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Saturday, 24 December 2022

डर

           


                                    कुछ रोज़ पहले ही सुगणी गाँव से शहर आई थी। शहर की सखी-सहेलियों को उसका रहन-सहन रास नहीं आया था। वह इच्छा से भरी मासूम बदरी थी। जहाँ चाहे वहीं बरस जाती थी। चूड़ी, चप्पल, बिंदी और लाली सब की चाह लिए दहलीज पर खड़ी रहती। मनिहार को आते-जाते देखती और देखती ही रह जाती।उसे वह सब कुछ चाहिए होता, जो उसकी सखी सहेलियों के पास होता।

उसकी एक सहेली ने बताया इसे देखना नहीं आता फिर झुँझलाकर उसी ने कहा-”अरे! दिखता ही नहीं है इसे।”

जब सुगणी से साँची ने पूछा तब उसने कहा-

"सब कहते हैं मेरी आँखें नहीं हैं, मेरी आँखों को जो जँचता है वह मेरे आदमी को नहीं जँचता।” कहते हुए वह अपलक कोरे आसमान को घूरने लगती थी।बड़ी-सी बिंदी, उससे भी बड़ी नथनी और उससे भी बड़ी-बड़ी आँखें। उन आँखों में रमे काजल पर ठहरी लालासा की दो बूँदें, जिसे उसकी आँखें बड़ी चतुराई से घोलकर पी लिया करती थी।

"मुझे देखने ही कब दिया? पहले मेरी माँ! फिर इसकी माँ!!  अब यह खुद!!!" न चाहते हुए भी वह भोर-सी बिखर पड़ी। रात की उतरी चादर में गुम नजरिया ढूँढ़ती।

”कुछ समय पहले तक मेरे पास भी आँखें नहीं थीं, लोग दिखाते मैं भी वही सब देख लेती।" साँची ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।

" सच कह रही हैं आप! मेरा उपहास तो नहीं उड़ा रही न?.” वह हल्की-सी हँसी के साथ कुछ शरमाई और फिर खुद में सिमटकर रह गई थी।

"नहीं सच! कसम से!!” साँची ने विश्वास के साथ कहा।

"फिर!” वह धीरे से बोली।

" फिर क्या? फिर मेरे आत्मचेतना के अँखुए उग आए उन्हें महसूस किया। कुछ समय पश्चात धीरे-धीरे मुझे दिखने लगा।” साँची ने उसके विश्वास को और गहरे विश्वास के रंग में रंगते हुए कहा परन्तु न जाने क्यों फिर भी उसने पैर दहलीज के अंदर खींच लिए?


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


2 comments:

  1. एक स्त्री की मनोदशा को दर्शाती , सोचने पर मजबूर करती लघुकथा ।

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  2. मुझे देखने ही कब दिया? पहले मेरी माँ! फिर इसकी माँ!! अब यह खुद!!!"

    आँखें होकर भगवान अंध सी जिंदगी ।

    मेरी आँखों को जो जँचता है वह मेरे आदमी को नहीं जँचता।”
    बस आदमी को जँचना चाहिए
    यही तो विडंबना है ।

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