Tuesday, 8 October 2019

मंदसौर में रावण दहन



संयोग ही था कि आज दशहरे के अवसर पर मैंने उसे शुभकामनाएँ देनी चाहीं और वह मेरा मुँह ताकती रही | मन कुछ विचलित-सा हुआ कि कहीं कुछ ग़लत तो नहीं कह दिया | उसने हलकी मुस्कान के साथ कहा-
"हम गाँव से पहली बार बाहर निकले हैं | कुछ ही महीने हुए  हैं जयपुर आये हुए, हमारे वहाँ इस तरह रावण दहन नहीं करते जिस तरह यहाँ जयपुर में  किया जाता है" | 
मेरी उत्सुकता और बढ़ गयी तब मैंने कहा-
"क्यों ?"
उसने कहा-
"वह दामाद था हमारा और दामाद कैसा भी हो, दमाद ही होता है इसीलिए हमारे मध्य प्रदेश में कई स्थान ऐसे हैं जहाँ रावण का दहन नहीं होता है बल्कि उसकी पूजा की जाती है। हमारे मंदसौर में तो लोग रावण को अपने क्षेत्र का दामाद मानते हुए उसकी पूजा करते हैं।वहाँ की बहुएँ  रावण की प्रतिमा के सामने घूंघट डालकर जाती हैं क्योंकि मंदसौर ज़िले को रावण का ससुराल माना जाता है यानी उसकी पत्नी मंदोदरी का मायका। पूर्व में इस ज़िले को दशपुर के नाम से जाना जाता था । हमारे खानपुरा क्षेत्र में रुण्डी नामक स्थान पर रावण की प्रतिमा स्थापित है, जिसके दस सर हैं।" 
उसने आगे कहा-
"दशहरा के दिन यहाँ  के नामदेव समाज के लोग प्रतिमा के समक्ष उपस्थित होकर पूजा-अर्चना करते हैं। उसके बाद राम और रावण की सेनाएँ निकलती हैं। रावण के वध से पहले लोग रावण के समक्ष खड़े होकर क्षमा-याचना करते हैं।"
 वे कहते हैं -
“आपने सीता का हरण किया था इसलिए राम की सेना आपका वध करने आयी है ” 
उसके बाद प्रतिमा स्थल पर अंधेरा छा जाता है और फिर उजाला होते ही राम की सेना उत्सव मनाने लगती है |
उसने और आगे कहा -
"रावण हमारे मंदसौर का दामाद था इसलिए हम महिलाएँ जब प्रतिमा के सामने पहुंचते ही घूंघट डाल लेती हैं। दामाद कैसा भी हो, उसका ससुराल में तो सम्मान होता ही है मगर इसके ऐतिहासिक और धार्मिक ग्रंथों में उदाहरण कहीं नहीं मिलते। सब कुछ परंपराओं, दंतकथाओं और किंवदंतियों के अनुसार चलता आ रहा है।” 
हमारा भी इन परम्पराओं से एक रिश्ता-सा जुड़ गया है जिस तरह यहाँ ख़ुशियाँ मनायी जाती हैं वैसे हमारे गाँव में नहीं मनाई जाती, वह ख़ुश थी या दुखी मैं कुछ समझ नहीं पायी परन्तु कुछ था जो अंदर ही अंदर टूट रहा था परम्परा के नाम पर कुछ अवधारणा के नाम, पर कुछ उन शब्दों के नाम पर जो समाज को तय दिशा दिखाने के लिये लिखे गये हैं | कल्पनाओं से उपजे हैं या यथार्थ की भूमि से उपजे हैं या स्वार्थवश इंसान के अंतरमन से. ... 

©अनीता सैनी 

12 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (09-10-2019) को    "विजय का पर्व"   (चर्चा अंक- 3483)     पर भी होगी। --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
     --विजयादशमी कीहार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  

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    1. सहृदय आभार आदरणीय चर्चामंच पर मुझे स्थान देने हेतु
      प्रणाम
      सादर

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  2. बहुत सुन्दर सृजन अनीता जी ।

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    1. सस्नेह आभार प्रिय मीना बहन
      सादर

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  3. बहुत रोचक जानकारी अनीता जी.
    हमारे ग्रेटर नॉएडा में बिसरख एक कस्बा है. यह मान्यता है कि रावण वहीं का रहने वाला था. बिसरख में दशहरे के अवसर पर रावण-वध नहीं होता है और वहां रावण का एक मन्दिर भी है.

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    1. तहे दिल से आभार आदरणीय सर सुन्दर समीक्षा और एक और रोचक जानकारी साजा करने हेतु
      प्रणाम सर
      सादर

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  4. रावण हमारे मंदसौर का दामाद था इसलिए हम महिलाएँ जब प्रतिमा के सामने पहुंचते ही घूंघट डाल लेती हैं। दामाद कैसा भी हो, उसका ससुराल में तो सम्मान होता ही है


    सुन्दर सृजन अनीता जी ।


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    1. सस्नेह आभार प्रिय ज़ोया बहना सुन्दर समीक्षा हेतु
      सादर

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  5. बहुत सुंदर और सार्थक सृजन 👌

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    1. सस्नेह आभार आदरणीया अनुराधा दीदी जी
      सादर

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  6. प्रिय अनिता, तुम्हारे इस सुंदर लेख पर मैं ना लिखा पायी थी उस समय,मेरी प्रतिक्रिया लंबित थी। मुझे बहुत अच्छा लगा और रावण की ससुराल के बारे में रोचक बातें जानी। सचमुच दामाद को बहुत ऊँचा स्थान मिला है भारतीय संस्कृति में। प्रातः स्मरणीय पंच देवियों में एक मंदोदरी , मंदसौर की बेटी है, ये मंदसौर के लिए गर्व की बात है । रोचक लेख के लिए हार्दिक शुभकामनायें। 💐💐💐💐🌹🌹🌹

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    1. सादर नमन आदरणीया दीदी जी मेरे छोटे से प्रयास को आपने से नवाज़ा. वसे तो आप का स्नेह और सानिध्य हमेशा ही मुझे मिलता रहा है. परन्तु यह लेख लिंक से थोड़ा अलग था. आपकी सराहना से सँबल मिला.
      सादर

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