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Tuesday, 5 May 2020

वृंदा

 

          रात के अंतिम पहर में धुँधले पड़ते तारों में तलाशती है अपनों के चेहरे ऐसा लगा जैसे एक-एक कर साथ छोड़ रहे हैं उसका और वह ख़ामोशी से खड़ी सब देख रही है। एक आवाज़ उसे विचलित कर रही है। 

"हक नहीं तुम्हें कुछ भी बोलने का। ज्ञान के भंडारणकर्ता हैं न,समझ उड़ेलने को। तुम क्यों आपे से बाहर हो रही हो। तुम्हें बोलने की आवश्यकता नहीं है।"

बुद्धि ने वृंदा को समझाया और बड़े स्नेह से दुलारा। 

"क्यों न बोलें हम,तानाशाही क्यों सहें?"

मन ने हड़बड़ाते हुए कहा। 

"क्योंकि वे समझ पर लीपा-पोतीकर रहे हैं जिससे काफ़ी लोगों को सुकून की अनुभूति हो रही है।"

बुद्धि ने अपनी गहराई से कुछ बीनते हुए कहा। 

"बाक़ी लोगों का क्या वे क्या गणना का हिस्सा नहीं है।"

"क्या यह सही समय था? तीनों सेनाओं को उलझाना ठीक था।"

गला रुँध गया और मन की आँखें नम हो गई। 

"वे सकारात्मकता दर्शाना चाहते हैं।"

बुद्धि ने मन को हिम्मत बँधाई। 

"फिर डॉक्टर और पुलिस की सुरक्षा के लिए ज़रुरी सामान उपलब्ध क्यों नहीं कराया गया। वे मर रहे हैं। बेवजह फूल बरसाकर क्या दिखा रहे हैं? "

मन एक कोने में बैठकर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा जैसे उसने किसी अपने को खोया है। 

"किससे अनुमति हासिल की कि इस तरह सभा बुलाकर मातम मना रहे हो?"

अंदर से आवाज़ ने आवाज़ दी मन और बुद्धि दोनों सहम गए। 

"ये वाकचातुर्य नासमझी को समझदारी का लिबास पहना रहे हैं।"

मन ने धीमे स्वर में अपना मंतव्य रखा। 

"क्या करोगे तुम? "

"ज़्यादा ज्ञान मत बघारो।"

आवाज़ ने आक्रोशित स्वर में उसांस के साथ कहा। 

"माफ़ी-माईबाप! अब कभी मन अपने शब्द ज़ूबाँ पर नहीं लाएगा। इसने पाँच सपूत खोए हैं। मनः स्थति समझो इसकी।"

बुद्धि ने मन की तरफ़ से आवाज़ से माफ़ी माँगी कभी आवाज़ न निकालने के वादे के साथ। 

वृंदा की आँखें नम हो गई,  उसने देखा!

 और पाँच तारे आसमान में लुप्त हो गए। 

@अनीता सैनी 'दीप्ति'


24 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (06-05-2020) को   "शराब पीयेगा तो ही जीयेगा इंडिया"   (चर्चा अंक-3893)    पर भी होगी। -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    -- 
    आप सब लोग अपने और अपनों के लिए घर में ही रहें।  
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    --
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 

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    1. सादर आभार आदरणीय सर चर्चामंच पर मेरी लघुकथा को स्थान देने हेतु.
      सादर

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  2. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज मंगलवार 05 मई 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. सादर आभार आदरणीया दीदी संध्या दैनिक में मेरी लघुकथा को स्थान देने हेतु.
      सादर

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  3. Replies
    1. सादर आभार आदरणीया दीदी उत्साहवर्धक समीक्षा हेतु.
      स्नेह आशीर्वाद बनाये रखे.
      सादर

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  4. प्रतीकों के माध्यम से एक अत्यंत पीड़ादाई विषय को कथानक के रूप में गढ़ा गया है। तीनों सेनाओं का इस्तेमाल कब,कहाँ,कैसे हो एक गंभीर प्रश्न है जिसे सरकार के निर्णय कौशल पर छोड़ दिया जाता है किंतु जब इनका इस्तेमाल छद्म उद्देश्यों के लिए किया जाने लगे तो यहाँ तर्क-वितर्क होने चाहिए। एक ओर जहाँ पाँच जांबाज़ सैनिकों की शहादत पर देश शोक में डूबा था तो दूसरी हवाई जहाज़ों से करोना योद्धाओं का मनोबल बढ़ाने के लिए पुष्पवर्षा की जा रही थी। ऐसे घटनाक्रम देश के नागरिक और सैनिक को असमंजस की स्थिति में डालते हैं। मेरी राय में यह क़दम व्यर्थ की क़वायद थी जिसे इस लघुकथा में एक मार्मिक रूपक के ज़रिये भावुकता की पराकाष्ठा के साथ प्रस्तुत किया गया है।

