Friday, 11 December 2020

बैल बुद्धि ने कहा- "उन्नति है!"


[चित्र साभार : गूगल ]

एक तरफ़ जहाँ उन्नति सम्पनता पीठ पर लादे दौड़ती है। 

वहीं सड़क किनारे लाचारी पेड़ की छाँव में बैठी उन्नति से हाथ मिलाने की चाह में टूटती जा रही है। 

गाँव और हाइवे का फ़ासला ज़्यादा नहीं है परंतु अंतर बहुत है। 

  हाइवे पर जहाँ आलीशान गाड़ियाँ दौड़ती हैं वहीं गाँव में ऊँट- गाडियों की मद्धिम चाल दिखती है। 

हाइवे से इतर, उन्नति गाँव में फैलना चाहती है जैसे ही ऊँट-गाड़ी गाँव की तरफ़ रुख़ करतीं है उन्नति उन पर सवार होती है।
कभी ऊँट की थकान बन गिरती है, कभी ऊँट को हाँकने की ख़ुशी बन दौड़ती है तो कभी दोनों का आक्रोश बन आग बबूला होती है। अगर जगह न भी मिले तब वह चिपकती है ऊँट गाड़ी के टायर से मिट्टी की गठान बन।
   कभी-कभी थक-हारकर वहीं पेड़ की छाँव में बैठती है। हाइवे को देखती है,देखती है जड़ता में लीन ज़िंदगियों की रफ़्तार।

ढलते सूरज का आसरा लिए कुछ क़दम चलती है उन्नति गाँव की औरतों के संग जो अभी-अभी उतरीं  हैं तेज़ रफ़्तार से चलने
वाली ज़िंदगियों के साथ, उन्नति सवार होती है उनकी हँसी की खनक पर, सुर्ख़ रंग के चूड़े के सुर्ख़ रंग पर, क़दमों की गति पर,
कभी ओढ़नी के झीनेपन से झाँकती है जिसे उन औरतों ने  छिपाया है थेले में सबकी निगाह से सबसे नीचे,कभी-कभी समा जाती है वह उन औरतों के मन में विद्रोही बन परंतु जैसे ही गाँव में प्रवेश करती हैं वे औरतें उसे छिटक देतीं  हैं। स्वयं से परे मिट्टी के उस टीले पर,पेड़ों के झुरमुट में।
कई सदियाँ बीत गईं, उन्नति वहीं बैठी है निर्मोही और निरीह।

आज उस मिट्टी के टीले पर बैठे हैं कुछ नौजवान वे उन्नति को गाँव की शोभा बनाने की बातों में उलझे हैं। विषय बहुत गंभीर है,आवाज़ में जोश उत्साह उफनता नज़र आया।
वे नौजवान भविष्य बेचने को उतारु, भूख ठुकराने को तत्पर,उन्नति की चाह में होश गवाँ बैठे।

कहते हैं -

"भूख भटकाएँगे, फिर भी न मिली तब हम कुछ स्वप्न  गिरवी रखेंगे।"

जोशीले नौजवान ने उन्नति हेतु स्वयं को दाँव पर लगाया।कुछ और नौजवानों में उत्साह जगाया।

जोखिम उठा कंधों पर, उन्नति को पाने की लहर-सी दौड़ी।
बुद्धि की चतुराई किसी के समझ न आई।

"चलना कहाँ है ?"
मन का डर एक पल बुदबुदाया।

 हिम्मत कहती है -
" बुद्धि कहते हैं उसे हमें भी सर-माथे बिठानी होगी।"

उन्नति की चाह में गाँव के नौजवानों ने बुद्धि से हाथ मिलाया।

सर-माथे बिठा, आदेश को आँखों पर सजाया।

उन्नति दुल्हन-सी शरमाई।

"हाँ! अब मैं प्रवेश करुँगी गाँव में सदियों बाद एक उम्मीद-सी इठलाई,नौजवानों की सांसों  में सुकून बन इतराई।"

धीरे-धीरे उन्नति निखरती आई। गाँव की गलियों में अशोक के वृक्ष-सी लहराई ।

बदले में नौजवानों ने गाँव का अन्न लुटाया, अपनों को भूखा सुलाया जो न माना उसे पानी पिलाकर सुलाया।

उन्नति की चाह ने सभी को नंगे पाँव दौड़ाया,उस दिन से लाचारी चौखट पर बैठी, भूख ने एक-एक निवाले को तरसाया।

बुद्धि ने अब बैल-बुद्धि का रुख़ अपनाया।

गाँव में हौज़ बनवाया पानी अभी तक न आया

सड़क के पत्थर रेत में समाए।  

बुद्धि ने नौजवानों को और झाँसे में ले उन्नति के नाम की बैसाखी थमाई उस पर इच्छाओं की घंटी लगवाई।

गाँववालों को भूख से कुपोषित करवाया। किसी की ज़मीन, किसी के बैल गिरवी रखवाए।गृह-क्लेश उनके हाथों में ज़िंदगी जहन्नुम बना ख़ामोशी पहन रियायत बाँटने निकली।

सड़क बनवाई उस पर पानी को दौड़ाया, लैंम्प पोस्ट के लट्टू की रोशनी निखर-निखरकर आई।जहाँ पानी का अभाव वहाँ पानी निकालने की नालियाँ नज़र आईं।

और तो और पुराना ऐतिहासिक पंचायत भवन को गिरा नए का शिलान्यास करवाया। नौजवानों के हाथों में लोहे के निवाले थमाए,वृद्धों के लिए मनोरंजन की व्यवस्था करवाई।

बुद्धि ने कहा-

"उन्नति है!"

