Sunday, 5 April 2020

...और वह निकल गयी !

      गस्त माह की उमसभरी गर्मी में घर से बाहर निकलना अरुचिकर कार्य लगता है। शरीर में पसीना उत्पन्न करती उमस से दो-चार होना ही पड़ता है नित्य ड्यूटी पर निकलनेवालों को। पक्षी भी मानो साँस साधकर पेड़ों पर बैठे हों उमस के गुज़रने के इंतज़ार में। दोपहर तक भी सूरज बादलों में छिपा हुआ था, कभी-कभार हल्की बूँदा-बाँदी से सड़क गीली हो जाया करती थी। उस दिन प्रीति अपने बेटे को कोचिंग सेंटर से लेने पहुँची थी। कोचिंग क्लास ख़त्म हुई तो बच्चे अपने-अपने साधनों से घरों को जाने लगे। बेटे रवि ने प्रीति से जूस पीने का आग्रह किया। दोनों पास ही एक रेस्टोरेंट में जाते हैं और प्रीति दो गिलास ऑरेंज जूस ऑर्डर करती है। यही कुछ तीन-चार मिनट हुए थे कि कुछ टकराने की तेज़ आवाज़ आती है। प्रीति सहम जाती है,उसका फोन हाथ से छूट जाता है। 

"क्या हुआ?"

"मॉम आपका फोन!"

रवि ने बेंच पर ख़ाली जूस का गिलास रखते हुए कहा। 

"वो देखो! वह बाइक फिसल गयी।"

हादसे को देखकर प्रीति के होश उड़ गये। 

"बाई सा! ऐसे हादसे यहाँ दिन में दस होते हैं,आप क्यों अपना मन माड़ा कर रहा हो।"

वेटर ने गिलास उठाते हुए कहा।

"आजकल के छोरा-छोरी ऐसे ही निकलते हैं घर से। नये ज़माने की नयी सोच।"

पास खड़े एक व्यक्ति ने कहा। 

"भैया! आप आइडी देखकर घरवालो को फोन कर दीजिये। 

प्रीति ने पास खड़े एक व्यक्ति से कहा। 

"बाइक पर उस लड़के के साथ एक लड़की भी थी वह  एक दम उठी और पास गुज़रते ऑटो में बैठकर निकल गयी उसने परवाह नहीं की कि वह लड़का कैसा है?"

प्रीति ने विचलित मन से यह सवाल पास खड़े लोगों से किया।

"मॉम ! आप क्यों अपना बीपी बढ़ा रही हो। वो नहीं उलझना चाहती थी पुलिस और लोगों से,अच्छा हुआ निकल गयी।"

 रवि अपनी से प्रीति का प्रतिउत्तर देते हुए, वहाँ से चलने का आग्रह करता है

"बाई सा! आप अपनी गाड़ी साइड में कीजिए या यहाँ से निकलिए,पुलिस आ चुकी है,वे संभाल लेंगे।"

रेस्टोरेंट में काम करते एक व्यक्ति ने कहा। 

प्रीति अपने बेटे के साथ घटनास्थल से निकल चुकी थी परंतु एक कसक थी मन में, काश! वह उस बीस-बाईस साल के लड़के की मदद कर पाती। वह क्यों घबरायी भीड़ से और उसके साथ जो लड़की थी एक दम उठ कर कैसे चली गयी,इतनी आसानी से,कैसे निर्णय कर लेते हैं चुटकियों में ? वह विचारों के अंतर द्वंद्व उलझती हुई अपने बेटे से कहती है। 

"रवि! तुहें पता है, जब तुम आठ-नौ महीने के थे; मुझे ठीक से तुम्हें गोद में उठाना भी नहीं आता था तब हम भोपाल में थे। हम रात को किसी पार्टी से आ रहे थे, यही कुछ दस-ग्यारह बजे थे। तुम्हारे पापा ड्राइविंग कर रहे थे सामने अचानक नील गाय आ गयी और ब्रेक लगाने से गाड़ी का बैलेंस बिगड़ गया। उस वक़्त उन लोगों ने जिस अपनत्व से हमारी मदद की थी, मैं भुला नहीं पा रही हूँ; हमें भी ऐसे ही लोगों की मदद करनी चाहिए।"

