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Tuesday, 29 June 2021

गठजोड़

         




        ”इसे संदूक के दाहिने तरफ़ ही रखना।”
शकुंतला ताई अपनी छोटी बेटी बनारसी से कहतीं हैं।
हल्का गुलाबी रंग का गठजोड़ जिसमें न जाने कितनी ही गठानें  लगा रखी हैं । देखने पर लगता जैसे इसमें कोई महँगी वस्तु छिपाकर बाँध रखी हो।जब कभी भी शकुंतला ताई की बेटियाँ उनके संदूक का सामान व्यवस्थित करती हैं  तब ताई आँखें फाड़-फाड़ कर उस गठजोड़ को देखती और देखती कि दाहिने तरफ़ ही रखा है न।


”माँ! पिछले चालीस वर्ष से सुनती आ रही हूँ, दाहिने तरफ़ रखना... दाहिने तरफ़ ही रखना, कोई पारस का टुकड़ा है क्या इसमें ?”
बनारसी संदूक के ढक्क्न को ज़ोर से पटकती हुई कहती है और चारपाई पर ताई के पास आकर बैठ जाती है।
विचार करती है कुछ तो माँ ने इस गठजोड़ में बाँध रखा है, हाथ में लेने पर भारी भी लगता है।चाहकर भी वह अपनी माँ से पूछ नहीं पाती है।
सोचती है माँ के बाद सब मेरा ही तो है।


”पाँच मुसाफ़िरी कीं थी तुम्हारे बापू ने इराक़ की, उसके बाद नहीं आया; देख ज़रा पाँच गठानें ही हैं ना।”
शकुंतला ताई बेटी को हाथ का इशारा करती हुई कहतीं हैं।
स्मृतियों के वज़न से हृदय का भार बढ़ जाता है। रुँधा गला सांसों को रोक लेता है, नथुने फूल जाते हैं, सूखी आँखों से बहती पीड़ा चेहरे  की झुर्रियों में खो जाती है।


”हाँ पाँच ही गठानें हैं।”
बनारसी अपनी माँ से कहती है 

अचानक गठजोड़ का वज़न बनारसी को और भारी  लगने लगता है।

@अनीता सैनी 'दीप्ति' 

Friday, 25 June 2021

फ़ख़्र



                          ”आतंकी मूठभेड़ में दो भारतीय जवान शहीद हुए। हमें फ़ख़्र है अपने वीर  जवानों पर जिन्होंने मातृभूमि के लिए अपने प्राण न्यौछावर किए। ऐसे वीर योद्धाओं के नाम इतिहास के सुनहरे पन्नों में लिखे जाएँगे साथ ही आनेवाला समय हमेशा उनका क़र्ज़दार रहेगा।”


टी.वी. एंकर की आवाज़ में जोश के साथ-साथ सद्भावना  भी थी।
आठ वर्ष की पारुल टकटकी लगाए टी.वी देख रही थी कि अचानक अपनी माँ की तरफ़ देखती है।

”तुम्हें फ़ख़्र करना नहीं आता।”

कहते हुए -
स्नेहवश अपनी माँ के पैरों से लिपट जाती है।


”नहीं!  मैं अनपढ़ हूँ ना।”
कहते हुए मेनका अपनी ही साँस गटक जाती है।


” तभी ग़ुस्सा आने पर मुझे और भाई को मारती हो?”
पास ही रखे लकड़ी के मुड्डे पर पारुल बैठ जाती है।


”वो तो मैं... ।”
कहते हुए मेनका के शब्द लड़खड़ा जाते हैं ।
चूल्हा जलाने के लिए लकड़ी तोड़ ही रही थी कि हाथ वहीं रुक जाते हैं और अपनी बेटी की आँखों में देखने लगती है।


”गाँव में सभी ने एक दिन फ़ख़्र किया था ना, तुम उनसे क्यों नहीं सीखती?”
निर्बोध प्रश्नों की झड़ी के साथ पारुल चूल्हे में फूँक देने लगती है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Tuesday, 22 June 2021

कद्दू


       

              ”पुष्पा तुम ने तो प्रताप को चोखी पट्टी पढ़ाई।”

