Thursday, 28 January 2021

बुज़ुर्ग

            


            "अंक प्लीज़ साइड में ही रहें आप आपके कपडों से स्मैल आ रही।”

बीस-बाईस साल की युवती ने मुँह बनाते हुए नाक को सिकोड़ते हुए।

अभी-अभी मेट्रो में सवार हुए सत्तर-पचहत्तर साल के बुज़ुर्ग लुहार से कहती है।

उसके कपड़े मैले-कुचैले,चेहरे और हाथों पर धूप-मिट्टी ने मिलकर एक परत बनाई हुई थी परंतु बड़ी-बड़ी मूछों में ताव अभी भी था। उसके दोनों कंधों पर लोहे के कुछ बर्तन टंगे थे एक हाथ से मेट्रो में सपोर्ट को पकड़े हुए और दूसरे हाथ में भारी सामान थाम रखा था।जिसे न जाने क्यों वह नीचे नहीं टिकाना चाहता था। लड़की ने जैसे ही उससे कहा वह स्वयं को असहज महसूस करने लगा। चेहरे पर बेचैनी के भाव उभर आए। सहारे की तलाश में वह बुज़ुर्ग इधर-उधर आँखें घुमाने लगा। हर कोई उससे दूरी बनाना चाहता था।

”मैम प्लीज़ आप मेरी सीट पर...।”

पास ही की सीट पर बैठे एक हेंडस्म नौजवान ने हाथ का इशारा किया और लड़की को अपनी सीट दी,हल्की मुस्कान के साथ दोनों ने एक-दूसरे का स्वागत किया। लड़की अब सहज अवस्था में थी। सीट मिलते ही वह अपने आपको औरों की तुलना में बेहतर समझने लगी।

अभी भी बुज़ुर्ग असहज था। उसकी आँखों में बेचैनी, क़दम कुछ लड़खड़ाए हुए से...।

”प्लीज़ टेक सीट।”

तीन-चार सीट दूर बैठे एक विदेशी टूरिस्ट की आवाज़ थी।

 उसने उस बुज़ुर्ग का सामान थामते हुए उसे अपनी सीट पर बैठने का आग्रह  किया।

जिन यात्रियों की आँखें इस घटनाक्रम पर टिकी हुईं थीं एक पल के लिए उनकी पलकें लजा गईं।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Tuesday, 26 January 2021

अंतर

        

                            ”बिटिया लकड़ियों से छेड़खानी नहीं करते काँटा चुभ जाएगा।”

विजया की दादी माँ ने अलाव में कुछ और कंडे डालते हुए कहा।

”अब भगीरथ की दोनों बहुओं को ही देख लो, छोटीवाली तो पूरे गाँव पर भारी है। शदी-विवाह में सबसे आगे रहती है। मजाल जो उसकी ज़बान से एक भी गीत छूट जाए।”

विजया की दादी अलाव से कुछ दूर खिसकती हुई उसके दादाजी से  कहती है।

”अरे! क्यों उनके पीछे लगी रहती है, सीख जाएँगीं धीरे-धीरे।”

और पास खड़ी विजया को वो अपनी गोद में बिठाते है।

”अब और कब सीखेंगीं, कल की ही बात कहूँ; बड़ीवाली से कहा कोठरी से जेवड़ी लाने को, वहाँ बूत बनी खड़ी रही जाने क्या मँगवा लिया हो? इतनी भी समझ नहीं है थारी बीनणियाँ में।”

बहुओं की खीझ लकड़ियों पर उतारते हुए,अंदर-ही अंदर टूट रही होती है।

”आप क्या जानो मेरे मन की पीड़ा दुनिया की बहुएँ इतनी टंच होवें कि सास-ससुर सुख से मर सकें और म्हारे माथे पर ये दोनों एक गूँगी, एक बहरी।”

”ठीक से समझाया करो इन्हें , आधी-अधूरी बात बोलती हो तुम।"

दादाजी  विजया से पानी का गिलास मँगवाते हुए कहते और वह दौड़ती हुई अंदर गई।

”अब पूजा-पाठ भी मैं ही सिखाऊँ? उनके माँ-बाप ने कुछ न सिखाया । म्हारा भी कर्म फूटेड़ा था जो ये दोनों मिली।”

विजया की दादी की चिंताएँ अब आग की लपटों-सी दहकती दिखीं।

”अम्मा मैं अच्छे से सभी गीत सीखूँगी,पूजा भी अच्छे से किया करुँगी और गाय को चारा भी डालूँगी।”

विजया ने दादाजी को पानी का गिलास थमाते हुए कहा।

”न री लाडो! बेटियाँ तो घर में चहकतीं ही अच्छी लगती, मैं तो बहुओं की बात कहूँ तू तो बड़ी हो कलेक्टर बनना।”

दादीजी ने विजया को सीने से लगा लिया।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


हाँ, डायन होतीं हैं !

          ”डायन होतीं हैं। हाँ, धरती पर ही होतीं हैं। अब बस उनके बदन से बदबू नहीं आती। बदसूरत चेहरा ख़ूबसूरत हो गया और न ही उनके होठों पर अ...