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Saturday, 14 January 2023

स्वप्न नहीं! भविष्य था



                       स्वप्न नहीं! भविष्य वर्तमान की आँखों में तैर रहा था और चाँद  दौड़ रहा था।

 ”हाँ! चाँद इधर-उधर दौड़ ही रहा था!! तारे ठहरे हुए थे एक जगह!!!”  स्वयं को सांत्वना देते हुए उसने भावों को कसकर जकड़ा।

धरती का पोर-पोर गहरी निद्रा में था। भूकंप की तीव्रता बढ़ती जा रही थी। तूफ़ान दसों दिशाओं को चीरता हुआ चीख़ रहा था। दिशाओं की देह से टपक रहा था लहू जिसे वे बार-बार आँचल से  छुपा रही थीं। इंसान की सदियों से जोड़ी ज़मीन, ख़रीदा हुआ आसमान एक गड्ढे में धँसता जा रहा था।

”धँस ही रहा था।हाँ! बार-बार धँस ही तो रहा था।” गहरे विश्वास के साथ उसने शब्दों को दोहराया।

चेतन-अवचेतन के इस खेल में उसे घड़ी की टिक-टिक साफ़ सुनाई दे रही थी।

हवा के स्वर में हाहाकार था, रेत उससे दामन छुड़ा रही थी। वृक्ष एक कोने में चुपचाप पशु-पक्षियों को गोद में लिए खड़े थे।उनकी पत्त्तियाँ समय से पहले झड़ चुकी थीं। सहसा स्वप्न के इस दृश्य से विचलित मन की पलकें उठीं, अब उसने देखा सामने खिड़की से चाँद झाँक रहा था।

”हाँ! चाँद झाँक ही रहा था!! न कि दौड़ रहा था।” उसने फिर विश्वास की गहरी सांस भरी।

 फूल,फल और पत्तों रहित वृक्ष एक दम नग्न अवस्था में  उसे घूर रहे थे वैसे ही अपलक घूर रही थी पड़ोसी देश की सीमा। देखते ही देखते सीमा के सींग निकल आए थे। सींगों के बढ़ते भार से वह चीख रही थी। वहाँ स्त्री-पुरुष चार पैर वाले प्राणी बन चुके थे। वे हवा में अपनी-अपनी हदें गढ़ रहे थे। बच्चे भाषा भूल गूँगे-बहरे हो चुके थे। समय अब भी घटित घटनाओं का जाएज़ा लेने में व्यस्त था। मैं मेरे की भावना खूँटे से आत्ममुग्धता की प्रथा को बाँधने घसीट रही थी।

उसने ख़ुद से कहा- ”उठो! तुम उठ सकते हो!! उठ क्यों नहीं रहे हो? देखो! वे अब भी स्वतः अपनी-अपनी हदे गढ़ रहे हैं।”

अर्द्धचेतना में झूलती उसकी चेतना उसे और गहरे में डुबो रही थी।

पशु-पक्षी अब भी सहमे-सहमे पेड़ों की गोद में छुपे बैठे थे। वह पक्षियों को उड़ाना चाह रहा था और पशुओं को दौड़ाना चाह रहा रहा था। इस बार वह चिल्लाया! बहुत ज़ोर से चिल्लाया परंतु उससे चिल्लाया नहीं गया। वह गूँगा हो चुका था ! ”हाँ! गूँगा ही हो चुका था!! ”उसने ने देखा! उसके मुँह में भी अब जीभ नहीं थी।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Saturday, 24 December 2022

डर

           


                                    कुछ रोज़ पहले ही सुगणी गाँव से शहर आई थी। शहर की सखी-सहेलियों को उसका रहन-सहन रास नहीं आया था। वह इच्छा से भरी मासूम बदरी थी। जहाँ चाहे वहीं बरस जाती थी। चूड़ी, चप्पल, बिंदी और लाली सब की चाह लिए दहलीज पर खड़ी रहती। मनिहार को आते-जाते देखती और देखती ही रह जाती।उसे वह सब कुछ चाहिए होता, जो उसकी सखी सहेलियों के पास होता।

उसकी एक सहेली ने बताया इसे देखना नहीं आता फिर झुँझलाकर उसी ने कहा-”अरे! दिखता ही नहीं है इसे।”