प्रीति अपने बेटे से कहती हुई भावुक हो जाती है। 

"मॉम! मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि आप ग़लत हो परंतु आप आज भी

पंद्रह साल पहले वहीं खड़े हो और समय आगे निकल चुका है शायद आपको भी समय के साथ चलना चाहिए।"

रवि ने बड़ी गंभीरता से अपनी मॉम के सामने अपना विचार रखा।

©अनीता सैनी 



20 comments:

  1. बहुत सुन्दर।
    हम सभी देशवासी मिल कर प्रधानमन्त्री की आवाज पर
    अपने घर के द्वार पर 9 मिनट तक एक दीप प्रज्वलित जरूर करें।

    ReplyDelete
    Replies
    1. सादर आभार आदरणीय सर
      सादर प्रणाम

      Delete
  2. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार (06 -04-2020) को 'इन दिनों सपने नहीं आते' (चर्चा अंक-3663) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    *****
    रवीन्द्र सिंह यादव

    ReplyDelete
    Replies
    1. सादर आभार आदरणीय सर मेरी लघुकथा को स्थान देने हेतु.
      सादर

      Delete
  3. बहुत सुंदर पोस्ट।

    ReplyDelete
    Replies
    1. सादर आभार आदरणीय
      सादर

      Delete
  4. बहुत बढ़िया

    ReplyDelete
    Replies
    1. सादर आभार आदरणीय
      सादर

      Delete
  5. समय के साथ हमारी संवेदनाएं मरती जा रही हैं. सुंदर लघुकथा.

    ReplyDelete
    Replies
    1. सादर आभार आदरणीय सर
      सादर प्रणाम

      Delete
  6. बहुत ही सुंदर

    ReplyDelete
    Replies
    1. बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सर
      सादर

      Delete
  7. बहुत ही अच्छी कहानी प्रिय अनीता जी ,आज के दौर का कड़वा सच हैं यह

    ReplyDelete
    Replies
    1. बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीया दीदी 🙏

      Delete
  8. बहुत ही सुन्दर और हृदयस्पर्शी कहानी ....सच में संवेदना मर रही है आजकल।
    लोग मदद करने को मुसीबत में पड़ना कहते हैं।

    ReplyDelete
    Replies
    1. सादर आभार आदरणीया दीदी उत्साहवर्धक समीक्षा हेतु.
      सादर

      Delete
  9. समाज के बदलते चरित्र पर तीखा प्रहार करती और नवोदित पीढ़ी के व्यवहार को बख़ूबी चित्रित करती लघुकथा एक साथ कई सवाल छोड़ जाती है पाठक के मन-मस्तिष्क पर। लघुकथा का कथानक वर्तमान परिवेश से जुड़े अनेक पहलुओं को प्रभावशाली ढंग से गढ़ता है। प्रस्तुत लघुकथा में शिल्पगत विशिष्टाएँ दृष्टव हैं। स्थानीय शब्दावली संवादों को रोचक बनाती है। लघुकथा के मानदंडों को पूरा करने के लिये आवश्यक है अनावश्यक विस्तार से बचा जाय और पात्रों का चरित्र न बदले, साथ ही सार्थक संदेश का संप्रेषण करती हुई पाठक के प्राणों को स्पर्श कर ले।

    ReplyDelete
    Replies
    1. सादर आभार आदरणीय सर सुंदर सारगर्भित समीक्षा हेतु.
      अनावश्यक विस्तार से बचा जाय और पात्रों का चरित्र न बदले, साथ ही सार्थक संदेश का संप्रेषण हो.. सुंदर सादर आभार मार्गदर्शन हेतु.
      सादर

      Delete
  10. बहुत अच्छी प्रस्तुति

    ReplyDelete
    Replies
    1. सादर आभार आदरणीय सर उत्साहवर्धक समीक्षा हेतु.
      आशीर्वाद बनाये रखे.
      सादर

      Delete

तुम्हें भुला नहीं पाई

          आज से लगभग दस वर्ष पूर्व मेरे पति की पोस्टिंग जयपुर कमांड हाउस में थी। हम सरकारी क्वाटर में रहते थे। उस वक़्त मेरी गुड़िया की उम्र ...