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Saturday, 21 December 2019

नागरिकता संशोधन क़ानून


          
                   
नागरिकता संशोधन क़ानून संसद से पास क्या हुआ. देशभर में इसका विरोध किया जाने लगा विरोध की वजह इस क़ानून में पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में धार्मिक रूप से प्रताड़ित हो रहे अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता देने का प्रावधान है. इन देशों से आये ऐसे अल्पसंख्यक शरणार्थी जो दिसंबर 2014 तक भारत में शरण के लिये आये हैं उन्हें भारत का नागरिक बना दिया जाय.इसमें वहाँ के अल्पसंख्यक हिन्दू, सिक्ख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई शामिल हैं. प्रावधान में इस्लाम का ज़िक्र न  करने पर भारत में विरोध के स्वर उभर आये हैं. विरोध केवल मुस्लिम नहीं कर रहे हैं बल्कि इनके साथ धर्मनिरपेक्ष विचार के लोग भी शामिल हैं. 
लोकतान्त्रिक देश में सरकार की नीतियों और पक्षपाती क़ानून का विरोध करना जनता का अधिकार है लेकिन यह हिंसक हो जाय तो इसकी निंदा भी की जानी चाहिये . क़ानून अपने हाथ में लेना, उसकी अवहेलना करना, राष्ट्रीय सम्पत्ति को क्षति पहुँचाना, सुरक्षा बलों पर हमला करना कैसे जाएज़ ठहराया जा सकता है? 
चूंकि भारत सरकार ने घोषणा की है कि इस क़ानून के बाद राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर यानी एनआरसी क़ानून लाया जायेगा. लोगों की आशंकाओं का सरकार ने जवाब दिया है फिर भी लोग संतुष्ट नहीं हैं और सीएए क़ानून को सरकार से लागू न करने की मांग कर रहे हैं आख़िर क्यों ? आपत्ति कहाँ है ?अगर कानून देश हित में है तो क्या हमें अपनी सरकार का साथ नहीं देना चाहिए।सरकारें अपने बोट बैंक के चलते ऐसे क़दम उठती भी बहुत कम है. क्या हमें अपने परिवारों की रक्षा के लिये कोई भी क़दम नहीं उठाना चाहिये. हमें जागरुक होना होगा राजनेता उस मैगी के ऐड की तरह है कभी कहेंगे यह देश हित में नहीं है और दूसरे ही पल कहेंगे इसे लागु होना चाहिये. अब समझने की बात यह है कि वह ऐसा क्यों कर रहे है. देश की उन्नति और उज्ज्वल भविष्य के लिये सार्थक क़दम समय-समय पर उठाने चाहिये. तकलीफ़ होती है उन ग़रीब और कमजोर तबके के लोगों को परेशान होते देख. लेकिन क्या हम कुछ परेशानी अपने देश के लिये नहीं झेल सकते वैसे भी हम ता- उम्र  परेशान ही रहते है.समय और विचारों की सार्थकता को समझते हुये भविष्य में सार्थक क़दम उठाये, राजनितिक संगठनों की बयान बाजी को  देखते हुये हमें स्वय के विवेक से देश हित में प्रयास रत होना चाहिए।जो सही है उसे डर क्या और जो गलत है उसे ज़िद क्यों।  
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हम लोगों से शांति की अपील करते हैं कि विरोध में रैलियों का आयोजन करने वाले राष्ट्रीय संपत्ति का नुकसान होने से बचाएँ और हिंसक आंदोलन को हवा न दें। 


 अनीता सैनी 

Saturday, 7 December 2019

"पुलिस बनी न्यायधीश"


