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Saturday, 10 September 2022

मरुस्थल की नदियाँ



”बाँकपन लिए,

मरुस्थल की नदियाँ खारी होती हैं!”

 विनय! रेत से भरी मुट्ठी हवा में उछालता व्यंगात्मक दृष्टि से अरुँधती की ओर मुस्कराता है।

अपेक्षाओं की बिखरती लहर देख वह शिकायतों का सेतु खड़ा करता है। तैरती विचारों की मछलियाँ समंदर और मरुस्थल का भेद भूल जाती हैं। रेत हवा में उड़ने लगती है। बची जल धराओं को सुविधा अनुसार मोड़ने का प्रयास पहाड़-सा लगता है।

”आख़िर समंदर की बेटियाँ हैं! लवणीयता लिए तो बहेंगी ही!”

इस बार विनय ने शब्दों की सूखी रेत नहीं उड़ाई ! भावों में भिगो मिट्टी का गोला बना अरुँधती की तरफ़ फेंका।

" नदी का बहना मात्र सार्थक नहीं है?”

अरुँधती ने शब्दों का घूँट-सा गटका इस वाक्य ने उसे पुनर्जीवित कर दिया।

”पहाड़ी नदी के स्वर में सुकून, पानी में मिठास होता है!”

विनय स्वच्छंद उड़ान की इच्छा में ठहरे पानी में कंकड़ फेंकता है।

" बादलों के नहीं बरसने से मरुस्थल रूठता है ? उसके नसीब में नहीं होता जंगल, मीठे पानी का झरना।”

जीवन से जूझती नागफनी थी अरुँधती , वहीं विनय शीतल झोंका ;  विनय शब्द बनने को तत्पर आवाज़ तलाशता रहा। अरुँधती उसे भाव बना मरुस्थल में छुपाती रही।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

 

9 comments:

  1. वाह, बादलों के नहीं बरसने से मरुस्थल रूठता है । अच्छा भाव बिम्ब

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  2. भाव मन को विचलित करते बहुत सुंदर लिखा।
    लदाख में मरुस्थल की स्मृतियाँ वाह

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  3. विभा नायक16 September 2022 at 08:40

    संबंधों के ताने-बाने में बढ़तीं अपेक्षाएँ उसे मरुस्थली और कैक्टसी बना देती हैं। भावपूर्ण प्रस्तुति🌹

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  4. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (17-09-2022) को "भंग हो गये सारे मानक" (चर्चा अंक 4554) पर भी होगी।
    --
    कृपया कुछ लिंकों का अवलोकन करें और सकारात्मक टिप्पणी भी दें।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  5. 'तैरती विचारों की मछलियाँ समंदर और मरुस्थल का भेद भूल जाती हैं।' -बहुत खूब कहा आपने अनीता जी !... अद्भुत!

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  6. भावपूर्ण बहुत सुंदर

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  7. नए नए बिंबों से सजी दिल को छूने वाली सुंदर रचना

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  8. गूढ़ रहस्यात्मक लघु कथा।
    किसी के मनोभावों को समझना अत्यंत कठिन होता है।
    और स्वछंदता कब जानती है बंधन का सुख।
    अप्रतिम।

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  9. मानव मन के गहन भाव को शब्द देती रचना ।

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