइयों की दुकान पर फोन रखा और पैसे माँगे; उसने मदद भी की। पैसे  बाद में लौटाने को कहा। तब लगा अच्छे लोग भी हैं धरती पर।
कुछ समय पश्चात आर्मी से भी बहुत मदद मिली।क़िस्मत अच्छी थी, उसी दौरान विदेश से अच्छे डॉक्टर भी आए हुए थे।  
कुछ दिनों बाद हम फिर मिले।अब ख़ामोशी ने शब्द तलाश लिए थे जब कभी भी उसे देखती, गोद में उठाती तो ममता छलक पड़ती। देखते ही देखते  बालकनी ने चुप्पी तोड़ी। वहाँ उन बच्चों की चीख़ें मुझे अक्सर  पुकारतीं और मैं दौड़कर बालकनी में पहुँच जाती।
दस साल के अंतराल पर भी उनके प्रति मेरा ममत्त्व वैसे ही यादों के हिंडोले  में झूलता रहा है। मैं उन बच्चों को कभी भूल नहीं पाई। मन के एक कोने में मीठी-सी याद बन बैठे हैं वे बच्चे।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Tuesday, 8 September 2020

बैठक

    फोन पर तय हुआ बैठक का स्थान व समय। स्थान सड़क किनारे रखी बेंच, समय रात आठ बजे नगरपालिका के लैंप पोस्ट के लट्टू की रोशनी में, निगरानी रखने के लिए रखे दो पेड़। 

मनोरंजन का साधन होगी पोस्टर पर बनी कामकाजी महिला।

सुनसान सड़क शालीनमुद्रा में, साथ ही होंगे शीतल हवा के झोंके,हाँ इक्के-दुक्के तारे भी आसमान में रहेंगे।

साथ ही मौसम भी सुहावना हो, प्रकृति को भी नियमावली समझाई गई। 

नौकरशाही ने समय की पाबंदी दर्शाते हुए पाँच मिनट पहले ही पहुँचना बेहतर समझा। हाथ में सफ़ेद पेपर का बंडल कपड़े एकदम ब्रांडेड टाई-बैल्ट। हाँ बैल्ट कुछ ढीला था नौकरशाही बार-बार उसे सँभालते हुए। 

अनायास ही कुछ मच्छर भी सभा के सहभागी बनने को उतारु न चाहते हुए भी इर्द-गिर्द ही भिनभिनाते रहे। नौकरशाही मनमौजी रबैये  में तल्लीन।

तभी एक शानदार गाड़ी के साथ लालफीताशाही का प्रवेश। काले रंग का सूट हाथ में एक शाही फ़ाइल रात के अँधरे में भी शाही चश्मा जैसे बतासे से मकोड़ा बाहर निकल रहा हो।

 "समय की तल्खियाँ मेहरबान हैं जनाब हम पर आप कुछ देरी से पधारे "


नौकरशाही ने दाहिना हाथ आगे बढ़ाया। कुछ मच्छरों ने संगीत बजाया दोनों पेड़ हवा के साथ लहराए। पोस्टरवाली महिला कुछ सहमी-सी अपनी प्राकृतिक मुद्रा में आने का प्रयास करती हुई।


" समय का अंतराल ही भेद तय करता है जनाब।"


स्वागत में सजी महफ़िल का जाएज़ा लेते हुए लालफीताशाही।


"यहाँ मच्छरों के संगीत में अपनापन ज़्यादा ही बरसता दिखा।"


मच्छर आत्मग्लानि से कुछ दूर भिनभिनाने लगते हैं। पेड़ सलामी  में झुकते हुए पोस्टरवाली महिला कुछ सँभलती हुई बेंच हल्की मुस्कान बिखेरती है। सड़क अभी भी ख़ामोश है।


"सहभागिता के लिए पारदर्शिता ज़रुरी है जनाब,लोकतंत्र की यही विशिष्टता है।"


नौकरशाही ने अपनी सजगता दर्शाते हुए कहा। मच्छरों ने संगीत और तेज़ किया, पेड़ मुस्कराए और पोस्टरवाली महिला सहज मुद्रा में।


"अनुचित हस्तक्षेप पॉलिसी के अंतर्गत नहीं।"


लालफीताशाही का रुख़ लाल हुआ तब कुछ लाल फीते कसे और बाँधे गए।सड़क का सर पैरों से कुचला उसे अंबानी को सौंपा गया।बेंच को नकारा गया, पोस्टरवाली महिला से कामकाज छीना गया। हवा को कुछ हद तक लताड़ा गया और उसे निन्न्यानवे साल के लिए लीज़  पर रखा गया।

 पेड़ों की सलामी पर कुछ हद तक प्रसन्नता  दर्शाई गई। मच्छरों पर हायर एंड फायर का शख़्त नियम नियमावली में मार्क किया गया। बैठक का मंतव्य अब तक सभी की समझ से परे था।


©अनीता सैनी 'दीप्ति'

तुम्हें भुला नहीं पाई

          आज से लगभग दस वर्ष पूर्व मेरे पति की पोस्टिंग जयपुर कमांड हाउस में थी। हम सरकारी क्वाटर में रहते थे। उस वक़्त मेरी गुड़िया की उम्र ...