Wednesday, 5 February 2020

ए. बी. सी. डी. (A, B, C, D )



      पुरुषों द्वारा महिलाओं के प्रति किया जाने वाला सार्वजनिक दुराचार तब सामान्य लगने लगता है जब इसका प्रतिकार न किया जाय या फिर एक महिला दूसरी महिला को इसे झेलने के लिये प्रेरित करती है। 
आँखों की दृष्टि कभी सहारा तो कभी इंसानीयत को लज्जित करने का सबब भी बन जाती है। किसी की आँखों से स्नेह,  किसी की आँखों से झलकती है वासना जो कामकाजी महिलाओं के लिये घुटन और ग़ुस्से का कारण बन जाती है वे न चाहते हुए भी सभी की निगाहों से बचना चाहती हैं और पालने लगती हैं अपने भीतर आक्रोश,अपनी दबंग आवाज़ को बनाती हैं अपना कवचवे नहीं दिखना चाहतीं कमज़ोर और असहाय। घर-बाहर करती हैं ज़िंदगी और अपनों से जद्दोजहद। 

      नीतू और गीता दोनों बहनें  बस स्टॉप पर सिटी बस का इंतज़ार कर रहीं थीं। नीतू कामकाजी महिला है और गीता कॉलेज छात्रा है बस आयी, स्टॉप पर रुकी। कुछ सवारियाँ उतरीं, नीतू और गीता भी सवारियों से खचाखच भरी बस में अपने लिये स्थान बनातीं हुईं सवार हो गयीं। बस कुछ दूर ही निकली थी कि नीतू को कुछ असहज लगने लगा। 

"भैया आप इतने सटकर क्यों खड़े हैं ?थोड़ी तो शर्म करो"
नीतू दुपट्टे को संभालती हुई, रुमाल से माथे का पसीना पोंछती हुई बाजू में खड़े अधेड़ उम्र के व्यक्ति को टोकती हुई कहती है। 
"बहनजी बस में जगह कहाँ है? आप इतने ही तेवर रखती हैं तब अपने निजी साधन से क्यों नहीं आती हैं
वह व्यक्ति कहता है। 
नीतू कुछ झिझक से अपने आप को असहज महसूस करती हुईकुछ कहना उसे अब उचित नहीं लगा। 
"क्यों? बस ख़रीद ली है क्या आपने? इज़्ज़त से पेश नहीं आ सकते। इसे अनुचित महसूस हुआ होगा तभी तो आपको कहा होगा
गीता अपनी सीट से उठती हुई नीतू को बैठने का इशारा करती है। 
"बहनजी इसमें असुरक्षा कहाँ से आ गयी। हमने कौनसे लट्ठ  मारे हैं इन्हें। बस में ब्रेक तो लगते ही हैं ,इसमें मेरी क्या ग़लती है। ड्राइवर से बोलिये। कई मर्तबा तो ड्राइवर जानबूझकर ज़ोर से  ब्रेक लगाता है ताकि भीड़ पीछे खिसक जाये
खीसें निपोरते हुए वह व्यक्ति अपनी समझदारी झाड़ते हुए कहता है। 
"मैं बहुत अच्छी तरह से जानती हूँ तुम जैसे लोगों की नियत को।अगर ब्रेक लगता है तब तुम लोग खिड़की से बाहर नहीं गिरते,लड़कियों पर ही क्यों गिरते हो?"
गीता अपना आपा खोते हुए कहती है। 
"अरे बेटा ! रहने भी दे अब कौनसे मोती झड़ गये तुम्हारी बहन के जो इतनी लाल-पीली हो रही हो"
एक बुज़ुर्ग औरत अपनी समझ दिखाती हुई गीता से कहती है। 
"अम्माजी! आप जैसे लोगों की करामात से ही इन लोगों को हिम्मत मिलती है। पता नहीं चलता कब आप किस को दोषी क़रार दे दो"
गीता अब भीड़ को भाँप चुकी थी। सभी के चेहरों पर बेशर्म मुस्कुराहट थी। 
"मैडम जी इतने तेवर न दिखाओ। यह बस है,आपके अब्बा की गाड़ी नहीं।यार की बस तो यों हो चलेगी, आप चाहो तो अभी उतर सकती हो
अब कंडक्टर ने अपनी समझ के सारे फीते एक पल में काट दिये। 
"गीता! रहने दे क्यों इन लोगों से उलझ रही है। हम ठीक है न।"
नीतू अपनी मासूमियत से गीता को समझाती है। 
"दीदी ! आप चुपचाप बैठ जाओ। मुझे आप पर सबसे ज़्यादा ग़ुस्सा आ रहा है। किस मिट्टी की बनी हो,थक गयी हूँ आपसे। मेरे सामने और महान मत बनो।"
सभी की निगाहें अब गीता पर टिकीं थीं।  
"बेटी! लड़की हो लड़की ही रहो। अपने ग़ुस्से को पालना सीखो। औरतें बर्दास्त करने के लिये ही होती हैं। हमने अपने समय में न जाने कितना सहा है, तुम क्या जानो आजकल की लड़कियाँ।" 
एक और औरत ने अपनी सहन करने की शक्ति का बखान कर ठण्डी साँस भरी। 
गीता अब अपना आपा खो बैठी -
 "अगर फिर कभी मेरी बहन के साथ बदतमीज़ी की तब सीधा जेल भिजवा दूँगी। समझे !  मैं देख रही हूँ काफ़ी दिनों से, तुम रोज़-रोज़ यही ड्रामे गढ़ते हो। तुम्हें शायद पता नहीं है अगर किसी महिला को तुम लगातार घूरते हो तब भी यह अपराध की श्रेणी में आता है।  समझे!"
"बहनजी बेवजह बात को तूल क्यों दे रही हो। ऐसा क्या किया है मैंने? मान न मान मैं तेरा मेहमान।हमें ही क़ानून का पाठ पढ़ाने लगी हो।"
वह व्यक्ति अब अकड़कर बोला, कुछ अपनी ही ग़लती में डूबता हुआ कुछ नर्वस होता हुआ। 
"फिर कभी किसी लड़की को सताने से पहले अपने दिमाग़ का ढक्कन खोल भेज़े में धारा 354A, 354B, 354c, 354D बिठा लेना,बस में ब्रेक लगते समय होश में रहना सीख जाओगे। समझे !" 
अपने गंतव्य पर उतरते हुए गीता नीतू को इशारा करते हुए बस से नीचे उतरने लगती है।