कहते हुए-

 रेवती दादी अपनी चारपाई पर बिछी चादर ठीक करने लगती है। 

नब्बे का आंकड़ा पार करने पर भी पोळी के एक कोने में अपना डेरा जमाए हुए कहती है- 

”घर में दम घुटता है”

चारपाई के नीचे रखी एक संदूक जिसमें पीतल का बड़ा-सा ताला जड़ा है। दो लोहे के पीपे जो देखने पर आदम के ज़माने के लगते हैं।

”अब के भूचाल आग्यो।"

पुष्पा खीजते हुए कहती है।

अपने कमरबंद को ठीक करने के साथ-साथ चोटी को पल्लू से छिपा लेती है।कही दादी-सास इस पर न कुछ नया सुना दे।

”अरे बावली ! सात पिढ़ियाँ की नींव रखी है तुमने और कद्दू की सब्ज़ी अकल के खेत में रख्याई। कह तो कोई हलवा पूरी जिमाव।”

कहते हुए -

दादी खिड़की में रखे अपने बर्तनों को निहारती है।

सोने से दमकते पीतल के बर्तन आज भी अपने हाथों से साफ़ करती है।विश्वास कहाँ किसी पर कोई अच्छे से न साफ़ करें।

”ढोक दादी-बूआ।”

एक बीस-बाइस वर्ष का नौजवान पैर छूता है।

”दूदो नहाव पूतो फलो।”

कहते हुए-

 रेवती दादी की आँखें भर आईं। बार-बार उसका हाथ अपने हाथ में लेकर सहलाती है वह नौजवान उठने का प्रयास करता है परंतु उठ नहीं पाया। साथ ही तेवती दादी का कलेजा मुँह को आ गया।

”पूरा ! तुम लोगो ने आँगन के टुकड़े तो कोनी करा न और बा खेजड़ी उठे ही खड़ी है न, कुएँ में पाणी तो ख़ूब है ना।”

आशीर्वाद के साथ-साथ स्नेह की बरसात कुछ यों हुई।

 रेवती दादी का कोमल स्वभाव आज ही सभी ने देखा।

”हाँ सब सकुशल है बूआ जी।”

कहते हुए-

लड़का बैग से पानी की बॉटल निकलकर पीने लगता है।

”पूरा ! अपणे कुएँ को पाणी।”

और वह खिलखिला उठती है।

रेवती दादी ने झट से पानी की बॉटल हाथों में ले पल्लू से छिपा लेती है और ठंडा पानी अंदर से लाने का इशारा करती है।

 और फिर वह लड़का अपने साथ लेकर आया सामान बैग से बाहर निकालता है कुछ मिठाई के डिब्बे और फ़्रूट के साथ एक बड़ा-सा कद्दू ।

”बड़ी माँ ने भेजा है आपके वास्ते, अपणे कुएँ का है।”

लड़का बड़े ही सहज स्वभाव से कहता है।

अब रेवती दादी लड़के का हाथ छोड़ कद्दू को सहलाने लगती है।

”मायके का तो उड़ता काग भी घणा चोखा होव है।”

कहते हुए -

मायके की तड़़प रेवती दादी के कलेजे से आँखों में छलक आई।

और कद्दू को सिहराने रख  बिन माँ की बच्ची की तरह भूखी ही सो गई।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Monday, 22 March 2021

दर्पण



                               ”लगता है सैर पर निकले हो?” 

कहते हुए, मंदी का चश्मा फिसलकर नाक पर आ गया । मोटी-मोटी आँखों से दूध और ब्रेडवाले को घूरने लगी।

”नहीं कॉलोनी की गलियों में दूध और ब्रेड की महक फैलाने निकले हैं, दिख नहीं रहा तुम्हारी अक्ल पर पत्थर पड़े हैं क्या?”

दूध और ब्रेडवाले का स्वर एक साथ गूँजा,तंज़ था आवाज़ में।

”तभी मैं जानू, गोल-गोल क्यों घूम रहे हो!”

