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Tuesday, 30 June 2020

पानी की किल्लत

 

 "प्रकृति का प्रकोप प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है,भूकंप के हल्के झटकों के साथ-साथ मुआ पानी भी पाताल की गोद में जा बैठा है।"

छत की मुँडेर पर रखे खाली बर्तन के पास बैठी एक चिड़िया ने मायूसीभरे स्वर में कहा। 

"हर किसी की जड़ें पीपल और बरगद-सी गहरी तो नहीं हो सकती ना...जो पाताल से पानी खींच सके।"

दूसरी चिड़िया की आवाज़ में व्याकुलता थी उसने आसमान को एक टक देखा उम्मीद और आग्रह दोनों आँखों की पलकों में छिपाते हुए कहा। 

  "धीरे-धीरे अब शेखावाटी में खेजड़ी का वृक्ष भी सूखने लगा है। धरती की तलहटी को छूते पानी से हम ही नहीं किसान भी व्याकुल हैं।"

पहली चिड़िया ने छज्जे की छाँव का आसरा लिया और दूसरी को आने का इशारा किया। 

"शहर और गाँव में बावड़ीयाँ तो पहले ही सूख चुकीं हैं  अब कुओं का पानी भी सूखने लगा है।"

छत के उपर से गुज़रते हुए कौवे ने खिसियाते हुए कहा। 

  "जीवन चुनौतियों से भरी गठरी को लादे रखता है वह कभी ज़मीन पर पैर ही नहीं रखता।"

दूसरी चिड़िया ने एक नज़र कौवे पर डालते हुए कहा। 

"वहीं तपती रेत पर अब ऊँट के पाँव भी जलने लगे हैं, छाले उभर आए हैं पैरों में उसके,उसकी कूबड़ सिकुड़-सा गया है।"

दोनों चिड़ियों ने पास रखे गमले में पानी के लिए चोंच मारी पानी तो नहीं था परंतु मिट्टी गीली होने से वहीं बैठ गई। 

"गड़रिये के पास छाँव के नाम पर कोरा आसमान है कुछ बादल के टुकड़े हैं जो कभी-कभार ही उसके साथ चलते हैं।"

पहली चिड़िया ने मन हल्का करते हुए कहा। 

"पेड़-पौधे भी सूख चुके हैं। मरुस्थल पैर पसार रहा है। भेड़-बकरियाँ अब मिट्टी को  सूँघती नज़र आतीं हैं। हर किसी का जीवन ठहरा-सा लगता है। नहीं ठहर रहा तो धरती की गोद में पानी और हुकुम का कभी आठ तो कभी शाम चार बजे बातें बनाना।"

एक तीसरी चिड़िया गमले में अपनी जगह बनाने का प्रयास करते हुए कहती है। 

©अनीता सैनी 'दीप्ति'



Friday, 26 June 2020

किशोरावस्था का आरंभिक चरण



       "भाई तुझे पता है! कुछ दिन पहले की ही ख़बर है। कोटा में नौवीं कक्षा  के एक छात्र ने पबजी के चक्कर में सुसाइड कर ली।"
भानु मूवी के बीच में माधव को टोकते हुए कहता है। 


"यार तुझे घर पर ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए। मेरी माँ हिटलर है।"
माधव हड़बड़ाते हुए भानु को चुप्पी साधने की हिदायत देता है। 

"भाई उसके पापा आर्मी में थे।"
भानु ने मायूसी से मुँह बनाते हुए कहा। 

"मुझे पता है यार, मैंने उसी दिन देख ली थी यह न्यूज़ ...तुझे प्रॉब्लम है तो भाई दिल्ली चला जा, सरकार इलाज भी कर रही है।"
माधव बार-बार भानु का मुँह बंद करने का प्रयास कर रहा था। 

"भाई लास्ट क्वेश्चन, क्या फोन को खिलौना बनाना ठीक है जिओ  को फ्री ही क्यों किया ?"
भानु माधव के ओर पास खिसकता है,ठुड्डी के हाथ लगाए एक टक माधव को घूरता है,अपने प्रतिउत्तर की प्रतीक्षा में। 

