Thursday, 16 January 2020

अंधा बाँटे रेवड़ी चीन्ह-चीन्ह के देय



"अरे! क्यों डबडबाई आँखें लिये फिरती रहती है,अब क्या तेरा खसम वापस आने वाला है। जब देखो दरवाज़े को घूरती रहती है,अब क्या आने-जाने वालों को खायेगी ? माथे की सलवटें कम हो गयीं हों तो एक कप चाय पिला दे आज बड़ी सर्दी है"

गीता बुआ झोला चारपाई पर पटकती हुई उसाँस लेते हुए प्रीति  से कहती हैं। 

"आप इस तरह ताने न दिया करो बुआ जी

प्रीति चाय का कप हाथ में थमाती हुई कहती है।

"क्यों न कहूँ पिछले छ: महीने से तेरे घर का ख़र्चा उठा रही हूँ,जल्द ही मेरे पैसे सूद समेत वापस कर देना,ये लो इस बार दो हज़ार ही लायी हूँ"

बुआ जी पैसे गीता के हाथ में थमाती है। 

"बुआ जी कोई अहसान नहीं करती हो, पेंशन मिलते ही लौटा दूँगी उधार के पैसे तो  लाई में भी नहीं जलते

गीता अपने को कोसती हुई मन भारीकर वहीं बैठ जाती है

" ये देखो कल की छोरियों के नखरे,रस्सी जल गयी पर बल नहीं गया। ठीक है नहीं कहेंगे परन्तु ऐसे कितने दिन ढोयेगी इस देह को.... अच्छा बता बिटवा की पेंशन कब से मिलनी शुरु हो रही है ? सुना है सरकार पेट्रोल पंप भी दे रही है ?" 

गीता बुआ अपनी बात पलटते हुए कहती हैं।

 "अरे कहाँ बुआ जी! रोज़-रोज़ बाऊजी सरपंच जी के यहाँ तक चप्पल घिस रहे हैं। अभी तक कोई ख़ैर-ख़बर नहीं है। अब तो हालत यह है कि कलेक्टर के ऑफ़िस में भी नहीं खड़ा होने देते। धक्के मार बाहर करते हैं। महीने-बीस दिन की हमदर्दी होती है फिर कोई सीधे मुँह बात नहीं करता।"

प्रीति ने लाचारी जताते हुए जवाब दिया। 

"मैं तो पहले ही कहती थी कि समाज भरे को भरता है ख़ाली को परे धरता है। मेरी कौन सुनता है।"

मुँह बनाते हुए गीता बुआ कहती हैं और एक निग़ाह प्रीति पर डालती हैं।

"यह क़सीदे की ओढ़नी तुम्हें शोभा नहीं देती बीनणी। किसी को दान कर दे। अगर दुनिया वाले  बाते बनायें तब मुझे मत कहना, तुम्हारे भले के लिये कहती हूँ।"

"अरे!आप ही लेते जाना एक-दो और रखी हैं।"

मन में गहरी टीस भरते हुए प्रीति ने कहा। 

" एक बात कहूँ बीनणी। भगवान झूठ न बुलाये, हमारे गाँव में तो एक जवान कारगिल में शहीद हुआ था,चिनवा के बापू बोल रहे थे बहुत पैसे मिले हैं।"बुआ ने प्रीति का मन खगालते  मन हुये कहा। "

अब क्या कहें आपको बुआ जी,जाने क़िस्मत ने क्या खेल खेला है।

"मिट्टी लगे हाथों से बाल ठीक करती हुई चूल्हे को मिट्टी से पोतती हुई प्रीति कहती है।

"और इधर कैसे आना हुआ बुआ" 

गली के बाहर से आवाज़ आती है। 

"अरे यो गगन को छोरो है न, इने क्यों दीदा काडेह है,आपणे बिटवा से बड़ो दीखे घूँघट कर ले।"

गीता बुआ प्रीती से कहती हैं।

"हाँ आता-जाता रहता है,बाऊजी के पास।"

प्रीति कहती है।

"छोरो टंच है,बोली से ही पतो चाल रो है।"

बुआ प्रीति से कहती हैं। इसी बीच गगन का लड़का वहाँ पहुँचता है और बुआ से कहता है...

"बुआ टंच तो आज काल पैदा होते ही बच्चे बन जा हैं। मैंने तो फिर भी तीस साल खायीं हैं।थे बताओ दीदा-गोडा ठीक,ब्याज़ का धंधा चालू है कि छोड़ दिया ?"
"न बेटा के करणों घणों पीसा को, राम के घरा मुँह दिखाणों है। मैं हाल-चाल पूछती रहूँ बीनणी का। किम पीसो-टको चाहे तो पूछ ला और के कर सका,लाइ दुःख लिखा के लायी है अपने  भाग्य में। अच्छा छोरा एक बात बता ब पेट्रोल पंप मिलता बताया न शहीद की विधवा को ऊको के होयो।"

यह कहते हुए बुआ ने अपनी व्याकुलता दिखायी। 

"अरे बुआ! वह  कहावत तो सुनी होगी आपने,अंधा बाँटे रेवड़ी चीन्ह-चीन्ह के देय। देश की यह हालत हो रही है,मिल गये जिसको मिलना था और ऐसी जगह मिले है जहाँ कोई आता-जाता ही नहीं है,थे बताओ इधर पेंट्रोल पंप लेने आती हो क्या महीने में एक बार?" 