जब सुगणी से साँची ने पूछा तब उसने कहा-

"सब कहते हैं मेरी आँखें नहीं हैं, मेरी आँखों को जो जँचता है वह मेरे आदमी को नहीं जँचता।” कहते हुए वह अपलक कोरे आसमान को घूरने लगती थी।बड़ी-सी बिंदी, उससे भी बड़ी नथनी और उससे भी बड़ी-बड़ी आँखें। उन आँखों में रमे काजल पर ठहरी लालासा की दो बूँदें, जिसे उसकी आँखें बड़ी चतुराई से घोलकर पी लिया करती थी।

"मुझे देखने ही कब दिया? पहले मेरी माँ! फिर इसकी माँ!!  अब यह खुद!!!" न चाहते हुए भी वह भोर-सी बिखर पड़ी। रात की उतरी चादर में गुम नजरिया ढूँढ़ती।

”कुछ समय पहले तक मेरे पास भी आँखें नहीं थीं, लोग दिखाते मैं भी वही सब देख लेती।" साँची ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।

" सच कह रही हैं आप! मेरा उपहास तो नहीं उड़ा रही न?.” वह हल्की-सी हँसी के साथ कुछ शरमाई और फिर खुद में सिमटकर रह गई थी।

"नहीं सच! कसम से!!” साँची ने विश्वास के साथ कहा।

"फिर!” वह धीरे से बोली।

" फिर क्या? फिर मेरे आत्मचेतना के अँखुए उग आए उन्हें महसूस किया। कुछ समय पश्चात धीरे-धीरे मुझे दिखने लगा।” साँची ने उसके विश्वास को और गहरे विश्वास के रंग में रंगते हुए कहा परन्तु न जाने क्यों फिर भी उसने पैर दहलीज के अंदर खींच लिए?


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


Thursday, 8 December 2022

मुखरित मौन

                   


                           "काल के क़दमों की आहट हूँ मैं! मेरा प्रभुत्व समय की परतों पर लिखा है।”  चट्टानों पर अपने नाम को अंकित करते हुए पुरुष ने स्त्री से कहा।

”ओह! बादल बरसे तब जानूँ मैं !” जेष्ठ महीने की तपती दुपहरी में स्त्री ने पुरुष  को परखते हुए कहा। कुछ समय पश्चात काली-पीली घटाएँ उमड़ी और बरसात की बूँदों से मिट्टी महक उठी जिसकी ख़ुशबू से  मुग्ध स्त्री झूम उठी।

” ठीक है! अब धूप के टुकड़े बिखेरकर बताओ तब लगे तुझ में कोई बात है!” साँझ के बढ़ते क़दम देख स्त्री ने पुरुष से फिर कहा।तभी माथे पर इंद्रधनुष सजाए कुछ पल के लिए आसमान धूप से चमक उठा।

"अच्छा! अब साँझ के आँगन में दीप जला कर दिखाओ ।" स्त्री ने पुरुष के सीने से लगते हुए कहा। पलक झपकते ही आसमान में तारे चमक उठे। चाँद उनकी टोह लेने देहरी पर खड़ा था। दोनों का प्रेम परवान चढ़ ही रहा था कि प्रेम में आकंठ डूबी स्त्री ने पुरुष से एक और इच्छा जताते हुए कहा- "चलो! अब मुझे पंख भी लगा दो।” सहसा स्त्री के शब्दों से पुरुष बिफर उठा।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Thursday, 1 December 2022

दर्द का कुआँ

                    


                           वह साँझ ढलते ही कान चौखट पर टांग देती और सीपी से समंदर का स्वर सुनने को व्याकुल धड़कनों को रोक लिया करती थी। बलुआ मिट्टी पर हाथ फेरती प्रेम के एहसास को धीरे-धीरे जीती थी।

हवा के झोंके से हिली साँकल के हल्के स्वर पर उसकी आँखें बोल पड़ती और वह झट से उठकर दूर तक ताकती सुनसान रास्तों को जिन पर सिर्फ़ चाँद-सूरज का ही आना-जाना हुआ करता था।

