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Monday, 30 March 2020

पिता मानव की सज़ा तय

    एक ऋतुकाल बसंत बीत रहा था और पतझड़ के मौसम की आहट पीपल और नीम के पीले होते पत्ते दे रहे थे।तीन महीनों से वातावरण में मानव ज़ात की ओर से पशु-पक्षिओं और प्रकृति को कोसने की रट गूँज रही थी।अनावश्यक विलाप सुनकर बरगद ने सभा आयोजित करने की मुनादी पिटवायी।सभा आहूत हुई ।

"घटना की गंभीरता को समझो! वह अपने किये का प्रायश्चित करना चाहता है।"

हवा ने अपना रुख़ विनम्र करते हुए कहा। 

"नहीं! नहीं!! अभी नहीं... कुछ दिन और ठहरो, पिता मानव की मानसिक स्थिति ठीक नहीं है। वह पल-पल अपना रुख़ बदलता है; कभी खाना खिलाता है तो कभी मुझे ही खाने को लालायित रहता है।"

खरगोश कुछ घबराया-सा अपना मंतव्य सभा के समक्ष रखता है। प्यारी-सी मुस्कान और कुछ सुकून के साथ अपनी सीट गृहण करता है। 

"ठीक ही कह रहे हो, भाई खरगोश मैंने भी बदलते तेवर देखे हैं पिता मानव के,मुझे  मारता तो है ही कभी-कभी वह मेरे परिवार के सींग भी चुरा लेता है।"

हिरणी से अब सब्र नहीं हुआ। खरगोश के मत के साथ अपना मत भी रखने चली आयी। 

सोचा ऐसे तो कोई सुनता नहीं है शायद ऐसी स्थिति में कोई मेरे मत पर विचार करे। 

"यह क्या बात हुई,भला मारना तो ठीक है परंतु चोरी का इल्ज़ाम!

 हे माँ प्रकृति! देख तेरे बच्चों को तेरे बनाये मानव पर इतना बड़ा इल्ज़ाम।"

लोमड़ी अब अपना ड्रामा दिखाने लगी। सभा में उसे अपनी उपस्थिति जो दर्ज करवानी थी। 

"ठीक है ठीक है....  तुम आयी हो आज सभा में तुम्हारी उपस्थित दर्ज हुई अब बैठो सीट पर। 

कौए ने अपनी चतुराई दिखायी और चोंच को दो बार अपने ही तन से  साफ़ किया। 

"मैं सहमत हूँ बहन हिरणी से, मेरे तन की तो छोड़ो;दाँत तक चुराये हैं पिता मानव ने। 

हाथी कुछ सुस्ताया-सा अपना मंतव्य सभा के समक्ष रखता है। 

"गुनाह तो बहुत संगीन है।जब हम स्वयं बिन माँगे पिता मानव की जाएज़-नाजाएज़ सभी माँगें पूरी कर रहे हैं  तब चोरी नहीं करनी नहीं करनी चाहिये थी। चोरी से बड़ा कोई गुनाह नहीं।"

बूढ़े बरगद को भी यह गुनाह संगीन लगा।कुछ पल विचार किया फिर अपनी दाढ़ी को सहलाया और आदेश दिया -

"ठीक है... एक पहर के ठहराव के लिय सभा मुल्तवी की जाय फिर गुनाह की सज़ा सुनायी जाएगी।"

सभा में एक दम सन्नाटा छा गया। 

पिंजरे में क़ैद मानव के चारों तरफ़ बैठे सभी पशु-पक्षियों का एक ही विषय पर विचार चल रहा था कि सज़ा कैसे बढ़ायी जाय मानव की। 

सभी ने विचार किया, चलो पानी के पास चलें; उसके बयान से नहीं बच पाएगा।

"नहीं नहीं...यह ठीक नहीं है। वह बहुत पवित्र है। साफ़ मन है उसका, माफ़ कर देगा !"

