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Tuesday, 26 January 2021

अंतर

        

                            ”बिटिया लकड़ियों से छेड़खानी नहीं करते काँटा चुभ जाएगा।”

विजया की दादी माँ ने अलाव में कुछ और कंडे डालते हुए कहा।

”अब भगीरथ की दोनों बहुओं को ही देख लो, छोटीवाली तो पूरे गाँव पर भारी है। शदी-विवाह में सबसे आगे रहती है। मजाल जो उसकी ज़बान से एक भी गीत छूट जाए।”

विजया की दादी अलाव से कुछ दूर खिसकती हुई उसके दादाजी से  कहती है।

”अरे! क्यों उनके पीछे लगी रहती है, सीख जाएँगीं धीरे-धीरे।”

और पास खड़ी विजया को वो अपनी गोद में बिठाते है।

”अब और कब सीखेंगीं, कल की ही बात कहूँ; बड़ीवाली से कहा कोठरी से जेवड़ी लाने को, वहाँ बूत बनी खड़ी रही जाने क्या मँगवा लिया हो? इतनी भी समझ नहीं है थारी बीनणियाँ में।”

बहुओं की खीझ लकड़ियों पर उतारते हुए,अंदर-ही अंदर टूट रही होती है।

”आप क्या जानो मेरे मन की पीड़ा दुनिया की बहुएँ इतनी टंच होवें कि सास-ससुर सुख से मर सकें और म्हारे माथे पर ये दोनों एक गूँगी, एक बहरी।”

”ठीक से समझाया करो इन्हें , आधी-अधूरी बात बोलती हो तुम।"

दादाजी  विजया से पानी का गिलास मँगवाते हुए कहते और वह दौड़ती हुई अंदर गई।

”अब पूजा-पाठ भी मैं ही सिखाऊँ? उनके माँ-बाप ने कुछ न सिखाया । म्हारा भी कर्म फूटेड़ा था जो ये दोनों मिली।”

विजया की दादी की चिंताएँ अब आग की लपटों-सी दहकती दिखीं।

”अम्मा मैं अच्छे से सभी गीत सीखूँगी,पूजा भी अच्छे से किया करुँगी और गाय को चारा भी डालूँगी।”

विजया ने दादाजी को पानी का गिलास थमाते हुए कहा।

”न री लाडो! बेटियाँ तो घर में चहकतीं ही अच्छी लगती, मैं तो बहुओं की बात कहूँ तू तो बड़ी हो कलेक्टर बनना।”

दादीजी ने विजया को सीने से लगा लिया।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


22 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (27-01-2021) को  "गणतंत्रपर्व का हर्ष और विषाद" (चर्चा अंक-3959)   पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    -- 
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
    --

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया सर चर्चामंच पर स्थान देने हेतु।
      सादर

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  2. आंचलिक परिवेश के ताने-बाने पर रचित हृदयस्पर्शी सृजन ।

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    1. दिल से आभार आदरणीय दी मनोबल बढ़ाने हेतु।
      सादर

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सर।
      सादर

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  4. मन को छू लेने वाली रचना ।

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सर।
      सादर

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  5. दोहरा मापदंड।
    बहुत सुंदर लघुकथा।
    दोहरी मानसिकता पर बहुत सुंदर सटीक लेखन।
    बहुत बहुत बधाई।

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    1. दिल से आभार आदरणीय दी।
      सादर

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  6. सामयिक, सटीक चित्र उकेरती रचना , बधाई

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    1. सहृदय आभार आदरणीय दी मनोबल बढ़ाने हेतु।
      सादर

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  7. थोड़े से शब्दों में बहुत कुछ कहती कथा.
    जो आज हमारी बेटी है, वो ही कल किसी की बहू बनेगी.

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    1. सादर आभार आदरणीय नूपुर दी मनोबल बढ़ाने हेतु।
      सादर

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  8. बहुत ही हृदयस्पर्शी रचना प्रिय अनीता जी, दोहरा मापदंड हमेशा स्त्री को व्यथित करता रहा है..सारगर्भित विषय उठाने के लिए आपको बहुत बधाई..

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    1. सादर आभार आदरणीय दी जिज्ञासा दी मनोबल बढ़ाने हेतु।
      सादर

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  9. बहू मायके से सब सीख कर आये और आते ही ससुराल में सारा घर सम्भाले...परन्तु बेटी कलक्टर बने...इसी दोहरी मानसिकता के चलते सास कभी माँ नहीं बन पायी और बहु से बेटी सदृश बनने की उम्मीद...
    बहुत ही सुन्दर सार्थक लघुकथा।

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    1. सादर आभार आदरणीय दी मनोबल बढ़ाती प्रतिक्रिया हेतु।
      सादर

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  10. बहुत बढ़िया, बहू और बेटी के अंतर को दिखाती सुंदर लघुकथा

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    1. सादर आभार आदरणीय सर मनोबल बढ़ाती प्रतिक्रिया हेतु।
      सादर

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सर।
      सादर

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टूटती किरण

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