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Sunday, 7 March 2021

असहजता

 


                ”कल सिया का जन्मदिवस है।” 

शीला अपने यहाँ काम पर आने वाली पूर्वा से कहती है।

”जी बच्चों को साथ लिए आती हूँ फिर ?”

पूर्वा साड़ी के पल्लू से हाथ पोंछती हुई कहती है।

”हाँ देख लो! वैसे ठीक ही है, मेहमान ज़्यादा होंगे।”

शीला बालों को झाड़ते हुए टॉवल से बाँधती हुई कहती है।

”अरे! छोड़, पल्लू क्यों चबा रही है? कहा है न जीजी ने, कल तुझे भी आना है।”

पूर्वा अपनी  बेटी के मुँह से साड़ी का पल्लू खींचती हुई दोनों हाथों से पकड़कर सीने से लगा लेती है।

” कल तुझे लाल वाली फ्रॉक पहनाऊँगी! चल अब बरामदे में बैठ, मैं आती हूँ।”

पूर्वा बेटी का माथा चूमते हुए फिर अपने काम में उलझ जाती है।

” हाँ, परंतु ध्यान रहे पिछली बार इसने तीन प्लेटें तोड़ डालीं  थीं, इस बार ऐसा न हो।”

शीला हिदायत देते हुए हॉल से बाहर, गार्डन में आकर बैठ जाती है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


11 comments:

  1. इन्सान की प्रवृत्ति पर सोचने पर मजबूर करती हुई अच्छी लघुकथा लिखी है आपने अनीता जी ।

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  2. बहुत सुन्दर लघुकथा

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  3. मनोभाव दर्शाती सुंदर लघु कथा

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  4. सोचने को विवश करती सुन्दर लघु कथा।

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  5. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार ( 08 -03 -2021 ) को 'आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है' (चर्चा अंक- 3999) पर भी होगी।आप भी सादर आमंत्रित है।

    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।

    #रवीन्द्र_सिंह_यादव

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  6. विचारणीय ,मन के भाव को सुंदर तरीके से बयां करती हुई सुंदर रचना, महिला दिवस की बधाई हो, नमन

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  7. सुन्दर लघु कथा।

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  8. सुंदर लघु कथा प्रिय अनीता

    महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

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  9. सोचने को विवश करती कथा
    शुभकामनाएं

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  10. बहुत ही हृदयस्पर्शी विचारणीय लघुकथा

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  11. घर में काम करने वालियों की बेबसी ।
    मर्मस्पर्शी रचना ।

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