तंज़ से अनभिज्ञ, मंदी ने चश्मा नाक पर सटाया,होंठों को पपोलते हुए छड़ी उठाने का प्रयास भी विफल रहा, उठ न सकी फिर वहीं बैठ गई।

” नित नई नीतियों ने निवाला छीन लिया! मरे को और मारने की ठानी है?”

बैंच के पास ही दाना चुगते सरकारी शहरी कबूतरों की गुट-रगूँ मंदी के कानों में पड़ती है।

”हाय! जहाँ देखो  वहीं मेरे ही चर्चे, कमर ही तो झुकी है;  टूटी तो नहीं ना।

 फटेहाल ही सही कुछ कपड़ा तो बचा है तन पर।”

स्वयं के चर्चे पर मुग्ध अपनी बलाएँ लेने लगी। बैंच के इस कॉर्नर से उस कॉर्नर तक खिसकती हुई,मुस्कान फैलाए।

” अख़बार! अख़बार!! अख़बार!!!।”

बंदर ने अपने ही अंदाज़ में आवाज़ लगाई,अख़बार मंदी की ओर बढ़ाया,उसने एक हाथ से छड़ी दूसरे में अख़बार उठाया।  

”लॉक डाऊन के दौरान भारी मंदी की मार साथ ही बिलायती बबूल के पत्तों की  पूँजी छत्तीस प्रतिशत बढ़ी।”

 लो! जामुन के पेड़ पर चमेली का फूल!

अख़बार की ख़बर पढ़ मंदी की आँखों पर अविश्वास छाया।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Monday, 8 March 2021

दृष्टिकोण

 


       ममा इसके चेहरे पर स्माइल क्यों नहीं है?” वैभवी ने बेचैन मन से अपनी मम्मी से कहा।

”बनाने वाले ने इसे ऐसा ही बनाया है।” वैभवी की मम्मी ने उससे कहती है। 

”उसने इसे ऐसा क्यों बनाया?”  पेंटिग देखते हुए वैभवी और व्याकुल हो गई।

”यह तो बनाने वाला ही जाने, उसकी पेंटिंग है।” वैभवी की मम्मी ने बहलाते हुए कहा।

”पेंटर को दोनों लड़कियों के चेहरों पर स्माइल बनानी चाहिए थी ना?”

वह एकाग्रचित्त होकर और बारीकी से पेंटिंग को देखने लगी।

”पेंटर जब मिलेगा तब कहूँगी, इसके चेहरे पर भी स्माइल बनाए।” उसकी मम्मी ने झुँझलाकर कहा।

”आपको तो कुछ नहीं पता ममा! इस लड़की की शादी बचपन में हो गई थी। 

ऐसी लड़कियाँ कभी स्माइल नहीं करती।"

यह सुनकर वैभवी की माँ अपनी लाड़ली का चेहरा विस्फारित नज़रों से निहारती रह गई!
 
@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Sunday, 7 March 2021

असहजता

 


                ”कल सिया का जन्मदिवस है।” 

शीला अपने यहाँ काम पर आने वाली पूर्वा से कहती है।

”जी बच्चों को साथ लिए आती हूँ फिर ?”

पूर्वा साड़ी के पल्लू से हाथ पोंछती हुई कहती है।

”हाँ देख लो! वैसे ठीक ही है, मेहमान ज़्यादा होंगे।”

शीला बालों को झाड़ते हुए टॉवल से बाँधती हुई कहती है।

”अरे! छोड़, पल्लू क्यों चबा रही है? कहा है न जीजी ने, कल तुझे भी आना है।”

पूर्वा अपनी  बेटी के मुँह से साड़ी का पल्लू खींचती हुई दोनों हाथों से पकड़कर सीने से लगा लेती है।

” कल तुझे लाल वाली फ्रॉक पहनाऊँगी! चल अब बरामदे में बैठ, मैं आती हूँ।”

पूर्वा बेटी का माथा चूमते हुए फिर अपने काम में उलझ जाती है।

” हाँ, परंतु ध्यान रहे पिछली बार इसने तीन प्लेटें तोड़ डालीं  थीं, इस बार ऐसा न हो।”

शीला हिदायत देते हुए हॉल से बाहर, गार्डन में आकर बैठ जाती है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


Sunday, 28 February 2021

हाँ, डायन होतीं हैं !


