Thursday, 28 July 2022

विसर्जन



                   ”गणगौर विसर्जन इसी बावड़ी में करती थीं गाँव की छोरियाँ।”

कहते हुए काई लगी मुंडेर पर हाथ फेरती शारदा बुआ मुंडेर से अपनी जान-पहचान बढ़ाने लगी। माँ के हाथों सिले घाघरे का ज़िक्र करती बावड़ी से कह बैठी -

”न जाने कितनी छोरियों के स्वप्न लील गई तु! पानी नहीं होता तो भी तुझमें ही पटककर जाती।”

आँखें झुका पैरों में पहने चाँदी के मोटे कड़ों को हाथ से धीरे-धीरे घुमाती साठ से सोलह की उम्र में पहुँची बुआ उस वक़्त, समय की चुप्पी में शब्द न भरने की पीड़ा को आज संस्कार नहीं कहे।

"जल्दी ही जीना भूल जाती हैं औरतें कब याद रहता है उन्हें कुछ ?”

बालों की लटों के रूप में बुआ के चेहरे पर आई मायूसी को सुदर्शना हाथ से कान के पीछे करते हुए कहती है।

” किसे डुबोती छोरियाँ ?”

"उस टेम सपने कहाँ देखने देते थे घरवाले, चूल्हा- चौकी खेत-खलिहान ज़मींदारों की बेटियों की दौड़ यहीं तक तो थीं?”

जीने की ललक, कोंपल-से फूटते स्वप्न; उम्र के अंतिम पड़ाव पर जीवन में रंग भरतीं सांसें ज्यों चेहरे की झूर्रियों से कह रही हों तुम इतनी जल्दी क्यों आईं ?

न चाहते हुए सुदर्शना बुआ से फिर पूछती है।

"  छोरियाँ तो देखती थीं न स्वप्न।”

"न री! बावड़ी सूखी तो तालाब, नहीं तो कुएँ और हौज़ तो घर-घर में होते थे उनमें डुबो देती थी।”

”स्वप्न या गणगौर ?”

सुदर्शना ने फिर यही प्रश्न दोहराया।

बड़प्पन का मुकुट ज़मीन पर पटक, मुँह फेरती सावित्री बुआ धीरे से कहती है।

"दोनों।”


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

32 comments:

  1. स्वप्न या गणगौर ?”
    सुदर्शना ने फिर यही प्रश्न दोहराया।
    बड़प्पन का मुकुट ज़मीन पर पटक, मुँह फेरते हुए धीरे से कहती है।
    "दोनों।”
    हृदयस्पर्शी .., भावपूर्ण कृति ।

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    1. हृदय से आभार आपका
      सादर स्नेह

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  2. लगता है स्त्रियों को स्वप्न देखने की इजाज़त भी नहीं । देख भी लिया तो उनको कहीं भी कैसे भी डुबोना ही है । मर्मस्पर्शी लिखा है ।

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    1. हृदय se आभार आपका.
      सादर स्नेह

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  3. नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शुक्रवार 29 जुलाई 2022 को 'भीड़ बढ़ी मदिरालय में अब,काल आधुनिक आया है' (चर्चा अंक 4505) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है। 12:30 AM के बाद आपकी प्रस्तुति ब्लॉग 'चर्चामंच' पर उपलब्ध होगी।

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    1. हार्दिक आभार आपका मंच पर स्थान देने हेतु।
      सादर

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  4. बहुत ही हृदयस्पर्शी सृजन ।
    स्वप्न देखने की चाहे कितनी भी मनाही रही हो गणगौर में तो स्वप्न देख ही लिए होंगे चोरी छुपे ही सही मन ने ... डुबाने ही सही । आखिर मन पर किसका वश चलता है।

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    1. स्त्री हृदय सभी की परवाह कर चलता है घर परिवार पिता और पति लेकिन जैसे जैसे समय का सूरज ढलता है हृदय स्वतः बिखरने लगता ऐसी पीड़ा मैंने अनुभव की है काफ़ी औरतों की।
      आपने सही कहा गणगौर ने तो स्वप्न देख ही लिया था अंत में उसे डूबना ही क्यों न पड़ा हो, मेरे भावों को समझने हेतु हृदय से अनेकानेक आभार।
      सादर स्नेह

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  5. प्रिय अनीता ,बहुत ही हृदयस्पर्शी सृजन...। सपनों को डूबते देखना कितना कष्टदायक होता है ...।पर मन पर वश कहाँ ...