     उसका प्रेम दुनिया के लिए पागलपन और उसके लिए एहसास था जिससे सिर्फ़ और सिर्फ़ वही जीती थी। घर पर नई रज़ाई और एक गद्दा रखती थी।

 कहती थी- ”पता नहीं किस बखत उसका  आना हो जाए? आख़िर घर पर तो सुख से सोए।”

हवाएँ कहतीं हैं-  कारगिल-युद्ध का स्वर सुनाई देता था उसे,वही स्वर होले-होले लील गया। वह मुंडेर पर रोटी रख कौवे के स्वर से हर्षा उठती परंतु आसमान में उड़ते हवाई जहाज़ के स्वर से घबरा जाती थी। अकेली नहीं रहती थी खेत पर! पति ने  पानी का कुआँ खुदवाकर दिया था। उसी के साथ रहती थी।

कभी कभार भोलेपन से कहती - ”कोई मेरा कुआँ चुरा ले गया तो! ” गाँव उसके लिए शहर था और शहर एक स्वप्न नगरी।

उसकी सहजता ने ही गाँव भर में ढिंढ़ोरा पिटवा दिया था कि "ग़रीब घर की लड़की थी। कुछ देखा-भाला था नहीं, पानी का कुआँ देखा; इसी से दिल लगा बैठी।”

उसके घर से कुछ दूरी पर एक सत्य का वृक्ष खड़ा था , वह सत्य ही बोलता। कहता -” बच्चों को मायके लेकर गई थी, घरवालों ने पीछे से शहीद का दाह-संस्कार कर दिया। रहती भी तो गाँव के बाहर थी कौन आता कहने?  साल-छः महीने बाद पता चला तभी से बेताल बन घूमती रहती थी इसी चारदीवारी में, आने-जाने वालों से एक ही प्रश्न पूछती थी - " युद्ध कब ख़त्म होगा?”


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Thursday, 17 November 2022

भूख


                    बारह महीनों वह काम पर जाता। रोज़ सुबह कुल्हाड़ी, दरांती कभी खुरपा-खुरपी तो कभी फावड़ा, कुदाल और कभी छोटी बाल्टी के साथ रस्सी लेकर घर से निकल जाता। शाम होते-होते जब वह वापस घर लौटता तब गुनहगार की भांति नीम के नीचे गर्दन झुकाए बैठा रहता। दो वक़्त की रोटी और दो कप चाय के लिए रसोई को घूरता रहता।

बाहर बरामदे में खाट पर बैठी उसकी बूढ़ी माँ, उसके द्वारा मज़दूरी पर ले जाए गए औज़ार देखकर तय करती कि आज उसकी मज़दूरी क्या और कितनी होगी? उसी के साथ यह भी तय करती कि शाम को घर लौटेगा कि न

”आज कुल्हाड़ी लेकर नहीं! फावड़ा, कुदाल और छोटी बाल्टी के साथ रस्सी लेकर निकला है, अब पाँच दिन तक घर की ओर मुँह नहीं करेगा।”  उसके जाते ही उसकी बूढ़ी माँ रसोई की खिड़की की ओर मुँह करते हुए ज़ोर से आवाज़ लगाती है। उसकी पत्नी  बुढ़िया का मंतव्य समझ जाती कि वह क्या कहना चाहती है।

” जगह है क्या उसे कहीं और?” इन्हीं शब्दों के साथ रसोई में दो-चार बर्तन गिरने की आवाज़ के साथ ही वह खाली पड़े पतिलों को ताकती है। 


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Wednesday, 2 November 2022

वीरानियों के सुर



           चित्तौड़ दुर्ग में विजय स्तंभ के पास घूमते हुए वह रानी पद्मिनी-सी लग रही थी।

शादी के चूड़े को निहारती बलाएँ ले रही थी अपने ख़ुशहाल जीवन की, सूरज की किरणों-से चमकते सुनहरे केश, खिलखिलाता चेहरा, ख़ुशियाँ माप-तौलकर नहीं, मन की बंदिशों को लाँघती दोनों हाथों से लुटाती जा रही थी।

प्यारी-सी स्माइल के साथ उसने रिद्धि की ओर फोन बढ़ाते हुए कहा-

”दीदी!  प्लीज एक पिक…।”

