Monday, 8 February 2021

समझ का सेहरा

     


                     

                       ”आप क्या जानो जीजी, पीड़ा पहाड़-सी लगती है जब बात-बात पर  कोई रोका-टाकी करता है।”

पिछले काफ़ी दिनों से राधिका की जुबाँ पर यही बस यही शब्द कथक कर  रहे होते हैं। उसे देखकर लगता काटो तो ख़ून नहीं।

”अनसुना क्यों नहीं करती? क्यों दिल पर लेती है? तुम्हारे पति की आदत है।सास-सुसर बुज़ुर्ग  हैं।”

बदले में नीता का यही एक उत्तर राधिका को मिलता परंतु न जाने क्यों आज वह तमतमा गई।

”आप क्या जानो मेरे हृदय की पीड़ा, घूँघट में सभी बीनणीया बढ़िया दिखतीं हैं चेहरा तो घूँघट उठाने पर दिखता है।”

ग़ुस्से से तमतमाया राधिका का चेहरा लाल पड़ चुका था, इतने ग़ुस्से में वो कभी न होती थी।

”जीजी! आपको रोकने-टोकनेवाला कोई नहीं है कि क्या बना रही हो? और क्या नहीं बनाओ? पति और सास-ससुर आपके कहे अनुसार चलते हैं आप कभी नहीं समझोगी  मेरी पीड़ा।”

राधिका आपे से बाहर हो आग-बबूला हो गई। इस समय नीता ने राधिका से ज़्यादा  वाद-विवाद करना ठीक नहीं समझा।

”तुम्हें फ़ीवर होता है तब तुम्हारे पति ही चाय बनाते होंगे और सास खाना, डॉ. के पास भी ले जाते होंगे?”

नीता आराम से राधिका से पूछती है।

”दायित्त्व है उनका और कौन करेगा? मैं फ़ीवर में काम क्यों करूँ?”

राधिका बेपरवाही में सिमटी अभी भी होश में नहीं थी।

” और तुम्हारा दायित्त्व ?"

नीता जल्द ही अपने शब्दों को बदलने का प्रयास करती है और कहती है -

” तुमने ठीक कहा, मैं नहीं समझूँगी क्योंकि मुझे कोई नहीं है यह कहने वाला कि आज तुम आराम करो तुम्हें फ़ीवर है,मैं चाय बनाता हूँ, आज बच्चों के स्कूल में, मैं ही चला जाता हूँ। कोई नहीं है ये कहने वाला कि माँ-बाबा की दवाई आज मैं ले आता हूँ। आज की ज़रूरतों को कल पर डालना कुछ भारी तो लगता ही होगा? परंतु तुम ठीक कहती हो मैं नहीं समझूँगी क्योंकि मैं तुम्हारी जगह नहीं हूँ।”


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


22 comments:

  1. बहुत अच्छी लघुकथा लिखी आपने अनीता जी । बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती हुई ।

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    1. सादर आभार आदरणीय सर मनोबल बढ़ाती प्रतिक्रिया हेतु।
      मानव मानसिकता का संकुचित दायरा बलवती इच्छाएँ उसे अपने ही स्तर से गिरा रही है।
      सादर

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  2. दूर के ढोल सभी को सुहावने लगते हैं। हम राजस्थानी में कहते हैं ना कि 'दूसरा की थाळी मांय घी घणो दीखे'
    सबके अपने अपने दुःख हैं।

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    1. ठीक कहा मीना दी कहावत एक दम फिट बैठी।पता नहीं हो क्या रहा हैं समाज में, स्वयं की मानसिकता पर प्रहार...विडंबना हैं।
      सादर

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  3. चिंतन को प्रेरित करती सारगर्भित लघुकथा । सत्य कथन है मीना जी का ..सबके अपने अपने दुःख हैं।

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    1. दिल से आभार आदरणीय मीना दी मनोबल बढ़ाती प्रतिक्रिया हेतु।
      सादर

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  4. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (10-02-2021) को "बढ़ो प्रणय की राह"  (चर्चा अंक- 3973)   पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    -- 
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
    --

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया सर चर्चामंच पर स्थान देने हेतु।
      सादर

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  5. बहुत सुंदर और सार्थक।

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    1. सादर आभार आदरणीय नितीश जी।
      सादर

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  6. Replies
    1. बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय विकास जी।
      सादर

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  7. सुंदर और सार्थक लघु-कथा

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    1. बहुत बहुत आभार आदरणीय मोनीज जी।
      सादर

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  8. ऐसे लोगों से अक्सर मुलाकात होती है अनीता जी,..सार्थक संदेशों से परिपूर्ण सुन्दर रचना..

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    1. दिल से आभार आदरणीय जिज्ञासा दी जी।
      सादर

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  9. हर किसी को अपना दुख ज्यादा बड़ा लगता है। सुंदर लघुकथा, अनिता दी।

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    1. दिल से आभार आदरणीय ज्योति जी।

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  10. ये ही जीवन का सत्य है अपनी समस्या सभी को सबसे बड़ी नजर आती है ,पीछे के सभी तथ्य नकारते हुए व्यक्ति बस वही देखति दिखाता है जिससे सहानुभूति अर्जन कर लें।
    सार्थक अभिव्यक्ति।
    सुंदर लघुकथा।

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    1. दिल से आभार आदरणीय कुसुम दी जी सारगर्भित समीक्षा हेतु।
      सादर

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  11. बहुत ही सुंदर लघु कथा अनिता जी ,

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    1. सादर आभार आदरणीय ज्योति जी।
      सादर

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