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Monday, 28 March 2022

परिवर्तन



                  ” न री ! पाप के पैरों घुँघरु न बाँध; तेरे कलेजे पर ज़िंदा नाचेगा ज़िंदगी भर।”

बुलिया काकी का अंतरमन उसे कचोटता है। हाथों में लहू से लथपथ बच्ची को माँ के पेट पर डालती है और बाँस का टुकड़ा टटोलने लगती है।

"अरे आँखें खोल शारदा! वे ले जाएँगे करमजली को।"

बुलिया काकी नाल काटते हुए शारदा को होश में लाने का प्रयास करती है। शारदा की यह चौथी बिटिया थी, दो को  ज़िंदा दफ़ना दिया, एक दरवाज़े के बाहर बाप के पैरों से लिपटी खड़ी है। कि इस बार वह अपने भाई के साथ खेलेगी।

”काकी-सा इबके लला ही आया है ना...।”

दर्द से कराहते, लड़खड़ाते शब्दों के साथ प्रसन्नचित्त स्वर में शारदा पूछती है।

" ना री तेरा द्वार पहचानने लगी हैं निर्मोही, मेरे ही हाथों जनती हैं मरने को।"

बुलिया काकी माथा पीटते हुए वहीं चारपाई पर बैठ जाती है। शारदा लटकते पल्लू से बच्ची को ढक लेती है।

"काकी-सा दरवाज़ा खोल दो, उन्हें अंदर आने दो….।"

शारदा दबे स्वर में दरवाज़े की ओर इशारा करती है।

स्वर भारी था-” काकी बिटवा है ना?"

मदन चारपाई के पास झुकता हुआ पूछता है। दोनों औरतें एक टक मदन को ख़ामोशी से घूरतीं हैं मदन लड़की को बिना देखे ही समझ लेता है कि लड़की हुई है,पैर पकड़ वहीं काकी के पास बैठ जाता है।

"वे आप के माँ-बाप थे? आप थी वह लड़की  या कोई और ?" स्मृतियों में खोई पार्वती दादी को नीता टोकते हुए कहती है।

पार्वती दादी स्मृति में डूब चुकी थी समय लगता था उन्हें  वापस आने में।

"मदन न मारता, अपनी बेटियों को! दहेज का दानव आता, उठा ले जाता गाँव की बेटियों को, माँ- बाप तो कलेजा पीटते, कोई छुड़ाता न था।"

पार्वती दादी के चेहरे की झुर्रियों से झाँकती पीड़ा कई प्रश्न लिए खड़ी,दो घुँट पानी पिया और पथरई आँखों से घूरते हुए कहती।

"आज भी खुले आम घूमता है दानव, जो बेटियाँ बहादुर होती हैं जीत लेती हैं, जो लड़ना नहीं जानती उसे उठा ले जाता है आता तो आज भी है, गला नहीं घोंटता, धीरे-धीरे ख़ून चूसता है, हाँ आता तो आज भी है।”

पार्वती दादी पूर्ण विश्वास के साथ अपने ही शब्दों का दोहराव करती हैं।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Tuesday, 15 March 2022

मैं हूँ


                       “मेरा ईमेल चैक करते रहना, ख़ैर ख़बर मिलती रहगी कि मैं हूँ।”  उस दिन फोन पर प्रदीप के शब्दों में जोश नहीं, प्रेम था। प्रेम जो सांसों से बहता हुआ शब्दों में ढलता कह रहा हो बस आख़िरी मिशन... फिर रिज़ाइन लिख दूँगा, अब बस और नहीं होती यह नौकरी।

"मैं हूँ से मतलब …?” कहते हुए भावातिरेक में तान्या के शब्द  लड़खड़ा रहे थे। वाक्यों की गठान ठीक न जोड़ पाई। उसने प्रदीप को इतना पढ़ा कि उसके इन शब्दों का प्रत्युत्तर ठीक से नहीं दे सकी। फिर चाहे किताब हो या इंसान; अक़्सर ऐसा होता है, ज़्यादा पढ़ने से तारतम्यता टूट जाता है।

 “मैं हूँ से मतलब मैं हूँ…।" हल्के स्वर में प्रदीप ने ये शब्द फिर दोहराये थे। इस बार गला रुँधा हुआ नहीं था, अपितु जोश था। नहीं रुँधा हुआ था। इन्हीं ख़्यालों में गुम तान्या कॉरिडोर में रखी ख़ाली कुर्सी को एक टक ताक रही थी। एक पखवाड़ा बीत गया प्रदीप की व्यस्तता के चलते न कोई ईमेल न ही फोन बस का एहसास था।

