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Saturday, 20 August 2022

ख़ामोश सिसकियाँ

                              


                                      ”देख रघुवीर ! इन लकड़ियों के पाँच सौ से एक रुपया ज़्यादा नहीं देने वाला। तुमने कहा यह चार खेजड़ी की लकड़ियाँ हैं, यह दो की भी नहीं लगती!”

दोनों हाथ कमर पर धरे एक पैर आगे बढ़ाए खड़ा प्राइमरी स्कूल का अध्यापक व रघुवीर का छोटा भाई धर्मवीर।

”कैसे नहीं लगती दोनों जगह वाली दो-दो खेजड़ी की लकड़ियाँ हैं, पूछो सुनीता, सुमन और सजना से, हम चारों ने मिलकर इकट्ठा की हैं।”

रघुवीर चोसँगी ज़मीन में गाड़ते हुए पसीना पोंछता है।

”देख भाई!  पाँच सौ से एक रुपया ज़्यादा नहीं देने वाला,तू जाने तेरा काम जाने; अब तू यह बता सुखराम दो दिन से स्कूल क्यों नहीं आ रहा?”

धर्मवीर रघुवीर की दुःखती रग पर हाथ रखते हुए ऊँट पर बैठे सात साल के सुखराम की ओर इशारा करता है, सुखराम अध्यापक कहे जाने वाले काका को देखता हुआ दाँत निपोरता है।

”काका! काका! यह हमारे साथ भट्टे पर मिट्टी खोदने जाता है।”

तीनों लड़कियाँ एक स्वर में एक साथ बोलती हैं।

” तू इन छोरियों के जीवन से कैसा खिलवाड़ कर रहा है? पास ही के गाँव के स्कूल में दाख़िला क्यों नहीं करवाता इनका!”

पास पड़ी लकड़ियों को धर्मवीर घूम-घूमकर देखता है। ”हाँ लकड़ियाँ हैं तो मोटी-मोटी, बढ़िया है। आड़ू को क्या पता मन और पंसेरी का ?”

रघुवीर की मासूमियत पर धर्मवीर अपनी राजनीति का लेप चढ़ाता है।

”तू अपने भट्टे पर पराली क्यों नहीं काम में लेता? खेत की लकड़ियाँ मेरे भट्टे पर डाल दिया कर, मैं छोरियों के स्कूल की व्यवस्था करता हूँ। तू  निरा ऊँट का ऊँट रहा, इन्हें तो इंसान बनने दे!”

कहते हुए धर्मवीर सूरज को ताकता हुआ वहाँ से स्कूल के लिए निकल जाता है।

बापू ! बापू ! स्कूल जाना है हमें।”

सुमन, सजना मन को पसीजते हुए कहती हैं।

”दिखता नहीं ! बापू की आँख में पसीना चला गया। चल दूर हट छाँव में बैठने दे!”

बड़ी लड़की सुनीता अपने पिता रघुवीर की ओर पानी से भरा जग बढ़ाती है।

”कलियुग में कौवों का बोलबाला है। कैसे बचेंगीं चिड़ियाँ ? कौन पिता होगा जो नहीं चाहता हो कि उसकी बेटियों को पंख और खुला आसमान न मिले?”

रघुवीर घर्मवीर की ओर देखता हुआ अंगोंछा सर पर कस के बाँधता है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Monday, 15 August 2022

ठूँठ


                        रिमझिम बरसात कजरी के मीठे स्वर-सी प्रतीत हो रही थी। मानो एक-एक बूँद प्रेम में झूम रही थी। जो प्रेम में, उसके लिए बारिश प्रेमल और जिसका हृदय पीड़ा में, उसके लिए समय की मार! अपनों के लिए अपनों को दुत्कारना फिर उन्हें अपनाने की चाह में भटकना, ऐसी थी धन कौर।

”हवा के साथ बरसात भी अपना रुख़ बदल लेती है! इंसान की तो बिसात ही क्या?”

बड़बड़ाते हुए धनकोर घर की ओर बढ़ती जा रही थी।

 अधीर मन को ढाँढ़स बँधाती बारिश में भीगी ओढ़नी निचोड़ती गीता को देख अनायास ही कह बैठती है।

”गृहस्थी में उलझी औरतें प्रेम में पड़ी औरतों से भी गहरी होती हैं।”

"स्पष्ट शब्द अशिष्टता की श्रेणी में कब खड़े कर दिए जाएँ और कब गिरा दिए जाएं।" इसी विचार के साथ धनकोर के दृष्टिकोण को समझते हुए,सीढ़ियों पर बैठी गीता सूखा टॉवल उसकी ओर बढ़ाती है।

”दिमाग़ के खूंटे से विचारों की रस्सी न लपेटाकर अब कहती हूँ लौट आ, तू वह नहीं रही जो पच्चीस वर्ष पहले थी।” पश्चाताप की अग्नि में जलती धनकोर ममत्व भाव उड़ेलती, अचानक बिजली गिरे वृक्ष-सी बेटी से लिपटकर सुबकने लगती है। उम्र के इस पड़ाव पर ज़रूरत का ताक़ाज़ा देती है इसी उम्मीद के साथ कि कोंपल फिर फूट जाएगी और वृक्ष हरा-भरा हो जाएगा।

"भूल क्यों नहीं जाती घटना और घटित लोगों को?किसी एक की परवाह में उलझी दूसरे के हृदय से कब ओझल हो जाती हैं गृहस्थ औरतें, जानती हैं ना आप?”

कहते हुए- गीता के आँसू बहे, न हृदय का भार बढ़ा और न ही पीड़ा के अनुभव से स्वर में आए कंपन ने रुख़ बदला।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

स्वप्न नहीं! भविष्य था

                       स्वप्न नहीं! भविष्य वर्तमान की आँखों में तैर रहा था और चाँद  दौड़ रहा था।  ”हाँ! चाँद इधर-उधर दौड़ ही रहा था!! तारे ठह...