©अनीता सैनी

9 comments:

  1. सुंदर विचारोत्तेजक लघु कथा। अक्सर महिलाओं से चुप रहने के लिए कहा जाता है लेकिन उन्हें बोलना चाईए।

    कहानी के अंत में जो घुमाव आया वह रोचक है लेकिन अचानक से आता दिखता है। व्यक्ति को वीडियो के विषय में कैसे लगता है यह बात साफ नहीं होती है। अगर होती तो बेहतर रहता। आभार।

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  2. बहुत शानदार प्रस्तुति। प्रेरणादायक किसी अतिक्रमण का विरोध जरूरी है ।
    सार्थक सृजन।

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  3. दिसंबर 2012 में दिल्ली में घटित हुए निर्भया कांड के बाद देश आंदोलित हो उठा कि महिलाओं की सुरक्षा के लिये कड़े से कड़ा क़ानून बनना चाहिए। तब तत्काल प्रभाव से तत्कालीन केन्द्र सरकार ने अवकाश प्राप्त मुख्य न्यायधीश ( अब स्वर्गीय ) माननीय जे.एस.वर्मा जी की अध्यक्षता में महिला उत्पीड़न रोकने हेतु सख़्त क़ानून बनाये जाने की क़वाएद शुरू हुई और अस्तित्त्व में आये नये क़ानून में महिला अधिकारों के लिये संघर्ष कर रहे संगठनों ने अपने सुझाव सम्मिलित करवाये थे जिनमें लगातार घूरना,पीछा करना,बिना मर्ज़ी के छूना,ग़लत इरादे से छूना, शाब्दिक अश्लीलता आदि को अपराध की श्रेणी में लाना था।

    प्रस्तुत लघुकथा समाज की घिसे-पिटे ढर्रे पर चलती व्यवस्था से अलग स्त्री-आत्मसम्मान और महिला उत्पीड़न से जुड़े क़ानूनों की ओर नाटकीयता के साथ इशारा करती है।

    लघुकथा में परंपरागत संवाद-शैली और अनावश्यक विस्तार से बचा जा सकता था।

    अंत में गीता का अति मुखर तेवर महिलाओं में अपने अधिकारों और आत्मगौरव के लिये लड़ने का जज़्बा पैदा करने वाला है। वीडियो का ज़िक्र आधुनिक तकनीक से सबूत एकत्र करने को प्रमुखता देना है बशर्ते स्त्रियाँ तात्कालिक निर्णय ले सकें।


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  4. वास्तविकता का बखूबी चित्रण किया है आपने अपनी इस लघुकथा में इस तरह की घटनाओं से आए दिन महिलाओं का सामना होता रहता है बुरा तब लगता है जब किसी लड़की की मुखरता पर महिलाएं ही बंदिशे लगाना शुरु कर देती है चुप रहो ऐसा चलता है होता है.. हमारे समाज के कुछ कमजोर पहलुओं को तो आपने दर्शाया है और साथ ही साथ अंत में गीता के कठोर प्रतिरोध ने कहानी की दिशा ही मोड़ दी.. सिर्फ वीडियो रिकॉर्डिंग कहां जहां जिक्र आया है वहाँ थोड़ी सी कहानी की लय बिखरी है..।
    कविता लिखने में तो आपको महारत हासिल है ही अब कहानियों की और आप हमें ले जा रहे हैं यह भी बहुत सुखद है

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  5. वाह!सखी अनीता ,सुंदर कहानी ,वास्तविकता का चित्रण बखूबी से किया गया है ।

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  6. सुंदर कहानी 👌👌👌

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  7. समाज का कटु सत्य दर्शाती बहुत ही सुन्दर कहानी.....
    सही कहा औरते अपनी सहनशक्ति का बखान न कर अगर पीड़ित लड़की का साथ दें तो ऐसे नरपिशाचों को थोड़ा भय हो
    बहुत ही सुन्दर लघुकथा एवं लाजवाब लेखन।

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  8. समाज के एक कुत्सित व्यवहार का बहुत ही जानदार शब्दांकन प्रिय अनीता | मुझे नहीं लगता कोई भाग्यशाली एक प्रतिशत महिलाएं इस स्थिति से बची हों | शत प्रतिशत महिला वर्ग को ऐसी स्थितियों से दो चार होना ही पड़ता है | पीड़ित की व्यथा और परेशानी को समझ लोग यदि उसकी साथ आ खड़े हों तो इसके खिलाफ बहुत बड़ा संदेश जाएगा | मौन भी एक तरह का समर्थन है |

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  9. बेहतरीन व लाजवाब सृजन ।

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