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

25 comments:

  1. अति सुन्दर.. शब्द शक्तियों का अद्भुत प्रयोग ।

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    1. आभारी हूँ मीना दी..सृजन सार्थक हुआ।
      सादर

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  2. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना आज शनिवार 12 दिसंबर 2020 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप सादर आमंत्रित हैं आइएगा....धन्यवाद! ,

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया श्वेता दी सांध्य दैनिक पर स्थान देने हेतु।
      सादर

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (13-12-2020) को   "मैंने प्यार किया है"   (चर्चा अंक- 3914)    पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    --   
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    --
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
    --

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया सर चर्चामंच पर स्थान देने हेतु।

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  4. बड़ा गम्भीर प्रश्न उथया है तुमने अनीता !
    पुराना तो कहीं भी बचा नहीं रह सकता. शहरों की तरह गाँवों का स्वरुप भी बदलेगा लेकिन गाँवों में और शहरों में अंतर तो रहेगा ही.
    गाँव से शहर की ओर पलायन तो नए ज़माने का चलन है और इसे कोई चाह कर भी रोक नहें सकता.
    हाँ, सरकार को और समाज को यह कोशिश करनी चाहिए कि गाँव में भी बुनियादी सुविधाएं मिलें और रोज़गार के अवसर भी बढ़ें.

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    1. आभारी हूँ सर आपकी सारगर्भित प्रतिक्रिया मिली सृजन सार्थक हुआ। आपका ब्लॉग पर आना ही संबल है मेरा...
      आशीर्वाद बनाए रखे।
      सादर

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया सर।

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया सर ।

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  7. गूढ़ प्रश्नों के साथ बढ़िया व्यंग ...।

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    1. जी बहुत बहुत शुक्रिया।

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  9. ऐसी उन्नति के व्यूह मैं फँसकर बुद्धि को बैल होना ही है । अत्यंत प्रभावी लेखन ।

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    1. दिल से आभार आपके आने से सृजन सार्थक हुआ।
      सादर

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  10. तरक्की के नाम पर या तो ग्रामीण नौजवान और किशोर शहरों को भाग रहे हैं, या फिर किसी दिमाग वाले के चक्कर में फस शहर ही गाँव में लाने की लालसा में अपना सब कुछ दांव पर लगा रहे हैं, फल वहीं "ढ़ाक के तीन पात" "न घर के न घाट के" महत्त्वाकांक्षाओं में फसा अनपढ़ या कम पढ़ा दिमाग संसाधनों की चमक दमक में ऐसा फंसता है कि सच घाणी के बैल जैसी गति होती है।
    गहन वैचारिक दृष्टि,सटीक वर्णन किया है आपने ग्रामीण परिवेश और हाईवे का जो खाका खींचा है वो अप्रतिम है अद्भुत है।
    बहुत ही सुंदर प्रस्तुति ।

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    1. दिल से आभार प्रिय दी व्यग्य का मर्म स्पष्ट करती सारगर्भित प्रतिक्रिया हेतु। आशीर्वाद बनाए रखे।
      सादर

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  11. बहुत उम्दा लिखा है. उन्नति की गाड़ी यूँ ही गाँव कस्बों और शहर में घूमती है, पर उन्नति है कि अपनी ही गाड़ी के पहिए तले कुचली हुई मिलती है. बहुत गंभीर विषय पर बहुत सहज लेखन. बधाई.

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  12. बैल बुद्धि ने कहा- "उन्नति है!"शीर्षक ही अपने आप में सम्पूर्ण लेख का सार व्यक्त करता अद्भभुद व्यंग है।बहुत ही लाजवाब लिखा है आपने.. ग्रामीण परिदृश्य का शानदार खाका खींचा है उन्नति और लाचारी को परखती बुद्धि अन्त में बैल बुद्धि..बहुत ही लाजवाब ...।

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  13. आपके आलेख में भारतीय ग्रामीणों का भोगा हुआ यथार्थ है । स्वयं एक राजस्थानी होने के कारण मैं इसमें प्रयुक्त राजस्थानी मिट्टी से जुड़े बिम्बों को अनुभूत कर सकता हूँ । इतनी अच्छी रचना के लिए अभिनन्दन आपका ।

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बैल बुद्धि ने कहा- "उन्नति है!"

[चित्र साभार : गूगल ] एक तरफ़ जहाँ उन्नति सम्पनता पीठ पर लादे दौड़ती है।  वहीं सड़क किनारे लाचारी पेड़ की छाँव में बैठी उन्नति से हाथ मिलाने की...