 “मैं हूँ”


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Wednesday, 9 March 2022

वज्राहत मन

          


                 ”अम्मा जी आपके साथ और कौन-कौन है?” कहते हुए नर्स ड्रिप बदलने लगती है।

”हाँ…हाँ… वे!” कहते हुए अम्मा जी टुकुर-टुकुर नर्स को घूरने लगती हैं ।अम्मा जी की स्मृति विस्तार पर प्रश्न वाचक का लोगो लगा हुआ था।नर्स डॉ. को जो जो सुनाना चाहती, वही उन्हें सुन जाता। दिखाई भी वही देता, नर्स डॉ. को जो जो दिखाना चाहती।

”अम्मा जी कुछ स्मरण हुआ ?” नर्स जाते-जाते यही शब्द फिर दोहराती है। अम्मा जी को कुछ याद आता है परंतु याद की तरह नहीं बल्कि छींक की तरह, उमड़ता है फिर चला जाता है । नर्स को फिर टुकुर-टुकुर देखने लगती है।

”बड़ी शांत और सुशील हैं अम्मा जी।”कहते हुए पाँच नंबर बैड का पेशेंट अम्मा जी के पास से गुजरता है।

"ओह! शांत और सुशील! " व्यंग्यात्मक स्वर में नर्स यही शब्द फिर दोहराती है। अम्मा जी को भी यही  सुनाई देता हैं।

”हाँ…हाँ…हाँ…शांत…सुशील… !” स्मृतियाँ अब अम्मा जी के बुखार की तरह धीरे-धीरे उमड़ती हैं। बहुत देर तक स्थाई रहती हैं। माथे पर ठंडे पानी से भीगी  पट्टी रखी जाती है। गहरी साँस के साथ चारों तरफ़ देखती हैं परंतु दिखता नहीं है।स्वयं के साथ संघर्ष कर आजीवन अर्जित किया ख़िताब अम्मा जी के होंठो पर फिर टहलने लगता हैं।

”शांत… सुशील…।”


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Tuesday, 1 March 2022

ज्ञान सरोवर



   ” मालिक! मैं यह न समझ पाया, आप कब हो आए? ज्ञान सरोवर!” नाथू जमीन पर सोने के लिए प्लास्टिक का त्रिपाल बिछाता है।

” सात पीढ़ियों पहले हमारे पूर्वज होकर आए, हमारे तो ख़ून में बहता है ज्ञान।”

हुक्के की गुड़-गुड़ के साथ जमींदार का सीना छह इंच और चौड़ा हो जाता है। इस वार्तालाप के साक्षी बने चाँद- तारे घुटनों पर ठुड्डी टिकाए आज भी वैसे ही ताक रहे हैं जैसे वर्षों पहले ताक रहे थे।

” अब मालिक पीछला हिसाब कर ही दो, सोचता हूँ मैं भी ज्ञान सरोवर हो ही आता हूँ।”नाथू विचलित मन से जल्दी-जल्दी हाथों से त्रिपाल की सलवटें निकालने लगता है।

”अरे! ऐसे कैसे हो आते हो? वो तो बहुत दूर है!”

हुक्के की गुड़-गुड़ और तेज हो जाती है।

”कितना दूर मालिक, चाँद पर तो न ही ना?”

नाथू हाथ में लिया अंगोंछा सर के नीचे लगा लेता है।

"मानसरोवर के भी उस पार, नाम सुना है कि नहीं? उससे भी कई पहाड़ी ऊपर, तुम रहने दो मर मरा जाओगे कहीं!” कहते हुए -

काली रात में नील गायों के आने की सरसराहट सुनते हुए जमींदार ने निगाह दौड़ाई।

”अब सोचता हूँ मालिक, कब तक आपही की खींची लकीरें देखता रहूँगा। कुछ कहूँ तब आप उपले की तरह  बात पलट देते हो।”

नाथू हाथ में अंगोंछा लिए, फिर घुटनों के बल बैठ जाता है।

”फिर?”

 जमींदार प्रश्न करता है।

” फिर क्या? यों हांडी में सर दिए नहीं बैठूँगा।अपनी लकीर खींचूँगा।”

नाथू मुँह पर अंगोंछा डालकर सो जाता है। रात भर हुक्के की गुड़-गुड़ उसके कानों में गुड़कती रहती है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

स्वप्न नहीं! भविष्य था

                       स्वप्न नहीं! भविष्य वर्तमान की आँखों में तैर रहा था और चाँद  दौड़ रहा था।  ”हाँ! चाँद इधर-उधर दौड़ ही रहा था!! तारे ठह...