” हाँ!  क्यों नहीं… ज़रूर !” रिद्धि ने कहा।

उसने प्रसन्नता ज़ाहिर करते हुए कसकर अपने पार्टनर को जकड़ा और कैमरे के सामने प्यारी-सी मुस्कान के साथ मोहक पोज दिया।

” यार शालीनता से … ! फोटोग्राफ़ मम्मी-पापा और दादी को भी भेजने हैं।”

उसके पार्टनर ने कहा।

पार्टनर के शब्दों से वह सहम गई और शालीन लड़की के लिबास में ढलने का प्रयास करने लगी।

अगले ही पल वे दोनों रिद्धि की आँखों से ओझल हो गए।

वहीं मीराँ मंदिर के पास पद्मिनी जौहर-कुंड की वीरानियों ने रिद्धि को जैसे जकड़ लिया हो या कहूँ वह उन्हें भा गई और उन्होंने हाथ पकड़ वहीं पत्थर पर रिद्धि से बैठने का आग्रह किया। वे एक-दूसरे के प्रेम में डूब चुकी थीं। एक ओर मीराँ का विरह अश्रु बनकर बह रहा था तो दूसरी तरफ़ पद्मिनी का जौहर-कुंड उसे जला रहा था। उन वीरांगनाओं के सतीत्व के तप से रिद्धि मोम की तरह पिघलने लगी थी, अचानक उसके कानों में एक स्वर कोंधा।

”तुम्हारा ही पल्लू कैसे फिसलता है यार और ये फूहड़ हँसी ?”

सहसा उसके पार्टनर का स्वर रिद्धि के कानों से टकराया परंतु उसकी आँखों ने अनदेखा करना मुनासिब समझा। 

”बचकानी हरकत करते समय निगाहें इधर-उधर दौड़ा लिया करो यार।” उसका पार्टनर सहसा फिर झुँझलाया।

जो चिड़िया फुदक-फुदककर चहचहाती डालियों पर झूला झूल रही थी अब वह लोगों से नज़रें चुरा रही थी।

 रिद्धि ने बेचैन निगाहों से उनकी ओर देखा! और देखती ही रह गईं कि एक पद्मिनी मीराँ बनकर घर लौट रही थी।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Saturday, 1 October 2022

लकीरें


                           " कामवालियों के हाथों में लकीरें नहीं होतीं!” मेहँदी रचे हाथ दिखाते हुए वह उसकी हथेली देखते हुए कहती है।

उसने पीछे मुड़कर उसको जाते हुए देखा और फिर बर्तन धोने लगी।

”तुम्हें दुख नहीं होता ?”

धुली कटोरियाँ उठाते हुए दूसरी ने कहा।

"ज़िंदगी की आपा-धापी में बिछड़ गए सुख-दुख।” पथराई आँखों से कैलेंडर को ताकते हुए वह कहीं खो जाती है।सहसा फिर चुप्पी तोड़ते हुए कहती है -

 ”पत्ते सरीखे होते हैं दुःख, अभी ड्योढ़ी तक बुहारकर आई हूँ !”

उसाँस के साथ साड़ी से हाथ पोंछते हुए ढलते सूरज की  हल्की रोशनी में अपनी सपाट हथेली पर उसने फिर से लकीरें उगानी चाहीं।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Tuesday, 27 September 2022

भेड़िया

         




         

                   भोर की वेला में सूरज अपना तेज लिए आँगन में उतरते हुए कह रहा था- "देख!  मैं कितना चमक रहा हूँ। बरसाता कच्ची धूप काया की सारी थकान समेटने आया हूँ।"

 रेवती कह रही थी-  ” दूर हट मरजाणा! सर पै मंडासो न मार।”

  तभी उसके दरवाज़े पर दस्तक होती है।

”ताई देख! कौण आया है?” श्यामलाल ने दूर खड़ी एक औरत की ओर इशारा किया।

”क्यों, तेरे बाप ने दूसरा विवाह कर लिया क्या?”रेवती ने बाड़ पर फैली तोरई और घीया की बेल ठीक करते हुए बिना देखे ही कहा।

