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Wednesday, 18 May 2022

पत्थरों की पीड़ा



"तोगड़े!  रिश्तों से उबकाई क्यों आने लगती है? ” कहते हुए वितान पलकों पर पड़े बोझ को तोगड़े से बाँटना चाह रहा था।

"श्रीमान! सभी अपनी-अपनी इच्छाओं की फिरकी फेंकते हैं जब वे पूरी नहीं होतीं तब आती है उबकाई।"

तोगड़े ने हाज़िर-जवाबी से उत्तर देते हुए कहा।

"पिछले पंद्रह महिनों से पहाड़ियों के बीचोंबीच यों सुनसान टीसीपी पर बैठना ज़िम्मेदारी भरा कार्य नहीं है ?"

वितान कुर्सी पर एक लोथड़े के समान पड़ा था। जिसकी आँखें तोगड़े को घूर रही थी। घूरते हुए कह रहीं थीं- ”बता तोगड़े, हम क्यों हैं?धरती पर,आख़िर हमारा अस्तित्व ही क्या है? क्यों नहीं समझती दुनिया कि छ: महीने में एक बार समाज में पैर रखने पर हमें कैसा लगता है?”

"क्यों नहीं? है श्रीमान! है, ज़िम्मेदारी से लबालब भरा है। दिन भर एक भी गाड़ी यहाँ से नहीं गुज़रती फिर भी देखो! हम राइफल लिए खड़े रहते हैं।" कहते हुए- तोगड़े राइफल के लेंस में पहाड़ियों को घूरता हुआ। वहाँ घूमती परछाई खोज रहा था।

"तोगड़े!" कहते हुए वितान ने चुप्पी साध ली ।

" हुकुम श्रीमान।” कहते हुए तोगड़े राइफल के लेंस में देखता ही जा रहा था।

"तुम्हारी पत्नी,दोस्त और घरवाले शिकायत नहीं करते तुम से तुम्हारी ज़िम्मेदारियों को लेकर।" कहते हुए वितान ने अपनी उलझनों को एक-एक कर सुलझाने के प्रयास के साथ अपनी ज़िंदगी से पूछना चाह रहा था। "कि आख़िर उसने किया क्या है?”

"नहीं साहेब! पत्नी को टेम कहाँ ? खेत-खलिहान बच्चे, चार-चार गाय बँधी हैं घर पर। छुट्टी के वक़्त उसे याद दिलाना पड़ता है कि मैं भी घर पर आया हुआ हूँ, पगली भूल जाती है।"

तोगड़े का अट्टहास वितान को गाँव की गलियों में दौड़ा रहा था। वह यादों के हल्के झोंकों की फटकार को थामकर बैठना चाहता था।

"साहेब! समाज में सभी का पेटा भरना पड़ता है। नहीं तो कौन याद रखता है हम जैसे मुसाफ़िरों को, दोस्तों को एक-एक रम की बॉटल चाहिए। घरवालों को पैसे और पत्नी को कोसने के लिए नित नए शब्द, बच्चों के हिस्से कुछ बचता ही कहाँ है? शिकायतों के अंकुर फूट-फूटकर स्वतः ही झड़ जाते हैं।"

वितान की मायूस आँखों को हँसाने के प्रयास के साथ तोगड़े दाँत निपोरता हुए टीसीपी के गोखे में रखी पानी की बॉटल को कोसने लगा।

 तपते पहाड़ो से गुज़रते शीतल झोंको के साथ वितान अपनों की स्मृतियों को और गहरे से उकेरने में मग्न हो गया।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

दर्द का कुआँ

                                                 वह साँझ ढलते ही कान चौखट पर टांग देती थी और सीपी से समंदर का स्वर सुनने को व्याकुल धड़कनों ...