         ”डायन होतीं हैं। हाँ, धरती पर ही होतीं हैं। अब बस उनके बदन से बदबू नहीं आती। बदसूरत चेहरा ख़ूबसूरत हो गया और न ही उनके होठों पर अब लहू लगा होता है। दाँत टूट चुके हैं। देखो! उनके नाख़ुँन घिस गए।  तुम्हें पता है, पता है न, बोलो! अरे बोलो न!! तुमने भी देखा है उसे ...?”

वह कमरे से बाहर दौड़ती हुई आई,घबराई हुई थी आँखों में एक तलाश लिए, पास खड़ी संगीता से पूछ बैठी।

न चेहरे पर झुर्रियाँ , न फटे कपड़े: पागल कहना बेमानी होगा। तेज था चेहरे पर, उम्र चालीस-पैंतालीस से ज़्यादा न दिखती थी। दिखने में बहुत ही सुंदर और शालीन थी वह।

”हाँ, होतीं  हैं जीजी! हमने कब मना किया, चलो अंदर अब आराम करो। लगन के बाद गुड्डू को हल्दी लगानी है। आपके बिन शगुन कैसे पूरा होगा? चलो-चलो अब आराम करो।”

दुल्हन की माँ उन्हें अंदर कमरे में ले जाती है।

इस वाकया के बाद माहौल में काना-फूसी होनी स्वभाविक थी। सभी की निगाहें उस बंद कमरे की तरफ़ थीं।

”कौन थी ये?”

संगीता ने पास बैठी एक महिला से दबे स्वर में पूछा।

”होने वाली दुल्हन की बूआ-सा हैं। सुना है इनके पति आर्मी में कोई बड़े पद से रिटायर्ड थे और बेटा भी आर्मी में कोई बड़ा ही अधिकारी था।”

महिला ने एक ही सांस में सब उगल दिया।

”नाम क्या था?”

संगीता ने बात काटते हुए कहा।

”नहीं पता! यही सुना बहु ने शादी के चार-पाँच महीनों में दोनों बाप-बेटे की कहानी ख़त्म कर, तलाक लेकर विदेश चली गई। बेटे ने रिवॉल्वर से ख़ुद को शूट कर लिया। पिता बेटे का ग़म सह न सका, कुछ दिनों बाद उसने भी आत्महत्या कर ली।”

महिला ने बड़े ही सहज लहज़े  में कहा, कहते हुए साड़ी और गहने ठीक करने में व्यस्त हो गई, अचानक कहा-

”वेटर कॉफ़ी।”

महिला ने कॉफी उठाई और चुस्कियों में डूब गई।

 वह बंद दरवाज़ा छोड़ गया मन में एक कसक कि क्या डायन होतीं हैं?


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Friday, 12 February 2021

पर उपदेश कुशल बहुतेरे

     


           सावन महीने के दूसरे सोमवार की घटना है, संजू और उसकी सास उस रोज़ सुबह-सुबह शिवालय में जल चढ़ाने जातीं हैं। एक दिन मंदिर में पार्वती माँ उनको मिलती हैं, कॉलोनी की औरतें उन्हें इसी नाम से पुकारतीं हैं।

     ”आ बैठ ममता! मंदिर में कुछ देर ठहरने से मन्नतें पूरी होतीं हैं, कुछ देर प्रभु की शरण में बैठना भी सुकून दे जाता है। देखो! तुम्हें  कहना ठीक तो नहीं लगता, अपनी है सो कह देती हूँ।”

मंदिर की सीढ़ियों पर पार्वती माँ के साथ संजू और उसकी सास बैठ जातीं हैं।

   ”उस रोज़ तुम्हारे घर की चाय पी थी।”

पार्वती माँ कुछ ठहर जातीं हैं।

   ”अरे वो! बहू ने बनाई थी, बड़ी अच्छी चाय बनाती है म्हारी संजू।”

संजू की सास चहकते हुए कहती है।

   ” वो तो ठीक है परंतु मैं यों कहूँ, उसमें जले दूध की गंध आ रही थी; यों दूध जलाना-उफानना ठीक नहीं।मान्यता है कि शुभ नहीं होता।”