” कभी तो सीधे मुँह बात कर लिया कर ताई।”श्यामलाल ने झुँझलाते हुए कहा ।

”ठीक है, मुँह मोगरी-सा न बना; बता कौण है?” रेवती ने पलटकर देखते हुए कहा।

”दिखती तो औरत ही है, भीतर क्यों न आई बैरन।” रेवती ने माथे पर हाथ सटाकर कहा।

”कांता! ओह!! म्हारी कांता।यह वही कांता है जो वर्षों पहले रूठकर चली गई थी। देख तो! कितनी काली पड़ गई है म्हारी छोरी। तेरे ख़सम के अनाज कम पड़ गया था के ?” बड़बड़ाते हुए अपनी बेटी की ओर दौड़ी तो ख़ुशी में बढ़ते कदम सहसा रुक गए।

” ठहर कांता! तू ऐसे ना जा सके। सुन बावली! आठ वर्ष की छोरी न बाप कोण्या मिला करें।”

कहते हुए रेवती आवाज़ पर आवाज़ दिए जा रही थी।

"नहीं!नहीं!! और न सह सकूँ अब,मेरा है ही कौण यहाँ?”

आठ साल की बच्ची की ऊँगली पकड़े  कांता तेज़ गति से चलती जा रही थी। बेटी रीता माँ!माँ!! पुकारती पाँव पीछे खींच रही थी।

"ठहर! एक बार सुन बावली!!”

रेवती बाँह फैला कांता को जाने से रोक रही थी।

वर्षों पहले गुज़रा समय आज फिर आँखों के सामने कांत को देख बिखर गया।

उसकी कानूड़ी कुछ ही दूरी पर उसी बाड़ के पास खड़ी आँसू बहा रही थी।

”माँ तू ठीक कहती थी! छोरी न बाप कोन्या मिला!” कहते हुए माँ से लिपट कांता फूट-फुटकर रोने लगी।

गाँव की सबसे होनहार ज़िद्दी,पढ़ी-लिखी लड़की कांता उस समय की पाँचवी पास। दुनिया से टकराने का जुनून,विधवा हो प्रेम विवाह रचाकर निकली थी गाँव से।

”मैं न कहती मरो मास न छोड़े ये भेड़िया,  तू तो जीवती निकली।” कहते हुए रेवती बेटी और नातिन की हालत पर फूट-फूट कर रोने लगी थी।

”कितनी उम्र में लेकर भाग गया छोरी ने तेरो ख़सम।” रेवती ने बेटी से सीधा प्रश्न किया।

”पंद्रह-सोलह की ही हुई थी कि हरामी की नज़र पहले से थी।” कांता ने अपनी ओढ़णी से नाक पोंछते हुए कहा।

”हूँ! तब तो ठीक है छोरी स्याणी होगी ही।”  रेवती ने बरामदे में बैठते हुए कहा।

”माँ! मेरी छोरी ऐसी न थी, बहला-फुसला लिया उस हरामी ने।” कांता ने मुँह बनाते हुए कहा।

"छोरी तो म्हारी भी ऐसी न थी उसी हरामी ने फाँस लिया ।” रेवती ने एक-एककर तोरई और घीया को टोकरी से बाहर बरामदे में रखते हुए कहा।  


@अनीता सैनी 'दीप्ति' 

Wednesday, 21 September 2022

भावों की तपिश


          ”हवा के अभाव में दम घुटता है, हमारा नहीं; पहाड़ों का। द्वेषी है! पेड़ों को पनपने नहीं देता!! "

पहाड़ों पर भटकते एक पंछी ने फोन पर अपनी पत्नी से कहा।

"कौन है द्वेषी?"

पत्नी ने सहज स्वर में पूछा।

”सूरज! कुछ दिनों से पृथ्वी से अनबन जो चल रही है उसकी !!”

पंछी सूरज, पृथ्वी और पहाड़ों से अपनी नज़दीकियाँ जताते हुए बड़ी चट्टान के सहारे  पीठ सटाकर बैठते हुए कहता है।

”तुम सुनाओ! तुम्हारे यहाँ क्या चल रहा है?