बबूल ने अपनी समझदारी दिखायी।

"चल कँटीले !चुप कर,चलो पानी के पास चलते हैं। "

गिलहरी भी अब अपना दिमाग़ लगाने लगी। 

"नहीं! ठीक कह रही है गिलहरी, एक पखवाड़े पहले मिला था मैं पानी से। आँसू छलक रहे थे मानव के कृत्य पर। गंदी पड़ी देह दिखी पानी की फिर भी मानव मानव पुकार रहा था।"

यहाँ ऊँट ने अपनी हाज़िर-जवाबी से सभी के क़दम रोक दिये।

"कहीं  नहीं जाना। अरे! तुम सब क्या कम हो,क्यों भूल रहे हो तुम्हारे अपनों की मृत देह से वह ख़ुशबू जैसा कुछ बनाता है, यह तो लालसा की अति हुई न। "

लोमड़ी ने फिर अपना दिमाग़ चलाया और अपनी समझदारी पर इतरायी।"

"बात तो ठीक है बहना, कभी-कभी वह मेरे सामने भी दड खिंच जाता है। मुझे लगता है चल बसा फिर दौड़ जाता है।"

भालू ने अपने बदन को खुजाते हुए कहा। 

"अरे! तुम भी तो बोलो गाय,कुछ तुम्हें भी तो परेशान करता होगा।"

दूर से आये बगुले ने गाय को उकसाते हुए कहा। 

"परेशान तो करता है परंतु खाना भी तो देता है। इतने निर्दयी भी मत बनो,आख़िर है तो हमारा पालनहार।"

"अच्छा ठीक है ठीक है  तुम घर जाओ।" 

कुछ जानवरों की एक साथ आवाज़ आती है। 

सभी सोच-विचार में लगे थे कि ऐसा क्या किया जाय  जिससे सज़ा की अवधि बढ़ायी जा सके। 

"ऐसे कहो न कि वह अच्छे मासूम सुंदर जानवरों को पहले पालता है फिर धीरे-धीरे उनकी नश्ल ही मिटा देता  है। 

"अरे! चुप कर चिड़िया, इस बार उसे चमगादड़ ने फँसाया है जिसे दिन में ठीक से दिखता भी नहीं है।"

अब कबूतर फड़फड़ाया और कहने लगा -

"उसे सभी ने माफ़ कर दिया। पृथ्वी को क्या कम दर्द दिया है, खा गया उसके खनिज-पदार्थ, पूरी देह बंजर कर डाली। ऊँट ने क्या कहा, सुना नहीं !पानी ने भी माफ़ कर दिया उसे। 

"चलो एक पहर पूरा हुआ, सभा में चलते हैं।इस बार मैं कुछ करता हूँ।"

सभी चूहे को हैरानी से देखते हैं और उसके पीछे-पीछे चलने लगते हैं।  

"हाँ !चलो इस महाशय की बात में दम है, मेरी भी इसी ने मदद की थी।"

शेर ने भी चूहे की बात पर सहमति जतायी और सभी ने सभा में अपनी-अपनी सीट गृहण की। 

"मारने से ज़्यादा चोरी का जुर्म संगीन है। हिदायत देकर नहीं छोड़ सकते लिहाज़ा प्रकृति-पुत्र है और वक़्त-बे- वक़्त हम एक-दूसरे के काम भी आते हैं और रही बात कोरोना वायरस की वह तुम में से किसी ने नहीं मानव के स्वयं के शरीर की देन है। वह इसी की देह से पनपा  है। 

हाँ! चमगादड़ का डीएनए मिला है परंतु इसने एक अदृश्य प्राणी पैदा किया है। हाँ! लिहाज़ा चोरी के जुर्म में मानव को इक्कीस दिन की सजा दी जाती है। सभी प्राणी अपने-अपने घर की ओर  प्रस्थान करें।  मानव को ख़ास हिदायत है कि वह अपने ही घर में इक्कीस दिन और क़ैद रहे।अब सभा संपन्न हुई।"

"अरे! तुम तो कह रहे थे न कुछ करोगे, क्या हुआ?"

