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Wednesday, 27 April 2022

मोजड़ी


                   " माँ! बहुत चुभती हैं मोजड़ी।”

 रुआँसा चेहरा लिए, पारुल ने अपना दिल माँ की गोद में रखा। इसी उम्मीद में कि माँ उसे सहलाकर सँभाल लेगी।

" नई मोजड़ी,  सभी को अखरती हैं! धीरे-धीरे इनकी ऐसी आदत लगती है कि कोई और जँचती ही नहीं ।"

माँ झूठ-मूठ की हँसी होठों पर टाँकते हुए बेवजह मेहंदी के घोल को और घोंटती जाती है।

"इनसे से पैरों में पत्थर भी धँसते हैं।"

पारुल अपने ही पैरों की ओर एक टक देखती है। मासूम मन छाले देख सहम जाता है।

 शून्य भाव में डूबी माँ दर्द, पीड़ा; प्रेम इन शब्दों के अहसास से ऊपर उठ चुकी है।बस एक शब्द है गृहस्थी जिसे वह खींचती रहती है। पारुल के पैरों में पड़े छालों पर मेहंदी का लेप लगाते हुए स्वयं के जीवन को दोहराती कि कैसे जोड़े रखते हैं रिश्तों की डोर? माँ परिवार शब्द से बाहर नहीं निकली, इसी शब्द में डूब चुकी है। कभी-कभी तो माँ के हाथों से छूट चेहरे से चिपक जाती है थकान, परंतु माँ है कि बोलती नहीं है। बस एक ही शब्द हाँकती है कुटुंब । यह शब्द पारुल के लिए नया है, तभी चुभती हैं उससे मोजड़ी।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Saturday, 23 April 2022

धरा की अंबर से प्रीत



               "जलती थी देह! अंबर ने छिटकी थी प्रेम की बूँदें!"

भावशून्य निगाहों से धरा, निशा को एक टक निहारती है।निशा सन्नाटे में सिमटी तारों जड़ा आँचल ओढ़े चाँदनी छान रही है।

 बाहों में ले कहता- " ख़्याल रखना अपना, एक आह! दौड़ा चला आता है!"

अंबर के अटूट प्रेम,विश्वास की एक गाँठ और पल्लू से बाँधती है धरा, कहती है -”हाँ मेरी खबर लेते रहना।"

”देखते ही देखते निहाल हो गई! बादलों का बरसना साधना थी। गृहस्थी फल-फूल रही है। निकम्मे बच्चों को पालना रेगिस्तान में दुब सींचने से कम कहाँ? "

अपने अति लाड-प्यार से बिगड़ैल बच्चों को पल्लू से ढकती है धरा, धीरे-धीरे उनका माथा सहलाती है।

बच्चों पर अपार स्नेह न्योछावर करती बहुत कुछ सहती एक लंबी सांस लेती है।

” अमर प्रेम है आपका!”

पवन पेड़ पर टंगी होले से फुसफुसाती है।धरा पवन के शब्दों को अनसुना करते हुए कहती है-

”एक ही परिवार तो था!  देखते ही देखते दूरियों में दूरिया बढ़ गई। चाँद का चाँदनी बरसाना, सूरज का भोर को लाना उसमें इतना आक्रोश भी न था। बादलों का यों भर-भरकर बरसना सब दाता ही तो थे ! बेटी बिजली का रौद्र रूप कभी-कभी पीड़ा देता है, बेटी है ना ; लाडली जो ठहरी।”

समर्पित भाव में खोई धरा, आह! के साथ तड़प उठती है।

”पुत्र समय! प्रेम की प्रति छवी है, गृहस्थी चलाने को दौड़ता है, घर का बड़ा बेटा है ना! मैं भी दौड़ती हूँ उसके पीछे, ये न कहे माँ निढाल हो गई।”

धरा होले से पालथी मार बैठती है, कहीं हिली तो नादान बच्चे भूकंप भूकंप कह कोहराम न मचा दे! "कहेंगे, ग़ुस्सा बहुत करती है माँ।"

" बच्चों की मनमानी पर यों पर्दा न डाला करो !”

निशा धरा के कंधे पर हाथ रखती है।

" ना री क्या कहूँ उन्हें ? दूध के दाँत टूटते नहीं कि कर्म जले अक्ल फोड़ने बैठ जाते हैं ! पानी है!हवा है!!  गढ़ने बैठ जाते है। नहीं तो यों अंबर में छेद कर मेरे आँचल को तार-तार न करते।”

धरा निशा को स्नेह से भीगी हल्की फटकार लगाती है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Wednesday, 13 April 2022

स्वाभिमान का टूटता दरख़्त

                 


                 ”मौत कभी पृष्ठभूमि बनाकर नहीं आती,दबे पाँव कहीं भी चली आती है।”

कहते हुए सुखवीर उठकर बैठ जाता है।

”खाली रिवॉल्वर से जूझती मेरी अँगुलियाँ! उसका रिवॉल्वर मेरे सीने पर था। नज़रें टकराईं! कमबख़्त ने गोली क्यों नहीं चलाई?”

सुखवीर माँझे में लिपटे पंछी की तरह छटपटाता हुआ अर्पिता की गोद में अपना सर रखता है।मौत का यों गले मिलकर चले जाना सुखवीर के लिए अबूझ पहेली बन गई।अर्पिता के हाथ को सहलाते हुए उसकी हस्त-रेखाएँ पढ़ने का प्रयास करता है।

”वह सतरह-अठारह वर्ष का बच्चा ही था ! हल्की मूँछे, साँवला रंग, लगा ज्यों अभी-अभी नया रंगरूट भर्ती हुआ हो ?”

