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Tuesday, 1 March 2022

ज्ञान सरोवर



   ” मालिक! मैं ये न समझ  पाया, आप कब हो आए? ज्ञान सरोवर!” नाथू जमीन पर सोने के लिए प्लास्टिक का त्रिपाल बिछाता है।

” सात पीढ़ियों पहले हमारे पूर्वज होकर आए, हमारे तो ख़ून में बहता है ज्ञान।”

हुक्के की गुड़-गुड़ के साथ जमींदार का सीना छह इंच और चौड़ा हो जाता है। इस वार्तालाप के साक्षी बने चाँद- तारे घुटने पर ठुड्डी टिकाए आज भी वैसे ही ताक रहे हैं जैसे वर्षों पहले ताक रहे थे।

” अब मालिक पीछला हिसाब कर ही दो, सोचता हूँ मैं भी ज्ञान सरोवर हो ही आता हूँ।”नाथू विचलित मन से जल्दी-जल्दी हाथों से तिरपाल की सलवटें निकालने लगता है।

”अरे! ऐसे कैसे हो आते हो? वो तो बहुत दूर है!”

हुक्के की गुड़-गुड़ और तेज हो जाती है।

”कितना दूर मालिक, चाँद पर तो न ही ना?”

नाथू हाथ में लिया अंगोंछा सर के नीचे लगा लेता है।

"मानसरोवर के भी उस पार, नाम सुना है कि नहीं? उससे भी कई पहाड़ी ऊपर, तुम रहने दो मर मरा जाओगे कहीं!”

काली रात में नील गायों के आने की सरसराहट सुनते हुए जमींदार ने निगाह दौड़ाई।

”अब सोचता हूँ मालिक, कब तक आपही की खींची लकीरें देखता रहूँगा। कुछ कहूँ तब आप उपले की तरह  बात पलट देते हो।”

नाथू हाथ में अंगोंछा लिए, फिर घुटनों के बल बैठ जाता है।

”फिर?”

 जमींदार प्रश्न करता है।

” फिर क्या? यों हांडी में सर दिए नहीं बैठूँगा।अपनी लकीर खींचूँगा।”

नाथू मुँह पर अंगोंछा डालकर सो जाता है। रात भर हुक्के की गुड़-गुड़ उसके कानों में गुड़कती रहती है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

16 comments:

  1. ” फिर क्या? यों हांडी में सर दिए नहीं बैठूँगा।अपनी लकीर खींचूँगा।”
    वाह !! कमाल की संवाद शैली । बहुत सुंदर सृजन ।

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    1. हृदय से आभार आदरणीय मीना दी जी आपकी प्रतिक्रिया से ऊर्जा द्विगुणित हुई।
      सादर स्नेह

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  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक चर्चा मंच पर चर्चा - 4358 में दिया जाएगा | चर्चा मंच पर आपकी उपस्थिति चर्चाकारों की हौसला अफजाई करेगी
    धन्यवाद
    दिलबाग

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    1. हृदय से आभार सर मंच पर स्थान देने हेतु।
      सादर

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  3. वाह! बहुत सुंदर रचना, अब तो ज्ञान सरोवर सबके हाथों में है, न कोई छोटा ना बड़ा सभी को गूगल बाबा का आशीर्वाद एक समान रूप से मिल रहा है

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    1. सही कहा आदरणीय अनीता दी जी ज्ञान पर सभी का अधिकार है। हृदय से आभार आपका।
      सादर

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  4. रचना को पढ कर मुन्शी प्रेमचंद की याद आती है ।

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    1. हृदय से आभार आदरणीय सर मनोबल बढ़ाती प्रतिक्रिया हेतु। शब्द नहीं हैं क्या कहूँ...।उपन्यास सम्राट - मुंशी प्रेमचंद जी के लेखन के मर्म का एक अंश में अगर मेरे सृजन में मिला धन्य हुआ मेरा लेखन। ब्लॉग पर आते रहें।
      मार्गदर्शन हेतु हृदय से आभार।
      सादर

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  5. मन मस्तिष्क को झखझोरती पोस्ट बहुत बधाइयाँ

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    1. हृदय से आभार आपका।
      सादर

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  6. 'गोदान' के 'ज़मींदार जिस तरह से ज़मीन पर सिर्फ़ अपना क़ब्ज़ा समझते हैं, किसी किसान का नहीं, उसी तरह से ज्ञान का ज़मींदार भी ज्ञान को अपनी बपौती समझता है. अगर और कोई ज्ञान की गंगा में डुबकी लगाना चाहता है तो वह अपने रौद्र रूप में आ जाता है. हर ज़मींदार 'मैं और मेरा मनसा' वाली कहानी ही दोहराता चाहता है.

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    1. सही कहा आदरणीय गोपेश जी सर ज्ञान का ज़मींदार भी ज्ञान को अपनी बपौती समझता है।
      परंतु यह गलत है। समय के साथ विचारों को भी बदलना चाहिए। प्रवर्तन को हृदय से लगाना चाहिए।
      आपकी प्रतिक्रिया हमेशा ही मेरा उत्साह द्विगुणित है हृदय से आभार आपका सर।
      आशीर्वाद बनाए रखें।
      सादर प्रणाम

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  7. अद्भुत प्रिय अनिता!आपकी कल्पना शक्ति आसाराम है, ज्ञान सरोवर जाने के माध्यम से आज नाथू ने विद्रोह का बिगुल बजा ही दिया धैर्य और ठोस भाषा में।
    चेतना का उद्भव लिए सुंदर लघुकथा।

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    1. हृदय से आभार आदरणीय कुसुम दी जी साहित्य पर आपकी पकड़ कमाल की है। संबल बनती प्रतिक्रिया हेतु अनेकानेक आभार।
      सादर स्नेह

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  8. कभी न कभी तो शुरुआत करनी ही होगी ..ज्ञान सरोवर में डुबकी लगाने का अधिकार सभी को है । बहुत सुंदर सृजन प्रिय अनीता ।

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    1. हृदय से आभार प्रिय शुभा दी जी स्नेहिल प्रतिक्रिया हृदय को ऊर्जावान बनाती है। आशीर्वाद बनाए रखें।
      सादर स्नेह

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