"यह प्रश्न मोदी जी और अम्बानी से कर ना यार, यहाँ मत कर मेरी माँ मुझे गेम छोड़ मूवी भी नहीं देखने देगीं।"
माधव सोफ़े से उठता हुआ भानु पर झुँझलाता है। 

"भाई सुन ना...।" 
भानु सभी प्रश्न एक ही सांस में गटक जाता है। 

राधिका रुम से सटी बालकनी में गमले की मिट्टी ठीक कर रही थी। 
अचानक उसके हाथ वहीं रुक जाते  हैं। 

-अनीता सैनी 'दीप्ति'

Saturday, 20 June 2020

प्रतीक्षा

    जैसे धूप से झुलसता आसमान धरती के लिए छाँव तलाशता दौड़ता हो वैसे ही सुमन दौड़कर आई और हाथ में टूटी चप्पल लिए सुरभि के सामने खड़ी हो गई। 

"मुझे पैसे नहीं दीदी काम चाहिए।"

सुमन अपनी टूटी चप्पल का फीता अँगूठे से दबाते हुए झट से ठीक करती है। लुगड़ी से हाथ पोंछती हुई  सफ़ाई का प्रमाण-पत्र देते हुए कहती है -

"कल ही ख़रीदी थी मैंने मेले से पूरे अस्सी रुपए की हैं। 

अच्छी हैं न...,चलताऊ नहीं हैं। फैंसी हैं न..., कम ही चलतीं हैं।"

सुमन ने अपनी टूटी चप्पल की ख़ामी फट से छिपा ली। 

सुमन  एक सांस में कितना कुछ कह गई सुरभि उसका चेहरा ताकती रही। 

"ऐसे वक़्त में मैं तुझे क्या काम दे सकती हूँ तुम भी कम ही बाहर निकला करो।"

कहते हुए सुरभि आगे क़दम बढ़ाती है। 

"आपकी पड़ोसन ने कहा था गेहूँ साफ़ करवाने हैं आपको।"

तेज़ आवाज़ में पुकारते हुए सुमन ने आत्मविश्वास के साथ लंबी उसाँस भरी। 

"वो तो है परंतु में पाँच सौ रुपये ही दूँगी।"

सुरभि विनम्रता से कहते हुए,पलटकर वहीं खड़ी हो गई। 

"नहीं दीदी मैं पूरे तीन सौ रुपये लूँगी दो दिन लगेंगे दो बोरी बीनने में। "

सुमन ने चेहरा ऐसे बनाया जैसे उससे समझदार इस धरती पर और कोई नहीं। 

"तुम्हें पता है तीन सौ रुपये कितने होते हैं?"

सुरभि ने उसकी मासूमियत को एक पल में छलना चाहा।

"क्यों नहीं जानती जब मेरा मर्द कार्तिक मास में ले गया था मुझे खेत पर काम करवाने तब दो महीने बाद मायके छोड़ गया था पूरे तीन सौ रुपये थमाये थे उसने मेरे हाथ में।"

उसके चेहरे पर सुकून था। भावविभोर हो गई थी वह  बीते समय को समेटते हुए। उसके पास सुनाने को बहुत कुछ था परंतु सुननेवाला कोई नहीं था। 

"तब तुम मज़दूरी क्यों करती हो पति है, घर है और ज़मीन भी है। अपने खेत पर काम करो यों क्यों घूमती हो?"

सुरभि ने उसे फटकारते हुए, कुछ समझाते हुए कहा। 

"वो छोटी बहू की चलती है न घर में।  गाय का गोबर डालती हूँ तब तसला छीन लेती है। रोटी बनाती हूँ तब बेलन छीन लेती है। सास-ससुर के चहेते बेटे-बहू है वो मान-सम्मान भी उन्हीं के हिस्से में हैं। कहते हैं तेरा ख़सम कमाता नहीं है।"

कहते-कहते उसका दर्द आँखों से छलक पड़ा। 

सतरह-अठारह साल की बच्ची पीड़ा ने जैसे उसका गला ही दबा दिया हो। आज उसके हृदय पर सुकून था। किसी ने उससे इतने स्नेह से बात की ही नहीं ,

ज़िंदगी से फटकार अपनों से अकाल के जैसी मार मिली थी उसे। 

"अब कभी नहीं जाओगी ससुराल?"