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    1. सही कहा प्रिय शुभा दी जी।
      हृदय से आभार.
      सादर स्नेह

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  6. आपके द्वारा कहानी गढ़ने का नायाब तरीका पाठक का मन मोह लेता है. स्वप्न द्वारा मन की भाव बाहर लाने की कला कहानी में रोचकता लाती है. लिखते रहें.

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    1. सादर नमस्कार सर।
      हृदय से आभार।
      आपकी प्रतिक्रिया से उत्साह द्विगुणित हुआ। आशीर्वाद बनाए रखें।
      सादर प्रणाम

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  7. अनीता, रंग-रंगीलो राजस्थान की महिमा का गुणगान तो तुमने बहुत बार किया है और बहुत सुन्दर तरीक़े से किया है लेकिन आज पहली बार तुमने राजस्थान के लिंगभेदी सामाजिक कलंक को अपनी लघु-कथा का आधार बना कर बड़े साहस का काम किया है. तुमको इसके लिए शाबाशी के साथ बधाई !

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    1. आदरणीय गोपेश जी सर सुप्रभात।
      हृदय से आभार।
      आपका आशीर्वाद हमेशा संबल प्रदान करता है।
      मैं विरोध नहीं करती कभी ठीक है जो भी अवधारणा लोगों ने गढ़ी है कुछ विचार तो अवश्य किया होगा।
      परंतु राजस्थान में नव विवाहिता गणगौर की स्थापना करती हैं सोलह दिन उसकी पूजा अर्चना करती हैं। उसके पीछे की कहानी शायद औरतों के हृदय में डर की स्थानपना करने हेतु ही गढ़ी गई है। शादी के बाद उन्हें इसकी याद दिलाई जाती है कि ध्यान रखना इसके साथ जो हुआ।मेरा दृष्टिकोण है किसी के हृदय पर आघात नहीं करना चाहती।
      सादर प्रणाम

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  8. आपकी लिखी रचना सोमवार 01 अगस्त 2022 को
    पांच लिंकों का आनंद पर... साझा की गई है
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    संगीता स्वरूप

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    1. हृदय से आभार आदरणीया संगीता दी जी मंच पर स्थान देने हेतु।
      सादर

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  9. स्त्री मन को छूती सराहनीय लघुकथा ।

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  10. अनीता जी, गणगौर की कहानी तो मुझे नहीं मालूम है लेकिन आपकी रचना मन को छू गई।
    सादर

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  11. सारयुक्त ,गहन भाव उकेरे हैं।
    अपने स्वप्नों को जीना हर स्त्री के भाग्य में कहाँ।
    मन को अनेक प्रश्नों से बींधती मर्मस्पर्शी लघुकथा।
    सस्नेह।

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    1. हृदय से अनेकानेक आभार आपका।

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  12. "न री! बावड़ी सूखी तो तालाब, नहीं तो कुएँ और हौज़ तो घर-घर में होते थे उनमें डुबो देती।”
    स्त्री के मन की पीर को छूती मार्मिक रचना👌

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    1. हृदय से आनेकाने आभार आदरणीय दी आपका।

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  13. जल्दी ही जीना भूल जाती हैं औरतें कब याद रहता है उन्हें कुछ ?” सही है। सादर।

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    1. जी हृदय से आभार आपका।
      सादर

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  14. बहुत ही सुंदर भावपूर्ण सृजन

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  15. डॉ विभा नायक3 August 2022 at 17:10

    मोहक🌹🌹

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  16. गणगौर के विसर्जन के साथ किशोर स्वप्नों का विसर्जन।
    कितनी गहन मर्माहत पीड़ा होगी शारदा के उर में एक सपने देखने के वय में कितनी सखियों ने और कितनों ने पहले और कितनों ने बाद में अपने सपनों का विसर्जन किया होगा।
    श्र्लाघनीय लेखन।

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    1. हृदय से आनेकानेक आभार आदरणीय कुसुम दी जी।
      आपका आशीर्वाद यों ही बना रहे।
      सादर स्नेह

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