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Tuesday, 14 September 2021

विकलित चित्त




           ”ग्वार की भुज्जी हो या सांगरी की सब्ज़ी, गाँव में भोज अधूरा ही लगता है इनके बिन।”

महावीर काका चेहरे की उदासी को शब्दों से ढकने का प्रयास करते हैं और अपने द्वारा लाई सब्ज़ियों की बड़बड़ाते हुए सराहना करने लगते हैं।

”क्यों नहीं आज फिर यही बनाती हूँ, बिटिया रानी को भी ग्वार बहुत पसंद है।”

गाँव से आई सप्ताहभर की सब्ज़ियों को संगीता फ़्रिज में व्यवस्थित करते हुई कहती है।

” नहीं! नहीं!! यह मेरी चॉइस नहीं है नानू, मेरे दाँतों में चुभता है ग्वार,मम्मी बनाती है फिर बार-बार रिपीट करती है, तुम्हारी चॉइस का खाना बनाया है आज।”

बिटिया रानी ऐसे चिल्लाई जैसे बहुत दिनों से मानसिक तनाव सह रही हो और आज नानू का स्पोर्ट पाते ही फूट पड़ी हो।

”आजकल के बच्चे देशी सब्ज़ियों कहाँ पसंद करते हैं?”

काका का भारी मन शब्दों का वज़न नहीं उठा पाया। बेचैनियाँ आँखों से झरती नज़र आईं। 

”ऐसा नहीं है। बिटिया को ग्वार बहुत पसंद है और फिर इतनी सारी खेत की सब्ज़ियों रोज़-रोज़ मार्किट जाने का झंझट ही ख़त्म।”

कहते हुए संगीता पास ही सोफ़े पर बैठ जाती है।

 शब्दों को जोड़-तोड़कर जैसे-तैसे तारीफ़ों के पुल बाँधने का प्रयास करती है कि कहीं बिटिया की हाज़िर-जवाबी से महावीर काका खिन्न न हो जाएँ।

”वैसे इस बार अनाज की पैदावार ठीक ही हुई होगी? "

संगीता बातों का बहाव बदलने का प्रयास करती है।

” कहाँ बिटिया! इस बार तो भादों की बरसात बीस एकड़ में खड़ी चौलाई की फ़सल लील गईं। बची हुई कड़बी काली पड़ गई।”

खेतों में हुए नुकसान को वो बार-बार दोहराते हैं। शहर में बिटिया को परीक्षा दिलाने आए तो है परंतु दिल वहीं गाँव में ही छोड़ आए। पगड़ी के लटकते छोर से आँखें मलते हुए कहते हैं।

"नानू मुझे पसंद है ग्वार।”

बिटिया दौड़कर पास ही रखा टिसु स्टैंड लाती है। उसे लगता है जैसे उसके कहने से इन्हें पीड़ा पहुँची हो।

” आप भी मुआवज़े की माँग किया करो।”

संगीता अपनी समझदारी का तीर तरकस से निकालते हुए कहती है।

”बिटिया रानी के इन काग़ज़ों (टिसु पेपर ) की तरह होती है मुआवज़े की रकम। 'नाम बड़े दर्शन छोटे' किसान के ज़ख़्मों का उपचार नहीं करता कोई, दिलासा बाँटते हैं।

महावीर काका थकान में डूबी आँखों को पोंछते हुए कहते हैं। 

एक लंबी ख़ामोशी संवाद निगल जाती है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

17 comments:

  1. परिस्थितियों से जूझते मन की व्यथा का हृदयस्पर्शी शब्द चित्र उकेरती सुन्दर लघुकथा ।

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  2. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज बुधवार 15 सितम्बर 2021 शाम 3.00 बजे साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. कभी मौसम,कभी व्यवस्था तो कभी कुछ और ... एक किसान का दर्द संवेदनशील मासूम बच्ची भी कम करने का
    प्रयास कर रही और हम... यह प्रश्न तो स्वयं से पूछना ही चाहिए। अन्नदाता अपनी जरूरतों के लिए कितने मजबूर होते है... बेहद मर्मस्पर्शी लघुकथा अनु।
    सस्नेह।

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  4. बिटिया रानी के इन काग़ज़ों (टिसु पेपर ) की तरह होती है मुआवज़े की रकम। 'नाम बड़े दर्शन छोटे' किसान के ज़ख़्मों का उपचार नहीं करता कोई, दिलासा बाँटते हैं।
    बहुत ही हृदयस्पर्शी लघुकथा....एक किसान का दर्द वही जानता है खून पसीने की कमाई पर मौसम की मार....
    शब्दों का ताना-बाना बहुत ही लाजवाब बुना है आपने।

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  5. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार (17-09-2021) को "लीक पर वे चलें" (चर्चा अंक- 4190) पर होगी। चर्चा में आप सादर आमंत्रित हैं।
    धन्यवाद सहित।

    "मीना भारद्वाज"

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  6. मर्मस्पर्शी लघुकथा, आप बात को कितना गहनता से कहती हो अनिता !
    लघुकथा के हर मापदंड पर खरी कथा।

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  7. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार १७ सितंबर २०२१ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  8. पढते-पढते मैं अपने गॉंव पहुँच गया। किसान की पीडा तो मानो इस देश का स्‍थायी-भाव ही हो गई है।

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  9. किसानों का दर्द समेटे, आत्मविभोर करती लघुकथा ।

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  10. लघुकथा में किसान के दर्द को समेट लिया । मार्मिक प्रस्तुति

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  11. इस अंतहीन दुःख का कोई तो छोर मिले । अति संवेदनशील लेखन ।

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  12. एक लम्बी खामोशी संवाद निगल जाती है बेहतरीन सृजन

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  13. बहुत मार्मिक कथा !
    किसान का दर्द ज़मीन से जुड़ा हुआ शख्स ही समझ सकता है.
    वैसे किसानों में भी अमीर-ग़रीब किसान होते हैं.
    सबसे बुरी हालत में खेतिहर मजदूर होता है जो कि व्यावहरिक दृष्टि से ज़मींदारों का और बड़े किसानों का, बंधुआ मजदूर जैसा होता है.

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  14. हृदयस्पर्शी सृजन प्रिय अनीता ।

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विकलित चित्त

            ”ग्वार की भुज्जी हो या सांगरी की सब्ज़ी, गाँव में भोज अधूरा ही लगता है इनके बिन।” महावीर काका चेहरे की उदासी को शब्दों से ढकने क...