पार्वती माँ दान में मिले सीदे की पोटली अलग-अलग करतीं हुईं  कहतीं हैं।दोनों सास-बहू के माथे पर अपमान की सलवटें उभर आईं।

   ”ठीक है फिर चलते हैं, पार्वती माँ फिर कभी फ़ुरसत में बात करेंगे।”

संजू की सास उठने का प्रयास करती है।

   ”अरे नहीं! बैठ तो ज़रा।”

पार्वती माँ हाथ पकड़कर संजू की सास को वहीं बैठाती है।

   ”देख घर की बात है तब कहूँ, घर में चप्पलें ठीक तरह तरतीब से रखी रहनी चाहिए और चप्पल पर चप्पल बड़ा अपशकुन होता है, देख! पायदान को रोज़ झाड़ें और दहलीज़ पर हल्दी-कुमकुम के छींटे दिया कर। एक और बात

बहू को थोड़ा रोकती-टोकती रहा कर, रसोई में बर्तनों की ज़्यादा आवाज़ ठीक नहीं। बहू सुशील है परंतु कुछ संस्कार भी हों तो सोने पे सुहागा।”

अब पार्वती माँ के कलेज़े का भार कुछ कम हुआ और वे अपने आपको हल्का महसूस करने लगी, लंबी और चैन की सांस भरी।एक पल के लिए,

संजू और उसकी सास का मन भारी हो गया। दोनों के पैरों को जैसे जड़ों ने जकड़ लिया हो। संजू ने सोचा यह एक बार घर आई और पूरा निरीक्षण का पिटारा हमारे ही सामने खोल दिया। सास जिस बहू की तारीफ़ करते नहीं थकती, कॉलोनी में अब क्या कहेगी?

     ” पहले पहर ही मंदिर में आकर बैठ जाओ, कुछ देर बच्चों को भी सँभाल लिया करो।”

पार्वती माँ के बेटे की बहू हवा की तरह आती है और बच्चे को उसकी  गोद में थमा उसी गति से वापस चली जाती है। तीनों उसका मुँह ताकतीं रह जातीं हैं।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Monday, 8 February 2021

समझ का सेहरा

     


                     

                       ”आप क्या जानो जीजी, पीड़ा पहाड़-सी लगती है जब बात-बात पर  कोई रोका-टाकी करता है।”

पिछले काफ़ी दिनों से राधिका की जुबाँ पर यही बस यही शब्द कथक कर  रहे होते हैं। उसे देखकर लगता काटो तो ख़ून नहीं।

”अनसुना क्यों नहीं करती? क्यों दिल पर लेती है? तुम्हारे पति की आदत है।सास-सुसर बुज़ुर्ग  हैं।”

बदले में नीता का यही एक उत्तर राधिका को मिलता परंतु न जाने क्यों आज वह तमतमा गई।

”आप क्या जानो मेरे हृदय की पीड़ा, घूँघट में सभी बीनणीया बढ़िया दिखतीं हैं चेहरा तो घूँघट उठाने पर दिखता है।”

ग़ुस्से से तमतमाया राधिका का चेहरा लाल पड़ चुका था, इतने ग़ुस्से में वो कभी न होती थी।

”जीजी! आपको रोकने-टोकनेवाला कोई नहीं है कि क्या बना रही हो? और क्या नहीं बनाओ? पति और सास-ससुर आपके कहे अनुसार चलते हैं आप कभी नहीं समझोगी  मेरी पीड़ा।”

राधिका आपे से बाहर हो आग-बबूला हो गई। इस समय नीता ने राधिका से ज़्यादा  वाद-विवाद करना ठीक नहीं समझा।

”तुम्हें फ़ीवर होता है तब तुम्हारे पति ही चाय बनाते होंगे और सास खाना, डॉ. के पास भी ले जाते होंगे?”

नीता आराम से राधिका से पूछती है।

”दायित्त्व है उनका और कौन करेगा? मैं फ़ीवर में काम क्यों करूँ?”