वह अट्टहास करता हुआ वहाँ से चला जाता है। 


© अनीता सैनी 


Sunday, 12 January 2020

चरित्र-हत्या एक खेल !



राजनीति हर क्षेत्र में अपने पैर पसारती नज़र आ रही है, जातिवाद के नाम पर बँट रहा परिवेश में इंसान, 
 मैं मेरे की भावना हो रही है बलवती। अपनी हदों को पार करता मानव स्वभाव अब किसी के चरित्र की हत्या करना या करवाना कलिकाल युग के मानव के लिये आम-सी बात बन गयी है बशर्ते करने और करवाने वाले को मिलना चाहिये एवज़ में एक ख़िताब बड़प्पन का वह भी करुणा भाव से छलकता हुआ क्योंकि उसने भी अपने चरित्र को ताक पर रख की  है सामने वाले के चरित्र की हत्या।यही  विशेषता रही है ख़ास इस दौर के मानव की, मुख पर शालीनता की लालिमा शब्दों में तर्क का तेज़ परन्तु दुर्भाग्य वह मानसिक और शारीरिक  रुप से  हो चुका है विकृत स्थिति यह हो चुकी है कि वह बौखला गया है। घटती उम्र बढ़ती महत्त्वाकाँक्षा में तालमेल बिठाना अब उसके हाथ में नहीं रहा वह अतीत को देखता है वर्तमान को जीता है और भविष्य को संवारता है प्रति पल अपने से करता है राजनीति, राजनीतिक अपंगता हर हृदय को अपने आग़ोश में लेने लगी है। इतिहास के तथ्य तलाशते-तलाशते वह उन्हीं  किरदारों में अपने आप को देखने लगा। उसी स्थान पर उसी दर्ज़े पर अपने आप को रखने लगा। बिन त्याग और बलिदान के एक पल में  अमर होने की प्रवृति परिवेश में पनपने लगी है। सूर्य-सी आभा मुखमंडल पर प्रतिष्ठित छवि चाहता है हर हृदय, यही विडंबना तुषार की बूँदों-सी टपक रही है कलिकाल युग में। 
ऐसा ही एक हृदय फिर रहा है मारा-मारा नाम कुछ गुनगुन सामने आया है।  समाज से बटोरने सहानुभूति या लिये  राजनीति की खड़ग कुछ कहना शायद असंभव-सा प्रतीत हो रहा। इस मोहतरमा ने संजीदगी से टपकाए हैं आँख से आँसू मनगड़ंत कहानी को आपबीती का लिबास पहना वह साबित करना चाहती है कि जब वह सात साल की थी तब उसके  साथ अन्याय हुआ था। मोहतरमा को आज अठाईस साल के बाद होश आया कि उस के साथ अन्याय  हुआ था वह भी उस साहित्यकार के मरणोपरांत बाईस साल बाद। यह कोरी राजनीति या एक मनगढ़ंत कहानी या एक सोची-समझी साज़िश एक साहित्यकार की चरित्र-हत्या करने की।आज एक वामपंथी साहित्यकार होना गुनाह है या सच की ज़ुबां काटी जा रही ,या उसके लेखन को लज्जित करने का षड़्यंत्र कहूँ,साहित्य पर भी वर्ग विशेष का अपना आधिपत्य है  जो भी है एक विश्वविख्यात साहित्यकार के चरित्र की  हत्या करना कहाँ तक जाएज़ है। बाबा नागार्जुन एक जन कवि थे जिन्हें आज तथाकथित साहित्यकारों द्वारा अपमानित किया जा रहा और उनका दोगला रबैया सामने आया है और मोहतरमा आज क्या बताना और दिखाना चाह रही हैं। इस तरह साहित्य में पैर पसारती घटिया राजनीति साहित्य को पतन के कग़ार पर खड़ा करती है। वामपंथ का अनुयायी होने के नाम पर इस तरह ज़लील करना कुछ लोगों की साहित्यिक  कुंठा मात्र हो सकती है। आज के क़लमकार अपनी क़लम से गुनगुन के लिये इंसाफ़ की गुहार लगाते नज़र आये, उसके लिये जिसने कभी यथार्थ के धरातल पर अपने क़दम ही नहीं रखे।जो हुआ ही नहीं उसे होने की संज्ञा देना एक अपराध को बढ़ावा देना मात्र है। मोहतरमा के अनुसार जब वह सात साल की थी तब शायद वह साहित्यकार बयासी  साल के थे अपने ज़िंदगी के अंतिम पड़ाव पर वह ज़िंदगी और मौत से जूझ रहे थे इस तरह बेबुनियाद शब्दों को ज़िंदगी का सच बताने वालों के ख़िलाफ़ कठोर कारवाही की माँग उठनी चाहिए। 
© अनीता सैनी 

लाचारी

      हल्की बरसात के साथ ही बरसाती पानी शहर की सड़कों पर दौड़ने लगा।  यह नगर पालिका की मेहरबानी थी। फ़ुटपाथ पर प्लास्टिक के कवर में ...