दिल पर लगी गहरी चोट को कुरेदते हुए,सुखवीर बीते लम्हों को मूर्ति की तरह गढ़ता है।आधी रात को झोंपड़ी के बाहर गूँजते झींगुरों का स्वर उस मूर्ति को ज्यों ताक रहे हों।

”भुला क्यों नहीं देते उस वाक़िया को?”

सुखवीर के दर्द का एक घूँट चखते हुए, अर्पिता उसका सर सहलाने लगती है।

 फड़फड़ाते मोर के पंखों का स्वर, तेज़ क्रन्दन के साथ पेड़ की टहनियों से निकलते हुए,मध्यम स्वर में बोलते  ही जाना। स्वर सुनकर दोनों की नज़रें खिड़की से निकल खेतों की ओर टहने निकल पड़ती हैं।

ख़ामोशी को तोड़ते हुए सुखवीर कहता है-

” फौजी पर बंदा एहसान कर गया, सांसें उधार दे कर !”

हृदय की परतों को टटोलते हुए सुखवीर अर्पिता को एक नज़र देखते हुए उसी घटना में डूब जाता है। मन पर रखे भार को कहीं छोड़ना चाहता है।अर्पिता को लगा कि वह टोकते हुए कहे- ”वह पल सौभाग्य था मेरा।” परंतु न जाने क्यों ख़ामोशी शब्द निगल जाती है। महीनों से नींद को तरसती आँखें विचारों में प्रेम ढूँढती हैं। मुट्ठी में दबा ज़िंदगी का टुकड़ा सुखवीर को कहीं चुभता है एक आह के साथ बोल फूट ही पड़ते हैं।

”बंदे को ऐसा नहीं करना चाहिए था !”

नींद ने ज्यों पानी से भीगी पलकों पर दस्तक दी हो!सुखवीर आँखें बंद कर लेता है, देखते ही देखते हल्के झोंके के साथ स्वाभिमान का भारी दरख़्त टूट कर धरती पर गिर पड़ता है, गिरने के तेज़ स्वर से सहमी अर्पिता सुखवीर को सीने से लगा लेती है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

Sunday, 3 April 2022

पेैबंद लगा पुरुष-हृदय


                   अहं में लिप्त पुरुष-हृदय करवट बदलता, स्त्री-हृदय को अपने प्रभुत्त्व का पाठ पढ़ाते हुए कहता है-

" काल के पैरों की आहट हूँ मैं! जब-जब काल ने करवट बदली,मेरा अस्तित्त्व उभर कर सामने आया है।"

  स्त्री-हृदय पुरुष-हृदय की सत्ता स्वीकारता है और खिलखिलाकर कहता है।

”चलो फिर बादलों में रंग भरो! बरसात की झड़ी लगा दो।”

कुछ समय पश्चात बादल घने काले नज़र आते हैं और बारिश होने लगती है।

”अब धूप से आँगन सुखा दो।”

कुछ समय पश्चात धूप से आसमान चमक उठता है।

" अच्छा अब अँधरे को रोशनी में डुबो दो। "

और तभी आसमान में चाँद चमक उठता है।

 समय के साथ पुरुष-हृदय का सौभाग्य चाँद की तरह चमकने लगता है।

अगले ही पल प्रेम में मुग्ध स्त्री-हृदय पुरुष-हृदय से आग्रह करते हुए कहता है-

"अब मुझे खग की तरह पंख लगा दो, पेड़ की सबसे ऊँची शाख़ पर बिठा दो।"

पुरुष-हृदय विचलित हो उठा, स्त्री-हृदय की स्वतंत्रता की भावनाएँ उसे अखरने लगती है। ”मुक्त होने का स्वप्न कैसे देखने लगी?” उसी दिन से पुरुष-सत्ता क्षीण होने लगती है।

 पेड़ की शाख़ पर बैठा पुरुष-हृदय छोटी-छोटी टहनियों से स्त्री-हृदय को स्पर्श करते हुए, स्वार्थ में पगी उपमाएँ गढ़ता है वह कोमल से अति कोमल स्त्री-हृदय गढ़ने का प्रयास करता है प्रेम और त्याग का पाठ पढ़ाते हुए कहता है -

”तुम शीतल झोंका, फूलों-सी कोमल, महकता इत्र हो तुम ममता की मुरत, प्रेमदात्री तुम।"

 स्त्री-हृदय एक नज़र पुरुष-हृदय पर डालता है शब्दों के पीछे छिपी चतुराई को भाँपता है और चुप चाप निकल जाता है।

” बला ने गज़ब ढाया है! रात के सन्नाटे को चीरते हुए निकल गई ! पायल भी उतार फेकी! चुड़ैल कैसे कहूँ? गहने भी नहीं लादे! लालचन लोभन कैसे कह पुकारूँ?"

वृक्ष की शाख़ पर बैठा पुरुष-हृदय, पेड़ के नीचे टहलते स्त्री-हृदय को देखता है।

देखता है! मान-सम्मान और स्वाभिमान का स्वाद चख चुका स्त्री-हृदय तेज़ धूप, बरसते पानी और ठिठुराती सर्दी से लड़ना जान चुका है। वर्जनाओं की बेड़ियों को तोड़ता सूर्योदय के समान चमकता, धरती पर आभा बिखेरता प्रकृति बन चुका है। 


@अनीता सैनी 'दीप्ति ' 

दंड

                                           भू कंप  झटकों के साथ, बर्तनों की आवाज़ और एक स्वर कौंधता है। ” निर्भाग है तू !  यह देख,  तेरा श्र...