गत 29 नवंबर को हैदराबाद में हुआ 
महिला चिकित्सक का सामूहिक बलात्कार और जघन्य
 क़त्ल देश को झकझोर गया। कल सुबह ख़बर आयी
 कि पुलिस जब इस केस के चारों आरोपियों को रात 3 बजे 
अपराध स्थल पर घटना के सूत्र एकत्र करने के लिये ले गयी जहाँ पुलिस के अनुसार आरोपियों ने 
उनके हथियार छीनकर पुलिस पर हमला करने की कोशिश की तो पुलिस ने उन्हें गोली मारकर मौत की नींद सुला दिया।
अब इस काँड पर देश में एक ओर जश्न मनाया जा रहा है, 
मिठाइयाँ बाँटीं जा रही हैं तो दूसरी ओर पुलिस की करतूत पर सख़्त ऐतराज़ भी किया जा रहा है। किसी भी आरोपी को अपराधी न्याय-तंत्र के द्वारा घोषित किया जाता है। 
पुलिस की थ्योरी अक्सर अदालतों में नकार दी जाती है। 
कई बार आरोपी बदल जाते हैं जैसा कि गुरुग्राम (गुड़गाँव )
 के एक निजी विद्यालय में 2017 में 
एक मासूम बालक की गला काटकर निर्मम हत्या कर दी थी
 तब बस कंडक्टर को पुलिस ने षड्यंत्र के तहत आरोपी बनाया जबकि सीबीआई जाँच में असली अपराधी तो
 उस विद्यालय का ही एक किशोर निकला। मुठभेड़ को तर्कसंगत मानना तभी सही होता है जब अपराधी की स्पष्ट पहचान अदालत द्वारा कर ली जाय या सामने वाला सुरक्षा बल पर हमला करने की स्थिति में सक्षम हो। 
यहाँ त्वरित न्याय का सवाल विवादों के घेरे में आ गया है।  
लोकतंत्र में व्यक्ति के अधिकारों की व्याख्या है तो दायित्वों की भी स्पष्ट परिभाषा उल्लेखित है. भारत में ऐसे अनेक प्रकरण हैं सबूत के रूप में जहाँ पुलिस ने निर्दोष लोगों को आरोपी बनाया है. पुलिस जब ख़ुद ही न्यायाधीश बन जाय तो फिर व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न उठने लाज़मी हैं. पुलिस की मनमानी पर नियंत्रण के लिये अनेक स्तरों पर व्यवस्था की गयी है. 
अभी हाल ही में समाचार आया था छत्तीसगढ़ के सारकेगुड़ा में 2012 में हुआ एनकांटर फ़र्ज़ी था. न्यायिक जाँच में स्पष्ट हुआ कि  सुरक्षा बल ने निर्दोष 17 ग्रामीणों को माओवादी बताकर मार डाला जिसमें नाबालिग भी शामिल थे. क्या हमें ऐसी स्वतंत्रता मिली है जिसमें किसी भी निर्दोष नागरिक को भी इस तरह मौत के घाट उतारा जा सकता है, वह भी सरकारी तंत्र की ग़लत मंशा के चलते जो बहुत बड़ी चिंता का विषय है. ऐसे एनकांटर का शिकार अक्सर ग़रीब ही क्यों होते हैं? समाज में अपराधों का ठीकरा हम ग़रीबों के सर ही फोड़ते हैं लेकिन हम विचार करें कि वे इस स्थिति तक पहुँचे कैसे. ज़रुर उनका किसी ने हक़ छीना है. 
क़ानून का ख़ौफ़ होना चाहिए इस बात पर सभी सहमत हैं लेकिन उसका दुरूपयोग नहीं होना चाहिए. 
जिस दिन हैदराबाद की महिला चिकित्सक के साथ दरिंदगी का भयावह समाचार आया उसी दिन उत्तर प्रदेश, झारखंड और गुजरात से भी महिलाओं पर हुए जघन्य अपराध बलात्कार की ख़बरें थीं लेकिन देशभर की जनता का ध्यान केवल एक घटना पर ही क्यों केन्द्रित किया गया? शायद यहाँ भी राजनीति अपनी कुटिल चाल में सफल हो गयी. 

महिला होने के नाते महिलाओं की अस्मिता पर होने वाले हरेक अत्याचार का मुखर विरोध करूँगी किंतु अपनी मुद्दे के विश्लेषण की क्षमता पर कभी क्षुब्ध नहीं हो सकती.

©अनीता सैनी 

गठजोड़

                  ”इसे संदूक के दाहिने तरफ़ ही रखना।” शकुंतला ताई अपनी छोटी बेटी बनारसी से कहतीं हैं। हल्का गुलाबी रंग का गठजोड़ जिसमें न ज...