राधिका बेपरवाही में सिमटी अभी भी होश में नहीं थी।

” और तुम्हारा दायित्त्व ?"

नीता जल्द ही अपने शब्दों को बदलने का प्रयास करती है और कहती है -

” तुमने ठीक कहा, मैं नहीं समझूँगी क्योंकि मुझे कोई नहीं है यह कहने वाला कि आज तुम आराम करो तुम्हें फ़ीवर है,मैं चाय बनाता हूँ, आज बच्चों के स्कूल में, मैं ही चला जाता हूँ। कोई नहीं है ये कहने वाला कि माँ-बाबा की दवाई आज मैं ले आता हूँ। आज की ज़रूरतों को कल पर डालना कुछ भारी तो लगता ही होगा? परंतु तुम ठीक कहती हो मैं नहीं समझूँगी क्योंकि मैं तुम्हारी जगह नहीं हूँ।”


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


Thursday, 4 February 2021

परिवर्तित परिवेश

                    


                ”बड़ी बहू कहे ज़िंदगीभर कमाया, किया क्या है? एक साइकिल तक नई नहीं ख़रीदी।”

बग़लवाली चारपाई पर ठुड्डी से हाथ लगाए बैठी परमेश्वरी अपने पति से कहती है।

”जब हाथ-पैर सही-सलामत तब गाड़ी-घोड़ा कौ के करणों।”

निवाला मुँह में लेते समय हाथ कुछ ठनक-सा गया, हज़ारी भाँप गए कि बहू दरवाज़े के पीछे खड़ी है और समझ गए अगले महीने होने वाले रिटायरमेन्ट पर उठनेवाले बवाल की लहरें हैं।

”मुझे तो समझ न थी, आप तो कुछ करके दिखाता बेटे-बहूआँ णा; जिणो हराम कर राखौ है। कहती है- के करौ  जीवनभर की कमाई को; आँधा पीसो कुत्ता खायो।”

परमेश्वरी पति की थाली में एक और रोटी रखती है, छाछ का गिलास  हाथ में थमाते हुए कहती है।

”घर आने से पहले इतनी हाय-तौबा, सोचता हूँ बाक़ी जीवन बसर कैसे होगा? पंद्रह जनों का पालन-पोषण कर रहा हूँ और क्या चाहिए?”

खाना अधूरा छोड़ हजारी थाली छोड़ उठ जातें हैं। हाथ धोकर तौलिए से हाथ पोंछते हुए अपनी चप्पलें चारपाई के नीचे से पैरों से खिसकाते हुए कहते हैं।

”अपने घर के पेड़ न सींचता! भाई-बहन को करो, कौन याद रखे।  परिवार के लिए बैंक में तो फूटी कौड़ी नहीं है, मैं नहीं बहू कहे।”

परमेश्वरी थाली स्टूल से उठाती हुई कहती है।

हज़ारी एक टक अपनी पत्नी की ओर देखते हैं, देखते हैं उसकी घबराई आँखों को; भोलेपन में डूबी बुढ़ापे की परवाह और बेटे-बहू की समझदारी के तैरते अनेक बैंक-बैलेंस के प्रश्नों को।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Thursday, 28 January 2021

बुज़ुर्ग

            


            "अंक प्लीज़ साइड में ही रहें आप आपके कपडों से स्मैल आ रही।”

बीस-बाईस साल की युवती ने मुँह बनाते हुए नाक को सिकोड़ते हुए।

अभी-अभी मेट्रो में सवार हुए सत्तर-पचहत्तर साल के बुज़ुर्ग लुहार से कहती है।

उसके कपड़े मैले-कुचैले,चेहरे और हाथों पर धूप-मिट्टी ने मिलकर एक परत बनाई हुई थी परंतु बड़ी-बड़ी मूछों में ताव अभी भी था। उसके दोनों कंधों पर लोहे के कुछ बर्तन टंगे थे एक हाथ से मेट्रो में सपोर्ट को पकड़े हुए और दूसरे हाथ में भारी सामान थाम रखा था।जिसे न जाने क्यों वह नीचे नहीं टिकाना चाहता था। लड़की ने जैसे ही उससे कहा वह स्वयं को असहज महसूस करने लगा। चेहरे पर बेचैनी के भाव उभर आए। सहारे की तलाश में वह बुज़ुर्ग इधर-उधर आँखें घुमाने लगा। हर कोई उससे दूरी बनाना चाहता था।

