Friday, 3 April 2020

पोशाक का फेर


माँ सा अक्सर तीन से छ बजे के बीच घर के सामने पार्क में टहलने जाया करती हैं।
आज भी ऐसा ही हुआ परंतु आज मौसम साफ़ नहीं था।
आसमान में काली घटाएँ घिर आयीं थीं, पक्षी न जाने क्यों मौन धारण किये हुए थे।
बाहर हल्की बूँदा-बाँदी हो रही थी तभी दरवाज़े पर आवाज़ आती है और मीनल दरवाज़ा खोलती है।
"माँ सा आप!"
मीनल ने सकपकाते हुए कहा।
"आ बैठ चौधराइन"
मीनल की सास अपने साथ आयी महिला को बैठने का इशारा करते हुए कहती है और मीनल को अनदेखा करती है।
"घर देखने से पतो चल जावै आपकी बहू बहुत संस्कारी है।"
चौधराइन घर में चारों तरफ़ अपनी निगाह डालती हुई कहती है। "आपकी बहू नज़र नहीं आयी?"
"जी पाँव लागूँ काकी सा।"
मीनल ने जल्दी में अपनी पोशाक बदली और एक संस्कारी बहू का रुप धारण  कर काकी को प्रणाम करने आयी। 
"ख़ुश रह बेटा, बहुत ही संस्कारी और सुशील बहू है सेठाणी आपकी।"
चौधराइन ने मीनल के सर पर स्नेह से हाथ सहलाते हुए कहा। 
"ठीक कहा आपने, कभी जी से ज़्यादा न सुनों इस के मुँह से।"
अब माँ सा ने मीनल की तारीफ़ों के पुल बाँधने शुरु कर दिये। 
चाय-पानी के बाद जैसे ही वह जाने लगी तभी पूछ ही बैठी-
"दरवाज़े पर जो छोरी थी मीनल की बहन जैसी लागी, अब नहीं दिखरी!"
उसने चारों तरफ़ निगाह डाली और फिर एक टक मीनल को ताकने लगी। 
"मैं भी ख़ूब कहूँ म्हारी बींदणी ने, कुछ मीनल से संस्कार ले।"
पति बाहर रहता है परंतु ज़िम्मेदारी निभाने में कोई बराबरी न कर सका।
घणा चोखा कर्म करा सेठाणी तम ने।"
कहते हुए वे दोनों सामने पार्क में टहलने चलीं जातीं हैं,तेज़ हवा चलने से बादल ग़ाएब हो गये थे;बूँदा-बाँदी रुक गयी थी।
© अनीता सैनी    

8 comments:

  1. सुंदर लघु कथा अनीता जी ,पोशाक से ही संस्कार की पहचान होती हैं ,सादर

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    1. सादर आभार आदरणीया कामिनी दीदी 🙏
      सादर

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  2. वाह!सखी ,सुंदर लघुकथा । लोगों की मानसिकता है ये कि वे पोशाक से संस्कारों को पहचानने की कोशिश करते है ,मेरे ख्याल से अब ये नजरिया बदलना होगा ।

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    1. सादर आभार आदरणीया शुभा दीदी 🙏
      सादर प्रणाम

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  3. बहुत बढ़िया

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    1. सादर आभार आदरणीय सर 🙏
      सादर प्रणाम

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  4. बहुत शानदार लघु कथा। मेरे ख्याल से पोशाक से संस्कारों का कोई लेना-देना नहीं पर हाँ लेना -देना है पोशाक पहनने वाले से ।संस्कारी व्यक्ति चाहता है कि उसके कारण किसी का दिल न दुखे।इसलिए सुविधा हो या ना हो बड़े बुजुर्गों का मान रखने के लिए पोशाक भी उनकी इच्छानुसार पहनता है।
    बहुत ही लाजवाब लघुकथा लिखी आपने अनीता जी! बहुत बहुत बधाई आपको।

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    1. सादर आभार आदरणीय सुधा दीदी सुंदर सारगर्भित समीक्षा हेतु.
      सादर प्रणाम

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