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    1. सादर आभार आदरणीय सर सुंदर सारगर्भित समीक्षा हेतु.
      आशीर्वाद बनाये रखे.
      सादर

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  5. बुद्धि वृन्दा मन आवाज आदि स्वयं ही पात्र स्वयं ही अभिनय और समसामयिकता पर खरी खरी...वाह!
    अद्भुत अंदाज में बेहतरीन लघुकथा।

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    1. सादर आभार आदरणीया सुधा दीदी आपकी प्रतिक्रिया ने मन मोह लिया. उत्साहवर्धन करती समीक्षा हेतु तहे दिल से आभार.
      स्नेह आशीर्वाद बनाये रखे.

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  6. बहुत बढ़िया

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    1. सादर आभार आदरणीय सर उत्साहवर्धक समीक्षा हेतु.
      सादर

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  7. बहुत सुंदर प्रस्तुति

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    1. सादर आभार आदरणीय दीदी उत्साहवर्धक समीक्षा हेतु.
      स्नेह आशीर्वाद बनाये रखे.

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  8. जो सितारे आसमान के समुंदर में खो गये उनके कदमों के निशान मात्र स्मृतियों में ही शेष न रहे काश कि ऐसा भी कुछ हो पाता!!
    कोई भी प्रयास सकारात्मक है या नकारात्मक इसका तार्किक अन्वेषण दृष्टिकोण और परिस्थितियों के तराजू पर रखकर करती संदेशात्मक लघुकथा अनु।

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    1. सादर आभार प्रिय श्वेता दीदी आपने लघुकथा के मर्म और कथानक की बहुत सुंदर विस्तारपूर्वक विवेचना प्रस्तुत करते हुए अपना मत व्यक्त करते हुए लघुकथा का मान बढ़ाया है. मनोबल बढ़ाने के लिए ढेर सारा आभार.
      स्नेह आशीर्वाद बनाये रखे.

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  9. अनिता दी,यह विडम्बना ही हैं कि जब पाँच जांबाज़ सैनिकों की शहादत पर देश शोक में डूबा था तब ही दूसरी तरफ हवाई जहाज़ों से करोना योद्धाओं का मनोबल बढ़ाने के लिए पुष्पवर्षा की जा रही थी।
    आपने प्रतीकों के माध्यम से लघुकथा को बहुत ही सुंदर अंजाम दिया हैं। बधाई।

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    1. सादर आभार आदरणीया ज्योति बहन जो आपने बिडंबना की ओर टिप्पणी के माध्यम से सबका ध्यान आकृष्ट कराया.
      सादर.सारगर्भित समीक्षा हेतु आभारी हूँ दी.
      स्नेह आशीर्वाद बनाये रखे.

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  10. वेदना से भरे मन की कशमकश का लाजवाब चित्रण ,लघु कथा इतना कुछ कह गई,कि सामायिक विसंगतियों को प्रश्न चिन्ह के घेरे में रख दिया ।
    बस नमन शहादत हुए वीरों को
    और साथ ही सेवा में लगे सपूतों को ।

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    1. सादर आभार आदरणीया कुसुम दीदी आपकी विस्तृत मनमोहक व्याख्या से लघुकथा का मर्म स्पष्ट हुआ.
      आपका आशीर्वाद और स्नेह मेरे लेखन की ऊर्जा है.
      सादर.
      स्नेह आशीर्वाद यों ही बनाये रखे.
      सादर

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  11. सामयिक परिस्थिति पर मन और बुद्धि के द्वन्द का बहुत सुन्दर चित्रण.

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    1. सादर आभार आदरणीया दीदी मनोबल बढ़ाती सुंदर प्रतिकिया हेतु.
      सादर

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  12. अंतर्मन दिन रात उलझता हे नित नए द्वन्द... बढ़िया रचना

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    1. सादर आभार आदरणीय मनोबल बढ़ाती सुंदर प्रतिकिया हेतु.
      सादर

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