”मैम प्लीज़ आप मेरी सीट पर...।”

पास ही की सीट पर बैठे एक हेंडस्म नौजवान ने हाथ का इशारा किया और लड़की को अपनी सीट दी,हल्की मुस्कान के साथ दोनों ने एक-दूसरे का स्वागत किया। लड़की अब सहज अवस्था में थी। सीट मिलते ही वह अपने आपको औरों की तुलना में बेहतर समझने लगी।

अभी भी बुज़ुर्ग असहज था। उसकी आँखों में बेचैनी, क़दम कुछ लड़खड़ाए हुए से...।

”प्लीज़ टेक सीट।”

तीन-चार सीट दूर बैठे एक विदेशी टूरिस्ट की आवाज़ थी।

 उसने उस बुज़ुर्ग का सामान थामते हुए उसे अपनी सीट पर बैठने का आग्रह  किया।

जिन यात्रियों की आँखें इस घटनाक्रम पर टिकी हुईं थीं एक पल के लिए उनकी पलकें लजा गईं।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Tuesday, 26 January 2021

अंतर

        

                            ”बिटिया लकड़ियों से छेड़खानी नहीं करते काँटा चुभ जाएगा।”

विजया की दादी माँ ने अलाव में कुछ और कंडे डालते हुए कहा।

”अब भगीरथ की दोनों बहुओं को ही देख लो, छोटीवाली तो पूरे गाँव पर भारी है। शदी-विवाह में सबसे आगे रहती है। मजाल जो उसकी ज़बान से एक भी गीत छूट जाए।”

विजया की दादी अलाव से कुछ दूर खिसकती हुई उसके दादाजी से  कहती है।

”अरे! क्यों उनके पीछे लगी रहती है, सीख जाएँगीं धीरे-धीरे।”

और पास खड़ी विजया को वो अपनी गोद में बिठाते है।

”अब और कब सीखेंगीं, कल की ही बात कहूँ; बड़ीवाली से कहा कोठरी से जेवड़ी लाने को, वहाँ बूत बनी खड़ी रही जाने क्या मँगवा लिया हो? इतनी भी समझ नहीं है थारी बीनणियाँ में।”

बहुओं की खीझ लकड़ियों पर उतारते हुए,अंदर-ही अंदर टूट रही होती है।

”आप क्या जानो मेरे मन की पीड़ा दुनिया की बहुएँ इतनी टंच होवें कि सास-ससुर सुख से मर सकें और म्हारे माथे पर ये दोनों एक गूँगी, एक बहरी।”

”ठीक से समझाया करो इन्हें , आधी-अधूरी बात बोलती हो तुम।"

दादाजी  विजया से पानी का गिलास मँगवाते हुए कहते और वह दौड़ती हुई अंदर गई।

”अब पूजा-पाठ भी मैं ही सिखाऊँ? उनके माँ-बाप ने कुछ न सिखाया । म्हारा भी कर्म फूटेड़ा था जो ये दोनों मिली।”

विजया की दादी की चिंताएँ अब आग की लपटों-सी दहकती दिखीं।

”अम्मा मैं अच्छे से सभी गीत सीखूँगी,पूजा भी अच्छे से किया करुँगी और गाय को चारा भी डालूँगी।”

विजया ने दादाजी को पानी का गिलास थमाते हुए कहा।

”न री लाडो! बेटियाँ तो घर में चहकतीं ही अच्छी लगती, मैं तो बहुओं की बात कहूँ तू तो बड़ी हो कलेक्टर बनना।”

दादीजी ने विजया को सीने से लगा लिया।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


गठजोड़

                  ”इसे संदूक के दाहिने तरफ़ ही रखना।” शकुंतला ताई अपनी छोटी बेटी बनारसी से कहतीं हैं। हल्का गुलाबी रंग का गठजोड़ जिसमें न ज...