चलते-चलते सुरभि ने एक प्रश्न और उसके हाथ में थमा दिया।

"क्यों न जाऊँ ससुराल साल में दो बार जाती हूँ और वह मुझे लेने भी आता है जब खेत पर खलिहान का काम ज़्याद होता है तब। मेरे सिवा उसका हाथ बँटानेवाला और है ही कौन है? मेरा मर्द बहुत भोला है। ससुराल वालों ने कितनी बार कहा सुमन को छोड़ दे,चप्पल तक  ठीक से नहीं पहननी आती उसे परंतु उसने मेरा साथ नहीं छोड़ा। जैसे-तैसे करके समय निकल जाए फिर आएगा वह मुझे लेने, मैं प्रतीक्षा में हूँ उसकी।"

सुमन कल आने के वादे के साथ उम्मीद समेटे आँचल में वहाँ से चली गई और छोड़ गई एक गहरी कसक। 

-अनीता सैनी 'दीप्ति'

Monday, 8 June 2020

कुछ प्रश्न

   पहली बार किसी सैनिक को ससम्मान उसके घर छोड़ने गया था।  घुटन अभी भी धड़कनों से रिस रही थी। सांसें स्वयं से द्वंद्व करतीं  नज़र आईं। सफ़र में कुछ पल ठहरे थे एक जवान के घर। 

वहीं से कुछ प्रश्न ज़ेहन में खटक गए। 

 अंतरद्वंद्व  के चलते आख़िर बैठे-बैठे मैं  पूछ ही बैठा-

"तुम्हारी पत्नी के हाथ में चूड़ियाँ नहीं थीं। 

मैंने हृदय की व्याकुलता अपने साथी सैनिक के सामने परोसी।

उसने कहा -

"हालात ने छीन लीं।"

और वह मुस्कुराया।

"उसका चेहरा भावशून्य था।"

मैंने अपनी ही सांस गटकते हुए कहा। 

उसने कहा -

"समय की धूप ने सोख लिए ।"

वह एकटक उसकी फोटो निहार रहा था। 

"उसकी चाल में लचक, पैरों में पायल की खनक नहीं थी।"

मैंने उसका हृदय टटोलते हुए कहा। 

उसने कहा -

"उसने किसी अपने को अर्पणकर दी।"

और उसकी आँखें नम हो गईं। 

"उसकी मुस्कान दिखावा लगी शब्द लड़खड़ा रहे थे।"

मैंने शब्दों से गहरा वार किया।

उसने कहा -

"वह दिखावा मेरे लिए था, बिखरे शब्द ही बीनता हूँ मैं।"

उसने गर्दन पीछे  सीट पर टिकाई और सीने की घुटन वहीं पी गया। 

"तुम इतने ख़ुश कैसे रह सकते हो उसके साथ?"

मैंने उसके सब्र पर व्यंग्यपूर्ण तीक्ष्ण प्रहार किया। 

उसने कहा -

" इसलिए कि वो आज भी मेरे इंतज़ार में जी रही है।"

उसने अपनी सांसों में एक राज़ दबा लिया देखते ही देखते उसने एक मासूम को अपनी वर्दी में छिपा लिया।

-अनीता सैनी 'दीप्ति'


Sunday, 7 June 2020

शब्दजाल में उलझे भाव

  "चाय पूछे न पानी ऊपर से चिलचिलाती धूप तू ही बता महतो यह  कैसी मीटिंग?" 