पंछी ने व्याकुल स्वर में पूछा।

”कुछ नया नहीं!  वही रोज़ का रुटीन!! दैनिक कार्यों में व्यस्त धूप धीरे-धीरे दिन सोख रही है। तीसरे पहर की छाँव तारीख़ से मिटने की पीड़ा में दहलीज़ पर बैठी है। समय चरखे पर लिपटने के लिए तेज़ी से दौड़ रहा है।”

पत्नी ने दिन का ब्यौरा देते हुए एक लंबी सांस भरी।

"और पौधे?” पंछी ने तत्परता से पूछा।

”पौधे नवाँकुर खिला रहे हैं तो कहीं फूलों में रंग भर रहे हैं।”

पत्नी ने बड़ी सहजता से कहा।

”हूँ " के साथ पंछी और पहाड़ों ने गहरी सुकून की सांस भरी जैसे हवा का झोंका नज़दीक से गुज़रा हो!


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Saturday, 20 August 2022

ख़ामोश सिसकियाँ

                              


                                      ”देख रघुवीर ! इन लकड़ियों के पाँच सौ से एक रुपया ज़्यादा नहीं देने वाला। तुमने कहा यह चार खेजड़ी की लकड़ियाँ हैं, यह दो की भी नहीं लगती!”

दोनों हाथ कमर पर धरे एक पैर आगे बढ़ाए खड़ा प्राइमरी स्कूल का अध्यापक व रघुवीर का छोटा भाई धर्मवीर।

”कैसे नहीं लगती दोनों जगह वाली दो-दो खेजड़ी की लकड़ियाँ हैं, पूछो सुनीता, सुमन और सजना से, हम चारों ने मिलकर इकट्ठा की हैं।”

रघुवीर चोसँगी ज़मीन में गाड़ते हुए पसीना पोंछता है।

”देख भाई!  पाँच सौ से एक रुपया ज़्यादा नहीं देने वाला,तू जाने तेरा काम जाने; अब तू यह बता सुखराम दो दिन से स्कूल क्यों नहीं आ रहा?”

धर्मवीर रघुवीर की दुःखती रग पर हाथ रखते हुए ऊँट पर बैठे सात साल के सुखराम की ओर इशारा करता है, सुखराम अध्यापक कहे जाने वाले काका को देखता हुआ दाँत निपोरता है।

”काका! काका! यह हमारे साथ भट्टे पर मिट्टी खोदने जाता है।”

तीनों लड़कियाँ एक स्वर में एक साथ बोलती हैं।

” तू इन छोरियों के जीवन से कैसा खिलवाड़ कर रहा है? पास ही के गाँव के स्कूल में दाख़िला क्यों नहीं करवाता इनका!”

पास पड़ी लकड़ियों को धर्मवीर घूम-घूमकर देखता है। ”हाँ लकड़ियाँ हैं तो मोटी-मोटी, बढ़िया है। आड़ू को क्या पता मन और पंसेरी का ?”

रघुवीर की मासूमियत पर धर्मवीर अपनी राजनीति का लेप चढ़ाता है।

”तू अपने भट्टे पर पराली क्यों नहीं काम में लेता? खेत की लकड़ियाँ मेरे भट्टे पर डाल दिया कर, मैं छोरियों के स्कूल की व्यवस्था करता हूँ। तू  निरा ऊँट का ऊँट रहा, इन्हें तो इंसान बनने दे!”

कहते हुए धर्मवीर सूरज को ताकता हुआ वहाँ से स्कूल के लिए निकल जाता है।

बापू ! बापू ! स्कूल जाना है हमें।”

सुमन, सजना मन को पसीजते हुए कहती हैं।

”दिखता नहीं ! बापू की आँख में पसीना चला गया। चल दूर हट छाँव में बैठने दे!”

बड़ी लड़की सुनीता अपने पिता रघुवीर की ओर पानी से भरा जग बढ़ाती है।

”कलियुग में कौवों का बोलबाला है। कैसे बचेंगीं चिड़ियाँ ? कौन पिता होगा जो नहीं चाहता हो कि उसकी बेटियों को पंख और खुला आसमान न मिले?”

रघुवीर घर्मवीर की ओर देखता हुआ अंगोंछा सर पर कस के बाँधता है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

स्वप्न नहीं! भविष्य था

                       स्वप्न नहीं! भविष्य वर्तमान की आँखों में तैर रहा था और चाँद  दौड़ रहा था।  ”हाँ! चाँद इधर-उधर दौड़ ही रहा था!! तारे ठह...