अब ज़्यादातर जानवर चूहे के पीछे उसकी चापलूसी में लग गये। 

"हाँ! प्लान तो किया था, देखता हूँ कितना सफल रहता है।"

चूहे ने गर्दन झुकाकर झेंपते हुए कहा। 

©अनीता सैनी

8 comments:

  1. 'पिता मानव की सज़ा तय की गयी' लघुकथा में प्रकृति के विभिन्न अंगों के बीच मानव की अपरिमित लालसा जब नियति के बंधनों का उपहास उड़ाते हुए हाहाकार मचाती भौतिकता के वशीभूत हो जाय तो प्रकृति का कोप किसी न किसी रूप में फूट पड़ता है। कोरोना वायरस से फैली महामारी ने इंसानी जीवन को गंभीर ख़तरों में डाल दिया है। अनीता सैनी जी ने अपनी लघुकथा में विश्व समाज को संदेश संप्रेषित करने हेतु प्रासंगिक कथानक ख़ूबसूरती से गढ़ा है। समकालीन परिवेश पर एक विस्तारित लघुकथा के माध्यम से मानव जाति की भयावह दुर्गति का मूलाधार चित्रित किया है जिसमें पशु-पक्षी,पेड़,पानी और मानव जो प्रकृति के अभिन्न अंग हैं, इनका अंतरसंबंध विश्लेषित करते हुए मानव की महत्त्वाकांक्षा की व्याकुल हूक को उसकी दुर्दशा का उत्तरदायी होना और उसे पिता जैसा सम्मान मिलना जैसी कथावस्तु को बड़ी ख़ूबसूरती से सँजोया गया है। मानव चूँकि प्रकृति की अनमोल कृति है जिसके पास बुद्धि-विवेक का अकूत ख़ज़ाना है तो उस पर परिवार के मुखिया / पिता जैसा दायित्त्व स्वतः ही उसके ऊपर आ जाता है। हालाँकि कहानी में मानव को पिता संबोधित करना असाधारण कल्पना। मासूम पशु-पक्षी, पेड़-पौधे अपने मूल्य बरक़रार रखते हुए मनुष्य को चेतावनी देते हुए माफ़ करते हैं और उसे मात्र सांकेतिक सज़ा का एलान किया जाता है।

    लघुकथा में शिल्पगत विशेषताएँ वातावरण, संवाद, कथावस्तु एवं उद्देश्य आदि प्रभावशाली ढंग से उभरे हैं। संवादों का आधिक्य, साधारण शब्दावली, अनावश्यक विस्तार, मुहावरों- लोकोक्तियों का अभाव आदि इस लघुकथा के नकारात्मक बिंदु हो सकते हैं हालाँकि मानक हिंदी शब्दों व व्याकरणिक अंगों का प्रभावशाली प्रयोग इसकी विशेषता बनकर उभरे हैं।

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    1. सादर आभार आदरणीय सर लघुकथा की बारीकी से समीक्षा करने हेतु. मार्गदर्शन करते रहे.
      सादर

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  2. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (03-04-2020) को "नेह का आह्वान फिर-फिर!" (चर्चा अंक 3660) पर भी होगी।

    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।

    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।

    आप भी सादर आमंत्रित है

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    1. सादर आभार आदरणीय दीदी चर्चामंच मर मेरी लघुकथा को स्थान देने हेतु.
      सादर

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  3. सुंदर ,मनोरजंक लघु कथा अनीता जी ,मानव को सजा तो मिलेगी ही और मिल भी रही हैं।

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    1. सादर आभार आदरणीय दीदी उत्साहवर्धक समीक्षा हेतु.
      सादर

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  4. Replies
    1. सादर आभार आदरणीय उत्साहवर्धक समीक्षा हेतु.
      सादर

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