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Thursday, 8 December 2022

मुखरित मौन

                   


                           "काल के क़दमों की आहट हूँ मैं! मेरा प्रभुत्व समय की परतों पर लिखा है।”  चट्टानों पर अपने नाम को अंकित करते हुए पुरुष ने स्त्री से कहा।

”ओह! बादल बरसे तब जानूँ मैं !” जेष्ठ महीने की तपती दुपहरी में स्त्री ने पुरुष  को परखते हुए कहा। कुछ समय पश्चात काली-पीली घटाएँ उमड़ी और बरसात की बूँदों से मिट्टी महक उठी जिसकी ख़ुशबू से  मुग्ध स्त्री झूम उठी।

” ठीक है! अब धूप के टुकड़े बिखेरकर बताओ तब लगे तुझ में कोई बात है!” साँझ के बढ़ते क़दम देख स्त्री ने पुरुष से फिर कहा।तभी माथे पर इंद्रधनुष सजाए कुछ पल के लिए आसमान धूप से चमक उठा।

"अच्छा! अब साँझ के आँगन में दीप जला कर दिखाओ ।" स्त्री ने पुरुष के सीने से लगते हुए कहा। पलक झपकते ही आसमान में तारे चमक उठे। चाँद उनकी टोह लेने देहरी पर खड़ा था। दोनों का प्रेम परवान चढ़ ही रहा था कि प्रेम में आकंठ डूबी स्त्री ने पुरुष से एक और इच्छा जताते हुए कहा- "चलो! अब मुझे पंख भी लगा दो।” सहसा स्त्री के शब्दों से पुरुष बिफर उठा।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

6 comments:

  1. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (11-12-22} को "दरक रहे हैं शैल"(चर्चा अंक 4625) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
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    कामिनी सिन्हा

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  2. अनीता सैनी की इस कथा में स्त्री को मुखर होते दिखाया गया है। स्त्री अपने मौन को स्थगित कर बोलना सीख रही है। वह शब्द की ताकत को आदिम व्यवहार में आजमाना सीख रही है। पुरुष के नजरिए को टटोल कर अपनी सबसे गहरी इच्छा को व्यक्त करने का शऊर सीख रही है। पुरुष हतप्रभ है, स्त्री की मुखरता पर। उसके पास जब शब्द नहीं बचते तब बिफरने के अलावा और है क्या ..... . सुंदर कथा के लिए लेखिका को बधाई।

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  3. बहुत ही सुन्दर रचना सखी सादर

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  4. स्त्री को पंख लग जायेंगे तो वह पुरुष के समकक्ष न पहुँच जायेगी ....फिर उसकी महानता गौण न हो जाय सो विफरना ही था....
    कमाल की लघुकथा
    अद्भुत 👏👏

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  5. वाह अनीता जी, अंतिम वाक्‍य ''चलो! अब मुझे पंख भी लगा दो।” पूरे समाज की परतें उधेड़ देता है...अद्भुत लिखा

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  6. सुंदर लघुकथा

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