रघुवीर अपने पास बैठे व्यक्ति से पसीना पोंछते हुए कहता है। 

"अरे! काका ठहरो, कुछ बड़े नेता आने वाले हैं आज।   

 शहर में आवारा पशुओं पर हो रहे अत्याचार को देखते हुए जागरुकता अभियान पर मीटिंग है।" 

महतो अपने सफ़ेद कुर्ते की सलवटें निकालता हुआ कुछ अकड़कर कहता है। 

"बात तो ठीक ही कहते हैं नेता लोग, हम जैसे अनपढ़ों की बुद्धि में  बैठती कहाँ है उनके जैसी राजनीति।"

रघुवीर मुँह पर हाथ फेरता इधर-उधर देखते हुए कहता है।  

"काका तुम कुछ समझो न समझो बस गर्दन को इस तरह घुमाना कि तुमसे समझदार कोई दूसरा व्यक्ति नहीं।"

महतो अपने साथ लाए पाँच-दस सदस्यों को धूप में और अधिक देर तक टिके रहने के लिए हिम्मत बँधाता है। 

"बात तो सौ  टका खरी कही तूने महतो,भला गर्दन घुमाने में हमारा क्या जाता है।"

पास बैठे एक व्यक्ति ने ठहाके के साथ महतो का समर्थन करते हुए कहा। 

"भाई ये नेता और मीडिया वाले पता नहीं क्या खाते हैं?

 आँखों के सामने हो रहे कुकृत्य पर मन द्रवित नहीं होता, इनके कहे शब्दों से दस दिन तक दिमाग़ ठनता है,

 मुझ जैसा अनपढ़ भी विचार करने  बैठ जाता है इनके कहे शब्दजाल पर।"

रघुवीर चारों तरफ़ निगाह दौड़ाते हुए वहाँ से निकलने की कोई जुगत लगाता है हुक्के चिलम के बिना वह ज़्यादा देर ठहर नहीं सकता।

"अरे! भाई मैं तो चला तेरे नेता लोग पता नहीं आएँगे कि नहीं परंतु तेरी काकी जरुर आ जाएगी खरी-खोटी सुनाती हुई।"

रघुवीर वहाँ से खिसक लेता है। 

"डेढ़ सौ रुपए की सब्ज़ी ख़रीदी...धनियाँ, मिर्ची डालते हुए भी नाटक!

घोर कलयुग...! इंसान ही इंसान को खाएगा!"

दोनों हाथों में सब्ज़ी से भरे पॉलीथिन के बैग थामें  बड़बड़ाते हुए रघुवीर घर पर आता है। 

"यही जगह मिली थी बैठने के लिए पूरे जहान में तुझे,

दिनभर डोलती है पॉलीथिन चबाती हुए बैठेगी आख़िर मेरी दहलीज़  पर,

गायों की हालत दिन व दिन बद से बदतर होती जा रही है।"

रघुवीर गाय को डंडा मारते हुए दहलीज़ से हटाता है। 

"बालों के साथ-साथ बुद्धि भी झड़ गई क्या आपकी, गौमाता पर कोई ऐसे झुंझलाता है ?"

सब्ज़ी से भरा पॉलीथिन का बैग हाथ में लेते हुए रघुवीर की पत्नी कहती है। 

"अरे! बहू से कहो रोटी हिसाब से बनाए, इस तरह आवारा पशुओं के सामने फेंकने से क्या फ़ाएदा।"

रघुवीर पत्थर पर पड़ी रोटियों को देखते हुए कहता है। 

"आप ही कहो, आपने क्या मुँह सिल रखा है?"

पति-पत्नी दोनों बातों में उलझते हुए  घर के अंदर जाते हैं। 

"अरे! बेटा एक कप कड़क अदरक की चाय पिला दे।"

कहते हुए रघुवीर कुर्सी पर बैठता है और टीवी चलाता है। 

"अरे! क्या हो गया है देश दुनिया को पशुओ पर निर्मम अत्याचार!"

पीड़ा का भाव चेहरे पर लिए रघुवीर एक टक टीवी स्क्रीन पर नज़र गढ़ाए हुए  कहता है। 

-अनीता सैनी 'दीप्ति'

टूटती किरण

                "जीजी! एक कप चाय के बाद ही बर्तन साफ़ करुँगी।” दरवाज़े के पास अपना छोटा-सा बैग रखते हुए किरण संकुचित स्वर में कहती है। ”...